लेखक परिचय

मृत्युंजय दीक्षित

मृत्युंजय दीक्षित

स्वतंत्र लेखक व् टिप्पणीकार लखनऊ,उप्र

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B 5047

B 5047

मृत्युंजय दीक्षित
आजादी के 65 वर्ष से भी अधिक समय बीत जाने के बाद भी झारखंड के महानायक और मुंडा आदिवासियों के भगवान बिरसा मुंडा को उनकी मौत के 116 वर्षों के बाद बेड़ियों से आजादी मिलने जा रही है। इसका कारण यह है कि झारखंड के महान आदिवासी नेता बिरसा मुंडा की राज्य में जितनी भी प्रतिमाएं थीं वे सब की सब बेडियों से बंधी हुई थीं और जिसके कारण युवाओं के मन में उनके प्रति नकारात्मक भाव जा रहा था । इस बात की जानकारी देते हुए झारखंड के कला एवं संस्कृति निदेशक अनिल कुमार सिंह ने बताया है कि जंजीरों में जकडी बिरसा मंुडा की प्रतिमा यह बताती है कि हमने उन्हें ब्रिटिश कैदी के रूप में स्वीकार कर लिया है। वहीं बिरसा को बेडियों से मृक्त करने का निर्णय मुख्यमंत्री रघुबर दास ने सुंनाया। ज्ञातव्य है ककि बिरसामुंडा ने अंग्रेजों से जबर्दस्त संघर्ष करते हुए 9 जून 1900 को अंतिम संास ली थी। । तब से उनकी जितनी भी प्रतिमाएं लगी है। सब की सब बेडियों से जकड़ी हुयी हैं अब उनकी आजादी का समय आ गया है। इस घोषणा के बाद मुंडा समुदाय भाजपा सरकार से खुश भी नजर आ रहा है।
ज्ञातव्य है कि तत्त्कालीन झारखंड राज्य अंग्रेजों के आधीन हो चुका था और अंग्रेजों ने आदिवासियों के साथ काफी निर्ममतापूर्वक व्यवहार किया था। जिसके कारण 15 नवम्बर 1875 को झारख्ंाड के रांची के गांव उलीहातू मे जन्में बिरसा का मन बचपन से दुखी रहता था और वे अंग्रेजो की दासता से मुक्ति का सपना देखते थे। उनके पिता का नाम सुगमा मंुडा और माता का नाम करमी हातू था। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा साल्मा गांव में हुयी और उसके बाद चाईबांसा आ गये जहां उनकी आगे की पढ़ाई हुयी। मुंडा का मन हमेशा अपने समाज की ब्रिटिश शासकों द्वारा की गयी बुरी दिशा पर सोचता रहता था।यही कारण था कि मुंडा ने अंग्रेजों के खिलाफ ”हमारा देश , हमारा शासन” नाम से महाआंदोलन शुरू किया। मुंडा ने बिखरे हुए मुंडा समाज को अंग्रेजों के खिलाफ एकजुट करना और एकत्र करना भी शुरू किया। जब 1894 में तत्कालीन छोटा नागपुर में मानसून असफल हो गया और अकाल की स्थिति पैदा होने पर बिरसा ने पूरे मनोयोग से लोगों की सेवा की। यह अंग्रेजो को पसंद नहीं आया। 1 अक्टूबर 1894 को मुंडा ने अपने समुदाय के लोगों को अंग्रेजों से लगान माफी के लिए एकत्र किया और 1895 में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। हजारीबाग में उन्हें दो साल की सजा सुनायी गयी। लेकिन बिरसा और उनके साथियों ने अकाल पीड़ितों की सहायता करने की ठान ली थी। उनकेे प्रभाव में वृद्धि होने के बाद पूरे इलाके में मुंडाओं में संगठित होने की चेतना जागी।1897-1900 के बीच मुंडा और अंग्रेजो के बीच काफी युद्ध हुए। मुुंडा लोगों ने अपनी वीरता के दम पर अंग्रेजों की नाक में दम कर दिया था। अगस्त 1897 में बिरसा ने अपने 400 सिपाहियों के साथ खूंटी थाने पर हमला बोल दिया था।1898 में तांगी नदी के किनारें मंुडों और अंग्रेजों के बीच जबर्दस्त संग्राम हुआ था जिसमें पहले चरण में अंग्रेजो की भारी पराजय हुयी थी।लेकिन बाद में अंग्रेजों ने पलटवार किया और मुंडाओं की काफी तीव्रता के साथ धरपकड हुयी।
4 जनवरी 1900 में डोमबाड़ी पहाड़ी पर जबर्दस्त संघर्ष हुआ था। जिसमें कइ्र्र लोग मारे गये थे। उस समय बिरसा एक जनसभा को संबोधित कर रहे थे। स्वयं बिरसा भी 3 फरवरी 1900 को चक्रधरपुर में गिरफ्तार कर लिये गये। बिरसा ने 9 जून 1900 को अपनी अंतिम सांस रांची कारागार में लीं। आज भी बिहार ,झारखंड , छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल में बिरसा को भगवान की तरह पूजा जाता है। झारखंड में बिरसा के नाम पर एयरपोर्ट ,अस्पताल हैं, कई स्कूलों के नाम भी बिरसा को समर्पित है। बिरसा की समाधि रांची में कोंकर पुके निकट डिस्टिलरी पुल के निकट स्थित है।

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