लेखक परिचय

मनोहर पुरी

मनोहर पुरी

करीब चालीस वर्षों से पत्रकारिता में व्यस्त। विशेष संवाददाता, सह संपादक, संपादक के पद पर रह चुके हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापन। दो सौ से अधिक वार्ताओं, संसद समीक्षाओं और समसामयिक टिप्पणियों का प्रसारण। पांच सौ से अधिक कहानियाँ, कविताएँ, व्यंग्य एवं समसामयिक लेख देश विदेश की ख्याति लब्ध पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित। समालोचनात्मक, सृजनात्मक, विवरणात्मक लेखन में रुचि।

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-मनोहर पुरी- corruption-
हमारे पर्वूजों ने बहुत सोच-समझकर यह कहावत बनाई होगी कि काजल की कोठरी में कितना ही सयाना व्यक्ति जाये उसके ऊपर एक लकीर कालिख की लगनी अनिवार्य है। सर्वविदित है कि राजनीति ऐसी ही काजल की कोठरी है। इसमें आने वाले व्यक्ति को अपने चाल चेहरे और चरित्र के विषय में लंबे-चौड़े व्यक्तव्य देने से पहले ही यह सोच लेना चाहिए कि इसकी कालिख से बच पाना संभव ही नहीं। इतिहास इस बात का साक्षी है कि ऐसे दावे करने वाले असंख्य लोग बडे़ बेआबरू हो कर इस कूचे से निकले हैं। महान सत्यवादी महात्मा गांधी से लेकर ऐवैं मल चतुर्वेदी तक इससे बच नहीं पाये। वर्षों पहले ही विचारकों ने यह सत्य उजागर कर दिया था कि शक्ति भ्रष्ट करती है और असीमित शक्ति असीमित रूप से भ्रष्ट करती है। राजनीति उसी सत्ता की पहली सीढ़ी होती है।
गत दिनों दिल्ली में एक भ्रष्टाचार विरोधी सम्मेलन हुआ। उसकी कोख से एक अनचाहे राजनीतिक दल ने जन्म लिया जिस के नेताओं ने दिन रात अपने अपने तौर पर अपने साफ सुथरे और साधारण आदमी वाले चेहरों को जनता के सामने प्रस्तुत किया। प्रारम्भ में ही आन्दोलन के जनक ने इस नव शिशु दल का मुंह देखने से ही इन्कार कर दिया। इस दल ने बहुत ही जोर शोर से हर मनचाहे नेता के कपड़े उतारने का जिम्मा अपने ऊपर ले लिया। जल्दी ही ज्ञात हो गया कि वे लोग पैसा लेकर इस प्रकार के काम करते रहे हैं। यह राजनीति में दूसरों को उनका चेहरा आइने में दिखाने के विशेषज्ञ माने जाने लगे परन्तु इन्होंने स्वयं अपना चेहरा दर्पण में देखने से साफ इन्कार कर दिया।
सादा साधारण जीवन व्यतीत करने का दंभ भरने वाले इस दल के नेता कैमरे में यह स्वीकार करते पाये गये कि वायुयान में वे साधारण श्रेणी में यात्रा नहीं करते और बड़े होटलों में भी उन्हें अपने ठहरने के लिए डीलक्स कमरों की दरकार रहती है। इतना ही नहीं वह अपने आयकर के नियम अपने आप बनाते हैं और अपनी इच्छा के अनुरूप आयकर चुकाते हैं। किसी को इस बात पर अपत्ति नहीं होनी चाहिए कि कोई नेता अपने किसी व्यक्तिगत कार्य के लिए कितना पारिश्रमिक लेता है। वह अपने लिए क्या क्या सुविधायें चाहता है। वह आयकर के नियमों को तोड़कर नकद राशि स्वीकार करता है। परन्तु केवल इस बात को स्वीकार करना कठिन होता है कि वह किसी साधारण आदमी का प्रतिनिधि होने का दावा कैसे कर सकता है। जिस देश में आधी से अधिक जनसंख्या गरीबी की रेखा से नीचे जीवनयापन करने के लिए विवश है। उनका प्रतिनिधि जो स्वयं को उनके बीच का ही व्यक्ति मानता है। आखिर क्या कहना चाहता है? क्या हमारी आम जनता वायुयान में यात्रा करती है और बड़े होटलों के डीलक्स कमरों में ठहरती है?
इस दल के नेताओं ने यह भी बताने की जहमत नहीं उठाई कि आज तक उन्होंने जिन जिन लोगों पर कीचड़ उछाली उसके लिए उन्होंने कितने लोगों से कुछ स्वीकार किया अथवा नहीं। क्योंकि यह तो उन्होंने माना है कि वह किसी को भी झूठा बदनाम करने के लिए अपने आदमी भेजने के लिए तैयार हो जाते हैं। उन्होंने यह भी स्वीकार किया है कि चुनाव में उतरने के लिए अच्छी खासी रकम की आवश्यकता होती है। यह राशि ईमानदारी से कैसे उनके पास आयेगी इसका ब्यौरा उन्होंने नहीं दिया। स्मरणीय है कि एक केन्द्रीय सरकार को पदस्थ होने से बचाने के लिए कुछ वर्ष पूर्व एक ऐसे ही किसी एक राज्य के सांसदों ने पैसा लिया था और वह पैसा बिना गिनती के ही बैंक में जमा करवा दिया गया था। बताते हैं कि कितना ही धन बैंक के कर्मचारी हड़प गये थे क्योंकि जमा करवाने वालों को यह पता तक नहीं था कि उन्हें कितना धन मिला है। पकड़े जाने पर उन्होंने भी एक एक रुपए की रसीदें कटी हुई दिखाने का प्रयास किया था। जिनका कोई अर्थ नहीं था क्योंकि सब जानते हैं कि सारा मामला फर्जी ही था। सर्वोच्च न्यायालय ने यह कह कर कुछ करने का दायित्व नहीं लिया कि जो कुछ भी हुआ संसद में हुआ जोकि हमारे अधिकार क्षेत्र में नहीं है। इसी प्रकार प्रश्न पूछे जाने के लिये तथाकथित रूप में कुछ राशि स्वीकार करने के लांछन से कई संासदों की संदस्यता समाप्त कर दी गई। उन सांसदों का राजनैतिक जीवन समाप्त हो गया। स्टिंग आपरेशन करने वालों से किसी ने नहीं पूछा कि यह कांड़ किस के कहने पर किसके पैसे से हुआ। इतना ही नहीं, प्रारम्भ में उन्होंने यह दावा किया कि हमारे पास और भी कई सांसदों केे टेप हैं जो बाद में कभी दिखाये नहीं गये। क्या इसका अर्थ यह लिया जाये कि स्टिंग करने वालों ने शेष लोगों से कुछ सौदेबाजी कर ली होगी।
दिन रात लोगों को अपनी पत्रिका में नंगा दिखाने वालेे एक वरिष्ठ पत्रकार अपने ही कार्यालय की कर्मचारी जोकि उनकी अपनी ही बेटी की मित्र थी, का शोषण करते समय तनिक भी नहीं लजाये। काजल की कोठरी में रहने वाले अन्य लोगों की तरह मुहं काला करने पर उतारू हो गये। नैतिकता के झंडाबरदार होने का दावा करने वाले इस पत्रकार ने पचंतारा होटल में जिस लड़की का शील भंग करने का प्रयास किया वह उन्हीं के मित्र की बेटी थी और आयु में उनकी बेटी के समान जो उन्हें अपना अविभावक भी मानती थी। विश्वभर में नैतिकता की दुहाई देने वाली इस पत्रिका की मैनेजिंग एड़िटर सारे मामले पर पर्दा डालते हुए दिखाई दी। अन्त में इस पत्रकार ने भी किसी न किसी प्रकार से अपने को उसी काजल वाली कोठरी का निवासी सिद्ध करने का प्रयास किया और एक राजनीतिक दल पर आरोप लगा कर उस कोठरी में स्थायी आवास पाने का प्रयास किया। क्योंकि वह जानते हैं कि एक बार इस कोठरी के निवासी बन गये तो उनके मुहं काला होने पर किसी को एतराज नहीं होगा। स्वयं उन्हंे भी नहीं।
राजनीति के दांव कितनी सहजता से भालेपन की आड़ में चले जाते हैं इसका ताजा ताजा एक अत्यंत वरिष्ठ नेता ने दिया। उन्होंने अपने समर्थकों को दो-दो स्थानों पर मतदान करने का आग्रह किया। गत चुनावों में उन लोगों ने एक ही स्थान पर मतदान करके जो भूल की थी उसे दोबारा न करने की नसीहत भी दे डाली। जब यह संदेश उन लोगों तक पहुंच गया जिन तक वह पहुंचाना चाहते थे तो उन्होंने कहा कि मैं तो मजाक कर रहा था। इस सादगी पर कौन नहीं मर मिटा होगा। उन्होंने बड़े आराम से इसके लिए माफी भी मांग ली। असली संदेश जनज न तक पहुंचाने के बदले छोटी सी माफी मांगने में क्या जाता है। यदि एक दो प्रतिशत मतदाता भी उनके इस संदेश को व्यवहार में ले आये, तो माफी मांगना बहुत सस्ता सौदा सिद्ध होगा नेता जी।

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1 Comment on "काजल की कोठरी है, जरा बचके"

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mahendra gupta
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हर शाख पे उल्लू बैठा है अंजामे गुलिस्तां क्या होगा ?जब हमाम में सब नंगे है तो कौन किसको नंगा कहेगा?

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