लेखक परिचय

मयंक चतुर्वेदी

मयंक चतुर्वेदी

मयंक चतुर्वेदी मूलत: ग्वालियर, म.प्र. में जन्में ओर वहीं से इन्होंने पत्रकारिता की विधिवत शुरूआत दैनिक जागरण से की। 11 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय मयंक चतुर्वेदी ने जीवाजी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में डिप्लोमा करने के साथ हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर, एम.फिल तथा पी-एच.डी. तक अध्ययन किया है। कुछ समय शासकीय महाविद्यालय में हिन्दी विषय के सहायक प्राध्यापक भी रहे, साथ ही सिविल सेवा की तैयारी करने वाले विद्यार्थियों को भी मार्गदर्शन प्रदान किया। राष्ट्रवादी सोच रखने वाले मयंक चतुर्वेदी पांचजन्य जैसे राष्ट्रीय साप्ताहिक, दैनिक स्वदेश से भी जुड़े हुए हैं। राष्ट्रीय मुद्दों पर लिखना ही इनकी फितरत है। सम्प्रति : मयंक चतुर्वेदी हिन्दुस्थान समाचार, बहुभाषी न्यूज एजेंसी के मध्यप्रदेश ब्यूरो प्रमुख हैं।

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मीडिया में प्रिंट हो या इलेक्टनॅनिक दोनों के विषय में जन मानस के बीच अनेक प्रकार के विचार सुनने को मिलते हैं, कोई इसे वर्तमान और भविष्य की दिशा तय करने वाला सशक्त माध्यम मानता है तो कुछ इसके बारे में ऐसी भी धारणा रखते हैं कि आजादी के बाद इसने अपना नैतिक स्तर खो दिया है। यह सिद्धांतों के लिए समर्पित नहीं, व्यक्ति सापेक्ष हो गई है। पत्रकारिता समाज व राष्टन् की प्रबोधिनी न होकर बाहुबलियों और शक्तिशालियों की दासी बन उनकी चाटुकारिता में ही अपना हित देखती है। निश्चित ही इन भाव-विचारों के बीच आज के दौर में इस बात को भी नहीं नकारा जा सकता है कि युग के अनुकूल परिस्थितियाँ बनती और बिगडती हैं। पहले धर्मदण्ड राज्य व्यवस्था से ऊपर माना जाता था तथा वह राजा के कर्तव्यों के निर्धारण के साथ आवश्यकता पडने पर उसके अनैतिक आचरण के विरूद्ध दण्ड भी देनें की शक्ति रखता था, जबकि वर्तमान संवैधानिक व्यवस्था के अंतर्गत सेक्युलर राज्य की अवधारणा ने धर्मदण्ड की शक्ति का हृास किया है, अब राज्य की लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता का चुना हुआ प्रतिनिधि (नेता) ही सर्वशक्तिमान है और राजनीतिक सत्ता सर्वोपरि है।

भारतीय संविधान के तीन प्रमुख स्तम्भ हैं सत्ता चलाने वाले (एक्जिक्युटिव्ह), कानून बनाने वाले (लेजिस्लेटिव्ह) तथा न्याय देने वाले (ज्यूडिशिअरी)। इन तीन स्तम्भों के सहारे ही भारतीय राज्य व्यवस्था का सम्पूर्ण तानाबाना बुना हुआ है। मंत्री परिषद् कोई योजना या नियम बनाती है, उसकी अच्छाई-बुराई को जनता के सामने रखना मीडिया की जिम्मेदारी है। जिसे वह अपने जन्मकाल से स्वतंत्र रूप से करती आ रही है। इसके बारे में भारतीय संविधान की 19वीं धारा में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में अधिकार के अंतर्गत विस्तार से दिया गया है। इस अनुच्छेद ने मीडिया को सार्वभौमिक शक्ति प्रदान की है जिससे वह प्रत्येक स्थान पर अपनी पैनी नजर रखते हुए स्व विवेक के आधार पर घटना से सम्बन्धित सही-गलत का निर्णय कर सके । यह ओर बात है कि जाने-अनजाने मीडिया की इस नजर से अनेक भ’ष्ट लोग हर रोज आहत होते हैं। ऐसे लोग आए दिन माँग भी करते हैं कि मीडिया पर ऍंकुश लगना चाहिए। उनका तर्क है कि जब कानून का शिकंजा सभी पर कसा हुआ है फिर मीडिया क्यों उससे अछूती रहे ? खासकर मीडिया और राजनीति के अंतर्सम्बन्धों को लेकर यह बात बार-बार उछाली जाती है।

यहाँ गौर करने वाली बात यह है कि 15 अगस्त 1947 से आजाद गणतंत्र के रूप में भारत ने जिस शासन प्रणाली को स्वीकारा है। वह जनता का जनता द्वारा जनता के लिए संचालित लोकतंत्रात्मक शासन है, जिसमें प्रगति के पथ पर पीछे छूट चुके व्यक्ति की चिंता रखना और उसके हित में कार्य करने को सबसे अधिक वरियता दी गई है। इस व्यवस्था में जनता से चुने गए प्रतिनिधि शासन का संचालन करते हैं, यह प्रणाली जन प्रतिनिधियों को अपार अधिकार प्रदत्त करती है। चूंकि मीडिया जनता के प्रति जबावदेह है इसलिए वह महाषियों और नेताओं का तथ्यपरख-तटस्थ लेखा-जोखा जनता तक पहुँचा देती है। अत: मीडिया और राजनीति एक दूसरे की सहयोगी बनकर कार्य करती दिखाई देती हैं।

सन् 1977 में कोलकाता में जब जेम्स आगस्टस हिकी ने भारत में सबसे पहले प्रेस की स्थापना की ओर 1980 से बंगाल गजट एण्ड कैलकटा जनरल एडवरटाइजर नामक दो पन्नों का अखबार शुरू किया था तब और उसके बाद प्रकाशित समाचार पत्र-पत्रिकाएँ उदन्त मार्तण्ड हरिश्चन्द्र मैगजीन, सर्वहित कारक, प्रजाहित, बनारस अखबार, प्रजाहितैषी, सरस्वती, बाल बोधनी, भारत जीवन, हिन्दी प्रदीप, ब्राम्हण, हिन्दुस्तान, अभ्युदय, प्रताप, कैसरी, कलकत्ता समाचार, स्वतंत्र, विश्वमित्र, विजय, आज, विशाल भारत, त्याग भूमि, हिंदू पंच, जागरण, स्वराज, नवयुग, हरिजन सेवक, विश्वबन्धु, हिन्दू, राष्ट्रीयता, चिंगारी, जनयुग, सनमार्गआदि ही क्यों न हों, प्राय: आजादी के पूर्व निकले इन सभी समाचार पत्र-पत्रिकाओं पर यह आरोप लगे थे कि क्यों यह राजनीतिक, प्रशासनिक व्यवस्था और राजनेताओं पर अपनी नजर गढाए रखते हैं तथा व्यवस्था परिवर्तन के बारे में लिखते हैं। स्वतंत्रता के पश्चात् बीते 62 सालों के बाद भी मीडिया पर यह आरोप यथावत् है। व्यवस्था में खामियाँ इतनी अधिक हैं कि उन पर मीडिया लगातार प्रहार कर रही है। यहाँ आरोप लगाने वाले भूल जाते हैं कि यही पत्रकारिता विकास के मॉडल तथा योजनाओं को जनता तक पहुँचाती है। न केवल मीडिया सूचना पहुँचाती है बल्कि जन के मानस को इस बात के लिए तैयार करती है कि सृह्ढ भविष्य के भारत निर्माण तथा अपने राज्य, नगर, ग्राम के हित में किस पार्टी को अपना बहुमूल्य वोट दें।

आज मीडिया के उद्देश्यों को लेकर दो तरह की विचारधाराएँ प्रचलित हैं। एक मीडिया को शुध्दा व्यवसाय मानते हैं तो दूसरा वर्ग इसे जन संचार का शक्तिशाली माध्यम होने के कारण जनकल्याण कारक, नैतिक मूल्यों में अभिवध्र्दाक, विश्व बन्धुत्व और विश्व शांति के लिये महत्वपूर्ण मानता है। दोनों के ही अपने-अपने तर्क हैं। वस्तुत: इन तर्कों के आधार पर कहा जा सकता है कि वर्तमान पत्रकारिता जहाँ व्यवसाय है वहीं परस्पर प्रेम, जानकारी और शक्ति बढाने का माध्यम भी है।

बोफोर्स, तेलगी, नोट कांड, भ’ष्टाचार से जुडी तमाम धांधलियाँ, भारत की सीमाओं में अवैध घुसपैठ, नकली करेंसी, हवाला के जरिए धन का आवागमन, आतंकवादी गतिविधियाँ और कुछ माह पूर्व आई लिब’हान रपट ही क्यों न हो। समाचार पत्र-पत्रिकाओं और इलेक्टनॅनिक मीडिया द्वारा जो बडे-बडे खुलासे किये गये, वह समय-समय पर पत्रकार को मिली राजनेताओं की मदद-सूचना एवं सहयोग का परिणाम है। वस्तुत: पत्रकार को राजनेता से बने आपसी सम्बन्धों का लाभ जीवन भर मिलता है। एक पत्रकार उस नेता को जिसका उससे मित्रवत् व्यवहार है आवश्यकतानुसार उसे प्रोत्साहित करता है, उसके हित में समाचार लिखता है। बदले में उससे ऐसे अनेक समाचार प्राप्त करता है जो न केवल पत्रकार की खोजी प्रवृत्ति के कारण उसके संस्थान में प्रतिष्ठा दिलाते हैं, बल्कि उसे मीडिया जगत में एक विश्वसनीय ब’ांड की तरह स्थापित करते हैं।

जब पत्रकार कोई नकारात्मक समाचार लिखता है तब भी वह अप्रत्यक्ष जनता का हित ही साध रहा होता है। आप राजनीति और मीडिया के इन अंर्तसम्बन्धों को चाहें तो स्वार्थ के सम्बन्ध भी कह सकते हैं बावजूद इसके यह नकारा नहीं जा सकता कि पत्रकार द्वारा धन-यश प्राप्ति के लिए किया गया प्रयास सदैव आमजन के हित में रहा है। जब एक नेता, दूसरे नेता की तथा प्रशासक-कर्मचारी दूसरे अधिकारी-कर्मचारी की खामियों, नीतियों, उनके काले कारनामों को उजागर करते हैं तब प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष वह जनहित से जुडे विषयों को मीडिया में रखने का कार्य करते हैं। भ’ष्टाचार की कलई खुलने पर जो राशि प्राप्त की जाती है उसका बहुत बडा भाग केन्द्र व राज्य सरकारों द्वारा जन कल्याणकारी योजनाओं में खर्च किया जाता है।

स्वाधीनता आंदोलन के समय और उसके बाद भारत में मूल्यों के संरक्षण संवर्धन तथा उनकी स्थापना का कार्य मीडिया निरंतर कर रही है। यही उसे लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का संरक्षक बनाता है। जब तक भारत में लोकतंत्रात्मक शासन व्यवस्था रहेगी तब तक मीडिया और राजनीति में अंर्तसम्बन्ध बने रहेंगे। इस पर कोई भी बहस की जाए वह अधूरी रहेगी।

-मयंक चतुर्वेदी

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