लेखक परिचय

राजीव गुप्ता

राजीव गुप्ता

बी. ए. ( इतिहास ) दिल्ली विश्वविद्यालय एवं एम. बी. ए. की डिग्रियां हासिल की। राजीव जी की इच्छा है विकसित भारत देखने की, ना केवल देखने की अपितु खुद के सहयोग से उसका हिस्सा बनने की। गलत उनसे बर्दाश्‍त नहीं होता। वो जब भी कुछ गलत देखते हैं तो बिना कुछ परवाह किए बगैर विरोध के स्‍वर मुखरित करते हैं।

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राजीव गुप्ता

तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो ममता बनर्जी का वर्तमान केंद्र सरकार से समर्थन वापसी का निर्णय अपने आप में न केवल एक अभूतपूर्ण निर्णय था अपितु 1 अक्टूबर को दिल्ली की जंतर-मंतर पर उनके द्वारा की गयी रैली में उमड़ी भीड़ को देखकर यह अंदाजा लगाया जा सकता है आज भी उनके लिए माटी-मानुष कितना महत्वपूर्ण है . प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सरकार पर हो रहे चौतरफा हमलो का जबाब देने के लिए अब खुद एक अर्थशास्त्री के रूप में कमान सम्हाल तो ली परन्तु यह भी एक कड़वा सच है कि यूपीए – 2 इस समय अपने कार्यकाल के सबसे बुरे दौर से गुजर रही है. भले ही सेंसेक्स बढ़ गया हो परन्तु जनता की नजर में सरकार की साख लगातार नीचे गिरती जा रही है. कांग्रेस की अगुआई वाली यूंपीए – 2 सरकार ने उसी आम-आदमी को महगाई और बेरोजगारी से त्राहि-त्राहि करने पर मजबूर कर दिया है जिसके बलबूते पर वह सत्ता में वापस आई है. सरकार ने आर्थिक सुधार के नाम पर जन-विरोधी और जल्दबाजी में लिए गए फैसलों के कारण सारा मुद्दा अब संसद से सड़क तक पंहुचा दिया है. समूचे विपक्ष के डीजल की कीमतों में बढ़ोत्तरी, घरेलू गैस पर सब्सिडी कम करने तथा प्रत्यक्ष विदेशी पूंजी निवेश (एफडीआई) पर सरकार के फैसले के खिलाफ भारत बंद की आग अभी ठंडी भी नहीं हुई थी कि सरकार ने प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के कबिनेट के फैसले का नोटिफिकेशन जारी कर यह जताने की कोशिश की सरकार अपने फैसले से पीछे नहीं हटेगी. यूपीए सरकार ने सभी आलोचना और विरोध की परवाह किए बगैर आर्थिक सुधारों की दलील देते हुए आर्थिक सुधारों की गाड़ी को और तेज करते हुए 4 अक्टूबर को कैबिनेट ने पेंशन में 26 फीसदी एफडीआई को मंजूरी दे दी. इतना ही नहीं, बीमा क्षेत्र में एफडीआई की सीमा को 26 फीसदी से बढ़ाकर 49 फीसदी कर दिया. अब इंश्योरेंस, पेंशन और कंपनी बिल को संसद से मंजूरी दिलानी होगी.

 

इतना ही नहीं देश को संबोधित करते हुए मनमोहन सिंह ने सरकार की तरफ से मोर्चा सँभालते हुए जनता को अपने उन तीनो फैसलों डीजल की कीमतों में बढ़ोत्तरी, घरेलू गैस पर सब्सिडी कम करने तथा खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी पूंजी निवेश पर सफाई देने की कोशिश की. मनमोहन सिंह ने अपने लघु-भाषण में यह बताने की कोशिश की लगातार हो रहे सरकारी वित्तीय घाटे के चलते “उन्होंने” ये फैसले मजबूरी में लिए है परन्तु वे यह बताने से पूरी तरह कन्नी काट गए कि यूपीए कार्यकाल के दौरान अभी तक जितने भी घोटाले हुए है वे पैसे कहा गए ? आखिर वे पैसे भी आम जनता के ही जेब से गए थे. सुरसा रूपी प्रतिदिन बढ़ती महंगाई और दम तोडती अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने हेतु घोटालो के पैसो और काले धन को वापस भारत लाकर सरकारी घाटे को कम किया जा सकता था. साथ ही हमें यह समझना होगा कि अभी भारत की हालत इस समय कोई 1991 के कार्यकाल की तरह नहीं है कि हमें विदेशों से कर्ज लेकर अपनी अर्थव्यवस्था को बचाना पड़ेगा जिसका हवाला प्रधानमंत्री बार-बार दे रहे है. बहरहाल मनमोहन सिंह के इस बयान कि “पैसे तो पेड़ पर उगते नहीं है” ने आग में घी डालने का काम किया. सरकार आर्थिक सुधारों के नाम पर जल्दबाजी में अपने नए – नए फैसलों के कारण समूचे विपक्ष समेत अपने सहयोगियों को भी अचंभित कर उन्हें विरोध करने के लिए मजबूर कर रही है. ध्यान देने योग्य है कि इससे पहले 24 नवम्बर 2011 को खुदरा व्यापार में विदेशी निवेश के सबंध में सरकार ने फैसला लेकर अपनी मुसीबत और बढ़ा ली थी जिसके चलते शीतकालीन सत्र के दोनों सदन दिन भर के लिए स्थगित हो गए थे. महंगाई , भ्रष्टाचार , कोलगेट और कालेधन पर चौतरफा घिरी सरकार ने अपनी नाकामियों को छुपाने एवं अपनी बची – खुची साख सुधारने के लिए जो तुरुप का एक्का चला वही उसके गले की फांस बन गया.

 

खुदरा क्षेत्र सहित नागरिक उड्डयन तथा चार सार्वजनकि कंपनियों में प्रत्यक्ष पूंजी निवेश को सरकार द्वारा हरी झंडी देने के बाद राजनैतिक दलों में जैसी मोर्चाबंदी हुई है, उससे केंद्र की राजनीतिक स्थिरता पर अनिश्चिता का संकट मंडराना अब स्वाभाविक ही है. इस समय भारत की जनता के सम्मुख राजनैतिक दलों की विश्वसनीयता ही सवालो के घेरे में है. परन्तु इन सब उठापटक के बीच सरकार मौन होकर स्थिति को भांप रही है. सरकार आर्थिक सुधार के नाम पर देश-विदेश में अपनी छवि सुधारने की कवायद में लगी है क्योंकि स्वयं मनमोहन सिंह ने ही कह दिया था कि अगर जाना होगा तो लड़ते-लड़ते जायेंगे. किसी देश का प्रधानमंत्री “शहीदी वाला” ऐसा वक्तव्य किसी सामान्य स्थिति में नहीं दे सकता. विश्व प्रसिद्द अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह ऐसे स्वार्थी-फैसले अपनी छवि सुधारने के लिए ले रहे है अगर ऐसा माना लिया जाय कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी. ध्यान देने योग्य है कि अभी हाल में ही उन्हें विदेशी मीडिया की आलोचनाओं का शिकार होना पड़ा था. कल तक मनमोहन सिंह को अक्षम, निर्णय न करने वाले, उपलब्धि-विहीन साबित करते विदेशी समाचार पत्र-पत्रिकाओं के सुर अचानक बदल गए. वॉल स्ट्रीट जरनल, वाशिंगटन टाइम्स, टाइम्स इत्यादि ने सरकार के इन कदमों का समर्थन करते हुए कहा है कि इससे सरकार की छवि बदलेगी.

 

सरकार अपने इन फैसलों को लेकर इसलिए निश्चिन्त है कि उसके पास सरकार चलाने के लिए पर्याप्त संख्या बल है और अगर कभी उस संख्या बल में कोई कमी आई तो उसके पास आर्थिक पैकेज और सीबीआई रूपी ऐसी कुंजी है जिसकी बदौलत वह किसी भी दल को समर्थन देने के लिए मजबूर कर सकती है. अगर इतने में भी बात न बनी और मध्यावधि चुनाव हो भी गए तो कांग्रेस द्वारा जनता को यह दिखाने के लिए हमने अर्थव्यस्था को पटरी पर लाने की कोशिश तो की थी पर इन राजनैतिक दलों ने आर्थिक सुधार नहीं होने दिया का ऐसा भंवरजाल बुना जायगा कि आम-जनता उसमे खुद फस जायेगी. इतना ही नहीं अभी आने वाले दिनों सरकार संभव है सरकार आने वाले दिनों में इंश्योरेंस क्षेत्र में विदेशी निवेश की सीमा बढ़ाने से लेकर पेंशन क्षेत्र में 26 प्रतिशत विदेशी निवेश, एकीकृत वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी पर संविधान संशोधन विधेयक, विदेशी शिक्षा संस्थानों की अनुमति आदि जैसे निर्णय लेगी जिससे कि राजनैतिक दलों को यह समझने का मौका ही नहीं मिलेगा कि सरकार के किस – किस फैसले का वह विरोध करे. ऐसा करना सरकार की मजबूरी भी है क्योंकि इस वर्तमान सरकार के पास जनता को केवल भ्रष्टाचार और आर्थिक संकट के आरोपों पर जवाब देने के अलावा और कुछ है नहीं.

 

महंगाई बेकाबू हो चुकी है और इसकी की मार से आम जनता त्राहि – त्राहि कर रही है. महंगाई से निपटने के लिए सरकार सिर्फ जनता को आश्वासन देने के लिए एक नयी तारीख देकर कुछ समय के लिए मामले को टाल देती है. सरकार के लिए महंगाई का मतलब कागजों पर जारी आंकड़ों से ज्यादा कुछ नहीं अगर ऐसा मान लिया जाय तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी. आम आदमी जो छोटे – मोटे व्यापार से अभी तक अपना परिवार पाल रहा था उसको बेरोजगार करने का सरकार ने अपने इस फैसले से पुख्ता इंतजाम कर लिया है क्योंकि खुदरे व्यापार से सीधे आम जनता का सरोकार है. सरकार का तर्क है कि उसके इस कदम से करोडो लोगों को रोजगार मिलेगा जो कि सिर्फ बरगलाने वाला तर्क – मात्र से ज्यादा कुछ नहीं है क्योंकि उसके इस कदम से जितने लोगो को रोजगार मिलेगा उससे कई गुना ज्यादा लोगो की जैसे रेहडी-पटरी लगाने वाले, फ़ल-सब्जी बेचने वाले, छोटे दुकानदार, इत्यादि प्रकार के मध्यम और छोटे व्यापारियों की रोजी-रोटी छिन जायेगी. इन छोटे व्यापारियों का क्या होगा , इस सवाल पर सरकार मौन है , और न ही सरकार के पास इनका कोई विकल्प है .

 

 

सरकार की दलील है कि भारत में एफडीआई की मंजूरी से किसानो को लाभ होगा उन्हें उनकी फसलों का उचित मूल्य मिलेगा और उपभोक्ताओं को भी सस्ते दामों पर वस्तुएं उपलब्ध होगीं . पर वास्तविकता इससे कही परे है . एक उदहारण से सरकार के इस तर्क को समझने का प्रयास करते है . मान लीजिये टमाटर का खुला बाजार मूल्य 30 रुपये किलो है तो वालमार्ट जैसी अन्य विदेशी कम्पनियाँ जिनके पास अथाह पूंजी है वो 28 रुपये किलो बेचेंगी क्योंकि उनके पास अपने “गोदाम” होंगे जिसमे वो वस्तुओ का स्टॉक रखेंगे और उसके सही मूल्य की प्रतीक्षा करेंगे , और फिर मीडिया रोजाना इनकी यह कहकर मार्केटिंग करेगी कि “देश में महंगा और विदेश में सस्ता” अर्थात खुली मंडी में टमाटर 30 रुपये किलो है और वालमार्ट जैसी अन्य कंपनियों के आउटलेट्स में टमाटर 28 रुपये किलो है . वालमार्ट की वस्तुयों को सस्ता बेचने की स्ट्रेटेजी यही होगी कि कोई ये लाला जी की तरह दस – बीस किलो समान नहीं खरीदेंगे अपितु ये सीधा सैकड़ों – हजारों टन माल एक साथ लेकर अपने गोदामों में भर लेगें ( किसानो की खडी फसल को ही खरीद सकते है / उनको आर्थिक मदद कर उनसे बारगेन कर सस्ता मूल्य लगा सकते है ) . जिससे ये इतनी बड़ी मात्रा में समान खरीदेंगें अथवा अडवांस में ही उनकी आर्थिक मदद कर देंगे वो दुकानदार तो अन्य के मुकाबलें में उसे सस्ते मूल्य पर ही देंगा . परिणामतः इनको 28 रुपये किलो टमाटर बेचने में भी ज्यादा घाटा नहीं होगा .

 

सरकार के पास इस समस्या का न तो कोई समाधान है और न ही कोई विकल्प . इस तरह से बेरोजगारी की सबसे बड़ी मार ऐसे ही छोटे एवं मझले व्यवसायियों पर ही पड़ेगी . भारत के ग्रामीण क्षेत्र में महिलाओं की बहुत बड़ी ऐसी आबादी है जो कि अपने आँगन अथवा घर के एक हिस्से में बागवानी कर मेंथी, प्याज, मूली , गोभी, बैगन इत्यादि फसलें उगाकर पास के हाट – बाजार में बेंच आती है यही उनका रोजगार हो जाता है . परन्तु वालमार्ट के आ जाने से सबसे ज्यादा असर ऐसे ही लोकल बाजारों पर पड़ेगा क्योंकि लोग वालमार्ट के एसी और म्युज़िक जैसी आधुनिकतम टेक्नोलोजी से सराबोर रोशनी की चमक से चमकते हुए आउटलेट्स में जाना पसंद करेंगे जहां उन्हें सेल्स पर्सन अपनी मनभावन मुस्कान से अपनी ओर आकर्षित करेंगे न कि मिट्टी से सने हुए हाट-बाजारों में जहां दुकानदारों के चिल्लाने की कर्कस आवाज सुनायी देती हो .

 

सरकार का एक तर्क यह है कि 10 लाख की आबादी तक के शहर मे ही इनको अपने आउटलेट्स खोलने की इज़ाज़त होगी (संभवतः बाद मे यह सीमा किमी. के आधार पर हो जायेगी) . सरकार का दूसरा तर्क यह है कि खुदरा व्यापार में विदेशी निवेश से किसानो को लाभ होगा . पर यह सच नहीं है क्योंकि वालमार्ट इत्यादि भारत में व्यवसाय करने के लिए आयेंगे जिनका उद्देश्य अधिक से अधिक लाभ कमाना होगा न कि किसी सहकारी समिति की तरह किसानों को लाभ पहुँचाना होगा . आजादी के बाद भारत के प्रथम प्रधानमंत्री श्री जवाहरलाल नेहरु से लेकर अब तक कृषि जगत में बुनियादी तौर पर कई प्रमुख समस्याएँ जैसे सड़क, भण्डारण , बिजली, सिचाई, उन्नत बीज, खाद, और उनकी मार्केटिंग इत्यादि बनी रहीं है . पर पहली सबसे प्रमुख समस्या है भण्डारण की जो कि सीधे तौर पर सरकार की जिम्मेदारी है . परन्तु सरकार किसानो को भण्डारण की उचित सुविधा मुहैया कराने में असफल रही है . परिणामतः गोदामों में अथवा खुले आसमान के नीचे अनाज सड़ जाता है पर भुखमरी से मरते लोगों तक अनाज नहीं पहुँच पाता है . एक सर्वे के अनुसार भारत सरकार का बजट लाखों – करोड़ों में होता है और समूचे देश में भण्डारण – व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए लगभग 8000 करोड़ रुपये की लागत आयेगी . परन्तु सरकार इसको दुरुस्त करने की बजाय तथा अपनी कमियों को छुपाने के लिए विदेशी निवेशको को ला रही है यह अपने आप में आश्चर्यजनक है .

 

दूसरी प्रमुख समस्या है सड़क परिवहन की . सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय के अनुसार भारत में 3 .3 मिलियन किमी. सड़क नेटवर्क है जो की विश्व में दूसरा सबसे बड़ा नेटवर्क है . राष्ट्रीय राजमार्गों के विकास के लिए केंद्र सरकार सीधे तौर पर जिम्मेदार है परन्तु राज्यीय राजमार्ग और प्रमुख जिला राजमार्ग का विकास पी. डब्ल्यू. डी. विभाग देखता है तथा जिला और ग्रामीण सडकों का विकास स्थानीय प्राधिकरणों जैसे पंचायत व नगर पालिकाओं की देख-रेख में होता है . भारत की 30 लाख किलोमीटर से अधिक सड़कों में से राष्ट्रीय राजमार्ग लगभग दो प्रतिशत है, राज्यों के राजमार्ग चार प्रतिशत, जबकि 94 प्रतिशत जिला और ग्रामीण सड़कें हैं . और यहीं पर केंद्र-राज्यों के बीच फंड को लेकर खींच-तान में आपूर्ति-श्रृंखला संरचना ढह जाती है .

 

तीसरी प्रमुख समस्या है विद्युत् उत्पादन की . विद्युत् मंत्रालय के अनुसार वर्ष 2010 – 2011 के दौरान सभी स्रोतों से कुल विद्युत् उत्पादन 811 .143 बिलियन यूनिट हुआ . मांग अधिक और सप्लाई कम होने की वजह से नियमत: बिजली जाती रहती है, जो कोल्ड-चेन के परिचालन को बेहद मुश्किल बना देती है। बड़े रिटेलर अपने स्वार्थ हेतु भण्डारण की व्यवस्था को तो सुधार सकते है परन्तु सड़क और बिजली के इस मुद्दे को नहीं सुलझा सकते . सरकार अपनी इन प्रमुख नाकामियों में सुधार करें न कि अपनी जिम्मेदारी से पीछे भागे और अपनी कमियों को ढकने के लिए वालमार्ट जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को खुदरा क्षेत्र में प्रवेश देने के नाम पर करोड़ों लोगों को बेरोजगार कर उन्हें सड़क पर ले आये . बाद में यही बेरोजगार लोग लोग देश के विकास में अवरोध बनकर सरकार का सबसे बड़ा सिरदर्द बनेगें . सरकार विदेशी निवेश से महंगाई कम होने का तर्क भी दे रही है क्योंकि इनके आ जाने से करीब भारतीय अर्थव्यवस्था में अनुमानित कई करोड़ डॉलर का निवेश होगा . जो कि शुरुआती दौर में अवश्य ही भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए सही हो पर बाद में ये कम्पनियाँ यही से अपना फंड उगायेगी . साथ ही हमें यह समझना होगा कि अभी भारत की हालत इस समय कोई चंद्रशेखर के प्रधानमंत्री कार्यकाल की तरह नहीं है कि हमें विदेशों से कर्ज लेकर अपनी अर्थव्यवस्था को बचाना पड़ेगा .

 

भारत जैसा देश जहां की आबादी लगभग सवा सौ करोड़ हो , आर्थिक सुधार की अत्यंत आवश्यकता है परन्तु आर्थिक सुधार भारतीयों के हितों को ध्यान में रखकर करना होगा न कि विदेशियों के हितो को ध्यान में रखकर . अतः सरकार जल्दबाजी में बिना किसी से सलाह किये चाहे वो राजनैतिक पार्टियाँ हो अथवा आम जनता लगातार फैसले लेकर अपने को मजबूत इच्छाशक्ति वाली सरकार दिखाना चाहती है जो कि इस सरकार की हठ्धर्मिता का परिचायक है . सरकार किसके इशारे पर और किसको खुश करने के लिये और क्या छुपाने के लिए आर्थिक सुधार के नाम पर इतनी जल्दबाजी में इतने विरोधे के बावजूद इतने बड़े – बड़े फैसले ले रही है असली मुद्दा यह है . क्योंकि बात चाहे सरकार द्वारा आर्थिक सुधारो के नाम पर बढ़ती महंगाई की हो या डीजल और और घरेलू वस्तुओ की कीमतों में वृद्धि की हो राजनेता तो राजनीति करते ही है परन्तु परेशानी तो आम जनता को ही होती है ऐसे में भला आम जनता जाये तो कहा जाये. बहरहाल सरकार का क्या होगा यह तो भविष्य तय करेगा परन्तु जनता की आवाज को बुलंद करने हेतु ममता बनर्जी ने सरकार से अपने कदम पीछे खीचकर जो साहसिक कार्य किया वह अन्य अन्य राजनैतिक दलों के लिए अनुकरणीय है

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1 Comment on "माटी-मानुष के लिए एफडीआई का विरोध"

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शिवेंद्र मोहन सिंह
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शिवेंद्र मोहन सिंह

राजीव जी ये धूर्तों की सरकार है, जब कोलगेट काण्ड तूल पकड़ गया तो उसकी काट के लिए एफ डी आइ का मुद्दा लाया गया. लिहाजा आज कोई कोलगेट कांड का नाम लेवा भी दिखाई नहीं दे रहा है, बड़ी सफाई से इस मुद्दे को लाइम लाइट से हटा दिया गया. अगर ये भी तूल पकड़ गया तो इसकी काट के लिए कोई और मुद्दा सामने आ जाएगा. देखते जाइये अभी और क्या क्या सामने आता है.

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