लेखक परिचय

अरविंद जयतिलक

अरविंद जयतिलक

लेखक स्‍वतंत्र टिप्‍पणीकार हैं और देश के प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों में समसामयिक मुद्दों पर इनके लेख प्रकाशित होते रहते हैं।

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-अरविंद जयतिलक
आजादी की लड़ाई के दौरान दीनबंधु सीएफ एंड्रयूज ने लाला लाजपत राय से आग्रह किया कि वह अपना ध्यान भारत को एक ऐसा दैनिक पत्र देने के लिए केंन्द्रित करें, जो भारतीय जनमत के लिए वैसा ही करे जैसा कि सीपी स्काॅट के ‘मांचेस्टर गार्डियन’ ने ब्रिटिश जनमत के लिए किया। लाला लाजपत राय और उनके सहयोगियों ने सीएफ एंड्रयूज के राष्ट्रवादी सुझाव को सिर-माथे लिया और एक राष्ट्रवादी दैनिक पत्र के प्रकाशन के निमित्त जुट गए। शीध्र ही लाला लाजपत राय और उनके सहयोगियों ने अक्टुबर, 1904 में समाचार पत्र ‘द पंजाबी’ का शुभारंभ कर दिया। ‘द पंजाबी’ ने अपने प्रथम संस्करण से ही आभास करा दिया कि उसका उद्देश्य महज एक दैनिक पत्र बनना नहीं बल्कि ब्रिटिश हुकूमत से भारतमाता की मुक्ति के लिए देश के जनमानस को जाग्रत करना और राजनीतिक चेतना पैदा करना है। ‘द पंजाबी’ ने रुस की जार सरकार के विरुद्ध जापान की सफलता की ओर देश का ध्यान आकर्षित करने के साथ ही बंगाल में गर्वनर कर्जन द्वारा प्रेसीडेंसी को दो भागों में विभाजित करने तथा पंजाब में उपराज्यपाल इब्बटसन के भूमि तथा नहर कालोनी कानूनों के मसले पर देशवासियों को जाग्रत किया। ‘द पंजाबी’ ने यह भी सुनिश्चित कर दिया कि स्वतंत्रता आंदोलन में मीडिया की भूमिका और उसका सरोकार क्या होना चाहिए। ‘द पंजाबी’ के अलावा लाजपत राय ने यंग इंडिया, यूनाइटेड स्टेट आॅफ अमेरिका, ए हिंदूज इन्प्रेशंस एंड स्टडी, इंगलैंड डैट टू इंडिया, पोलिटिकल फ्यूचर आॅफ इंडिया जैसे ग्रंथों के माध्यम से जनता को आजादी की लड़ाई के लिए प्रेरित किया और राष्ट्रवादी पत्रकारिता की नींव डाली। इसी दौरान एक और घटना घटी जिससे पत्रकारिता का काला पक्ष उजागर हुआ। लाहौर के एक प्रमुख भारतीय समाचार पत्र के संपादक ने कुछ छात्रों के गुप्त नाम से प्रकाशित किए गए लेख की मूल पांडुलिपि गवर्नमेंट कालेज के प्रिंिसपल को सौंप दी। इस लेख से स्कूल प्रशासन बेहद नाराज हुआ और कठोरतापूर्वक छात्रों को प्रताड़ित किया। संपादक का यह कृत्य न सिर्फ पत्रकारिता के सिद्धांतों, मूल्यों और उत्तरदायित्वों के विरुद्ध था बल्कि युवाओं में अंगड़ाई ले रही आजादी और राष्ट्रप्रेम की भावना को कुचलने का प्रकटीकरण भी था। इस घटना से साबित हुआ कि उस दौरान भी मीडिया का एक वर्ग भारतीयता, आजादी और राष्ट्रवाद के विरुद्ध था जैसा कि आज मीडिया का एक वर्ग राष्ट्रवादी भावनाओं की खुली मुखालफत कर रहा है। कहना गलत नहीं होगा की पत्रकारिता का वह जहरीला बीज आजादी के 68 साल बाद आज निकृष्ट पत्रकारिता के रुप में वट वृक्ष बन चुका है जिसकी टहनियां भारत माता की आंचल को खरोंच रही है। मीडिया का यह वर्ग आज राष्ट्रविरोधी तत्वों को अभिव्यक्ति की आजादी और नकली प्रगतिशीलता का कवच पहनाकर नायक बनाने पर आमादा है। बीते दिनों जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय में छात्रों के एक वर्ग द्वारा भारत विरोधी नारे लगाए गए और भारत के कई टुकड़े करने की हिमायत की गयी। दुर्भाग्य से मीडिया का यह वर्ग इन राष्ट्रद्रोही छात्रों की जुबान बनता नजर आया। पत्रकारिता का यह वर्ग अपने को राष्ट्रवादी या लोकतांत्रिक होने की चाहे जितनी दुहाई दे लेकिन सच यही है कि उसने अपने नकारात्मक विचारों और तेवरों से राष्ट्र की एकता, अखंडता और संप्रभुता को खंडित किया। पत्रकारिता के तथाकथित इन अलंबरदारों को गौर करना होगा कि आजादी के दौरान पत्रकारिता के अग्रदूतों ने मूल्य आधारित राष्ट्रवादी पत्रकारिता की नींव इसलिए डाली कि आजादी के लक्ष्य को हासिल करने के साथ लोकतंत्र का चैथा स्तंभ देश के नागरिकों विशेषकर युवाओं में राष्ट्रीय भावना का संचार करेगा। पत्रकारिता के अग्रदूतों का लक्ष्य अपनी लेखनी और विचारों के जरिए भारतीय संस्कृति, मूल्य, प्रतिमान और सारगर्भित विचारों की विरासत को सहेजना और एक सामथ्र्यवान भारत का निर्माण करना था। क्या आज की तथाकथित सेकुलर मीडिया जो अपनी निष्पक्षता की कोरा दावा करती है क्या उस कसौटी पर खरा है? क्या उसकी खबरें और वैचारिक सरोकार राष्ट्रीय भावना का प्रतिनिधित्व करते हैं? क्या वह देश के जनमानस में राष्ट्रीय भावना का संचार कर रही है? सच तो यह है कि आज की मीडिया का एक बड़ा वर्ग इंडस्ट्री की तरह काम कर रहा है जिसकी खबर और सरोकार राष्ट्रवादी नहीं बल्कि षड़यंत्रकारी है जिसका मकसद भारतीयता और राष्ट्रीयता को चोट पहुंचाना है। उसे न तो राष्ट्रहित की चिंता है और न ही भावी पीढ़ी को संवारने की जिसके मार्फत भारत का भविष्य तय होना है। काॅरपोरेट कम्युनिकेशन की सुनामी में समा चुकी इस पत्रकारिता के पैरोकारों में न तो सच लिखने का माद्दा है और न ही राष्ट्र के प्रति कोई जवाबदेही और जिम्मेदारी। उनका सिर्फ एक मकसद देश को भ्रमित करना है। उचित होता कि मौजुदा पत्रकारिता के ये सिरमौर लाला लाजपत राय, महामना मदनमोहन मालवीय, विपिनचंद्र पाल, गणेश शंकर विद्यार्थी, बाल गंगाधर तिलक और विपिन चंद्र पाल सरीखे आजादी के दीवानों की पत्रकारिता को अपना आदर्श मूल्य व विचार बनाते। बाल गंगाधर तिलक ने जब मराठी भाषा में ‘केसरी’ और अंग्रेजी भाषा में ‘मराठा’ नामक पत्रों का प्रकाशन प्रारंभ किया तो उन्होंने राष्ट्रीय व सामाजिक सरोकारों को आगे रखा। उनके आंखों में भारत की आजादी और समतामूलक समाज का सपना था, जो उनके पत्रों में स्पष्ट परिलक्षित और प्रतिबिंबित होता था। उन दिनों कोल्हापुर रियासत के शासन में बड़ा अंधेर मचा था। इस अंधेरगर्दी के खिलाफ ‘केसरी’ ने जोरदार आवाज बुलंद की लेकिन गोरी सरकार को यह रास नहीं आया। सो उसने बाल गंगाधर तिलक और उनके सहयोगियों पर मुकदमा चलाकर जेल में डाल दिया। लेकिन तिलक अपने पत्रों के जरिए भारतीय जनमानस में चेतना भरने में कामयाब रहे। यही नहीं वे इन समाचारपत्रों के जरिए ब्रिटिश शासन तथा उदार राष्ट्रवादियों की, जो पश्चिमी तर्ज पर सामाजिक सुधारों तथा संवैधानिक तरीके से राजनीतिक सुधारों का पक्ष लेते थे, की भी कटु आलोचना के लिए विख्यात हो गए। लाल-बाल-बाल की तिकड़ी के तीसरे नायक व क्रांतिकारी विचारों के जनक विपिन चंद्र पाल ने अपनी धारदार पत्रकारिता के जरिए स्वतंत्रता आंदोलन में जोश भर दिया। उन्होंने अपने गरम विचारों से स्वदेशी आंदोलन में प्राण फूंका और अपने पत्रों के माध्यम से ब्रिटेन में तैयार उत्पादों का बहिष्कार, मैनचेस्टर की मिलों में बने कपड़ों से परहेज तथा औद्योगिक तथा व्यवसायिक प्रतिष्ठानों में हड़ताल इत्यादि हथियारों से ब्रिटिश हुकूमत की नींद उड़ा दी। उन्होंने 1880 में परिदर्शक, 1882 में बंगाल पब्लिक ओपिनियन, 1887 में लाहौर ट्रिब्यून, 1892 में द न्यू इंडिया, 1901 में द इनडिपेंडेंट इंडिया, 1906-07 में वंदेमातरम्, 1908-11 में स्वराज, 1913 में हिंदू रिव्यू, 1919-20 द डैमोक्रैट और 1924-25 में बंगाली के जरिए आजादी की लड़ाई को धार दिया और भविष्य की पत्रकारिता के मूल्यों को परिभाषित किया। महान देशभक्त पंडित मदन मोहन मालवीय ने देश की चेतना को प्रबुद्ध करने के लिए कई पत्रों का संपादन किया। कालाकांकर के देशभक्त राजा रामपाल सिंह के अनुरोध पर उन्होंने उनके हिंदी व अंग्रेजी समाचार पत्र हिंदुस्तान का संपादन कर देश की जनता को जाग्रत किया। उन्होंने 1907 में साप्ताहिक ‘अभ्युदय’ और ब्रिटिश सरकार समर्थक पत्र पायनियर के समकक्ष 1909 में दैनिक ‘लीडर’ अखबार निकालकर जनमत निर्माण का महान कार्य संपन्न किया। फिर 1924 में दिल्ली आकर हिंदुस्तान टाइम्स को सुव्यवस्थित किया तथा सनातन धर्म को गति देने हेतु लाहौर से विश्वबन्ध जैसे अग्रणी पत्र को प्रकाशित करवाया। देश में नवजागृति और नवीन चेतना का संचार करने वाले गणेश शंकर विद्यार्थी महामना के पत्र ‘अभ्युदय’ से जुड़ गए और 1913 में ‘प्रताप’ नामक समाचार पत्र का प्रकाशन कर ब्रिटिश हुकूमत की चूलें हिलानी शुरु कर दी। ‘प्रताप’ के प्रथम संस्करण में ही उन्होंने हुंकार भरा कि हम राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन, सामाजिक-आर्थिक क्रांति व उत्थान, जातीय गौरव और साहित्यिक विरासत के लिए, अपने हक अधिकार के लिए संघर्ष करेंगे। ‘प्रताप’ में प्रकाशित नानक सिंह की ‘सौदा ए वतन’ कविता से नाराज होकर अंग्रेजों ने विद्यार्थी जी पर राजद्रोह का आरोप लगाकर ‘प्रताप’ का प्रकाशन बंद करवा दिया। लेकिन हार न मानने वाले इस शूरवीर ने ‘प्रताप’ का पुनः प्रकाशन किया और सरकार की दमनपूर्ण नीति की सख्त मुखालफत की। गौर करें तो स्वतंत्रता आंदोलन की जंग से पूर्व ही 1857 की क्रांति की घटना ने राष्ट्रीय जागरण के युग की शुरुआत कर दी और 19 वीं शताब्दी के प्रथम अर्धभाग में अंग्रेजी तथा देशी भाषाओं में समाचार पत्र-पत्रिकाओं ने नवचेतना का संचार करना शुरु कर दिया। राष्ट्रवादी संपादकों, पत्रकारों एवं लेखकों ने अपने संपादकीय, लेखों और खबरों के माध्यम से ब्रिटिश साम्राज्य की चूलें हिलानी शुरु कर दी। उनका लक्ष्य ब्रिटिश पंजे से भारत को मुक्ति दिलाना ही नहीं बल्कि स्वतंत्रता बाद एक लोकतांत्रिक और समतामूलक समाज का निर्माण करना भी था। 18 वीं शताब्दी में जब भारतीय समाज बहु-विवाह, बाल-विवाह, जाति प्रथा और पर्दा-प्रथा जैसी सामाजिक बुराईयों से अभिशप्त था उस दरम्यान भी पत्रकारिता के अग्रदूतों ने समाज को संस्कारित करने का काम किया। इन अग्रदूतों में से एक राजाराम मोहन राय ने ‘संवाद कौमुदी’ और ‘मिरातुल अखबार’ के जरिए भारतीय जनमानस को जाग्रत किया। नवजागरण के परिणाम स्वरुप देश में अनेक समाचार पत्रों का प्रकाशन प्रारंभ हुआ जिनमें 1861 में टाइम्स आॅफ इंडिया, 1865 में पायनियर, 1868 में अमृत बाजार पत्रिका, 1875 में स्टेट्समैन और 1880 में ट्रिब्यून इत्यादि समाचार पत्र प्रमुख है। इन समाचार पत्रों में कुछ ब्रिटिश हुकूमत के पाल्य थे और उनकी स्वामीभक्ति ब्रिटिश साम्राज्य के चरणों में थी। ठीक उसी तरह जैसा कि आज के कुछ समाचार पत्रों की विचारधारा पूर्णतः राष्ट्रवादिता के विरुद्ध है। समाचार पत्रों की भूमिका तब और प्रासंगिक हो जाती है जब राष्ट्र संक्रमण के दौर से गुजरता है। लेकिन जब समाचार पत्र ही राष्ट्रवाद पर कुठाराघात कर देशद्रोहियों की पैरोकारी करेंगे और सत्य के उद्घाटन की जगह प्रायोजित झुठ को स्थापित करेंगे तो फिर पत्रकारिता का उद्देश्य और मूल्य खण्डित होगा ही। उचित होगा कि पत्रकारिता की आड़ में राष्ट्रविरोधी तत्वों को प्रश्रय देने वाले मीडिया समूह अपने राष्ट्रीय उत्तरदायित्व को समझते हुए हर घटनाओं का सार्थक मूल्यांकन करें और देश व समाज को गुमराह करने के बजाए उन्हें सत्य से परिचित कराएं। राष्ट्रविरोधी कृत्यों के राष्ट्रद्रोहियों को अभिव्यक्ति और आजादी का कवच कुंडल पहनाकर उन्हें नायक बनाने की प्रवृत्ति राष्ट्र के साथ धोखाधड़ी और समाज के साथ छल है।

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