लेखक परिचय

विजय कुमार

विजय कुमार

शिक्षा : एम.ए. राजनीति शास्त्र, मेरठ विश्वविद्यालय जीवन यात्रा : जन्म 1956, संघ प्रवेश 1965, आपातकाल में चार माह मेरठ कारावास में, 1980 से संघ का प्रचारक। 2000-09 तक सहायक सम्पादक, राष्ट्रधर्म (मासिक)। सम्प्रति : विश्व हिन्दू परिषद में प्रकाशन विभाग से सम्बद्ध एवं स्वतन्त्र लेखन पता : संकटमोचन आश्रम, रामकृष्णपुरम्, सेक्टर - 6, नई दिल्ली - 110022

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suicide

आत्महत्या के बारे में मैंने कभी गंभीरता से नहीं सोचा। क्या बताऊं, कभी इसकी नौबत ही नहीं आयी। एक बार मेरा एक मित्र इस समस्या से पीड़ित हुआ, तो मैंने उसे एक बड़े लेखक की विश्व प्रसिद्ध पुस्तक ‘आत्महत्या से कैसे बचें ?’ दे दी। उसे पढ़कर मेरे मित्र ने यह नेक विचार सदा को टाल दिया। यद्यपि कुछ साल बाद उस लेखक ने खुद आत्महत्या कर ली। सुना है कि इस पुस्तक की प्रसिद्धि देखकर उसने ‘आत्महत्या कैसे करें ?’ नामक एक पुस्तक और लिखी; पर उसे लिखते हुए वह उसमें इतना डूब गया कि स्वयं को रोक नहीं सका। भगवान उसकी आत्मा को शांति दे।

लेकिन परसों मुझे इस विषय पर विचार करने को बाध्य होना पड़ा। हुआ यों कि हर दिन की तरह मैं प्रातःकालीन चाय का आनंद ले रहा था कि फोन की घंटी बज उठी। मैंने मोबाइल उठाया, तो उधर शर्मा जी थे। सर्दी में भी मेरे माथे पर पसीना आ गया। इतनी जल्दी तो आज तक उन्होंने कभी फोन नहीं किया ? जरूर कोई खास बात रही होगी। गांव में उनकी भैंस काफी बीमार चल रही थी। कहीं वह तो भगवान को प्यारी नहीं हो गयी ?

पर शर्मा जी बड़े उत्साह में थे। हंसते हुए बोले – वर्मा, जो लोग आत्महत्या करना चाहते हैं, मोदी सरकार की कृपा से उनके लिए सचमुच अच्छे दिन आ गये हैं। तुमने आज का अखबार देखा ?

– अभी तो नहीं देखा। कोई खास बात है क्या ?

– हां बिल्कुल। शासन ने संविधान की धारा 309 समाप्त कर दी है।

– इससे क्या होगा ?

– जो लोग आत्महत्या के प्रयास में विफल हो जाते थे, उन्हें अपराधी मानकर एक साल की सजा दी जाती थी। इस चक्क्र में मैं कई साल से रुका हुआ था; पर अब ऐसा नहीं होगा।

– बेकार की बात मत करो शर्मा। अभी तुम पर कई घरेलू जिम्मेदारियां बाकी हैं। और वैसे भी आत्महत्या की लाइन में तुमसे आगे इतने लोग खड़े हैं कि तुम्हारा नंबर कई साल तक नहीं आएगा।

– मैं समझा नहीं..।

– प्यारे शर्मालाल, मेरा बस चले, तो अगले साल तुम्हें मूर्खता का नोबेल  पुरस्कार दिलवा दूं। तुम्हें यह जरा सी बात समझ नहीं आ रही कि भारत में कई नेता दलबल सहित आत्महत्या को तैयार हैं। अब तक तो उन्हें एक साल की सजा का डर था; पर अब तो खुला खेल फर्रुखाबादी है। पहली बार में सफलता न मिले, तो दूसरी और तीसरी बार के लिए भी रास्ता खुल गया है।

– तुम तो पहेलियां बुझा रहे हो वर्मा ?

– इसमें पहेली की क्या बात है ? कांग्रेस को ही देखो। सब कांग्रेसी इस पर तुले हैं कि चाहे जो हो जाए; पर हम सोनिया मैडम और राहुल बाबा को नहीं छोड़ेंगे। यह आत्महत्या नहीं तो और क्या है ? कुछ लोग तो प्रियंका और राबर्ट वडेरा को आगे लाने की मांग कर रहे हैं। गनीमत है कि उनके बच्चे अभी छोटे हैं, वरना…।

– वर्मा, तुम्हें हमारी महान पार्टी और उसके नेताओं के बारे में ऐसी टिप्पणी नहीं करनी चाहिए। हम उनका बहुत सम्मान करते हैं।

– शर्मा जी, सम्मान तो मैं भी करता हूं; पर पूरे देश से कांग्रेस साफ हो रही है, उसका क्या करें ? प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सफाई अभियान का यह सुपरिणाम भी होगा, किसे पता था ?

– तुम आत्महत्या से सफाई पर आ गये, यह ठीक नहीं है।

– तो बिहार की कहानी सुनो। नीतीश बाबू ने यह सोचकर जीतनराम मांझी को कुर्सी दी थी कि उन्हें मुख्यमंत्रियों की बैठक में मोदी को नहीं झेलना पड़ेगा; पर अब उन्हें मांझी को झेलना ही कठिन हो रहा है। नीतीश की बिल्ली उसे ही म्याऊं बोल रही है।

– जी नहीं। अगले चुनाव नीतीश जी का मुख्यमंत्री बनना तय है। अब तो लालू और मुलायम सिंह के साथ उनका मोर्चा बन गया है।

– यही तो आत्महत्या है। मोर्चे की बैठकों के दौरान लालू ने मुलायम सिंह से रिश्तेदारी बनाकर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर अपने परिवार का दावा पक्का कर लिया है। यानि नीतीश जी की स्थायी छुट्टी।

– लेकिन लालू जी के सितारे तो बुलंद हैं ?

– बिहार में अगला विधानसभा चुनाव आने दो, तब पता लग जाएगा। नीतीश और लालू एक दूसरे की जड़ में मट्ठा डालेंगे, तो दूसरी ओर नरेन्द्र मोदी और सुशील मोदी की जुगलबंदी होगी। ऐसे में तुम समझ सकते हो कि किसकी पतंग कटेगी और किसकी बचेगी ?

– पर उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह का टैम्पो तो हाई है।

– इसीलिए उन्होंने रामपुर में अपने जन्मदिन के जुलूस में अंग्रेजी बग्घी मंगायी थी। ऐसी बग्घी पर बैठकर ही अंग्रेज शासक जनता को दर्शन देते थे; पर देश की जनता ने उन्हें ऐसा भगाया कि आज तक वापस नहीं आ सके। अब मुलायम सिंह, आजम खां और अखिलेश यादव ने उसकी सवारी की है। इसलिए अब वे ‘उम्मीद की साइकिल’ पर दोबारा नहीं चढ़ सकेंगे। यह लिख लो।

– लेकिन ममता बनर्जी बंगाल में मजबूती से जमी हैं ?

– जी नहीं। सारदा घोटाले के चक्कर में ममता दीदी की तृण अपने मूल से उखड़ रही है। नरेन्द्र मोदी, अमित शाह और भा.ज.पा. के विरुद्ध वे जितना बोलेंगी, उनकी छवि उतनी ही नीचे गिरेगी।

– और उमर अब्दुल्ला के बारे में तुम्हारा क्या विचार है ?

– इतना निश्चित है इन दिनों जो चुनाव हो रहे हैं, उसमें उनकी पार्टी कांग्रेस से आगे रहेगी।

– यानि.. ?

– यानि कांग्रेस चौथे स्थान पर रहेगी और उमर बाबू तीसरे पर।

– तुमने केजरी ‘आपा’ के बारे में कुछ नहीं कहा ?

– वो तो विदेश में हैं और इधर उनका घर जल रहा है। उनके प्रिय मनीष सिसौदिया खुद को मुख्यमंत्री पद का दावेदार बता रहे हैं।

– लेकिन वर्मा, यदि भा.ज.पा. और नरेन्द्र मोदी के विरुद्ध ये सब नेता हाथ मिला लें, तब क्या होगा ?

– तो यह सामूहिक आत्महत्या होगी; और यह समझ लो कि सरकार ने व्यक्तिगत आत्महत्या के प्रयास को सजामुक्त किया है, सामूहिक को नहीं।

शर्मा जी ने भड़भड़ाते हुए फोन बंद कर दिया।

 

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