लेखक परिचय

मनमोहन आर्य

मनमोहन आर्य

स्वतंत्र लेखक व् वेब टिप्पणीकार

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-मनमोहन कुमार आर्य-
marrige

वैदिक व्यवस्था में मनुष्य के जीवन को चार आश्रमों में समयोजित किया गया है। यह आश्रम हैं, ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ एवं संन्यास हैं जिनमें प्रत्येक आश्रम की अवधि सामान्यतः 25 वर्ष निर्धारित है। पहले आश्रम ब्रह्मचर्य में 8-12 वर्ष की अवस्था तक, अथवा कुछ पहले अपने बालक व बालिकाओं को माता-पिता को विद्याध्ययन के लिए गुरूकुल में भेजना होता था जहां वह संस्कृत के आर्श व्याकरण व अन्य वैदिक ग्रन्थों का अध्ययन कर स्नातक बनकर परिवार में आते थे। गुरूकुल में प्रवेश से पूर्व माता-पिता उसके शिक्षक हुआ करतेे थे व बहुत कुछ अध्ययन कराकर उसकी आयु के अनुरूप उसे ज्ञान व व्यवहार की शिक्षा दे देते थे। गुरूकुल में स्नातक बनने पर कुछ स्नातकों का विवाह वहां के आचार्य अपनी देखरेख में अन्य गुरूकुलों की समान गुण-कर्म व स्वभाव की ब्रह्मचारिणी-कन्याओं से दोनों की सहमति से सम्पन्न करा देते थे और वह स्नातक अपनी वधु सहित अपने परिवार में आता था। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि आचार्य व गुरूजी की आज्ञा को दोनों पक्षों के माता-पिता शिरोधार्य कर स्वीकार करते थे। यदि गुरूकुल में विवाह सम्पन्न नहीं होता था तो माता-पिता, आचार्यों के सहयोग से, अपने-अपने पुत्र-पुत्रियों का विवाह योग्य युवक व कन्याओं से अपने घरों पर करते थे। यहां यह जानना आवष्यक है कि प्राचीन समय जिसे वैदिक काल कहते हैं, जन्म पर आधारित वर्तमान की जाति-व्यवस्था नहीं थी जिसमें कोई स्वयं को शर्मा, टण्डन, पाण्डेय, उपाध्याय, शुक्ला, कुलश्रेष्ठ, श्रीवास्तव, रायजादा, चौहान, वर्मा, परिहार, अग्रवाल, गुप्ता, महेश्वरी आदि कहता, कहलवाता व लिखता है। इस जन्म पर आधारित जाति-पांति व्यवस्था का आरम्भ मध्यकाल में हुआ होना सिद्ध होता है। कारण यह है कि रामायण काल में जिन सहस्रों नामों का उल्लेख रामायण में आता है उनमें इस प्रकार के जातिसूचक शब्द जुड़े हुए नहीं है और न ही किसी प्रकार का उल्लेख इस महाकाव्य में है।

महाभारत में भी सहस्रों नामों का उल्लेख है, परन्तु किसी के साथ भी इस प्रकार के जाति सूचक षब्दों का प्रयोग नहीं है। वेदों व अन्य शास्त्रों में भी इस प्रकार के जाति सूचक षब्दों का विधान या उल्लेख देखने को नहीं मिलता है। अतः यह सिद्ध होता है जाति-भेद वाले इन शब्दों का प्रयोग अज्ञानता व अन्धविश्वासों के काल मध्यकाल में आरम्भ हुआ। आज देखा जाता है कि प्रत्येक या अधिकांश व्यक्ति जब विवाह करता है तो वह अपनी जाति-बिरादरी की व्यवस्था, जिसका आधार मध्यकाल की अज्ञान से उत्पन्न वर्ण व्यवस्था का विकार वाली जन्माधारित जाति-व्यवस्था है, में ही करने का प्रयास करता है और अधिकांश विवाह इस ‘सीमित मनुष्य जाति-समाज या समुदाय’ में होते हैं। देखने को मिल रहा है। हमारे पण्डित व पुजारी स्वयं भी अनुसरण करते हैं। वह दूसरों को इसके गुण व दोष के बारे में बता सकते हैं, इसकी अपेक्षा उनसे नहीं की जा सकती। मध्यकाल में मनुष्यों में इतना ज्ञान व बुद्धि, मुख्यतः हमारे पण्डितवर्ग में नहीं थी कि वह विवेक पूर्वक निर्णय ले सकतें अन्यथा इतने अन्धविश्वास व कुरीतियां उत्पन्न हीं न होतीं। वर्तमान आधुनिक समय में हम सोच-समझ कर विवेकपूर्ण निर्णय कर सकते हैं परन्तु गुण-दोषों को जानने पर भी हम सत्य को स्वीकार न कर परम्परा व अन्धविश्वासों से चिपटे हुए हैं जिसमें सम्बन्धित व्यक्ति व समुदायों का स्वार्थ व अज्ञान, दोनों ही कारण हैं। जातिवाद की अन्धपरम्परा के समान ही विवाहों में जन्मपत्रियों के आधार पर भावी वर व वधु के गुण-दोषों का मिलाया जाना है जो पूर्णतः अज्ञान व अविवेक पर आधारित है।

सृष्टि के आरम्भ में ईष्वर ने मनुष्य को इस जन्म जाति से विहीन, केवल मनुष्य के रूप में, बनाया था। उनमें किसी प्रकार का जाति-भेद नहीं था। सभी प्रेम से रहते रहे, विवाह होते रहे, कहीं कोई समस्या नहीं आई, इस प्रकार से लगभग 1.96 अरब वर्ष का समय व्यवतीत हो गया। सृष्टि के आरम्भ काल में हमारे ऋषियों ने वेदों के आधार पर, मनुष्यों के गुण-कर्म-स्वभाव के अनुसार, वर्ण व्यवस्था बनाई जिससे मनुष्य जीवन को सुख पूर्वक व्यतीत करते हुए जीवन के चार पुरूषार्थों व लक्ष्यों धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष को प्राप्त करने में सफलता प्राप्त कर सके। यह आवष्यक था और आज भी है। आजकल कई प्रकार की सामाजिक व्यवस्थायें हैं। कार्यालय में कर्मचारी अनेक पदों पर कार्य करते हैं, सबकी षिक्षा अलग-अलग, वेतन अलग-अलग कार्य भी अलग-अलग हैं और नाना प्रकार के अन्तर या भेदभाव हैं। एक व्यक्ति के लिए यात्रा में रेल की द्वितीय श्रेणी तो अन्यों के एसी3, किसी के लिए एसी2 व एसी1 व वायुयान से यात्रा करने की सुविधा है। क्या यह भेदभाव नहीं है? यह वस्तुतः भेदभाव है और यह अपरिहार्य है। यह व्यक्ति की ज्ञान, कर्म व योग्यता व अनुभव के आधार पर है और आवष्यक व उचित है तभी तो इसका कोई विरोध नहीं कर रहा है। वर्ण व्यवस्था भी इसी प्रकार देश व समाज की उन्नति के लिए आवष्यक थी। इसका तर्क व प्रमाणों से युक्त स्वरूप हमारे सामने हैं। मध्यकाल में इसमें आईं विकृतियां अनुचित थीं जिसे समाप्त किया जाना था जो अब षिथिल पड़ गई हैं। महर्षि दयानन्द के आविर्भाव से पूर्व मध्यकाल में हमारे पण्डित वर्ग ने इसको अधिकाधिक विकृत किया और जन्म पर आधारित जाति-पांति व्यवस्था को प्रचलित किया।

अन्याय कब होता है कि जब कोई साधन सम्पन्न या बलवान, शक्तिशाली व्यक्ति जो पूर्ण ज्ञान न रखता हो, धार्मिक ज्ञान व आध्यात्मिक ज्ञान से षून्य या अपूर्ण हो। वह अपने स्वार्थ व अज्ञानवश ऐसा करता है। हमारे सबके पूर्वज ऋषि-मुनि धर्म, ज्ञान व आध्यात्मिक गुणों में अत्यन्त सक्षम थे। उनके समय में न तो वह स्वयं कोई अनुचित कार्य कर सकते थे और न ही उनके नियन्त्रण व परामर्श से कार्य करने वाले राजा ही ऐसा कुछ समाज के लिए अहितकर कार्य कर सकते थे। सभी वर्णों के कार्य व सेवा निर्धारित होने से कहीं कोई अवरोध व कठिनाई नहीं थी। समाज अन्याय, पक्षपात व षोषण से मुक्त था। विद्या प्राप्ति के सबको समान अवसर उपलब्ध थे। महाभारत काल से कुछ समय पूर्व सामाजिक व्यवस्था में विकार आने आरम्भ हुए जिसकी ओर महर्षि दयानन्द सरस्वती ने संकेत किया है। महाभारत युद्ध में क्षत्रियों के बड़ी संख्या में विनाष को प्राप्त होने पर राज्य व्यवस्था अस्थिर वा रूग्ण हो गई जिससे तत्कालीन पण्डित वा ब्राह्मण वर्गों में भी अज्ञान व आलस्य प्रमाद बढ़ने लगा। इसी का भावी परिणाम मध्यकाल में धर्म-कर्म का वास्तविक स्वरूप आंखों से ओझल हो गया और समाज के बड़े लोगों में अभिमान, अहंकार व स्वार्थ बढ़ने से अन्य वर्णों व लोगों का शोषण, अन्याय, अत्याचार आदि बढ़ने लगे जिसके लिए न तो वेद दोषी हैं और न मनुस्मृति आदि धर्म ग्रन्थ अपितु सत्ताशाली मध्यकालीन लोग उत्तरदायी हैं।

वर्तमान युग आधुनिक काल कहा जाता है। इस समय हमारा भारतीय समाज मुख्यतः उच्च, मध्यम व निम्न वर्ग में विभाजित है। उच्च श्रेणी के लोगों के पास अपनी आवष्यकताओं से कहीं अधिक धन है जिसका वह अविवेक पूर्वक अनाप-शनाप व्यय करते हैं। मध्यमवर्गीय परिवारों के पास जीवनयापन के योग्य या आवश्यकता से कुछ अधिक धन है। वह भी उच्च वर्ग को देखकर उनका अन्धानुकरण करते हैं। यह भी कह सकते हैं कि यह दोनों वर्ग ही विदेशी वा पाष्चात्य विचाराधारा से प्रभावित हैं और ईसाईयत के अनुसार अपना धार्मिक व्यवहार न करने पर भी विवाह आदि में इनके कार्यकलाप पाश्चात्य लोगों की ही भांति पाप-नाच-डांस व संगीत आदि वाले होते है। हमने आजकल विवाहों की बारातों, कन्या पक्ष के घर या विवाह स्थल अथवा वर पक्ष के प्रीतिभोज आदि के अवसरों पर डीजे व आरकेस्ट्रा के प्रयोग में देखा है कि वहां दोनों पक्षों के लोग युवा तो युवा वर वधु के माता-पिता तक नाचते हैं। यह आधुनिक सामाजिक विकृति है जो संशोधनीय एवं सुधार की अपेक्षा रखती है।

वर वधु के परिचित व मित्र-मण्डली के लोग भी इस नृत्य या डांस में भाग लेते हैं। कुछ युवा व वृद्ध वहां मदिरापान कर डांस कर रहे भी होते हैं। उस वातावरण में हम जैसे लोगों को घुटन होती है। कारण यह होता है कि हमारी धर्म, संस्कृति व सभ्यता व हमारे वैदिक संस्कार हमें इस प्रकार से डांस करने की अनुमति नहीं देते। हमारी घुटन व बेचैनी का कारण सामाजिक पतन की स्थिति होता है। हमने टंकारा में एक बार स्वामी जगदीश्वरानन्द सरस्वती के प्रवचन में सुना था कि जब हमारे कुलीन घरों की स्त्रियां, देवियां व पुत्रियां सड़कों पर वा विवाह आयोजन स्थलों पर पुरूषों के साथ डांस करती हैं तो हमें लज्जा आती है और हमारा सिर इस कृत्य से लज्जा से झुक जाता है। यदि युवा व बड़े स्त्री-पुरूष विवाह स्थल तथा सड़कों पर डांस करें तो इसमें बुराई क्या है? हमें लगता है कि डांस का विवाह से कोई सम्बन्ध नहीं है। यदि डांस नहीं होगा तो ऐसा नहीं है कि विवाह संस्कार में बाधा आयेगी। ऐसा नहीं है कि डांस भी विवाह संस्कार का एक आवष्यक अंग या भाग है। यदि ऐसा होता तो हमारे स्वामी दयानन्द सहित हमारे ऋषियों जिन्होंने संस्कारों के विधान किये हैं, वह अवश्य ही विवाहों में इस प्रकार के डांसों का विधान करते। इसके अतिरिक्त वेदों के मन्त्रों में भी विवाहों आजकल की तरह का डांस करने का विधान उपलब्ध होता। ऐसा न होना, डांस को अनुचित व अनावश्यक ठहराता है। इसका पहला कारण तो इसका न तो विवाह से सम्बन्ध है और न हि इसकी किसी प्रकार की आवष्यकता है। हमारी संस्कृति व सभ्यता स्त्री व पुरूषों के एक साथ, एक स्थान पर नृत्य व डांस करने के विरूद्ध है। इससे समाज में विसंगतियां उत्पन्न होती हैं। यह जो लोग डांस कर रहे होते हैं यह लोग अपनी किसी आवश्यकता की पूर्ति करते हैं या दूसरों की आवश्यकता की पूर्ति करते हैं। डांस करने वालों को डांस करके आखिर मिलता क्या है? हमें लगता है कि यह विदेशी सभ्यता की देन है और हमारे युवा बिना सोचे समझे, अविवेकपूर्वक अज्ञानतावश इसका व्यवहार कर रहे हैं। इसको रोका जाना चाहिये, अन्यथा संस्कृति व सभ्यता का ह्रास कहां जाकर रूकेगा, कह नहीं सकते।

हम यहां यह भी स्पष्ट करना चाहते हैं कि हमें व्यक्तिगत रूप से इस डांस से कोई द्वेष नहीं है अपितु यह हमारी धर्म, संस्कृति व सभ्यता व पूर्वजों की मान्यताओं, सिद्धान्तों व मर्यादाओं के विरूद्ध होने से हमें अस्वीकार्य है। हम नई पीढ़ी के उन युवक-युवतियों से कहना चाहते हैं कि इस डांस के उपयोगी, आवश्यक व लाभदायक पक्षों से हमें अवगत करायें जिससे हम उस पर विचार कर सकें। हमारी दृष्टि में एक उदाहरण आया है। एक व्यस्क कन्या किसी युवक की बारात में अन्य प्रदेश में गई। वहां उसे कोई युवक दिखा। परस्पर बाते हुई होगीं। लौटने पर उसने अपने माता-पिता को उस युवक से विवाह करने के लिए कहा। माता-पिता सहमत नहीं हुए तो उसने अपने एक हाथ की नसें काट डालीं। अस्पताल ले जाया गया, जहां उसकी जान बच गई। माता-पिता ने फिर समझाया परन्तु वह नहीं मानी। युवक के परिवार से सम्पर्क करने पर वह मान गये। एक आर्य समाज मन्दिर में उसका विवाह करा दिया गया और विवाह को कानूनी रूप से पंजीकृत भी करा दिया गया। युवक कन्या से कम उम्र का है। इस विवाह का भविष्य क्या होता है, अभी कुछ नहीं कहा जा सकता। इतना ही कह सकते हैं कि वर-वधु ने बहुत जल्दबाजी में भावनाओं में बहकर विवाह का निर्णय किया। हो सकता है कि उनका गृहस्थ जीवन सफल हो। हमें न तो विवाह से कोई आपत्ति है, न दोनों के भिन्न-भिन्न प्रदेशों का होने से और न ही दोनों की भिन्न मातृभाषाओं के होने से। हम तो इन सबके समर्थक हैं। महर्षि दयानन्द स्वयं भाषा, क्षेत्र, प्रदेश आदि के आधार पर अन्तर या भेदभाव के विरूद्ध थे। वह विधान करते हैं कि कन्या व वर के गुण-कर्म-स्वभाव समान होने चाहिये। ऐसा होने पर ही विवाह सफल होता है। हमें लगता है कि आयुर्विज्ञान के अनुसार विवाह में आयु का भी महत्व है जिसका उल्लेख मनुस्मृति व सत्यार्थ प्रकाष तथा संस्कार विधि आदि ग्रन्थों में उपलब्ध है। आधुनिक आयुर्विज्ञान व चिकित्सकीय ज्ञान के आधार पर हमारे शास्त्रों में विवाह योग्य आयु व वर व वधु की आयु में अन्तर का जो विधान किया गया है, उस पर अनुसंधान, षोध आदि किया जा सकता है।

अब हम वर्तमान में अन्तरजातीय विवाह कहलाने वाले रूढ़ शब्द के पक्ष व विपक्ष पर विचार करते हैं। अन्तर्जातीय विवाह उन विवाहों को कहा जाता है जिसमें वर्तमान में प्रचलित जन्म पर आधारित जाति से बाहर अन्य जाति में विवाह होता है। इस प्रकार के विवाहों में वर व वधु की जन्म पर आधारित जातियां भिन्न-भिन्न होती है। सम्प्रति हिन्दू समाज और आर्य समाज दोनों ही अधिकांशतः इस जन्म पर आधारित जाति में ही विवाह सम्बन्ध करते हैं जो आर्य समाज की विचारधारा व मान्यताओं के विपरीत है। एक जाति में विवाह होने से यह सुविधा होती है कि दोनों में कुछ सम्बन्धी परस्पर परिचित होते हैं। दूसरी सुविधा यह होती है कि भविष्य में यदि वर-वधु में किसी प्रकार के मतभेद, विरोध या कलह हो जाये तो परस्पर परिचित मित्र एक दूसरे को समझा कर उन्हें सहमत कर विवाद को निपटा सकते हैं। अज्ञानता के कारण परिवार वालों को एक ही जाति में ऐसे विवाह को करने में अन्तर्जातिय विवाह की तुलना में अच्छा लगता है। दोनों कुलों के समान रीति-रिवाज आदि भी ऐसे विवाहों में सहायक होते है। यह कुछ लाभ एक जाति में विवाह करने पर दिखाई देते हैं। परन्तु इससे हानियां भी अनेक हैं जो साधारण बुद्धि वाले पढ़े-लिखें लोगों को भी दिखाई नहीं देती है। अन्तर्जातिय विवाह में अनेक लाभ हैं। जन्म पर आधारित जाति से समाज एक प्रकार से जाति समूह में बंट जाता है। सब अपने को श्रेष्ठ मानते हैं, श्रेष्ठ शायद हि इनमें केाई हो, सब दूसरों को अपने से निम्न मानकर व्यवहार करते हैं। यथार्थ स्थिति यह है कि मनुष्य श्रेष्ठ या निम्न वा नीच अपने गुण, कर्म व स्वभावों से होता है। जिसके गुण, कर्म व स्वभाव श्रेष्ठ हैं वह अच्छा व बड़ा व जिसके गुण, कर्म व स्वभाव हेय हैं वह साधारण व्यक्ति होता है। इस हेय के पास धन व सम्पत्ति कितनी भी अधिक क्यों न हो वह श्रेष्ठ गुण, कर्म व स्वभाव वाले व्यक्ति के समकक्ष कदापि नहीं हो सकता। ईश्वर की दृष्टि में श्रेष्ठ कौन है? श्रेष्ठ वह है जो ईश्वर, जीव व प्रकृति के स्वरूप को यथार्थ स्वरूप से जानता है। ईष्वर की उसके यथार्थ स्वरूप को जानकर योग के अनुसार ध्यान व चिन्तन द्वारा स्तुति, प्रार्थना व उपासना करता है। प्रतिदिन प्रातः व सायं यज्ञ करता है। माता-पिता का सम्मान, आदर करने के साथ उनकी आवष्यकता की सभी वस्तुओं को जिनमें उनका भोजन, वस्त्र, चिकित्सा, आश्रय सम्मिलित हैं, श्रद्धापूर्वक करता है। अतिथि व बलिवैश्वदेव यज्ञ नित्य प्रति करता है। भ्रष्टाचार से सर्वथा रहित एवं मांस, अण्डे व मदिरा का किसी भी स्थिति में सेवन नहीं करता। जुआं की आलोचना करता है। पुरूषार्थी हो व सुशिक्षित हो। अन्धविश्वासी, पाखण्डी, फलित ज्योतिष को मानने वाला न हो, कुरीतियों से दूर हो, ऐसे व्यक्ति ही श्रेष्ठ होते हैं भले ही वह किसी निर्धन व किसी भी प्रकार के कार्य को करने वाले के यहां जन्मे हों। इस पर और अधिक भी कहा जा सकता है परन्तु हम समझते हैं कि श्रेष्ठ व अश्रेष्ठ का इस आधार पर निर्धारण किया जा सकता है। यहां यह कहना भी उचित होगा कि विवाह वैदिक या आर्य पुरोहित से ही करायें जो महर्षि दयानन्द रचित संस्कार विधि से विवाह संस्कार सम्पन्न कराते हैं। अन्य विधियां अपूर्ण, खर्चीजी व सटीक नहीं हैं एवं अधिक समय लेती हैं जो उद्देश्य की पूर्ति में साधक न होकर बाधक होती हैं। जहां तक सम्भव हो संस्कार गोधूली वेला में कराया जाये। रात्रि में सूर्यास्त के पष्चात किसी संस्कार का मुहूर्त नहीं होता है।

यदि किसी व्यक्ति में यह सब गुण या अधिकांश गुण हों और वह कन्या के गुण से मिलते हों, समानता रखते हों तो फिर उनका परस्पर विवाह होने में शास्त्रों की किसी प्रकार से अवमानना नहीं होती, बल्कि ऐसा करना ही शास्त्रों की आज्ञा के अनुरूप होता है। समाज के अधिकांश व सभी लोग सत्य से अनभिज्ञ हैं। इसी कारण विरोध होता है। इनका प्रचार होना चाहिये। परन्तु बाधा यह है कि जिन्हें प्रचार करना है, वही इसमें बाधक है। बाधक होने का कारण उनका स्वार्थ व अज्ञान दोनों ही है। अज्ञान तो दूर किया जा सकता है परन्तु स्वार्थ तो संस्कारों की शुद्धि से ही दूर होगा। इसके लिए वेद, वैदिक साहित्य तथा आर्य समाज की शरण में आना आवश्यक है। आर्य समाज के सिद्धान्तों से दूर रहने से अज्ञानता छायी रहेगी और आर्य समाज के सिद्धान्तों के अध्ययन व स्वाध्याय से अज्ञानता व स्वार्थ दोनों ही दूर होगें। ईश्वर के सच्चे स्वरूप को जान कर स्तुति, प्रार्थना व उपासना करने से भी स्वार्थ के संस्कारों पर प्रभाव होता है और व्यक्ति इनसे मुक्त हो सकता है। रोग का उपचार तो तभी होगा जब रोगी को पता हो कि वह रोगी है। अतः जन्म की जाति में विवाह का आग्रह नहीं किया जाना चाहिये, जन्मपत्री आदि न मिलाकर गुण, कर्म व स्वभावों को मिलाना चाहिये, फलित ज्योतिष में विष्वास नहीं करना है और विवाह को अधिक से अधिक मितव्ययता से करना चाहिये। बैण्ड-बाजे की आवश्यकता नहीं है। सड़कों पर विवाह स्थल पर डांस करना अनावश्यक व अनुचित है। भोजन में अधिक संख्या में व्यंजन न बनाकर कर स्वास्थ्य की दृष्टि से लाभकारी भोजन की व्यवस्था करनी चाहिये। विवाह यदि आर्य समाज मन्दिरों में सम्पन्न करायें तो यह काफी सस्ता हो सकता है। आज आर्य समाज को भी अपना कायाकल्प रने की आवश्यकता नहीं। हमें दुख से कहना पड़ता है कि आज के आर्य समाज महर्षि दयानन्द की परिकल्पना वाले समाज नहीं हैं। यहां अनेक बुराइयां आ गईं हैं जिन्हें दूर करना है जिससे यहां आने वाला व्यक्ति प्रसन्न हो और औरों को भी प्रेरित करें। आर्य समाज के अधिकारियों को अपने व्यवहार पर भी ध्यान देना चाहिये। व्यवहार आर्योचित ही होना चाहिये।

हमने विवाह से जुड़े कुछ प्रष्नों पर वेदों और आर्य समाज की विचार के आधार पर विचार किया है। पाठक सत्य का ग्रहण व असत्य का त्याग करें। धर्म व संस्कृति के विपरीत व्यवहार व आचरण किंचित न करें। समाज में स्वस्थ परम्पराओं की स्थापना हो, यह हमें अभीष्ट है।

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1 Comment on "विवाह और इसकी कुछ विकृतियां"

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ken
Guest

Very good,

Here are some article related link.

One may spread Wiki general and scientific knowledge in Hindi through translation.

http://en.wikipedia.org/wiki/Marriage
http://en.wikipedia.org/wiki/Divorce
http://www.cdc.gov/nchs/nvss/marriage_divorce_tables.htm

આઓ મિલકર સંકલ્પ કરે,
જન-જન તક ગુજનાગરી લિપિ પહુચાએંગે,
સીખ, બોલ, લિખ કર કે,
હિન્દી કા માન બઢાએંગે.
ઔર ભાષા કી સરલતા દિખાયેંગે .
બોલો હિન્દી લેકિન લિખો સર્વ શ્રેષ્ટ નુક્તા/શિરોરેખા મુક્ત ગુજનાગરી લિપિમેં !

ક્યા દેવનાગરી કા વર્તમાનરૂપ ગુજનાગરી નહીં હૈ ?
http://youtu.be/d5gCPwhj-No

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