लेखक परिचय

राजीव रंजन प्रसाद

राजीव रंजन प्रसाद

लेखक मूल रूप से बस्तर (छतीसगढ) के निवासी हैं तथा वर्तमान में एक सरकारी उपक्रम एन.एच.पी.सी में प्रबंधक है। आप साहित्यिक ई-पत्रिका "साहित्य शिल्पी" (www.sahityashilpi.in) के सम्पादक भी हैं। आपके आलेख व रचनायें प्रमुखता से पत्र, पत्रिकाओं तथा ई-पत्रिकाओं में प्रकशित होती रहती है।

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[राजगीर भ्रमण करते हुए]

राजीव रंजन प्रसाद

“मीना कुमारी हमको बहुत पसंद है सर इसलिये अपनी घोडी का नाम भी यही रख दिये हैं”। सुरेन्द्र पासवान, जो राजगीर में मेरे सारथी थे, कुछ मुस्कुराकर और थोड़ी उँची आवाज में बोले। मौसम मनोनुकूल था, बादल छाये हुए थे और हवा की सामान्य से कुछ तेज गति होने के कारण ‘टमटम’ से परिभ्रमण आनंददायी हो गया। यथानाम तथा गुण, मीनाकुमारी की सधी हुई चाल थी उसपर गले में लगे पट्टे पर से एक ही धुन में बजते घुंगरु…..। मसीही कैलेंडर में जहाँ से शून्य शुरु होता है उससे भी कई हजार साल पीछे जाने पर ही राजगीर (राजगृह) के वैभव की कल्पना संभव है। उस महाराज जरासंध की राजधानी थी यह भूमि जिन्हें परास्त करने के लिये कौटिल्य के आगमन से बहुत पहले ही भगवान श्रीकृष्ण को कुटिलता की दीक्षा भीम को प्रदान कर विलक्षण वरदान से सुरक्षित उस महाप्रतापी नरेश की मलयुद्ध में हत्या करवा दी थी। नन्दों के उत्थान और पतन, अनेकों राजवंशों की गौरवपूर्ण राजधानी रहने, समकालीन दो महानतम दिव्यात्माओं – भगवान बुद्ध और भगवान महावीर के द्वारा पवित्र की हुई यह भूमि पाँच पहाडों से घिरी और हरी भरी है।

एसा क्यों है कि हम भारतवासियों को अपने वास्तविक इतिहास को उकेरने, खोजने तथा उसके वैज्ञानिक प्रामाणिकरण में बहुत रुचि नहीं है। दु:ख है कि हमारा इतिहास भी जातिवादी-वर्गवादी तथा विचारधारा वादी है। एक ही स्थान पर अलग अलग सोच वाले लेखक उपलब्ध जानकारियों को अपनी सोच के अनुरूप मोडते और घुमाते रहते है। नालंदा अंग्रेजों के खोज दिया, जमीन से आपके लिये निकाल दिया वरना तो हम भूल ही बैठे थे। अभी 10% भी खुदाई पूरी नहीं हुई है लेकिन लगता है हमे ही कोई जल्दीबाजी नहीं है एक मुहावरा कहता भी है अजगर करे न चाकरी, पंछी करे न काम…..लेकिन मेरे टमटम में लगी घोडी मीनाकुमारी न तो अजगर थी और न ही पंछी इस लिये पर्वतीय चढाईयों में उसकी गति बदल जाया करती थी।

वेणुवन अर्थात भगवान बुद्ध का वर्षा प्रवास स्थल जो सौभाग्य से अभी भी हरा भरा है, वहाँ से गुजरते हुए मैने पासवान जी से पूछा कि कितनी कमाई हो जाती है दिन भर मे? उन्होंने अपनी व्यथाकथा की शुरुआत मीनाकुमारी के चारे से की। बोले – “सर कमाई हो या नहीं हो दो सौ रुपिया का चारा तो आपको चाहिये ही। ऑफ सीजन में तो चारा ही निकलता रहे, थोडी बहुत खेती बाडी से घर चल जाता है। सीजन में कमाई हो जाती है। अभी आप अकेला आदमी टमटम रिजर्व करा कर जितना में घूम रहे हैं उतना तब दो सवारी से ही निकल जाता है”। मैंने कहा कि “अच्छा है चार महीना जम कर काम कीजिये और बाकी दिन आराम भी मिल जाता है”। “आराम करना कौन चाहता है सर!! सवारी से ही रोजी रोटी है। लेकिन अब बहुत मुश्किल आ गया है”। पासवान जी की आवाज दबी हुई थी। “क्या हुआ?” मेरी जिज्ञासा बढी। “सर अब टैक्सी आ गया है, कार आ गया है एसे में टमटम को लोग भूलते जा रहे हैं। आदमी पटना से आता है तो वहीं से कार करके चला आता है। लोकल में भी खूब टैक्सी वाला सब हो गया है। आगे ये टमटम चलेगा नहीं, खतम हो जायेगा।“…….। बात तो सही है। पर्यटन केवल मौजमस्ती नहीं है। आप जब घूमने निकलते हैं तो महसूस कीजिये कि उससे बहुत से रोजगार आपकी ओर इस उम्मीद से देख रहे हैं कि अगर हमारी उपयोगिता आपने ही नहीं समझी तो मिट ही जायेंगे हम। “कौन् चीज हमेसा रही है सर!! इसी जगह बडे बडे राजा थे आज कोई भी नहीं बचा, उनकी पीढी भी खतम हो गयी।“ अपनी रौ में पासवान जी बोल रहे थे और मै महसूस कर रहा था कि सचमुच क्या टमटम के आनंड का टैक्सी कभी विकल्प बन सकती है? आखित क्यों विल्पुत हो जायें ये सवारियाँ? केवल इस लिये कि हमारी सोच सोच को आधुनिक होने का अहंकार हो गया है?

विचार का क्रम टूटा बगल से एक ट्रैक्टर गुजर रहा था जिसमे कोई गीत बहुत तेज बज रहा था। गानें में मैं केवल दो ही शब्द समझ सका “भौजाई” और “देवरवा”। “पहले हमारे टमटम में भी म्यूझिक सिस्टम था सर, प्रसासन नें हटवा दिया” पासवान जी नें कहा। मैं उनके चेहरे के मनोभाव देख मुस्कुरा दिया और बोला “ट्रैफिक में डिस्टर्ब होता होगा।“ अबकि पासवान जी बिदक गये और स्वर भी तेज हो उठा “ट्रैक्टर में काहे लगा है? कार में और टैक्सी में भी लगा है, बस वाला भी लगा के रखा है। बहुत सा सवारी आता है और डिमांड करता है”। मैं मौन हो गया, या कहूँ कि निरुत्तर। अजीब बाजारवाद है जिसमे मरती हुई चीज ही मारी जाती है? हम भी जाने दो, चलता है और यस बॉस के युग में जी रहे है शायद इन बातों से फर्क ही नहीं पडता हमें। सुरेन्द्र पासवान के सरोकार हमारे अपने सरोकार क्यों नहीं बन पाते? मैं अभी भी नाउम्मीद नहीं हुआ था पूछ ही बैठा “आप लोगों की यूनियन वगैरह नहीं है क्या?” “है सर। सीटू से जुडे हैं हम लोग। यहाँ कुछ भी बात होती है तो दिल्ली तक जाती है और वहीं फैसला होता है।“ पासवान नें बताया। “मन के अनुसार परिणाम मिल जाते हैं आपको? काम हो जाता है?” मेरी जिज्ञासा और बढ गयी थी। “हम लोगों का बात दिल्ली में कौन सुनता है सर? जब जरूरत पडता है और बंद कराना है या हडताल कराना है तब तो टमटम वाला सबका याद पड जाता है लेकिन उसके बाद कौन जानता है कि घोडा को दाना मिलता है कि नहीं?” पासवान जी की वेदना उनकी ज़ुबान पर थी।

वैशाली जाना है इस लिये आज पटना लौट आया हूँ लेकिन सोच अब भी मुझे कुरेद रही है। रह रह कर मीनाकुमारी और उसके सारथी पासवान जी आँखों के आगे आ रहे हैं। टमटम वालों की समस्याओं जैसे नितांत स्थानीय सरोकार भी अगर समाधान के लिये दिल्ली का मुँह ताकते हैं तो मुझे यह कहने में गुरेज नहीं कि कभी कोई समाधान नहीं निकलेगा। अगर मजदूर और किसान नेता जमीनी लडाईयाँ छोड कर यह महसूस करते हैं कि दिल्ली से जुड कर उनकी शान बढती है तो मान लीजिये कि आप केवल इस्तेमाल की वस्तु हैं। शायद आम आदमी के वास्तविक सरोकारों का किसी कोल्हू में घुमा घुमा कर तेल निकाल दिया गया है इसीलिये न तो अब सही मायने लिये मजदूर किसान आन्दोलन ही जीवित बचे न ही वैसे जीवट नेता जिनकी मुट्ठिया तन जायें तो हजारों हाँथ एक साथ इंकलाब उद्घोष करते उपर उठें। सरोकार बस्तर से ले कर राजगीर तक रूप बदल बदल कर भी एक जैसे हैं लेकिन उन्हें सुनने वाले कानों की जगह दिल्ली नें खरीद ली है कुछ मोमबत्तियाँ।…..और मैं केवल कुछ पंक्तियाँ लिख कर अपनी जिम्मेदारी से भाग नहीं सकता। यह वायदा है मीनाकुमारी और उसके सारथी से कि अब किसी भी स्थान पर घूमने जाउंगा तो सबसे पहले तलाश करूंगा वहाँ की स्थानीय सवारी की, वह घोडा हो, उँट हो या रिक्शा ही क्यों न हो। आभार! आज से पहले मैने इस तरह कभी सोचा न था।

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2 Comments on "मीनाकुमारी, सारथी – पासवान और दिल्ली की मोमबत्तियाँ"

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एल. आर गान्धी
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aaj kal saarthi paaswaan nahi-swaarthi paaswaan ka zmaana hai…aur meena kumari ka..ant..to ham sabhi ko maaloom hi hai…fir bhi sajeev -yathaarth vyatha-katha ke liye saadhuvaad…

डॉ. मधुसूदन
Guest

बहुत अच्छा अंत किया आपने–यही निश्चय हम भी करते हैं।

—>”यह वायदा है मीनाकुमारी और उसके सारथी से कि अब किसी भी स्थान पर घूमने जाउंगा तो सबसे पहले तलाश करूंगा वहाँ की स्थानीय सवारी की, वह घोडा हो, उँट हो या रिक्शा ही क्यों न हो। आभार! आज से पहले मैने इस तरह कभी सोचा न था।”
बहुत सुंदर, आलेख, बहुत सुन्दर अंत।

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