लेखक परिचय

निर्मल रानी

निर्मल रानी

अंबाला की रहनेवाली निर्मल रानी कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से पोस्ट ग्रेजुएट हैं, पिछले पंद्रह सालों से विभिन्न अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं में स्वतंत्र पत्रकार एवं टिप्पणीकार के तौर पर लेखन कर रही हैं...

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निर्मल रानी
हमारा देश भारतवर्ष विभिन्न धर्मों,जातियों तथा अलग-अलग विश्वासों के मानने वालों का देश है। हमारे देश का संविधान देश के सभी नागरिकों को समान रूप से अपने धार्मिक रीति-रिवाजों का पालन करने की इजाज़त देता है। परंतु राजनीति में अपना गहरा स्थान बना चुकी तुष्टीकरण की राजनीति करने की परंपरा और वोट बैंक की सियासत ने समय-समय पर विभिन्न धर्मों व समुदायों के लोगों के संवैधानिक अधिकारों के हनन का काम किया है। गत् कई वर्षों से कभी गौ हत्या को लेकर तो कभी बीफ के मांस पर तो कभी सभी जानवरों के मांस खाने न खाने को लेकर सियासत होती आ रही है। एक वर्ग मांस के सेवन को अपनी भावनाओं के विरुद्ध बताता है तो दूसरा वर्ग मांस के प्रतिबंध को अपने भावनाओं के िखलाफ बताता है। इस विषय पर अधिक से अधिक एक बात तो किसी हद तक स्वीकार की जा सकती है कि हिंदू बाहुुल्य देश होने के नाते इस देश में कम से कम गौ हत्या तो नहीं की जानी चाहिए क्योंकि हिंदू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार गाय को अत्यंत पवित्र व धार्मिक दृष्टिकोण से बेहद महत्वपूर्ण माना गया है। परंतु केवल किसी एकमात्र दृष्टिकोण के लिहाज़ से गोैहत्या पर रोक के अध्याय को यहीं समाप्त भी नहीं किया जा सकता। यदि हम भारत में गौवध की परंपरा पर नज़र डालें तो पूर्वोत्तर व दक्षिण beef banभारत के कई राज्यों में,हिंदुओं व ईसई समुदाय के लोगों द्वारा सामान्य रूप से गौ मांस का सेवन किया जाता है। खासतौर पर गरीब मांसाहारी लोगों के लिए बकरे व मुर्गे का मंहगा मांस खरीद कर खा पाना संभव नहीं होता इसलिए वे सस्ते उपलब्ध मांस के रूप में बीफ खाना ही पसंद करते हैं।
बाबा साहब भीमराव अंबेडकर ने गौ मांस खाने के संबंध में लिखे अपने एक निबंध में गौ हत्या का विरोध करने वाले लोगों के इस दावे को भी चुनौती दी है कि हिंदुओं द्वारा कभी गौमांस नहीं खाया गया और गाय को हमेशा से ही पवित्र माना गया है। हिंदू और बौद्ध धर्मग्रंथों के हवाले से डा० अंबेडकर ने प्राचीनकाल में हिंदुओं द्वारा गौमांस खाए जाने की बात साबित करने की कोशिश की है। अपनी बातों के समर्थन में उन्होंने मराठी में धर्मशास्त्र विचार पृष्ठ 180 और ऋगवेद जैसे धर्मग्रंथों का हवाला दिया है। हिंदू धर्मशास्त्रों के विख्यात विद्वान पीवी काणे लिखते हैं कि ऐसा नहीं है कि वैदिक काल में गाय पवित्र नहीं थी। परंतु उसकी पवित्रता के कारण ही बाजसनेयी संहिता में कहा गया है कि गौ मांस को खाया जाना चाहिए। डा० अंबेडकर के अनुसार ऋगवेद से ही यह स्पष्ट है कि ऋग्वेद काल के आर्य खाने के लिए गाय को मारा करते थे। डा० अंबेडकर ने वैदिक ऋचाओं का हवाला देते हुए लिखा है कि बलि देने हेतु गाय और सांड में से चुनने को कहा गया है। ऋग्वेद (10.86.14) में इंद्र कहते हैं कि ‘उन्होंने एक बार पांच से ज़्यादा बैल पकाए। ऋग्वेद (10.91.14)कहता है कि अग्रि के लिए घोड़े,बैल,सांड,बांझ गायों और भेड़ों की बलि दी गई.ऋग्वेद से ही यह भी प्रतीत होता है कि गाय को प्राचीनकाल में तलवार या कुल्हाड़ी से मारा जाता था। इस प्रकार के सैकड़ों ऐसे और भी उदाहरण हैं जिनसे यह बात साबित होती है कि गौमांस अथवा बीफ खाने का संबंध केवल मुसलमानों या ईसाईयों अथवा किसी गैर हिंदू धर्मावलंबियों तक ही सीमित नहीं है।
जहां तक मांसाहारी होने का संबंध मुसलमानों से ही जोडऩे का प्रश्र है तो निश्चित रूप से यह महज़़ एक राजनीति तथा देश के दो प्रमुख समुदायों के मध्य नफरत फैलाने की कोशिश के सिवा और कुछ नहीं है। आज देश में बीफ निर्यात के जितने भी बूचड़खाने चल रहे हैं उनमें अधिकांश बूचड़खाने हिंदू धर्म के लोगों के ही हैं। हां बकरीद जैसा एक त्यौहार मुस्लिम धर्मावलंबियों में ऐसा ज़रूर है जिस दिन पूरे विश्व में एक ही दिन में करोड़ों जानवरों की बलि दी जाती है। हिंदू धर्म भी पशुओं की बलि दिए जाने की परंपरा से अछूता नहीं है। भारत ही नहीं बल्कि स्वयं को हिंदू राष्ट्र बताने वाले नेपाल में भी हज़ारों भैंसों की एक साथ बलि दिए जाने की प्राचीन परंपरा रही है और अब भी हज़ारों भैंसों की बलि प्रत्येक वर्ष दी जाती है। हमारे देश में भी दक्षिण भारत में कई जगह यह परंपरा निभाई जाती है।
जहां तक इस्लाम धर्म की शिक्षाओं व मान्यताओं का प्रश्न है तो इस्लाम में मनुष्य को धरती के समस्त प्राण्यिों में सर्वश्रेष्ठ प्राणी बताया गया है। यानी उसे अशरफ़ुल मख़लूख़ात की संज्ञा दी गई है। अर्थात् ख़ुदा द्वारा जितने भी प्राणी पृथ्वी पर पैदा किए गए उनमें सबसे अशरफ़(सर्वोत्तम) प्राणी। और धरती पर प्रकृति द्वारा उपलब्ध सभी वस्तुएं मनुष्य के उपयोग व उसकी सुख-सुविधाओं के लिए ही पैदा की गई हैं। अब यदि यहां हम इन इस्लामी शिक्षाओं को इसलाम व मुसलमानों से अलग हटा कर भी देखें तो क्या रचनात्मक रूप से ऐसा नहीं है? आज प्रत्येक मनुष्य अपनी ज़रूरतों के हिसाब से जानवरों के मांस व उसके शरीर के अन्य हिस्सों का उपयोग स्हसत्राब्दियों से करता आ रहा है। कभी खेतों में जानवरों के इस्तेमाल के रूप में,कभी उसकी सवारी करने की शक्ल में, कभी दवाईयों में उसके शरीर के कई हिस्सों के इस्तेमाल के रूप में,कभी जूते-चप्पल,वस्त्र,बेल्ट,पर्स तथा बैग आदि के रूप में तो कभी वाहनों में जोतने की शक्ल में। यहां तक कि हमारे आराध्य देवी-देवता भी अपनी सुविधा के अनुसार कहीं जानवरों पर सवारी किए दिखाई देते हैं तो कहीं किसी मृतक जानवर की खाल पर आसन लगाए विराजमान रहते हैं। क्या यह सब दलीलें यह प्रमाणित नहीं करती कि वास्तव में इंसान पृथ्वी का सर्वोत्तम प्राणी ईश्वर द्वारा रचा गया है और अन्य सभी प्राणियों पर उसको वर्चसव हासिल है? दूसरी ओर इसी इस्लाम धर्म में मनुष्य से दयालु होने की बात भी कही गई है। जानवरों ही नहीं बल्कि पेड़-पौधों पर भी दया करने की शिक्षा दी गई है।
हमारे देश में बिहार देश का दूसरा सबसे बड़ा राज्य है। यहां मिथिलांचल सहित राज्य के अन्य कई क्षेत्रों में ब्राह्मणों के विवाह समारोह में कई प्रकार के मांस निर्मित व्यंजन परोसे जाते हैं। यह उनकी परंपराओं में शामिल है। परंतु उत्तर भारत के दूसरे स्थानों पर ऐसा नहीं है। आिखर एक ही समुदाय में मांस के सेवन को लेकर इतने बड़े अंतर्विरोध का मतलब क्या है? यदि आप बिहार के मांसाहारी ब्राहमणों को समझाने की कोशिश करें कि उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए तो वे आपको अपनी परंपराओं के पक्ष में सैकड़ों तर्क दे डालेंगे। ठीक है शाकाहारी लोगों की अपनी भावनाएं हैं। उन्होंने अपने संस्कारों में शाकाहार हासिल किया है लिहाज़ा उन्हें न तो मांसाहार के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए न ही उनकी शाकाहारी होने की भावनाओं का निरादर किया जाना चाहिए। परंतु ठीक इसी प्रकार दूसरे समुदायों के भी खानपान को लेकर,पहनावे-वेशभूषा तथा बोल-भाषा आदि को लेकर उनकी अपनी भी मान्यताएं हैं। हमें इनका भी निरादर नहीं करना चाहिए। भारत जैसे देश में कानून बनाकर किसी समुदाय विशेष को किसी विशेष खानपान के लिए प्रतिबंधित करना कतई मुनासिब नहीं है। गत् कई वर्षों से कभी दारूलउलूम देवबंद द्वारा तो कभी दूसरी अन्य कई इस्लामी धार्मिक संस्थाओं द्वारा खासतौर पर बकऱीद के ही अवसर पर ऐसे फतवे जारी होते दिखाई देते हैं जिनमें मुसलमानों को यह निर्देश दिए जाते हैं कि वे बकरीद के अवसर पर हिंदुओं की भावनाओं का आदर करते हुए गौवंश की हत्या न करें। आज देश में अधिकांश मुस्लिम विद्वान ऐसे हैं जो भारत में गौवंश की हत्या का विरोध करते देखे जा रहे हैं। ज़ाहिर है इन विद्वानों द्वारा देश में भाईचारा व अमन-शांति बरकरार रखने की ग़रज़ से ही ऐसी अपीलें की जा रही हैं।
हमारे देश की सरकारों,राजनेताओं व राजनैतिक दलों को भी इस बात का पूरा ध्यान रखना चाहिए कि इस विषय को लेकर किसी एक समुदाय को ख़ुश करने के लिए किसी विवादित कानून को थोपने की प्रवृति से बाज़ आएं। और यदि इस प्रकार के कदम उठाने ही हैं तो सर्वप्रथम देश में चल रही मांस की निर्यात कंपनियों पर प्रतिबंध लगाने का साहस दिखाएं। बीफ मांस पर प्रतिबंध लगाना अथवा इस प्रकार के दूसरे किसी प्रकार के प्रतिबंध थोपना हमारे देश की संवैधानिक व्यवस्था के विरुद्ध है। यहां इस प्रकार के सभी संवेदनशील विषय परस्पर बातचीत व सहमति से हल किए जाने चाहिए। न कि ऐसे संवेदनशील विषयों कों मतों के ध्रुवीकरण या वोट बैंक की राजनीति करने के अवसर के रूप में लिया जाना चाहिए। हमारे देश में सभी धर्मों तथा सभी विश्वासों के मानने वालों की भावनाओं का समान रूप से आदर व सम्मान किया जाना चाहिए। उनकी संख्या बल के आधार पर उन्हें उपकृत करना अथवा उनका तिरस्कार करना कतई मुनासिब नहीं है। आज जब हम देश को एक स्मार्ट देश बनाने की ओर बढ़ रहे हों ऐसे में खानपान जैसे विषयों को लेकर एक-दूसरे समुदायों के दिलों में दरार पैदा करने की कोशिश करना किसी स्मार्ट देश की निशानी क़तई नहीं समझी जा सकती।

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