लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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प्रमोद भार्गव

उत्तर-प्रदेश और उत्तराखण्ड के चुनाव परिणामों ने तय कर दिया है कि भारतीय राजनीति करवट ले रही है। परंपरागत राजनीति का समय अतीत बनने को तत्पर है। यही वजह है कि जिस उत्तर-प्रदेश की अनेक विधानसभा सीटों पर मुस्लिमों के 18 से 40 फीसदी मतदाता होने का दावा किया जाता था, उन सीटों पर भी भाजपा ने बिना कोई मुस्लिम प्रत्याशी खड़ा किए, बड़े अंतर से विजय हासिल की है। गोया, न केवल सांप्रदायिक धु्रवीकरण के समीकरण टूटे हैं, बल्कि जातीय व समुदाय विशेष के बेमेल गठजोड़ को भी बड़ा झटका लगा है। मायावती ने इसी गठजोड़ के चलते 99 मुस्लिम उम्मीदवारों को मैदान में उतारा था, लेकिन बसपा कुल 19 सीटें ही जीत पाई। अब मायावती इस करारी हार का ठींकरा इलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीनों पर फोड़ रही हैं। उन्हें आशंका है कि ईवीएम के साॅफ्टवेयर में गड़बड़ी की गई है। जबकि हकीकत यह है कि इस चुनाव में छद्म-धर्मनिरपेक्षता, कथित सामाजिक न्याय और जाति आधारित राजनीति को मतदाता ने पूरी तरह नकार दिया है। यही करण रहा कि एक भी मुसलमान प्रत्याशी नहीं बनाए जाने के बावजूद भाजपा ने सहयोगी दलों समेत 325 सीटें कब्जा ली हैं। इनमें 311 भाजपा की हैं। जीत का यह आश्चर्यजनक कीर्तिमान बनाने के साथ चुनावी जोड़-तोड़ में मुस्लिम मतदाता इतने अप्रासंगिक हो गए है कि अन्य दल भी अब भविष्य में मुस्लिम तुष्टिकरण से परहेज करने लग जाएं तो हैरानी नहीं होनी चाहिए ?

उत्तर-प्रदेश में इस बार मोदी लहर, राम लहर से भी ज्यादा प्रभावशील रही है। नतीजतन 17वीं उत्तर-प्रदेश विधानसभा की तस्वीर साफ होने के बाद स्वतंत्र भारत में यह पहली बार स्थिति बनी है कि विधानसभा में सबसे कम 23 मुस्लिम सदस्यों की उपस्थित रहेगी। सपा और बसपा ने जिस तदाद में मुस्लिमों को टिकट दिए थे, उससे इन्हें भ्रम था कि महज मुस्लिम और यादवों तथा मुस्लिम और दलितों के गठजोड़ से  चुनावी वैतरणी पार हो जाएगी। इन बेमेल सांप्रदायिक व जातीय समीकरणों के चलते ही सपा ने 89 और बसपा 99 मुस्लिम उम्मीदवार मैदान में उतारे थे। 99 मुस्लिम प्रत्याशियों की घोषणा के बाद अखिलेश यादव द्वारा विलय के बाद सपा से बेदखल किए गए पूर्वांचल के बाहुबली विधायक मुख्तार अंसारी अपनी पार्टी ‘कौमी एकता दल‘ समेत बसपा में शामिल हो गए थे। इसके बाद मायावती ने अंसारी परिवार के तीन सदस्यों को और टिकट दे दिए थे। इस तरह से बसपा के कुल मुस्लिम प्रत्याशी 102 हो गए थे। मुस्लिमों द्वारा जीत की मजबूत पृष्ठभूमि रच दी जाने के बावजूद यह नरेंद्र मोदी और उत्तर-प्रदेश चुनाव के रचनाकार अमित शाह की ही इच्छा-षक्ति थी कि उन्होंने एक भी मुस्लिम को टिकट नहीं देकर कथित सामाजिक न्याय और सांप्रदायिक धु्रवीकरण की राजनीति को पलीता लगा दिया।

चुनाव परिणाम आने के बाद अब निश्चित हो गया है कि धर्मनिरपेक्षता के बहाने मुस्लिमों को वोट-बैंक बनाए रखने के उपक्रम थोथे हैं। इस लिहाज से अब मुस्लिमों को भी कभी इस तो कभी उस दल के बंधुआ-मतदाता बन जाने की मजबूरी से मुक्त होने की जरूरत है। यही नहीं भाजपा अपने बूते उत्तर-प्रदेश के साथ जिस प्रचण्ड बहुमत से उत्तराखण्ड में जीती है और मणिपुर एवं गोवा में उसने कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत से दूर रखा है, उससे भी साफ हुआ है कि अल्पसंख्यक मुस्लिम हों या ईसाई उनके तुष्टिकरण के बिना भी चुनाव जीते जा सकते हैं ? क्योंकि सिद्धांत के बहाने कांग्रेस द्वारा माणिपुर में जातीय द्वेष को भड़काया गया और पंजाब में आम आदमी पार्टी ने पंथिक कट्टरवाद का सहारा लिया, किंतु विफल रहे। गोया, संप्रदाय या जाति विशेष के मतदाताओं का धु्रवीकरण भारतीय राजनीति के पटल पर जिस तरह अप्रासंगिक हुआ है, उससे तय है कि उसे व्यापक स्वीकृति है ही नहीं ?

स्वतंत्र भारत में भारतीय राजनीति उत्थान और पतन के अनेक मोड़ों से गुजरी है। ऐसे में सियासी नेतृत्वकर्ताओं को कई अनहोनियों का सामना भी करना पड़ता है। भाजपा ने नरेंद्र मोदी व अमित शाह की जुगलबंदी का नेतृत्व साथ रहने के बावजूद दिल्ली और बिहार की करारी हार झेली। किंतु अब उप्र और उत्तराखण्ड की प्रचण्ड जीत ने इन हारों को झुठला दिया है। मोदी लहर के छा जाने में अमित शाह की रणनीति ने अहम् भूमिका निभाई है। केशव प्रसाद मौर्य को प्रदेश भाजपा का अध्यक्ष बनाए जाने के साथ ही चुनावी राणीतिक पहल शुरू हो गई थी। इसके बाद बसपा के राष्ट्रिय महासचिव रहे स्वामी प्रसाद ने मौर्य ने मायावती पर टिकट बेचने का आरोप लगाते हुए बसपा छोड़ दी थी। स्वामी भाजपा में शामिल हो गए थे। अमित शाह ने इनके साथ मिलकर अति पिछड़े वर्ग ( मोस्ट बैकवर्ड क्लास) के लोगों को भाजपा के पक्ष में एकजुट करने की शुरूआत की। हालांकि ये लोग संख्या में कम हैं और एकजुट भी नहीं हैं। किंतु इनकी मुस्लिम और जाटव मतदाताओं की तरह खूबी यह रही है कि ये शत-प्रतिशत मतदान करते हैं। साथ ही ये किसी पार्टी के कभी वोट बैंक इसलिए नहीं बन पाए, क्योंकि इन्हें किसी ने दुलारा ही नहीं। कांग्रेस समेत उत्तर-प्रदेश में सपा और बसपा मुस्लिम, यादव, जाटव और ब्राह्मण मतदाताओं को लुभाने में लगी रहीं। कांग्रेस से छिटकने के बाद ब्राह्मण किसी भी दल का स्थायी वोट-बैंक नहीं बन पाया। लिहाजा अमित शाह ने पिछड़े वर्ग की आखिरी पंक्ति में बैठे अति पिछड़े वर्ग के मतदाताओं को पुचकारा, वहीं अग्रिम पंक्ति के ब्रह्मणों को भी दुलारा। इस प्रदेश में ब्राह्मण मतदाताओं की संख्या 10 प्रतिशत है। इनके साथ यदि निचले दर्जे के ब्रह्मणों में शुमार पंडे, जोगी, ओझा, जांगिड़ और भूमिहरों को भी जोड़ दिया जाए तो यह संख्या बढ़कर 14 फीसदी हो जाती है।

दूसरी तरफ सपा, बसपा और कांग्रेस ने जिस तादात में मुस्लिमों को टिकट दिए और संप्रदाय व जतीयता को उभारने के प्रयत्न किए, उसके चलते मायावती से जहां उसका परंपरागत जाटव वोट छिटका, वहीं सपा से यादव छिटक गए। मुलायम कुनबे की लड़ाई ने भी इस क्षरण में इजाफा करने का काम किया। कांग्रेस का राहुल गांधी के नेतृत्व में जिस तरह से जनाधार सिमट रहा है, उससे साफ है कि वंशवादी राजनीतिक परंपरा से जनता अब छुटकारा चाहती है। देश की 58 प्रतिशत आबादी और 25 फीसदी जीडीपी वाले 14 राज्यों में भाजपा की सरकारें बन जाना इसका प्रमाण है।

दरअसल गांधी-नेहरू परिवार के हाथ में कांग्रेस का नेतृत्व सदा के लिए सौंप देने के चलते भारत को संविधान और लोकतंत्र देने वाली कांग्रेस अब महज वंशवादी पार्टी बनकर रह गई है। इस वंश में मुलायम परिवार की तरह वंशवृक्ष नहीं है, इसलिए सत्ता को लेकर परिवार में टकराव की स्थिति उत्पन्न नहीं हुई, अन्यथा गांधी परिवार भी मुलायम-कुनबे की तरह बहुत पहले बिखर गया होता ? लेकिन कांग्रेस के पतन का कारण केवल परिवारवाद नहीं रहा, जिस उत्तर-प्रदेश में कांग्रेस 27 साल से बाहर है, उसकी एक प्रमुख वजह मंदिर और मंडिल की राजनीति भी रही है। इसने एक तरफ जाति की राजनीति के माध्यम से दलित और पिछड़े नेतृत्व को जन्म दिया तो दूसरी तरफ बहुसंख्यक उभार का खेल जिस तरह से मोदी और शाह की जोड़ी ने खेला, उसने दलित व पिछड़ों के साथ मुस्लिम अल्पसंख्यकों में भी सेंघ लगाने का काम किया। इसी के बूते अब भाजपा सत्ता में है। तीन तलाक के मुद्दे पर मुस्मिल महिलाएं भाजपा की ओर आकर्षित हुई हैं।

दुर्भाग्य से कांग्रेस के हाथ में ऐसा कोई सामाजिक समीकरण या दांव नहीं रह गया है, जिसे खेलकर वह अपना भविष्य संवार सके। बहरहाल सपा, बसपा और कांग्रेस जहां धर्मनिरपेक्ष ताकतों की एकजुटता के बहाने सतह के नीचे जाति और संप्रदाय का खेल खेलते रहे, वहीं मोदी और शाह ने हिंदू जातियों की विविधता को सामाजिक एकरूपता में पिरोकर चुनावी रण जीत लिया। इस परिप्रेक्ष्य में राजनीतिक विश्लेशकों के लिए अब यह विश्लेशण करने की जरूरत है कि मुस्लिमों को पूरी तरह अलग-थलग करके भाजपा चुनाव जीती तो कैसे ? क्योंकि चुनाव संचालन की यह स्थिति अन्य राजनीतिक दलों के लिए नजीर बन गई तो भविष्य में होने वाले चुनावों से मुस्लिमों को दूर रखने की परिपाटी भी शुरू हो सकती है ? भाजपा तो लगता है अब इसी लकीर पर चलेगी। इस संदर्भ में मुस्लिमों को भी सोचने की जरूरत है कि वे भविष्य में भी अप्रासंगिक न बने रहें, इस लिहाज से किसी एक दल का वोट बैंक बने रहने की भूल से बचें ?

 

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