लेखक परिचय

मा. गो. वैद्य

मा. गो. वैद्य

विचारक के रूप में ख्‍याति अर्जित करनेवाले लेखक राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ के प्रवक्‍ता और 'तरुण भारत' समाचार-पत्र के मुख्‍य संपादक रहे हैं।

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download (1)जेनेरिक दवा मतलब मूल दवा या दवा का मूल नाम और ब्रॅण्डेड दवा मतलब उसी दवा को कंपनी ने दिया नाम.

‘ब्रॅण्डेड ’ दवाईयों के भाव जेनेरिक दवाईयों से कई गुना अधिक होते है. इसका कारण है बाजार की जानलेवा स्पर्धा के कारण कंपनियों के लिए आवश्यक बन गई विज्ञापनबाजी, उस पर के सरकारी कर, व्यापारी और केमिस्टों का कमिशन, यातायात खर्च; अंत में इसका पूरा आर्थिक बोझ बिमारी से ग्रस्त रुग्ण पर ही लादा जाता है. कभी-कभी अनुपलब्धता के कारण ‘जेनेरिक दवाईयॉं’ महंगी पड़ती है. लेकिन जेनेरिक दवाईयों की मांग बढ़ी तो पूर्ति बढ़ेगी और वह सस्ती हो सकती है.

दरों का अंतर

मधुमेह के रुग्ण को कौनसी दवा दोगे, ऐसा एमबीबीएस के विद्यार्थी को परीक्षा में पूछॉं तो वह उत्तर लिखेगा ‘ग्लिमेपेराईड’. मधुमेह के उपचार के लिए सामान्यत: उपयोग में लाए जाने वाले एक क्षार का यह नाम है. लेकिन यही विद्यार्थी डॉक्टर बनने के बाद जब उसके पास मधुमेह का रुग्ण आएगा तो शायद वह उसे ‘ऍमारिल’ यह दवा लिख देगा. क्या यह दवा गलत है? नहीं. यह उस क्षार से बनाई ब्रॅण्डेड दवा का नाम है. नाम छोड़ दे तो दोनों में क्या अंतर है? ‘ऍमारिल’ की १० गोलियॉं करीब १२५ रुपयों में मिलती है तो ‘ग्लिमेपेराईड’ की १० गोलियॉं केवल दो रुपयों में मिलती है. दोनों के औषधि गुणधर्म एक ही है, लेकिन ब्रॅण्डेड दवा के लिए हम सीधे १२३ रुपये ज्यादा देते है.

हरदम ही होने वाली सर्दी. इसके लिए सरेआम उपयोग किए जाने वाली औषधि क्षार का नाम है सेट्रिझाईन. इस मूल दवा की किमत, उत्पादन खर्च, यातायात खर्च और पर्याप्त लाभ मिलाकर होती है, १० गोलियों के लिए १रुपया २० पैसे. इसी गुणधर्म की सेटझाईन ब्रॅण्डेड दवा मिलती है ३५ रुपयों में १० गोलियों की दर से.

जिस कारण हृदयाघात होता है उस धमनियों में के अवरोध को दूर करने के लिए सरे आम उपयोग में लाए जाने वाला इंजेक्शन है स्टेप्टोकिनेस या युरोकिनेस. उसकी मूल किमत होती है एक हजार रुपये. उसे किसी ब्रॅण्ड का नाम चिपकते ही किमत हो जाती है पॉंच हजार रुपये.

भारत में मुख्यत: छोटे बच्चों के लिए मलेरिया एक जानलेवा बिमारी है. दवाईयों से बेअसर मलेरिया के लिए दिए जाने वाले इंजेक्शन की, तीन कुप्पियों का पाकिट २५ रुपये के दर से मिल सकता है. वही इंजेक्शन ब्रॅण्डेड होते ही उसकी किमत एक कुप्पि के लिए होती है ३०० से ४०० रुपये.

छोटे बच्चों की और एक जानलेवा बिमारी है डायरिया. इसमें सही खतरा होता है शरीर की जलशुष्कता का. उसे रोकने के लिए डॉम्पेरिडोन औषधि क्षार का उपयोग करते है और उसकी दस गोलियों की पट्टी मिलती है केवल सव्वा रुपये में. उसकी ही डोमेस्टाल यह ब्रॅण्डेड दवा मिलती है ३३ रुपयों में. गरीब ही नहीं मध्यमवर्गीयों को भी यह दवाईयॉं कैसे पुराएगी? इसके लिए जेनेरिक मेडिसिन मतलब दौषधि द्रव्य मूल स्वरूप में उपलब्ध कराना यह उपाय है. भारत में सामान्यत: २५ प्रतिशत बिमारियों पर पुराता नहीं इसलिए उपचार ही नहीं किया जाता. अत: ‘जेनेरिक मेडिसिन’ से हर भारतीय को कितना लाभ हेगा, यह सोचे.

और एक दिलचस्प जानकारी. जेनेरिक मेडिसिन की दुकान शुरू करने के लिए इच्छुक व्यक्ति को केन्द्रीय रसायन एवं खाद मंत्रालय की ओर से ५० हजार रुपये अनुदान मिलता है. इसके अलावा उन्हें दुकान के लिए जगह देने का स्वेच्छा अधिकार भी है. गरीब और अमीरों को बढ़िया स्तर की आरोग्य सेवा एक समान मिलने का स्वप्न साकार होने के संकेत दिखाई दे रहे है.

(साप्ताहिक ‘विजयंत’ सांगली, से साभार )

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पर्वत भी नतमस्तक 

यह कहानी है दशरथ मांझी नाम के एक गरीब आदमी की. 

दशरथ मांझी का जन्म १९३४ में बिहार के गेलहर गॉंव में एक बहुत गरीब परिवार में हुआ. वे बिहार के आदिवासी जनजाति में के बहुत निम्न स्तरीय मुसाहर जनजाति से है. उनकी पत्नी का नाम था फाल्गुनी देवी. दशरथ मांझी के लिए पीने का पानी ले जाते फाल्गुनी देवी दुर्घटना की शिकार हुई. उसे तुरंत डॉक्टरी सहायता नहीं मिल पाई. शहर उनके गॉंव से ७० किलोमीटर दूर था. वहॉं सब सुविधाए थी. लेकिन वहॉं तक तुरंत पहुँचना संभव नहीं था. दुर्भाग्य से वैद्यकीय उपचार के अभाव में फाल्गुनी देवी की मौत हो गई. ऐसा प्रसंग किसी और पर न गुजरे, इस विचार ने दशरथ मांझी को पछाड़ा. समीप के शहर की ७० किलोमीटर की दूरी कैसे पाटी जा सकती है इस दिशा में उनका विचार चक्र चलने लगा. उनके ध्यान में आया कि, शहर से गॉंव को अलग करने वाला पर्वत हटाया गया तो यह दूरी बहुत कम हो जाएगी. पर्वत तोडने के बाद शहर से गॉंव तक की सत्तर किलोमीटर दूरी केवल सात किलोमीटर रह जाती. उन्होंने यह काम शुरू करने का दृढ निश्‍चय किया. लेकिन काम आसान नहीं था. इसके लिए उन्हें उनका रोजी-रोटी देने का दैनंदिन काम छोडना पड़ता. उन्होंने अपनी बकरियॉं बेचकर छन्नी, हतोड़ा और फावडा खरीदा. अपनी झोपडी काम के स्थान के पास बनाई. इससे अब वे दिन-रात काम कर सकते थे. इस काम से उनके परिवार को दुविधाओं का सामना करना पड़ा, कई बार दशरथ को खाली पेट ही काम करना पड़ा. उनके आस-पास से लोगों का आना-जाना शुरू था. गॉंव में इस काम की चर्चा हो रही थी. सब लोगों ने दशरथ को पागल मान लिया था. उन्हें गॉंव के लोगों की तीव्र आलोचना सहनी पडती थी. लेकिन वे कभी भी अपने निश्‍चय से नहीं डिगे. जैसे-जैसे काम में प्रगति होती उनका निश्‍चिय भी पक्का होता जाता. लगातार बाईस वर्ष दिन-रात किए परिश्रम के कारण १९६० में शुरु किया यह असंभव लगने वाला काम १९८२ में पूरा हुआ. उनके अकेले के परिश्रम ने अजिंक्य लगने वाला पर्वत तोडकर ३६० फुट लंबा, २५ फुट ऊँचा और ३० फुट चौडा रास्ता बनाया. इससे गया जिले में के आटरी और वझीरगंज इन दो गॉंवों में का अंतर दस किलोमीटर से भी कम रह गया.

उनकी पत्नी फाल्गुनी देवी – जिसकी प्रेरणा से उन्होंने यह असंभव लगने वाला काम पूरा किया, उस समय उनके पास नहीं थी. लेकिन, गॉंव के लोगों से जैसे बन पड़ा, उन्होंने मिठाई, फल दशरथ जी को लाकर दिए और उनके साथ उनकी सफलता की खुशी मनाई. युवक भी चॉंव से इस पर्वत को हिलाने वाले देवदूत की कहानी सुनने लगे है. गॉंव वालों ने दशरथ जी को ‘साधुजी’ पदवी दी है.

दशरथ जी कहते है, ‘‘मेरे काम की प्रथम प्रेरणा है मेरा पत्नी पर का प्रेम. उस प्रेम ने ही पर्वत तोडकर रास्ता बनाने की ज्योत मेरे हृदय में जलाई. करीब के हजारों लोग अपनी दैनंदिन आवश्यकताओं के लिए बिना कष्ट किए समीप के शहर जा सकेगे, यह मेरी आँखो के सामने आने वाला दृष्य मुझे दैनंदिन कार्य के लिए प्रेरणा देता था. इस कारण ही मैं चिंता और भय को मात दे सका.’’

(‘विकल्पवेध’ अंक १ से १५ दिसंबर से साभार)

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माजुली द्वीप पर का मराठी शिक्षक

ब्रह्मपुत्र के पात्र में रेत-मिश्रित मिट्टी जमा होकर निर्माण हुए माजुली द्वीप बहुत ही सुंदर है. इन द्वीपों पर छोटे-बड़े १०-१२ गॉंव है. नारियल-सुपारी के बगिचे, बेंत (पतले और कड़े बॉंस) के वन, बड़े-बड़े वृक्षों पर खिले ऑर्किड, पानी से भरी जगह पर की चावल की खेती और बाढ़ से सुरक्षा के लिए गहराई का भाग छोड़कर बॉंस पर, रास्ते के किनारे बेंत से बनाए घर है! यहॉं हर घर में आपका आदर के साथ स्वागत होगा. महाराष्ट्र से आए है, ऐसा बताते ही तुरंत प्रश्‍न पूछॉं जाता है, ‘‘रवि सर कैसा है?’’ फिर हर घर में यही प्रश्‍न आपका पीछा करता है. तब आपको भी सोचते है, ‘‘कौन है ये रवि सर?’’ माजुली में हर आदमी इस रवि सर के बारे में इतनी आस्था से क्यों पूछ-तॉंछ करता है? और इस रवि सर के बारे में महाराष्ट्र के सब लोगों को जानकारी होनी ही चाहिए, ऐसी उनकी अपेक्षा क्यों है?

ये रवि सर है – रवीन्द्रनाथ देवेन्द्रनाथ सावदेकर. नासिक जिले में के चांदवड गॉंव के. देवेन्द्रनाथ सावदेकर गुरुजी के एकमात्र पुत्र. स्वामी विवेकानंद के तत्त्वज्ञान से प्रेरित होकर रवीन्द्रनाथ ने भारत परिक्रमा में भाग लिया. कन्याकुमारी के विवेकानंद केन्द्र में ‘आचार्य’ का प्रशिक्षण पूर्ण किया. केन्द्र ने उन्हें नागालँड में के डायांग में जाने के लिए कहा. अकेला लड़का इतने दूर, हिंसाग्रस्त भाग में जाएगा, इस विचार से मॉं का हृदय विचलित हुआ. लेकिन ‘एक माह जाकर देखता हूँ’ ऐसा कहकर सन् २००० में रवीन्द्रनाथ सावदेकर ने घर छोड़ा. डोयांग के अतिदुर्गम प्रदेश में की शाला में एक-दो माह नहीं करीब दो वर्ष काम करने के बाद माजुली द्वीप पर नई शुरु होने वाली शाला में उनकी मुख्याध्यापक पद पर नियुक्ति हुई. जोर्‍हाट में के निमाटी घाट पर सर सुबह आठ बजे पहुँचे. ब्रह्मपुत्र के किनारे सुबह बिताने के बाद, सायंकाल छ: बजे सर माजुली द्वीप पर पहुँचे. कमलाबारी गॉंव की सुंदरता देखकर खो गए.

५३ विद्यार्थी और २ शिक्षक, किराए की छोटी सी इमारत के साथ सर की शाला शुरु हुई. लेकिन नया प्रदेश, नया वातावरण होने के कारण सर के सामने अनेक प्रश्‍न थे. उन प्रश्‍नों का हल लोगों की सहायता के बिना निकलना कठिन था. उसमें भी एक समस्या थी. गॉंव के लोग हिंदी या अंग्रेजी नहीं जानते थे और सर को आसामी भाषा नहीं आती थी. फिर प्रश्‍नों का हल कैसे ढूंढे?

सर ने आसामी भाषा सीखना आरंभ किया. मराठी और आसामी की समानता का उन्हें अच्छा उपयोग हुआ. धीरे-धीरे टूटी-फूँटी आसामी में सर ने गॉंववालों के साथ संवाद आरंभ किया. गॉंव में के लोगों के साथ संवाद बनाने के लिए सर रोज सायंकाल गॉंव में चक्कर लगाते. उनके आने का समय लोगों को याद हो गया. वे सर की राह देखने लगे और फिर सावदेकर सर गॉंव के ‘रवि सर’ बन गए.

रवि सर ने शाला के लिए गॉंव के बाहर की जगह हासिल की. अब शाला किराए की इमारत से अपनी खुद की जगह में गई थी. लेकिन यह जगह थी बेंत का जंगल और झाडियों से घिरी दलदल. लोगों की सहायता से सर ने जगह साफ की. वहॉं सिमेंट कॉंक्रिट की इमारत बनाना एक आव्हान ही था. वहॉं की दलदली और भुरभूरी जमीन में कॉंक्रिट का स्ट्रक्चर बनाते, तो भूजल का स्तर कब बदलेगा इसकी कोई गारंटी नहीं थी. द्वीप पर निर्माण कार्य के लिए पत्थर, गिट्टी नहीं थी और द्वीप पर की रेत भी निर्माण काम के लिए उपयुक्त नहीं थी. द्वीप पर सिंमेंट कहॉं से और कैसे लाए, यह भी प्रश्‍न था. लेकिन रवि सर ने निर्घार किया. ‘माजुली हितैषी बंधु’ नाम का पालक संगठन बनाया और उस संगठन की सहायता से काम शुरु किया. १५ ट्रक पत्थर नाव से लाए. यह थे नदी में के गोल पत्थर. पत्थर तोडने के लिए आदमी नहीं मिलते थे. पत्थर तोडते समय, उड़े हुए टुकड़ों से सिर और आँखों पर घाव होने के कारण काम करने वाले लोग भाग जाते थे. फिर सर ने बड़े गॉगल लाए. वह गॉगल लगाकर मजदूर पत्थर तोडने लगे. लगातार बारिश, प्रतिकूल जलवायु और चारों ओर पानी ही पानी इस स्थिति में कड़ी मेहनत कर सर ने शाला की इमारत बनाई.

२००४ में सर ने अहमदनगर की पूर्वा नाम की युवती से विवाह किया. पूर्वा असम में ब्रह्मपुत्र के द्वीप पर रहने के लिए तैयार थी. पूर्वा दिदी भी रवि सर के साथ शाला में पढ़ाने लगी. रवि सर के समान ही उन्होंने भी स्वयं को असम की प्रतिकूल परिस्थिति के अनुकूल ढाल लिया है.

ब्रह्मपुत्र में बाढ़ आने के बाद माजुली द्वीप का अधिकांश भाग पानी में डूब जाता है. गॉंव के लोगों का एक-दूसरे के साथ का और अन्य गॉंवों के साथ का भी संपर्क टूट जाता है. उस समय रवि सर नाव से घूमते हुए गॉंव वालों की सहायता करते. सन् २००८ में इतनी बाढ़ आई कि, नाव में से दिखने वाले घरों के छप्पर देखकर अनुमान लगाना पड़ता था कि हम किस गॉंव में है. लेकिन उस स्थिति में भी रवि सर छोटी नाव लेकर दिन-रात हर प्रकार से गॉंव वालों की मदद कर रहे थे.

माजुली द्वीप पर के इस प्रतिकूल वातावरण में काम करने के लिए क्या कोई शिक्षक तैयार होगा? लेकिन रवि सर कहते है, ‘‘मैं महाराष्ट्र में नौकरी करता तो शायद एक अच्छा शिक्षक बन भी जाता. लेकिन यहॉं माजुली द्वीप पर लोगों के सांस्कृतिक बंध देश के साथ मजबूती से बने रहे इसलिए हम जो काम कर रहे है, वह नहीं कर पाता.’’

आज रवि सर असम के दिब्रुगढ़ में स्थित विवेकानंद केन्द्र के विद्यालय के प्राचार्य है. माजुली द्वीप छोडे उन्हें दो वर्ष हो गए है. लेकिन आज भी द्वीप पर का हर छोटा-बड़ा अत्यंत भावुक होकर पूछता है, ‘‘रवि सर कैसा है?’’

(लोकसत्ता, ९ जुलाई २०१२ से साभार)

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अमेरिका में गीता पठन

व्हँकुअर. अमेरिका में का एक शहर. वह युएसए में मतलब संयुक्त राज्य संस्थान में है या कॅनडा में यह मुझे पता नहीं. शायद, इन दो देशों की सीमा पर होगा.

लेकिन वह बात महत्त्व की नहीं. महत्त्व की बात है वहॉं के ‘वीणा संस्कृत फाऊंडेशन’ संगठन ने ली गीता पठन की स्पर्धा. स्पर्धा का नाम था ‘श्रीमद्भगवद्गीता श्लोकोच्चारण प्रतियोगिता’. ३४ लड़के-लड़कियों ने इसमें भाग लिया. पॉंच ने संपूर्ण गीता सुनाई. व्हँकुअर के ही नवनीत कौशल और सुचिता रामन् परीक्षक थे.

सात वर्ष के सिद्धार्थ गणेश ने गीता का संपूर्ण सातवा अध्याय सुनाया. सुब्रमण्यम् जनस्वामी, ८ वर्ष की निकिता शिवराम ने १५ वा अध्याय, और श्रद्धा कौशिक ने १२ वा अध्याय सुनाया. २५ वर्ष से अधिक आयु के लोगों ने भी पाठांतर प्रकट किया. लेकिन उनका समावेश स्पर्धकों में नहीं था.

इस स्पर्धा में पहला पारितोषिक ६ वर्ष की कुमारी श्रेयांसी वाला ने हासिल किया. सात वर्ष के विष्णुगुप्त दीक्षित और छ: वर्ष की वेदांशी वाला को संयुक्त दूसरा क्रमांक मिला. तीसरा क्रमांक पॉंच वर्ष के उदय गणेश ने हासिल किया.

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एक गॉंव की कहानी

तामिलनाडु के कोईमतुर जिले में के इस गॉंव का नाम है ‘कालीथिंबम्’. गॉंव में अभी भी बिजली नहीं. फिर अन्य नागरी सुविधा तो बहुत दूर की बात है.

गॉंव में ‘अराली’ जनजाति की बस्ती है. गॉंव के लोग उपजीविका के लिए कोईमतूर और इरोडा शहरों में जाते है और उल्लेखनीय यह कि साथ में पत्नी भी ले आते है. अन्य जाति की वधू लाने में इस जनजाति के लोगों को अभिमान अनुभव होता है. गॉंव में ३०० परिवार है. उनमें से ४० परिवारों में की बहुएँ अन्य जनजाति से है. उनमें से कुछ दलित भी है.

इस चत्मकार के पीछे एक कारण है. पहले कभी, कुछ लड़कों ने अपनी जनजाति से बाहर की लड़कियों से प्रेम किया, तब लड़कों के घरवालोंे ने उनके विवाह को कड़ा विरोध किया. इस कारण, अनेकों ने आत्महत्या की. तब उनके घर के लोगों की आँख खुली; और उन्होंने ऐसे विवाहों को मान्यता दी. अब तो ऐसे विवाहोत्सव में पूरा गॉंव शामिल होता है. इन विवाहों के समय गॉंव के लोग शपथ लेते है कि, हम ऐसे प्रेमविवाहों को विरोध नहीं करेगे. लड़की के परिवार का ऐसे विवाह को विरोध हुआ, तो लड़के के पक्ष के लोग उन्हें समझाते है. अपनी जनजाति की लड़कियों ने जनजाति से बाहर के युवक के साथ विवाह किया, तो उसे भी गॉंव वालों की सम्मति होती है.

(अनुवाद : विकास कुलकर्णी )

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3 Comments on "दवाईयॉं : ब्रण्डेड और जेनेरिक"

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इक़बाल हिंदुस्तानी
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प्रेरणा देने वाली घटनाएँ हैं आपको साधुवाद

शिवेन्द्र मोहन सिंह
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शिवेन्द्र मोहन सिंह

प्रेरक प्रसंग और अति उत्तम सूचना ………. सादर

डॉ. मधुसूदन
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विकास कुलकर्णी जी का आभार।
(१) बहुत बहुत प्रेरणादायी वास्तविक घटनाएं पढकर हर्षित हूँ।
ऐसी जानकारियाँ संकलित कर देते रहें।
(२)ऐसी जानकारियों का एक अच्छासा नाम देकर, एक स्थायी स्तम्भ प्रारंभ किया जाय।
प्रवक्ता प्रेरणाका भी प्रवक्ता हो।
(३)व्हॅन्कुवर कनाडा में ही पश्चिमी छोरपर, अमरिका/कनाडा की सीमा निकट बसा हुआ है।

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