लेखक परिचय

डॉ. सुरेंद्र जैन

डॉ. सुरेंद्र जैन

लेखक विश्व हिंदू परिषद के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं।

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डॉ. सुरेंद्र जैन

आखिरकार सरकार को झुकना पड़ा। जनता की ताकत के सामने सरकार की निरंकुश ताकत को समर्पण करना पड़ा। भारत में एक बार फिर यह सिद्ध हो गया कि यहां का लोकतंत्र परिपक्व है। यहां की जनता बिकाऊ नहीं है। वह भेदभाव से ऊपर उठकर देश के हित में संघर्ष कर सकती है। वह अपने ही द्वारा चुने हुए प्रतिनिधियों के खिलाफ भी खडी हो सकती है और उनको अपनी आवाज पर चलने के लिये मजबूर कर सकती है।

बारह दिन की इस रस्साकशी में दुनिया नें देखा कि सरकार व राजनीतिक दलों के दुष्प्रचार और छलकपट विफल हो गये, न तो जनता भ्रमित हुई और न ही टीम अन्ना इनकी चालों में फंसी। अग्निवेश जैसे पुराने दलाल इनसे छिटक कर अलग हो गये परन्तु यह टीम अडिग रही और अंतिम क्षण तक चलने वाली घटिया सरकारी चालों का मुंहतोड जवाब देती रही। इस युद्ध में केवल देश की जनता जीती है जिसने अन्ना के नेतृत्व में अपने विश्वास को बनाये रखा।

भारत की वह पीढ़ी जिसने गांधी के दर्शन नहीं किये अब देख सकी है कि गांधी कैसे रहे होंगे और उन्होंनें अंग्रेजों की सरकार को को कैसे झुकने के लिये मजबूर किया होगा। अभी तक आजादी के बाद केवल एक ही नेता हुआ था जिसने जनता को अपने साथ संघर्ष करने के लिये प्रेरित किया था, वह थे जयप्रकाश नारायण। लेकिन उनके पीछे कई राजनीतिक दल थे। उनके साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं की देवतुल्य टोली खड़ी थी। परन्तु अन्ना के साथ क्या था? कुछ लोग कहते थे कि अन्ना संघ का मुखौटा है। अग्निवेश जैसों व कुछ वामपंथी संगठनों के बैनरों को देखकर कुछ लोग इसे वामप्रायोजित मान रहे थे, परन्तु वामपंथी नेता इसमें भाग लेना तो दूर इसके पक्ष में बयान देने से भी कतराते थे। कुछ लोग इसमें कारपोरेट घरानों का षड्यंत्र देख रहे थे तो कुछ लोग इसके पीछे विदेशी शक्तियों के सबूतों का हवाई दावा कर रहे थे। लेकिन इन सब विरोधाभासी दावों के बावजूद यह आन्दोलन कौन चला रहा है, यह सबको दिखाई दे रहा था।

इसका संचालन कोई और नहीं भ्रष्टाचार से त्रस्त भारत की जनता कर रही थी, जो किसी दुष्प्रचार में फंसे बिना इसमें अपना सब कुछ झोंकने की तैयारी में थी। इस आन्दोलन में स्कूली बच्चों से लेकर उच्च शिक्षा प्राप्त युवा थे तो बडे़ व्यवसाइयों से लेकर इनके यहां काम करने वाले मजदूर भी थे। इसमें जहां शहरी लोगों की सहभागिता थी तो वहीं अपने गांव में बैठकर अनशन करने वालों की कमी भी नहीं थी। इसके सहभागियों को किसी वर्ग या विचारधारा के दायरे में नहीं बांधा जा सकता। यह सही मायने में जन आन्दोलन था जिसके साथ जुडने में हर भारतीय को गर्व महसूस हो रहा था।

इस आन्दोलन के गर्भ से कई महत्वपूर्ण प्रश्न निकल कर सामने आये। पहला प्रश्न आया कि जनता बड़ी है या उनके द्वारा चुने गये प्रतिनिधियों की संसद। यह प्रश्न जनता की आवाज को दबाने के लिये उनके ही चुने गये सांसदों द्वारा उठाया गया। मानों ५ साल के लिये चुनने के बाद उनको मनमानी का अधिकार मिल गया हो।

ऐसा लगता है मानों वे चाहते हों कि उनको चुनने के बाद जनता की जबान को लकवा मार जाये। भारत के इतिहास में पहली बार संसद को अपना अहम छोड़कर जनता की आवाज में अपनी आवाज मिलानी पड़ी। यह सिद्ध हो गया कि जनता ही सर्वोपरि है। दूसरा प्रश्न उठाया गया कि जनता की आवाज की ठेकेदारी केवल उसके द्वारा चुने गये सांसदों के पास ही है। यदि कोई और आवाज उठाता है तो वह अलोकतांत्रिक है।

कई बार पूछा गया, कौन अन्ना?, उसे किसने चुना? उसने कौन सा चुनाव लडा है? अन्ना को सुझाव दिये गये कि उसे पहले कोई चुनाव लड़ना चाहिये। यह प्रश्न पहली बार नहीं उठाया गया। श्रीराम जन्मभूमि आन्दोलन के समय भी यह प्रश्न कई लोग पूछते थे। यह प्रश्न हर जनान्दोलन के समय खड़ा किया जाता है। हर बार इसका जवाब जनता देती है। इस बार यह जवाब अधिक जोर के साथ आया है। शराब, पैसे, गुंडों, जाति आदि नकारात्मक आधारों पर जीतने वाले सही मायने में प्रतिनिधि नहीं हो सकते। जनता के सरोकार के मुद्दे उठाकर उनका समर्थन हासिल कर निरंकुश व भ्रष्ट सरकार को झुकाने वाला ही सही मायने में नेता हो सकता है। नामधारी नेताओं ने केवल शोषण किया है, उनसे निजात दिलाने वाला व्यक्ति जो उनकी भावनाओं को आवाज दे वही सही मायने में उनका नेता कहलाने का अधिकारी है।

इन सब आधारों पर अगर विचार किया जाये तो स्वातंत्र्योत्तर भारत में केवल एक ही नेता पैदा हुआ है जिसे सभी वर्गों का जनसमर्थन मिला हो और वह है अन्ना हजारे। गांधी के बाद अगर कोई और नेता इस देश में पैदा हुआ है तो वह है अन्ना हजारे। सरकार की हरकतों से यह लगता है कि वह अब भी कोई चालबाजी करने का सोच रही है। अब उसे यह गलती करने से पहले खाड़ी के देशों के भ्रष्ट तानाशाहों के हश्र को ध्यान में रखना चाहिये। अब उनको अपने स्वार्थ छोड़कर देशहित के लिए सोचना चाहिये। यही उनके भी हित में है।

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2 Comments on "भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता"

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swamisamvitchaitanya
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लोकतंत्र की बात छोडो लोगो की परिपक्तावता का विचार करो जो इस देश में कभी संभव नहीं है

डॉ. राजेश कपूर
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बड़ा सही और सकारात्मक विश्लेषण इस लेख में है, साधुवाद.

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