लेखक परिचय

पंकज झा

पंकज झा

मधुबनी (बिहार) में जन्म। माखनलाल चतुर्वेदी राष्‍ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर की उपाधि। अनेक प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों में राजनीतिक व सामाजिक मुद्दों पर सतत् लेखन से विशिष्‍ट पहचान। कुलदीप निगम पत्रकारिता पुरस्‍कार से सम्‍मानित। संप्रति रायपुर (छत्तीसगढ़) में 'दीपकमल' मासिक पत्रिका के समाचार संपादक।

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OB-DR673_ibjp05_G_20090516074443यदि समग्र रूप से आजादी के बाद के राष्ट्रवादी आंदोलनों पर दृष्टिपात करें तो मोटे तौर पर यह पाते है कि दक्षिणपंथी कहे जाने वाले संगठनों को सदैव ही मीडिया की उपेक्षा का शिकार रहना पडा है। ना केवल उपेक्षा अपितु बहुधा इन विचारधाराओं को असहयोग और दुष्प्रचार का भी सामना करना पड़ा है। बात चाहे संघ की हो, जनसंघ की या आज के भाजपा की, अनावश्यक रूप से कई बार समाचार माध्यमों ने अपने पूर्वाग्रह के कारण इस आन्दोलन को गंभीर नुकसान पहुचाया है। उदाहरण तो कई हैं, लेकिन अगर आप केवल इस कोण से लोकसभा के हालिया चुनाव परिणाम का ही विशेषण करें तो कई चीज़ें स्पष्ट हो जायेगी।

आखिर क्या मायने थे इस परिणाम के? पार्टी विशेष के मीडिया एवं प्रकाशन से जुड़े होने के कारण इस लिक्खाड़ को तो यही लग रहा है कि यह केवल केन्द्रीय स्तर पर कांग्रेस के मीडिया प्रबंधन की जीत थी। निश्चित ही भाजपा समेत हर पार्टी के प्रचार-प्रसार विभाग को यह सीखना होगा कि न केवल अच्छे मुद्दे उठाना महत्वपूर्ण है, बल्कि उसे जनता तक कैसे पहुँचे इसकी चिंता करना भी जरूरी है। और साथ ही असुविधापूर्ण मुद्दों को दरकिनार कैसे किया जाय, उससे मतदाताओं को डायवर्ट किस तरह किया जाय यह भी सीखने वाली बात है। आखिर मनमोहन सरकार की दुबारा ताजपोशी के बाद भी कोई यह कह सकता है कि भाजपा द्वारा उठाये गये मुद्दे गलत थे? क्या महंगाई आसमान नहीं छू रही थी, आपको दाल रोटी के लिए मोहताज नहीं होना पड़ रहा था? लोग बेरोजगार नहीं हो रहे थे, उसके पेट पर लात नहीं पड़ रहा था? किसान आत्महत्या नहीं कर रहे थे, आतंकवाद अपने चरम पर नहीं था? आखिर कोई यह बात कहेगा कि अफजल की मेहमान-नवाजी बदस्तूर जारी रहनी चाहिए? देश का सारा धन स्विस बैंकों में जमा हो जाना चाहिए और सत्यम् जैसे घोटालों के कारण वास्तविक छोटे-छोटे निवेशकों को कंगाल हो जाना चाहिए। केवल एक कंपनी के 53 हजार से अधिक कर्मचारियों का भविष्य दांव पर लग जाना चाहिए। क्वात्रोकी पर से रेड कार्नर नोटिस हटा लेनी चाहिए और 84 के नरसंहार के आरोपियों को खुला छोड़ देना चाहिए? इस तरह के ढेर सारे मुद्दे न गलत थे और न ही कम महत्वपूर्ण। लेकिन आपको ध्यान होगा कि प्रियंका के पहनावे, उनके जिंस और टॉप का रंग, राहुल जी की शादी होगी या नहीं होगी, ऐसे युवा अभिरूचि से जुड़े हुए रोचक विषय पूरे चुनाव के दौरान अखबारों में जगह पाते रहे और वास्तवविक मुद्दे गायब रहे। चुंकि पिछले अनुभवों ने कांग्रेस को यह सबक दी थी कि किसी भी सरकार को उखाड़ फेंकने या उसे बनाने में एक ही मामला काफी होता , एक ही लहर पर्याप्त है। जैसे केवल रामजन्म भूमि आंदोलन के कारण भाजपा सत्ता में आ गयी, तो प्याज के कारण दिल्ली की भाजपा सरकार चली गई, गुर्जर-मीणा संघर्ष के कारण राजस्थान से भाजपा का सफाया हो गया। तो कांग्रेस के मैनेजरों ने मीडिया का इस्तेमाल बखूबी कर जन सरोकारों से जुड़े तमाम विषयों को नेपथ्य में डालकर वास्तव में इस चुनाव को राष्ट्रीय मुद्दा से विहीन बनाने का सफल प्रयास किया और वह जीत शायद उसी की थी। और हुआ ये कि मुद्दों के अभाव में लोगों ने क्षेत्रीय या स्थानीय आधार पर मतदान किया और मोटे तौर पर राष्ट्रीय चुनाव में भी राज्य सरकारों के काम-काज को ही आधार बनाया गया। छत्तीसगढ़, बिहार, कर्नाटक जैसे प्रदेशों में भाजपा या राजग की इकतरफा जीत, पश्चिम बंगाल केरल जैसे राज्यों में वामपंथियों का सफाया, उत्तरप्रदेश में बसपा, राजस्थान में भाजपा के विरोध में जनादेश तो दिल्ली, मध्यप्रदेश, गुजरात उत्तराखंड जैसे राज्यों में कांग्रेस को उम्मीद से अधिक सफलता। इन सबके संदेश यही हैं कि राष्ट्रीय मुद्दों के कृत्रिम अभाव में लोगों द्वारा स्थानीय आधार पर मतदान किये। अब यह अलग बहस का विषय हो सकता है कि क्या यह उचित है कि प्रधानमंत्री का चुनाव करते समय हम अपने महापौर या नगर पंचायत के कामकाज को ध्यान में रखकर मतदान करें?

इसी तरह अभी तक तमाम विश्लेषक इस बात पर सबसे ज्यादा जोर दे रहे हैं कि भाजपा को उसके नकारात्मक प्रचार अभियान का खामियाजा उठाना पड़ा है। अगर यह सही होता तब तो 2004 में राजग की जीत अवश्यंभावी होनी चाहिए थी? इस समय तो ‘फील गुड’ और ‘इंडिया शाइनिंग’ जैसे बिल्कुल सकारात्मक मुद्दे ही केंद्र में थे, वाजपेयी सरकार विशुद्ध रूप से अपने छ:वर्ष के कार्यकाल में किये गये विकास के सकारात्मक आधार पर मैदान में थी, तो आखिर तब उसे मुंह की क्यों खानी पड़ी थी? तो क्या जीत या हार इस पर निर्भर करता है कि आपने अपने अभियान को सकारात्मक या नाकारात्मक रखा? इसी तरह एक बात बार-बार कही जा रही है कि राजग को प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार का घोषणा करना भारी पड़ा यहां यह ध्यातव्य है कि यह घोषणा भी कोई पहला मामला नहीं था आखिर भाजपा सत्ता में आयी भी थी ”अबकी बारी अटल बिहारी’ के नारे के सहारे, फिर राज्यों के विधानसभा चुनाव में भी तो चेहरे को आगे करके ही चुनाव लड़ा गया था। उन चुनावों में अधिकांश जगह पर पार्टी जीती और जहाँ कांग्रेस को भी विजय मिली वह भी ‘चेहरे’ की बदौलत ही, जैसे दिल्ली में। जब आप सत्ता में आने पर अपने पूरे पांच साल के आगामी कार्यक्रमों की घोषणाएं अपने मेनीफेस्टो के द्वारा कर सकते हैं तो सत्ता में आने पर नेता कौन होगा यह घोषणा करने में क्या बुराई है? आखिर आप लाख अध्यक्षीय प्रणाली एवं वेस्टमिंस्टर प्रणाली के बीच के अंतर का राग अलापे, लेकिन सच्चाई तो यही है कि यूपीए को भी प्रधानमंत्री पद के अपने उम्मीदवार की घोषणा आनन-फानन में करनी पड़ गयी जबकि इससे पहले कांग्रेस का स्पष्ट मत था कि ‘नेता’ निर्वाचित सांसदों द्वारा ही चुना चाना चाहिए।

यह तय है कि यूपीए की यह जीत अप्रत्याशित है न केवल सेफॉलाजिस्टों बल्कि स्वयं कांग्रेस को भी ऐसे रिजल्ट की आशा नहीं थी। चाहे क्वोत्रोकी को रेड कार्नर से मुक्ति दिलाने का मामला हो या टाइटलर और सज्जन कुमार जैसे लोगों को क्लीन चिट दिलवाने का, कांग्रेस बिल्कुल हड़बड़ी में थी और सीबीआई पर दबाव डालकर भी अपने सारे ‘काम’ निपटा लेना चाहती थी।

तो भले ही यह परिणाम किसी के भी आशानुकूल नहीं आया हो, लेकिन इसका सकारात्मक पक्ष यह है कि एक सुस्थिर सरकार के पक्ष में जनादेश दिया गया। आज प्रसन्नता की बात यह है कि केन्द्र में बिल्कुल दो ही राष्ट्रीय दलों की प्रभावी भूमिका बच गयी है, पक्ष में कांग्रेस और विपक्ष के रूप में भाजपा। इन्हीं दोनों दलों पर राष्ट्र को आगे ले जाने की जिम्मेदारी जनता ने दी है। तमाम क्षेत्रीय एवं जातीय ताकतों, ब्लेकमेलर दलों, छुटभैयों का सफाया हो जाना लोकतंत्र के लिए संजीवनी की तरह है। इस मायने में नि:संदेह यह एक परिपक्व जनादेश है। भाजपा को विपक्ष के रूप में काम करने का दशकों का अनुभव है, फिलहाल तो उसे अपने इन्हीं अनुभवों से काम चलाना होगा।

बहरहाल, हर पार्टी चाहे वह जीते या हारे। लोकतंत्र के इस सबसे बड़े ‘युद्ध’ में हर राजनीतिक दल भरसक प्रयत्न करती ही है। यदि आप जीत गये तो उसी प्रयत्न की प्रशंसा की जायगी और हार गये तो वही काम आलोचना का केन्द्रबिंदू बना दिया जायेगा। निश्चत ही कांग्रेस के इस जीत पर भाजपा द्वारा चिंतन-मनन किया जायेगा, कहां क्या कमी-बेसी रह गयी इस पर विचार किया गया होगा। लेकिन यह तय है कि अगर प्रसार माध्यम भी वैसा नहीं है जैसा होना चाहिए, यदि आपकी बात मीडिया द्वारा जनता तक नहीं पहुंच पा रही है तो भाजपा जैसी बड़ी राजनीतिक पार्टी को चाहिए कि वह अपना प्रचार एवं संचार तंत्र विकसित करें। चुंकि इस आलेख के प्रकाशन में भी प्रसार माध्यमों का ही सहारा चाहिए अत: मीडिया की भूमिका पर ज्यादा कहना संभव नहीं है। लेकिन इस चुनाव परिणाम ने भाजपा को यह इशारा जरूर किया है कि वह अपना मार्ग खुद तय करे। न केवल प्रचार-प्रसार के क्षेत्र में बल्कि सहयोगी दलों द्वारा ऐन मौके पर साथ छोड़ जाने से सबक लेकर राजनीतिक मामलों में भी उन्हें अब आत्मनिर्भर ही होना होगा। गुरुदेव रवीन्द्र नाथ के शब्द में कहूं तो ”यदि तोर डाक शुने केऊ न आसे, तबे एकला चलो रे। एकला चलो, एकला चलो, एकला चलो रे।’

-जयराम दास

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1 Comment on "मीडिया और भाजपा : तेरा मेला पीछे छूटा राही चल अकेला"

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ajit gupta
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आपने एकदम सटीक चित्रण किया है, कि इस बार ब्‍लेकमेलर दल समाप्‍त हुए हैं। लेकिन एक बात है कि हम नकारात्‍मक प्रचार कब तक करेंगे? हमारी छवि भी तो बननी चाहिए कि हम क्‍या हैं? आखिर छवि बनाता कौन है? बुद्धिजीवी ही छवि बनाते हैं, लेकिन भाजपा के पास इसका अकाल पडा हुआ है। उसने अपने आसपास व्‍यापारी ही एकत्र कर लिए हैं। प्रत्‍येक व्‍यक्ति केवल सत्ता के लिए जुडा है। उनकी बातों में केवल सत्ता और आर्थिक पक्ष ही रहता है। यदि बुद्धिजीवी साथ होते तो वे उनकी नीतियों पर चर्चा करते। राम और कृष्‍ण के जमाने में वाल्मिकी… Read more »
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