लेखक परिचय

सिद्धार्थ शंकर गौतम

सिद्धार्थ शंकर गौतम

ललितपुर(उत्तरप्रदेश) में जन्‍मे सिद्धार्थजी ने स्कूली शिक्षा जामनगर (गुजरात) से प्राप्त की, ज़िन्दगी क्या है इसे पुणे (महाराष्ट्र) में जाना और जीना इंदौर/उज्जैन (मध्यप्रदेश) में सीखा। पढ़ाई-लिखाई से उन्‍हें छुटकारा मिला तो घुमक्कड़ी जीवन व्यतीत कर भारत को करीब से देखा। वर्तमान में उनका केन्‍द्र भोपाल (मध्यप्रदेश) है। पेशे से पत्रकार हैं, सो अपने आसपास जो भी घटित महसूसते हैं उसे कागज़ की कतरनों पर लेखन के माध्यम से उड़ेल देते हैं। राजनीति पसंदीदा विषय है किन्तु जब समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का भान होता है तो सामाजिक विषयों पर भी जमकर लिखते हैं। वर्तमान में दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, हरिभूमि, पत्रिका, नवभारत, राज एक्सप्रेस, प्रदेश टुडे, राष्ट्रीय सहारा, जनसंदेश टाइम्स, डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट, सन्मार्ग, दैनिक दबंग दुनिया, स्वदेश, आचरण (सभी समाचार पत्र), हमसमवेत, एक्सप्रेस न्यूज़ (हिंदी भाषी न्यूज़ एजेंसी) सहित कई वेबसाइटों के लिए लेखन कार्य कर रहे हैं और आज भी उन्‍हें अपनी लेखनी में धार का इंतज़ार है।

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 २००७ में उत्तरप्रदेश में मुलायम सरकार को अपदस्त कर मायावती ने पूर्ण बहुमत प्राप्त कर सत्ता संभाली तो सभी के जेहन में यह सवाल था कि क्या मायावती मुलायम सिंह से अपनी पुरानी अदावत चुकाने हेतु उन्हें जेल भेजने जैसी कार्रवाई को अंजाम देंगी? जनता के मन में उमड़ रहे इस सवाल का वाजिब कारण भी था| २००७ विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान मायावती अपनी हर रैली और जनसभा को संबोधित करते वक़्त यह हुंकार भरती नज़र आती थीं कि यदि प्रदेश में उनकी सरकार आई और मुलायम के विरुद्ध एक भी आरोप तय हो गया तो मुलायम जेल में होंगे| किन्तु चुनाव परिणाम आते ही उन्होंने अपनी रणनीति बदलते हुए कुछ उदारता का परिचय दिया| बाद में जब किसी ने मायावती से मुलायम को जेल भिजवाने के उनके वादे के बारे में पुछा तो मायावती ने बड़े ही सधे अंदाज़ में जवाब दिया कि जब जनता ने ही मुलायम से सत्ता छीन उन्हें सज़ा दे दी है तब मैं उन्हें जेल क्यूँ भेजूं? अब जबकि लखनऊ की गद्दी पर सत्ता परिवर्तन हो चुका है और मुलायम सिंह तथा अखिलेश यादव भी मायाराज में हुए भ्रष्टाचार बाबत मायावती को जेल भेजने की बात करते रहे हैं; क्या सियासी राजनीति के इस रंग-बदलू दौर में मुलायम भी मायावती पर वही रहम करेंगे तो २००७ में मायावती ने उनपर किया था? खैर इस सवाल का जवाब तो भविष्य के गर्त में छुपा है किन्तु वर्तमान परिपेक्ष्य में मायावती की मुसीबतें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं| चाहे वह भट्टा-परसौला में ज़मीन अधिग्रहण का मामला हो या अपने भाई की निजी कंपनियों को फायदा पहुंचाने अथवा एन.आर.एच.एम. घोटाले में बाबूसिंह कुशवाहा द्वारा बहनजी का नाम घसीटे जाने का मामला; मायावती चहुँ ओर जांच के दायरे में घिरी नज़र आती हैं|

उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव में अंतिम वोट पड़ने के साथ ही सी.बी.आई द्वारा बाबूसिंह कुशवाहा की गिरफ्तारी ने राजनीति में भूचाल तो ला ही दिया; साथ ही सी.बी.आई की कार्यप्रणाली पर भी सवालिया निशान लगा दिए हैं| उसपर भी बाबूसिंह कुशवाहा ने एन.आर.एच.एम. घोटाले का पूरा ठीकरा मायावती पर फोड़ते हुए कहा कि एन.आर.एच.एम. के तहत केंद्र सरकार से मिले फंड के उपयोग का फैसला एक समिति करती थी जिसकी अध्यक्षता मुख्यमंत्री करती थीं| गौरतलब है कि कुशवाहा जब यू.पी. के परिवार कल्याण मंत्री थे, तब १३.४ करोड़ रुपये की लागत से १३४ जिला अस्पतालों के जीर्णोद्धार की योजना बनाई गई थी| उत्तरप्रदेश जल निगम की इकाई कंस्ट्रक्शन एंड डिजाइन सर्विसेस के मार्फ़त यह काम किया गया था लेकिन कंस्ट्रक्शन एंड डिजाइन सर्विसेस का महाप्रबंधक पी.के.जैन के साथ मिली भगत कर कुशवाहा ने गाजियाबाद की कंपनी मेसर्स सर्जिकोइन को इसका ठेका दे दिया| सी.बी.आई के अनुसार अकेले इसी योजना में ५.४६ करोड़ का घोटाला हुआ है| सिर्फ यही नहीं सी.ए.जी. की रिपोर्ट में एन.आर.एच.एम. में ६ साल तक दिए गए ८६५७ करोड़ में से करीब ५००० करोड़ रुपयों का हिसाब नहीं मिला है| सी.ए.जी. ने २३ जिलों में धनराशि में गड़बड़ी की भी जांच की है| वित्तीय कुप्रबंधन के कारण भी ३९६ करोड़ रुपये बर्बाद किए गए हैं| सी.ए.जी. की यह रिपोर्ट राज्यपाल को भेजी जा चुकी है जिसपर तमाम राजनीतिक दलों की निगाहें लगी हुई हैं|

अब नज़र मायावती पर है| कुशवाहा ने भले ही राजनीतिक प्रतिद्वंदिता के कारण मायावती का नाम एन.आर.एच.एम. घोटाले में उछाला हो मगर इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि मुख्यमंत्री होने के नाते मायावती को इस घोटाले के बारे में कुछ भी मालूम न हो| मायावती ने जिस ठसक से पांच वर्ष तक सरकार चलाई है उसको देखते हुए यह विश्वास के साथ कहा जा सकता है कि एन.आर.एच.एम. घोटाले में मायावती की भी संलिप्तता से इंकार नहीं किया जा सकता| सत्ता छिन जाने और कुशवाहा द्वारा स्वयं का नाम एन.आर.एच.एम. घोटाले में आने के बाद मायावती यक़ीनन जोड़-तोड़ की राजनीति का सहारा लेंगी| वे किसी भी हद तक सियासी समझौते हेतु खुद को तैयार करेंगी| उत्तराखंड में कांग्रेस की सरकार को बिना शर्त समर्थन देना शायद इसी सियासी पैंतरे का पहला कदम है|

 

दिलचस्प बात तो यह है कि ५००० करोड़ रुपये से अधिक के इस घोटाले की तह में छिपे ताकतवर लोग अपने हर गुनाह के सबूत मिटाने के प्रयास में जुटे हुए हैं| प्रदेश के सबसे बड़े घोटाले की जांच में अहम गवाह और आरोपियों की एक के बाद एक हत्या और संदिग्ध मौतों को देखते हुए सवाल उठ रहे हैं कि इस घोटाले का असली सूत्रधार कौन है? नज़र मुलायम के पाले पर भी है| चूँकि मुलायम को प्रदेश की जनता ने पूर्ण बहुमत सत्ता दी है और इस उम्मीद के साथ दी है कि मुलायम सिंह मायाराज में हुए भ्रष्टाचार का हिसाब-किताब चुकता करेंगे; देखना दिलचस्प होगा कि माया-मुलायम की इस जंग में नफा-नुकसान किसका होता है? मायावती के लिए कांग्रेस और मुलायम से एक साथ लड़ना आसान नहीं होगा| वैसे उत्तरप्रदेश की राजनीति अभी और भी रंग दिखायेगी जिसमें न जाने कितने काले चेहरे बेनकाब होंगे?

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1 Comment on "सत्ता जाते ही माया घिरी मुश्किलों में.."

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इक़बाल हिंदुस्तानी
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मुलायम पर माया जैसे आरोप नहीं थे दुसरे सत्ता खो देना ही सजा नहीं है, कोई भी हो मुक़दमा चलना ही चाहिए.

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