लेखक परिचय

लिमटी खरे

लिमटी खरे

हमने मध्य प्रदेश के सिवनी जैसे छोटे जिले से निकलकर न जाने कितने शहरो की खाक छानने के बाद दिल्ली जैसे समंदर में गोते लगाने आरंभ किए हैं। हमने पत्रकारिता 1983 से आरंभ की, न जाने कितने पड़ाव देखने के उपरांत आज दिल्ली को अपना बसेरा बनाए हुए हैं। देश भर के न जाने कितने अखबारों, पत्रिकाओं, राजनेताओं की नौकरी करने के बाद अब फ्री लांसर पत्रकार के तौर पर जीवन यापन कर रहे हैं। हमारा अब तक का जीवन यायावर की भांति ही बीता है। पत्रकारिता को हमने पेशा बनाया है, किन्तु वर्तमान समय में पत्रकारिता के हालात पर रोना ही आता है। आज पत्रकारिता सेठ साहूकारों की लौंडी बनकर रह गई है। हमें इसे मुक्त कराना ही होगा, वरना आजाद हिन्दुस्तान में प्रजातंत्र का यह चौथा स्तंभ धराशायी होने में वक्त नहीं लगेगा. . . .

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भोपाल। मीडिया में ठेकेदारी (कान्ट्रक्ट सर्विस) प्रथा के बढ़ते चलन पर ‘मजीठिया वेजबोर्ड’ को खुलकर सामने आने का सुझाव देते हुए मध्यप्रदेश श्रमजीवी पत्रकार संघ ने 27 मार्च को भोपाल में उसे सौंपे अपने प्रतिनिधित्व :ज्ञापन: में कहा है कि कान्ट्रेक्चुअल सर्विस वास्तव में देश में लागू श्रम कानूनों का उल्लंघन है।

मप्र श्रमजीवी पत्रकार संघ की ओर से उसके अध्यक्ष शलभ भदौरिया एवं अन्य प्रदेश पदाधिकारियों ने सौंपे इस ज्ञापन में पत्रकारों एवं गैर पत्रकारों के लिए गठित मजीठिया वेजबोर्ड से कहा है कि श्रम कानून का मखौल उड़ाने वाली इस ठेकेदारी प्रथा से मीडियाकर्मियों को निजात दिलाने के लिए उसे सरकार के सामने अहम् भूमिका निबाहनी चाहिए।

उन्होने कहा कि पहले से ही समाचार पत्र उद्योग में श्रम कानूनों का उल्लंघन धड़ल्ले से किया जा रहा था तथा इससे पहले केन्द्र द्वारा स्वीकृत किए गए विभिन्न वेजबोर्ड्स की सिफारिशों को लागू नहीं किया गया है। मीडिया हाउसों के दबाव में सरकारों ने इन वेजबोर्ड्स को लागू कराने की भी कोई प्रभावी मशीनरी कायम नहीं की, जिससे आज भी इनमें काम करने वाले पत्रकार एवं गैर पत्रकार साथियों का जमकर शोषण हो रहा है। दुनिया भर में अराजकता और शोषण के खिलाफ अपनी कलम से आवाज उठाने वाला यह वर्ग अपने ही शोषण के खिलाफ इन बड़े और दबंग नियोक्ताओं के खिलाफ, अपनी रोजी-रोटी बचाए रखने की गरज के कारण कुछ नहीं कह सकता है। इसलिए मजीठिया वेजबोर्ड को चाहिए कि वह उसे मिले इस अवसर को ठेकेदारी प्रथा जैसे नामाकूल चलन पर प्रभावी रोक लगाने के लिए उपयोग करे।

ज्ञापन में सुझाव दिया गया है कि वेजबोर्ड लागू करने के लिए वह सरकार को श्रमजीवी पत्रकार कानून 1955 में आवश्यक संशोधन सुझाए, ताकि इसका उल्लंघन एक संज्ञान योग्य अपराध बन जाए। वेजबोर्ड को चाहिए कि वह राज्य स्तर तक नए वेतनमान लागू करने के प्रभावी उपाय भी सरकार को सुझाए ओर इसके उल्लंघन के लिए दाण्डिक प्रावधान करे। यही नहीं, बल्कि वेजबोर्ड का उल्लंघन करने वाले मीडिया हाउस को केन्द्र एवं राज्य दोनो सरकारों के विज्ञापनों के लिए ‘ब्लैकलिस्ट’ किया जाए।

वेजबोर्ड की सिफारिशें पूरी तरह लागू करने के लिए संघ ने यह भी सुझाव दिया है कि हर साल की शुरूआत में जिला श्रम अधिकारियों द्वारा श्रमजीवी पत्रकारों की सूची तैयार कर, जिसमें उनके नियोक्ता का नाम और संस्थान भी शामिल हो, विधानमण्डलों एवं संसद के दोनो सदनों में अधिसूचना सहित पेश की जाए और इसी अधिसूचना को पत्रकारों की अधिमान्यता देते समय उपयोग में लाया जाए। इससे वेजबोर्ड लागू नहीं करने वाले संस्थानों का भाण्डाफोड़ तो होगा ही साथ ही इसी सूची के आधार पर सरकार की पेशन, स्वास्थ्य, जीवन बीमा आदि योजनाओं को पत्रकारों के लिए प्रभाव में लाया जा सकेगा।

संघ ने वेजबोर्ड में समाचार पत्रों की श्रेणियां पांच तक सीमित रखने तथा समाचार अभिकरणों की तीन श्रेणियां अंतरर्राष्ट्रीय, राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय और टेलीविजन न्यूज चैनलों की भी श्रेणियां उनके राजस्व आय के आधार पर तय करने का सुझाव दिया है।

ज्ञापन में कहा गया है कि हर वेजबोर्ड का मकसद पत्रकारों एवं गैर पत्रकारों के लिए आकर्षक वेतन तय करना होता है, इसलिए मजीठिया अयोग से भी ऐसी ही अपेक्षा है, क्योंकि वर्तमान में पत्रकारों एवं गैर पत्रकारों के वेतनमान अन्य क्षेत्रों के कर्मचारियों की तुलना में काफी कम हैं। सरकारी कर्मचारियों के लिए तय हुए छठवें वेतनमान के मद्देनजर तो यह और भी कम है।

वैश्वीकरण के इस दौर में निजी क्षेत्र में दिए जा रहे बेहद आकर्षक वेतन को देखते हुए संघ का सुझाव है कि सबसे निचली श्रेणी में भी पत्रकारों के लिए वेतन निर्धारण कम से कम चालीस हजार रूपये मासिक होना चाहिए। हर श्रेणी में महंगाई भत्ते का शतप्रतिशत विलय के साथ ही समय-समय पर इसे ‘रिवाइज’ करने की सुविधा हो तथा महंगाई भत्ता सरकारी कर्मचारियों को देय भत्ते से किसी भी कीमत पर कम नहीं होना चाहिए। इसी प्रकार हाउसरेंट एलाउंस, मूल वेतन का 35 प्र्रतिशत, सिटी कम्पनसेटरी एलाउंस कम से कम एक हजार रूपये, मेडिकल एलाउंस पांच हजार रूपये मासिक तथा कन्वेंस एलाउंस भी कम से कम पांच हजार रूपये मासिक तय किया जाना चाहिए। जो कर्मचारी रात के समय डयूटी करते हों, उन्हें सब्सीडाइज्ड कैंटीन सुविधा अथवा 200 रूपये मील एलाउंस एवं 100 रूपये मासिक चायपान एलाउंस दिया जाए।

हर कर्मचारी को कम से कम 20 लाख रूपये का बीमा कवर मिले और इसका प्रीमियम प्रबंधन द्वारा भुगतान किया जाएं। इसके अलावा कर्मचारियों को चिकित्सा बीमा सुविधा पूरे जीवनकाल के लिए मिले और इसका प्रीमियम जिला श्रम अधिकारी के जरिए प्रबंधन द्वारा भरा जाए तथा नौकरी जाने अथवा सेवानिवृत्ति पर इसकी प्रीमियम राशि का भुगतान सरकार द्वारा हो।

संघ ने पत्रकारों के बच्चों की शिक्षा, गंभीर बीमारी के लिए ईलाज, उनके सभी आश्रितों के लिए चिकित्सा सुविधा, असुरक्षित क्षेत्रों में काम करने पर रिस्क एरिया एलाउंस, जैसी मांगों को भी वेजबोर्ड के सामने पूरी ताकत से रखा है।

उसने कहा है कि वेजबोर्ड इस तरह की व्यवस्था करे, ताकि उसकी लागू सिफारिशों को हर पांच साल में हर श्रेणी में अपने आप पचास प्रतिशत बढ़ा दिया जाए। उनसे यह भी आग्रह किया गया कि वह अपना कार्यकाल मई 2010 में पूरा होने तक सरकार को सिफारिशें सौंप दें और इसे एक जनवरी 2008 से लागू करने का सुझाव सरकार को दे, ताकि इसमें और अधिक विलंब नहीं हो।

-लिमटी खरे

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2 Comments on "मीडिया हाउसों में ठेकेदारी प्रथा पर लगे प्रभावी रोक"

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डॉ. महेश सिन्‍हा
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एक अख़बार कुछ सालों में कैसे इतना बढ़ गया पुराने सारे अखबारों को पीछे छोडते ?
इसी बहाने उसने अपना एक औद्योगिक साम्राज्य भी खड़ा कर लिया

डॉ. महेश सिन्‍हा
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सरकार जब खुद ठेके में लोगों से काम करवा रही है “संविदा नियुक्ति” तो उससे कैसी उम्मीद .
मीडिया खुदा मीडिया मैनजरों के सहारे चल रहा है

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