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ललित गर्ग

ललित गर्ग

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153वें मर्यादा महोत्सव- 3 फरवरी, 2017

– ललित गर्ग

भारत की वसुंधरा ऋषिप्रधान है। भारतीय संस्कृति में दो प्रकार की पद्धतियों का प्रचलन हैµ एक है श्रमण संस्कृति, और दूसरी है वैदिक संस्कृति। दोनों ही संस्कृतियों में अनेक पर्व, उत्सव मनाए जाते है। पर्व, उत्सव क्यों मनाए जाते है? क्योंकि इन उत्सवों के माध्यम से व्यक्ति अपने उत्साह की अभिव्यक्ति तो करते ही हंै साथ ही साथ नई सोच, नए विचारों, नई स्फुरणा को जन्म देते हैं। उत्सवों के माध्यम से सृजनात्मक एवं रचनात्मक शक्ति का प्रस्फुटन भी होता है। जैन समाज का एक छोटा-सा आम्नाय तेरापंथ धर्मसंघ अपनी अनूठी सोच एवं मर्यादित कार्यप्रणाली के कारण अग्रणी है। ‘तेरापंथ’ शब्द के पीछे जुड़ा है आचार्य भिक्षु का बलिदान एवं तपोमय जीवन।
संसार में चल रहे अनैतिकता के माहौल में नैतिकता की दीपशिखा प्रज्ज्वलित करने वाले लौहपुरुष आचार्य भिक्षु ने अपने प्रतिभा ज्ञान के द्वारा तेरापंथ को उन्मुक्त आकाश में विहरण की अनूठी शक्ति प्रदान की। सत्यशोध की प्रवृति में निरंतर गतिशील चरण है तेरापंथ। अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाला है तेरापंथ। आचार विचार की शुद्धि की मूलभित्ति है तेरापंथ।
आचार्य भिक्षु ने अपने धर्मसंघ की एकता और पवित्रता बनाए रखने के लिए कर्तव्य-अकर्तव्य, विधि-निषेध की सीमा स्थापित की, जिसे मर्यादा नाम से जाना जाता है। उनके द्वारा निर्मित अंतिम मर्यादा सं. 1859 माघ शुक्ला सप्तमी को हुई। प्रश्न उपस्थित हुआ मर्यादा क्या? मनुष्य ने जब से समूह में रहना सीखा, उसने नियंत्रण, अनुशासन और सीमा-रेखाओं का भी निर्माण किया। जैसे-जैसे उसने विकास की दिशा में चरण न्यास किया उन सीमाओं, मर्यादाओं की उपयोगिता अधिक समझ में आने लगी। परिवार हो या समाज, राजनीति हो या या धर्मनीति, जाति समुदाय हो या धार्मिक संगठन- अनुशासन-मर्यादा के खाद पानी के बिना उनके पनपने और फलने-फूलने की कल्पना भी नहीं की जा सकती। एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति की, एक समाज दूसरे समाज की एवं एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र की स्वतत्रंता न छीने इसी का नाम है मर्यादा। मर्यादा वह पतवार है जो व्यक्ति को आकाशीय ऊँचाइयों तक पहुँचा देता है। मर्यादा संयममय जीवन जीने की जीवन शैली का नाम है। उच्छृंखलता पर अंकुश की लगाम है मर्यादा। अहं के बिखराव का नाम है मर्यादा। विनम्रता और सहिष्णुता मर्यादा के सुरक्षा कवच है। मन के घोड़े की लगाम को वशीकरण करने का महामंत्र है मर्यादा। सूर्य पूर्व दिशा में उदित हो सायं पश्चिम दिशा में अस्त हो जाता है। समय के प्रबंधन का नाम है मर्यादा। मर्यादा वह मशाल है जो जिंदगी को जगमगा देती है। मर्यादा वह ऊष्मा है जो शीतकाल की ठंडी बयार को सहन कर सके।
इन्हीं मर्यादाओं को सुदृढ़ बनाने एवं इनको हर वर्ष दोहराने के उद्देश्य से मर्यादा महोत्सव का आयोजन किया जाता हैं। मर्यादा-महोत्सव दुनिया का अनूठा उत्सव एवं विलक्षण पर्व है। तेरापंथ धर्मसंघ की ऐतिहासिक परम्परा से जुड़ा यह पर्व लौकिक पर्व नहीं है। इस दिन राग-रंग, नाच गाना, विशाल भोज, मनोरंजन का कोई आयोजन नहीं होता है। सिर्फ सामुदायिक चेतना के अभ्युत्थान की संयोजना में धर्मसंघ का दिल और दिमाग नए आदर्शों को अनुशासना से जोड़ता है। इस पर्व पर साधुता की तेजस्विता, कर्तृत्व की कर्मण्यता और निर्माण की निष्ठा का प्रशिक्षण होता है। पूरे धर्मसंघ की आचार्य द्वारा सारणा-वारणा की जाती है। इस वर्ष का मर्यादा महोत्सव वर्तमान आचार्य श्री महाश्रमण के सान्निध्य में सिलीगुड़ी (प. बंगाल ) में 1-2-3 फरवरी 2017 को भव्य रूप में आयोजित हो रहा है।
तेरापंथ की गतिविधियों का नाभि केंद्र है। मर्यादा महोत्सव का केन्द्रीय विराट आयोजन संघ के अधिशास्ता आचार्य की पावन सन्निधि में समायोजित होता है। इसकी पृष्ठभूमि चातुर्मास की समाप्ति के साथ ही शुरू हो जाती है। प्रस्तुत वर्ष का मर्यादा महोत्सव कहां मनाना है यह घोषणा आचार्य द्वारा काफी समय पहले ही हो जाती है। देश-विदेश में विहार और धर्म प्रचार करने वाले सैंकड़ों साधु-साध्वियां और समण-समणियां महोत्सव स्थल पर गुरु सन्निधि में पहुंच जाते हैं। गुरु दर्शन करते ही अग्रगण्य साधु-साध्वियां स्वयं के पद को और स्वयं को विलीन कर विराटता का अनुभव करते हैं।
मर्यादा महोत्सव तेरापंथ का महाकुंभ मेला है, जिसमें इसमें शिक्षण-प्रशिक्षण, प्रेरणा-प्रोत्साहन, अतीत की उपलब्धियों का विहंगावलोकन, भावी कार्यक्रमों का निर्धारण आदि अनेक रचनात्मक प्रवृत्तियां चलती हैं। सब साधु-साध्वियां अपने वार्षिक कार्यक्रमों और उपलब्धियों का लिखित और मौखिक विवरण प्रस्तुत करते हैं। श्रेष्ठ कार्यों के लिए गुरु द्वारा विशेष प्रोत्साहन मिलता है। कहीं किसी का प्रमाद, मर्यादा के अतिक्रमण का प्रसंग उपस्थित होता है तो उसका उचित प्रतिकार होता है। संघ की यह स्पष्ट नीति है कि किसी की कोई गलती हो जाए तो उसको न छुपाओ, न फैलाओ, किन्तु उसका सम्यक् परिमार्जन करो, प्रतिकार करो।
मर्यादा महोत्सव का एक अतिभव्य, नयनाभिराम या रोमांचक दृश्य होता है-बड़ी हाजरी का। उसमें सब साधु-साध्वियां दीक्षा क्रम से पंक्तिबद्ध खड़े होते हैं और संविधान पत्र का समवेत स्वर में उच्चारण करते हैं। इस हाजरी में आचार्य केन्द्र में रहते हैं। उनको तथा विराट धर्म परिषद को घेर कर धवलिमा बिखेरती वृत्ताकार वह कतार ऐसी लगती है मानो धर्म और अध्यात्म के सुरक्षा प्रहरी श्वेत सैनिकों ने सम्पूर्ण आत्मविश्वास के साथ अपना मोर्चा संभाल लिया है। अध्यात्म चेतना या मानवता की सुरक्षा का मजबूत परकोटा बन गया है, ऐसा प्रतीत होता है। इसके पश्चात आचार्यश्री के निर्देशानुसार समस्त साधु-साध्वियां आचार, मर्यादा, अनुशासन, संघ व संघपति के प्रति अपनी अगाध आस्था अभिव्यक्त करते हैं। तेरापंथ में शिष्य बनाने और आचार्य पद पर नियुक्ति करने का अधिकार एक मात्र आचार्य के हाथों में सुरक्षित है। इससे अयोग्य दीक्षा और अयोग्य हाथों में प्रशासन की बागडोर आना, ये दोनों ही समस्याएं समाहित हो गई। तेरापंथ की शासन प्रणाली न एक तंत्रीय है, न प्रजातंत्रीय, यह गुरु तंत्रीय शासन प्रणाली से संचालित है। इसीलिए यह घोष जन-जन के मुख पर मुखरित है- ‘‘तेरापंथ की क्या पहचान? एक गुरु और एक विधान।’’
किसी न किसी धर्म और सम्प्रदाय से जुड़कर वर्ष का हर दिन कोई न कोई त्योहार बन जाता है। लेकिन मर्यादा महोत्सव का त्योहार मनोरंजन का प्रतीक नहीं हैं, बल्कि उसकी अगवानी में व्यक्तित्व विकास के आदर्शों की अनगिनत योजनाएं सिमटी हुई रहती हैं। इनके बहाने लोग घर-आंगन को ही नहीं, अपने आस-पास जड़ चेतन सभी को संवारते, सजाते एवं उनमें प्राणवत्ता भरने का प्रयास करते हैं। ऐसे दिन प्रेरणा भरते हैं सनातन और नवीनतम युगीन संस्कृति एवं संस्कारों की समन्विति में। कहीं नया जोड़ा जाता है तो कहीं पुराने का सम्मान होता है।
तेरापंथ धर्मसंघ तेजस्वी संघ है, यह तैजस की आराधना का केन्द्र हैं। उसकी तेजस्विता के स्रोत हैं- आत्मानुशासन, आत्म निंयत्रण और आत्म संयम की प्रबल भावना। एक आचार, एक विचार और एक समाचारी के लिए तेरापंथ प्रख्यात है। वह संघ स्वस्थ और चिरंजीवी होता है, जिसका प्रत्येक सदस्य स्वस्थ संतुष्ट हो, प्रसन्न हो। मर्यादाओं के निर्माण के पीछे आचार्य श्री भिक्षु का यही पवित्र दृष्टिकोण रहा था। उन्होंने लिखा- न्याय, संविभाग और समभाव की वृद्धि के लिए मैंने ये मर्यादाएं लिखी है। आपसी कलह और सौहार्द की कमी संगठन की जड़ों को कमजोर बनाते हैं। भिक्षु की मर्यादाओं और व्यवस्थाओं का ही प्रभाव है कि तेरापंथ संघ में कलह, घरेलु झगड़े पनप भी नहीं सकते। तेरापंथ में गुरु शिष्यों का संबंध अनुपम है। वे विनय और वात्सल्य भाव के सुदृढ़ स्तम्भों पर टिके हुए हैं। साधु-साध्वियों का विनय, समर्पण, श्रद्धा, भक्ति और अहंकार-ममकार से मुक्त संयमी जीवन भी जन-जन के लिए कम आकर्षण का विषय नहीं है। इसका कारण है आज्ञा, मर्यादा, अनुशासन और गुरु निष्ठा उनके रोम-रोम में श्वास-प्रश्वास में रमी हुई है। तेरापंथ धर्मसंघ एवं उसकी मर्यादाएं आज विभिन्न धार्मिक संगठनों एवं सम्प्रदायों के लिये अनुकरणीय है।
श्रीराम द्वारा लंका-विजय के अभिक्रम में सेतु निर्माण का कार्य गति पर था। वानरों द्वारा फैंका गया हर पत्थर समुद्र पर तैर रहा था, क्योंकि समुद्र में फैंके जा रहे प्रत्येक छोटे बड़े पाषाण पर राम नाम अंकित था। श्रीराम ने सोचा जब मेरे नाम से पत्थर पानी पर तैर रहे हैं तो स्वयं मेरे हाथों से फैंका गया पत्थर तो जरूर तैरेगा। राम ने समुद्र में पत्थर डालने शुरू किये। किन्तु यह क्या? राम के हाथों डाले गये सारे पत्थर पानी के तल में जा रहे थे। डूब रहे थे। आश्चर्य के साथ राम ने वानर सेना की ओर निहारा। वानर गण ने कहा-महाराज यही तो रहस्य है जो राम नाम का सहारा ले लेता है वह समस्याओं के उफनते सागर को भी पार कर लेता है किन्तु जो आपके हाथ से छूट जाता है वह डूब जाता है। तेरापंथ धर्मसंघ के प्रत्येक सदस्य के अन्तःकरण में ऐसे ही संस्कारों के मंत्राक्षर अंकित हैं कि मर्यादा-अनुशासन की सीमा में रहने वाला विकास की अमाप ऊंचाइयों का स्पर्श कर लेता है और जो मर्यादा से मुक्त होने का प्रयत्न करता है, वह पतन के द्वार खोल लेता है।
किसी न किसी धर्म और सम्प्रदाय से जुड़कर वर्ष का हर दिन कोई न कोई त्योहार बन जाता है। त्योहार सिर्फ मनोरंजन का प्रतीक ही नहीं होता, उसकी अगवानी में व्यक्तित्व विकास के आदर्शों की अनगिनत योजनाएं सिमटी हुई रहती हैं। इनके बहाने लोग घर-आंगन को ही नहीं, अपने आस-पास जड़ चेतन सभी को संवारते, सजाते एवं उनमें प्राणवत्ता भरने का प्रयास करते हैं। ऐसे दिन प्रेरणा भरते हैं सनातन और नवीनतम युगीन संस्कृति एवं संस्कारों की समन्विति में। कहीं नया जोड़ा जाता है तो कहीं पुराने का सम्मान होता है।
तेरापंथ धर्मसंघ का मर्यादा महोत्सव मात्र मेला ही नहीं है, सैकड़ों प्रबुद्ध साधु-साध्वियों के मिलन की अनूठी घटना है। वह मात्र आयोजनात्मक ही नहीं, वह संघ के फलक पर सृजनशीलता के नये अभिलेख अंकित करता है। महोत्सव के समय ऐसा लगता है मानो नव निर्माण के कलश छलक रहे हैं, उद्यम के असंख्य दीप एक साथ प्रज्वलित हो रहे हैं। हर मन उत्साह से भरा हुआ, हर आंख अग्रिम वर्ष की कल्पनाशीलता पर टिकी हुई और हर चरण स्फूर्ति से भरा हुआ प्रतीत होता है। यह महापर्व पारस्परिक संबंधों को प्रगाढ़ता प्रदान करता है। उनमें अंतरंगता लाता है। अनेकता में एकता का बोध कराता है। मर्यादा महोत्सव संघीय चेतना का अदृश्य वाहक है। इसमें वैयक्तिक और संघीय गति, प्रगति एवं शक्ति निहित है। स्वयं को समग्र के प्रति समर्पित करने का अनूठा महोत्सव है यह। इसका संदेश है स्वयं को अनुशासित करो, प्रकाशित करो और दूसरों को प्रेरणा दो। अपेक्षा है एक धर्मसंघ में मनाया जाने वाला यह अनूठा पर्व, समग्र मानवता का उत्सव बने।
बहुत वर्षों बाद कभी ऐसा अवसर आता है जब सभी ग्रह-नक्षत्र एक समय एक साथ मिलकर ऊर्जा को संवर्धित करते हैं। पर तेरापंथ धर्मसंघ में तो प्रतिवर्ष ऐसा अवसर उपलब्ध होता है। इसलिए यह मर्यादा महोत्सव अनेक उत्सवों और संभावनाओं को अपने में समेटे आकर्षण का केन्द्र बना हुआ है। इस दिन सब कुछ अभिनव, आकर्षक, जीवंत एवं प्रेरणादायी होता है।
राष्ट्र की वार्तमानिक परिस्थितियों में फैलता वैचारिक प्रदूषण, आर्थिक अपराधीकरण, रीति-रिवाजों में पाश्चात्य संस्कृति का अनुसरण, धार्मिक संस्कारों से कटती युवापीढ़ी का रवैया, समाज में बढ़ता सत्ता, प्रतिष्ठा और पैसे का अंधाधुंध आकर्षण जैसे जीवन-संदर्भों के साथ किसी भी कीमत पर समझौता न कर हम समझ के साथ संस्कृति को योगक्षेम देने का संकल्प करें। तभी मर्यादा-महोत्सव संघ को बुनियाद पर समाज और राष्ट्र को नई प्रतिष्ठा, नई दिशा दे सकेगा।

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