लेखक परिचय

संजय द्विवेदी

संजय द्विवेदी

लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विवि, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं। संपर्कः अध्यक्ष, जनसंचार विभाग, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, प्रेस काम्पलेक्स, एमपी नगर, भोपाल (मप्र) मोबाइलः 098935-98888

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बात अगर नई तकनीक और प्रौद्योगिकी की करें तो उसने अखबारों की ताकत और उर्जा का विस्तार ही किया है। अखबारों का नया रूप ज्यादा स्वीकार्य, सुदर्शन और व्यापक हुआ है तो इसके पीछे इंटरनेट और सूचना प्रौद्योगिकी का विकास ही है। सूचना की दुनिया की बढ़ती गति ने अखबारों के कार्यालयों का स्वरूप बदल गया। खबरें ज्यादा तेजी से, ज्यादा सज-धज के सामने आने लगीं। कम्प्यूटर पर पेजमेकिंग के नित नए साफ्टवेयर्स ने अखबारों को बेहद सजीला बना दिया है। आंचलिक अखबारों की बढ़ी ताकत और उनके नित नए संस्करणों का विकास दरअसल सूचना प्रौद्योगिकी और प्रिटिंग टेक्नालाजी में आए बदलावों के चलते ही संभव हुआ है। इसी आईटी क्रांति ने भाषाई पत्रकारिता को नवजीवन और नया जोश दिया है। यह दरअसल भारत जैसे देश के लिए एक नई परिघटना है। तेजी से बढ़ती साक्षरता, लोगों की बढ़ती क्रयशक्ति और स्टेटस सिंबल के रूप में बदलते अखबार एक ऐसी घटना है जिसे समझना जरूरी है। शायद यही कारण है कि भारत प्रिंट मीडिया के सबसे बड़े विश्वबाजार के रूप में उभर रहा है।

ये विकास का पहला चरण है, विकास का यह दौर अभी शुरू हुआ है जाहिर तौर पर वह लंबा खिचेंगा। विद्वानों की मानें तो भारतीय प्रिंट मीडिया को अभी दस या पंद्रह सालों तक कोई गंभीर चुनौती बेब माध्यम प्रस्तुत कर पाएंगें ऐसा नहीं लगता। लेकिन क्या दूसरे चरण में भी अखबारों की यह विकासयात्रा जारी रह पाएगी यह सवाल सबके सामने है। दस या पंद्रह साल बाद ही सही अखबारों के सामने चुनौती के रूप में वेब माध्यम का विकास तो हो ही रहा है। वह कुछ प्रतिशत में ही सही, अखबार को सूचना का प्राथमिक श्रोत तो नहीं ही रहने देगा। आज यह आंकड़ा बहुत कम जरूर है किंतु यह तेजी से बढ़नेवाला है इसे मान लेना चाहिए। हम इसे आज की युवा पीढ़ी जो शहरों में रह रही है कि बदलती आदतों से समझ सकते हैं कि वह किस माध्यम के ज्यादा करीब है। इंटरनेट के अविष्कार ने इसे एक ऐसी शक्ति दी जिसे सिर्फ अनुभव किया जा सकता है। वेबसाइट्स के निर्माण से ई-रीडिंग का प्रचलन भी बढ़ा है । हमारे पुस्तकालय खाली पड़े होंगे किंतु साइबर कैफै युवाओं से भरे-पड़े हैं। एक क्लिक से उन्हें दुनिया जहान की तमाम जानकारियां और साहित्य का खजाना मिल जाता है। यह सही है उनमें चैटिंग और पोर्न साइट्स देखनेवालों की भी एक बड़ी संख्या है किंतु यह मैं भरोसे के साथ कह सकता हूं कि नई पीढ़ी आज भी ज्यादातर सूचना या पाठ्य सामग्री की तलाश में इन साइट्स पर विचरण करती है। तकनीक कभी भी किसी विधा की दुश्मन नहीं होती, वह उसके प्रयोगकर्ता पर निर्भर है कि वह उसका कैसा इस्तेमाल करता है। नई तकनीक ने सूचनाओं का कवरेज एरिया तो बढ़ा ही दिया ही साथ ही ज्ञान-विज्ञान के तमाम अनुशासनों के प्रति युवाओं की पहुंच का विस्तार भी किया है। वेबसाइट्स ने दुनिया की तमाम भाषाओं में हो रहे काम और सूचनाओं का रिश्ता और संपर्क भी आसान बना दिया है। एक क्लिक पर हमें साहित्य और सूचना की एक वैश्विक दुनिया की उपलब्धता क्या आश्चर्य नहीं है। इसके साथ ही नेटवर्किंग और सोशल साइट्स की उपस्थिति एक दीवानगी के रूप में बढ़ रही है। यह सारा कुछ हमारे पढने के समय की ही चोरी है। परंपरागत तरीके के अध्ययन से यह तरीका अलग है। अखबार तो नेट और मोबाइल पर पढ़े जा सकते हैं, आपके टीवी सेट पर भी देखे जा सकते हैं।

अखबारों की पठनीयता पर कोई गंभीर अध्ययन कराया जाए तो इसके सही निष्कर्ष सामने आ सकते हैं। अखबार शहरी क्षेत्रों में पढ़े नहीं, पलटे जा रहे हैं। फिर इनके प्रसार बढ़ने का कारण क्या है। सही मानें तो अखबार एक स्टेटस सिंबल में बदल गए हैं। पढ़ने के मातृभाषा का अखबार और डायनिंग हाल में रखने को अंग्रेजी का अखबार। चार लोगों के रहने वाले घर में भी दो या चार अखबार आसानी से आते हैं। बढ़ती क्रय शक्ति भी इसका उत्प्रेरक तत्व बनी है। साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ती साक्षरता प्रेरक तत्व बनी है। सूचना पाने की उत्कंठा आज समाज के हर वर्ग में हैं। कंप्यूटर साक्षरता की धीमी गति, बिजली की कम उपल्ब्धता, मंहगे कंप्यूटर धीमी इंटरनेट कनेक्टिविटी ने अखबारों के लिए जीवनदान का काम किया है। आपको टीवी देखते, इंटरनेट पर विचरण करते युवाओं की टोली मिल जाएगी पर अखबार को धर्मग्रंथ की तरह बांचते अब प्रौढ़ या वृद्ध ही दिखते हैं।

इस तेजी से बदलती दुनिया, तेज होते शहरीकरण और जड़ों से उखडते लोगों व टूटते सामाजिक ताने बाने ने इंटरनेट को तेजी से लोकप्रिय किया है। कभी किताबें,अखबार और पत्रिकाएं दोस्त थीं आज का दोस्त इंटरनेट है क्योंकि यह दुतरफा संवाद का भी माध्यम है। सो पढ़े या लिखे हुए की तत्काल प्रतिक्रिया ने इसे लोकप्रिय बनाया है। आज का पाठक सब कुछ तुरंत चाहता है-इंस्टेंट। टीवी और इंटरनेट उसकी इस भूख को पूरा करते हैं। यह गजब है कि आरकुट, फेसबुक, ट्यूटर जैसी सोशल साइट्स का प्रभाव हमारे समाज में भी महसूस किया जाने लगा है। यह इंटरनेट पर गुजारा गया वक्त अपने पढ़ने के वक्त से लिया गया है। दूसरा सबसे बड़ा कारण यह है कि अखबारों के प्रकाशन में लगने वाली बड़ी पूंजी के नाते उसके हित और सरोकार निरंतर बदल रहे हैं। इस मामले में इंटरनेट अभी ज्यादा लोकतांत्रिक दिखता है। वेबसाइट बनाने और चलाने का खर्च भी कम है और ब्लाग तो निःशुल्क ही हैं। सो एक पाठक खुद संपादक और लेखक बनकर इस मंच पर अपनी उपस्थिति को सुलभ मानता है। स्वभाव से ही लोकतांत्रिक माध्यम होने के नाते संवाद यहां सीधा औऱ सुगम है। भारतीय समाज में तकनीक को लेकर हिचक है इसके चलते वेबमाध्यम अभी उतने प्रभावी नहीं दिखते, पर यह तकनीक सही मायने निर्बल का बल है। इस तकनीक के इस्तेमाल ने एक अनजाने से लेखक को भी ताकत दी है जो अपना ब्लाग मुफ्त में ही बनाकर अपनी रचनाशीलता से दूर बैठे अपने दोस्तों को भी उससे जोड़ सकता है। भारत जैसे देश में जहां साहित्यिक पत्रिकाओं का संचालन बहुत कठिन और श्रमसाध्य काम है वहीं वेब पर पत्र-पत्रिका का प्रकाशन सिर्फ आपकी तकनीकी दक्षता और कुछ आर्थिक संसाधनों के इंतजाम से जीवित रह सकता है। यहां महत्वपूर्ण यह है कि इस पत्रिका का टिका रहना, विपणन रणनीति पर नहीं, उसकी सामग्री की गुणवत्ता पर निर्भर करता है। वेबसाइट्स पर चलने वाली पत्रिकाएं और सूचनाप्रधान अखबार अपनी गुणवत्ता से जीवित रहते हैं जबकि प्रिंट पर छपने वाली पत्रिकाएं और अखबार अपनी विपणन रणनीति और अर्थ प्रबंधन की कुशलता से ही दीर्धजीवी हो पाते हैं। सो साहित्य के अनुरागी जनों के लिए ब्लाग जहां एक मुफ्त की जगह उपलब्ध कराता है वहीं इस माध्यम पर नियमित पत्रिका या विचार के फोरम मुफ्त चलाए जा सकते हैं। इसमें गति भी है और गुणवत्ता भी। इस तरह बाजार की संस्कृति का विस्तारक होने की आरोपी होने के बावजूद आप इस माध्यम पर बाजार के खिलाफ, उसकी अपसंस्कृति के खिलाफ मोर्चा खोल सकते हैं। इस मायने में यह बेहद लोकतांत्रिक माध्यम भी है। इसने पत्राचार की संस्कृति को ई-मेल के जरिए लगभग खत्म तो कर दिया है पर गति बढ़ा दी है, इसे सस्ता भी कर दिया है।

सही मायने में अभी हिंदी समाज को ई-संस्कृति विकसित होने का इंतजार करना पड़ेगा। इसके चलते भले ही प्रिंट माध्यम अपनी उपयोगिता बनाए रख सकते हैं। बावजूद हिंदी का यह बन रहा विश्व समाज हमें नए मीडिया के द्वारा खोले गए अवसरों के उपयोग करने वाली पीढ़ी तैयार कर रहा है। हिंदी का श्रेष्ठ साहित्य न्यू मीडिया में अपनी जगह बना सके इसके प्रयास हो रहे हैं। इंटरनेट ने प्रायः उन विधाओं और विषयों को फोकस किया है जो प्रायः मुख्यधारा के मीडिया से गायब हो रहे हैं। प्रिंट में अनुपस्थित बहुत सी विधाओं और विषयों पर इंटरनेट पर गंभीर विमर्श देखे जा रहे हैं। सो यह माध्यम देर-सबेर एक चुनौती के रूप में सामने तो खड़ा है ही। भारत के प्रायः सभी अखबार आज अपनी वेबसाइट बना चुके हैं इसका मतलब यह है कि उन्होंने इस माध्यम की स्वीकार्यता को समझ लिया है। इसके साथ ही कई अखबार मोबाइल पर भी खबरें दे रहे हैं। सो प्रिंट माध्यम के धराने एक साथ रेडियो, टीवी, फिल्म, मोबाइल न्यूज,वेबमाध्यम सभी में प्रवेश कर रहे हैं। इससे एक माध्यम दूसरे माध्यम को चुनौती भी देता हुआ दिखता है तो सहयोगी की भूमिका में भी है। इसे प्रिंट माध्यमों से जुड़े घरानों का विस्तारवाद तो कहा ही जा सकता है पर इसे इस रूप में भी देखा जाना चाहिए कि इन घरानों ने प्रिंट माध्यम या अखबारों की सीमाएं समझ ली हैं। आने वाला समय सूचना के विविध माध्यमों में आपसी संघर्ष के गवाह बनेगा जिसे देखना निश्चय ही रोचक होगा।

– संजय द्विवेदी

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