लेखक परिचय

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

यायावर प्रकृति के डॉ. अग्निहोत्री अनेक देशों की यात्रा कर चुके हैं। उनकी लगभग 15 पुस्‍तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। पेशे से शिक्षक, कर्म से समाजसेवी और उपक्रम से पत्रकार अग्निहोत्रीजी हिमाचल प्रदेश विश्‍वविद्यालय में निदेशक भी रहे। आपातकाल में जेल में रहे। भारत-तिब्‍बत सहयोग मंच के राष्‍ट्रीय संयोजक के नाते तिब्‍बत समस्‍या का गंभीर अध्‍ययन। कुछ समय तक हिंदी दैनिक जनसत्‍ता से भी जुडे रहे। संप्रति देश की प्रसिद्ध संवाद समिति हिंदुस्‍थान समाचार से जुडे हुए हैं।

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burhanडा० कुलदीप चन्द अग्निहोत्री
अपनी पार्टी पी.डी.पी के कार्यकर्ताओं को 28 जुलाई को जम्मू कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती ने सम्बोधित किया । आठ जुलाई को हिज़बुल मुजाहिदीन के तथाकथित कमांडर बुरहान बानी के सुरक्षा बलों से मुठभेड़ में मारे जाने के बाद पी डी पी की पहली बैठक थी जिसमें पार्टी के सभी महत्वपूर्ण कार्यकर्ता मौजूद थे । बुरहान की मौत के बाद कश्मीर घाटी, ख़ासकर दक्षिणी कश्मीर में जो हिंसा हुई है , उसी की छाया में यह बैठक हो रही थी । इस हिंसा में पचास के लगभग लोग मारे गए और पाँच हज़ार के आसपास घायल हुए । घायल होने वालों में सुरक्षा बलों के जवान भी काफ़ी संख्या में हैं । यद्यपि अब घाटी शान्त दिखाई देती है लेकिन गिने चुने इलाक़ों में अभी भी कर्फ़्यू लगा हुआ है । जहाँ तक नैशनल कान्फ्रेंस और सोनिया कांग्रेस का सवाल है , उन्होंने अपने अपने तरीक़े से बुरहान बानी को श्रद्धांजलि देने और उसे शहीद बताने में कोई कसर नहीं छोड़ी । पाकिस्तान सरकार ने तो आधिकारिक तौर पर बुरहान बानी को शहीद घोषित किया और उसकी मौत को लेकर कई दिन मुँह लटकाए रखा ।
लेकिन अब सूबे की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती ने अपनी पार्टी को एक नई सूचना देकर सभी को चौंका दिया । उनका कहना है कि सुरक्षा बलों को पता ही नहीं था कि उस घर में बुरहान बानी है । यदि उनको इस बात का थोड़ा सा भी पता होता तो वे उसे कभी न मारते । सुरक्षा बलों को तो केवल इतना ही पता था कि उस घर में तीन आतंकी छिपे हुए हैं , इसलिए उन्होंने धावा बोल दिया । इसलिए बुरहान बानी की मौत सही जानकारी व सही सूचना के अभाव में हो गई । महबूबा मुफ़्ती का यह भी कहना है कि राज्य सरकार को भी इस बात की सूचना नहीं थी । मुफ़्ती के इस रहस्योदघाटन से दो तीन प्रश्न पैदा होते हैं । महबूबा की बात यदि सच्ची मान ली जाए तो इसका अर्थ यह हुआ कि सुरक्षा बलों को हिज़बुल मुजाहिदीन के आतंकवादियों को तो मारना चाहिए लेकिन यदि उनका कमांडर दिखाई पड़ जाए तो उसे हाथ नहीं लगाना चाहिए । महबूबा के हिसाब से तो उसका सम्मान किया जाना चाहिए था । आख़िर कमांडर रैंक का एक आदमी सुरक्षा बलों के हाथों साधारण आतंकी की तरह मारा गया , यह कितना दुखद है । मुफ़्ती के कहने से यह भाव भी निकलता है कि यदि राज्य सरकार को बुरहान बानी के बारे में इलम होता तो वह तो उसे किसी भी क़ीमत पर मारने न देती । पाकिस्तान बुरहान बानी को नायक बनाए यह बात समझ आती है लेकिन महबूबा मुफ़्ती बानी की लाश को नायकत्व का कफ़न क्यों ओढाना चाहती हैं ? आतंकवादियों से बातचीत की जानी चाहिए, ऐसी चर्चा जो कश्मीर घाटी में चलाई जा रही है , कहीं उसका अर्थ यह तो नहीं कि अब सुरक्षा बल आतंकवादियों से लड़ने की बजाए उनके स्वागत सत्कार की तैयारी में लग जाएँ ? महबूबा मुफ़्ती ने बानी को लेकर जो प्रवचन दिया है , वह हुर्रियत कान्फ्रेंस के गिलानी या फिर यासीन मलिक देते तो किसी को आश्चर्य न होता । लेकिन सूबे की मुख्यमंत्री ऐसा कहेंगी तो जान हथेली पर रख कर आतंकवादियों से जूझने वाले सुरक्षा बलों में निराशा ही आयेगी ।
जम्मू कश्मीर का दुर्भाग्य यह है कि नैशनल कान्फ्रेंस या पी डी पी जीतते तो उन आम कश्मीरियों के मतों से हैं जो रियासत में अमन अमान चाहते हैं । लेकिन जीतने के बाद उनको चिन्ता अातंकवादियों की होने लगती है और वे उन्हीं की सुरक्षा की चिन्ता करने लगते हैं । जो निर्दोष लोग पुलिस की गोलियों का शिकार हो गए , उनके प्रति निश्चय ही सहानुभूति होनी चाहिए लेकिन सहानुभूति के नाम पर आतंकवादियों का ही पक्ष लेना शुरु कर दिया जाए , यह निंदनीय है । दरअसल कश्मीर घाटी के राजनैतिक दलों को वहाँ के अवाम के मौन बहुमत के साथ खड़ा होना चाहिए न कि मुट्ठी भर आतंकवादियों के साथ जिन्हें यक़ीनन पाकिस्तान का साथ मिला हुआ है । सरकार को शिनाख्त तो उन लोगों की करनी चाहिए जो आतंक का व्यापार करने के लिए करोड़ों रुपए हवाला के माध्यम से प्राप्त करते हैं । ऐसे दलालों की पहचान से घाटी का मनोविज्ञान भी बदलेगा और शान्ति प्रक्रिया में पहल भी होगी । यदि सरकार उन गिनती के राजनीतिज्ञों की पहचान कर ले और उनके नाम सार्वजनिक कर दे जो करोड़ों रुपये का बजट डकार जाते हैं तो आम जनता का सरकार के प्रति विश्वास भी बढ़ेगा । महबूबा मुफ़्ती को बुरहान बानी को लेकर चिन्ता तो हो गई लेकिन वह उन लोगों के चेहरे से पर्दा क्यों नहीं उठाती जो विदेशी पैसे से पल रही तंजीमों के दादा हैं । वे ग़रीब लोगों को डरा धमका कर प्रदर्शन के लिए लाते हैं और बाद में उनमें से कुछ की लाशों पर अपनी राजनीति करते हैं । कश्मीर उन चन्द लोगों का नहीं है जो विदेशी इशारों पर नाचते हुए अपनी रणनीति में आम जनता को ईंधन की तरह इस्तेमाल करते हैं । महबूबा मुफ़्ती को मजबूरी में उन ईंधन बन रहे कश्मीरियों की चिन्ता करनी चाहिए न कि बुरहान बानी की ।
लेकिन बुरहान बानी की मौत के बाद जिस तेज़ी और सुनियोजित तरीक़े से हिंसा भड़की , वह निश्चित ही प्रतिक्रिया नहीं कहीं जा सकती । इस प्रकार की हिंसा के लिए बड़े पैमाने पर लम्बी तैयारी की जरुरत होती है । राज्य में काफ़ी हद तक स्थिति सामान्य हो गई थी और इस वर्ष तो पर्यटकों की जिस प्रकार संख्या आ रही थी वह चौंकाने वाली थी । विधान सभा चुनावों में जिस उत्साह से लोगों ने हिस्सा लिया था , वह कश्मीर घाटी में बह रही नई हवा की ओर संकेत करता था । केवल ज़्यादा संख्या में मतदान की ही बात नहीं , घाटी में चुनावों के दौरान प्रचार शैली भी बदली बदली दिखाई दे रही थी । इससे पहले ये चुनाव एक तरफ़ा होते थे क्योंकि मतदाताओं को भी और जीतने वाले प्रत्याशी को भी पता होता था कि कौन जीतेगा । इसलिए चुनाव प्रचार महज़ एक रस्म भर होता था लेकिन इस बार सब कुछ अनिश्चित था और मतदाताओं व प्रत्याशियों को भी इसका इलम हो गया था , इसलिए सभी प्रत्याशी पूरे ज़ोर शोर से चुनाव प्रचार में जुटे थे । चुनाव परिणामों के बाद सरकार में भारतीय जनता पार्टी की भी हिस्सेदारी हो गई । घाटी में ये सभी परिवर्तन न पाकिस्तान को माक़ूल थे और न ही आतंकवादियों को । ये बदली फ़िज़ा और हालात केवल घाटी के आम अवाम के माक़ूल थे जो दिन रात रोज़ी रोटी के लिए खटता है । ज़ाहिर है पाकिस्तान और आतंकी तंजीमें किसी भी तरह घाटी को एक बार फिर पटडी से उतारना चाहतीं थीं । उसके लिए काफ़ी लम्बी तैयारी की होगी । जब तैयारी मुकम्मल हो गई तो पाकिस्तान और इन आतंकी तंजीमों को आग लगाने के लिए कोई लाश चाहिए थी । बुरहान बानी से अच्छी लाश किसकी हो सकती थी जिसे इतनी मेहनत से इन तंजीमों ने आतंक का पोस्टर ब्याय बनाया था । कहीं ऐसा तो नहीं कि इन आतंकी तंजीमों ने ही सुरक्षा बलों को तीन आतंकियों के छिपे ठिकाने की सूचना दे दी ? आतंकी तंजीमों को तो पता था कि इन तीनों में उनका पोस्टर ब्याय भी है जिसे इतनी मेहनत से नायकत्व प्रदान किया था । जिन्होंने आतंकियों के छिपे ठिकाने के बारे में सूचना दी उन्होंने नाम नहीं बताए और सुरक्षा बलों को नाम से कुछ लेना देना नहीं होता , उनके लिए आतंकी महज़ आतंकी होता है फिर चाहे वह बुरहान बानी हो या हाफ़िज़ सैयद । लेकिन आतंक के सरगनाओं के लिए अपनी सबसे प्यारी चीज़ को क़ुर्बान करने का वक्त आ गया था । और यह क़ुर्बानी का माल बुरहान बानी ही हो सकता था । उधर बुरहान बानी की लाश गिरी इधर कई महीनों से तैयारी कर रही तंजीमों ने प्रक्रिया और प्रदर्शन के नाम पर आगज़नी शुरु कर दी । महबूबा मुफ़्ती जब कहती हैं कि उन्हें पता ही नहीं चला कि आतंकियों में बुरहान बानी भी है तो कहीं उसके पीछे की पृष्ठभूमि यही लुका छिपी का खेल तो नहीं ? दरअसल राज्य सरकार को आतंकी तंजीमों के इसी नैटवर्क को नष्ट करना चाहिए जो अपनी सुविधा और तैयारी के हिसाब से बलि देने के लिए पहले किसी बुरहान बानी को तैयार करता है और बाद में उसकी लाश का प्रयोग घाटी में आगज़नी के लिए प्रयोग करता है । इतना पक्का है कि इस नैटवर्क में भूमिगत आतंकी कम तथाकथित सिविल सोसायटी के लोग ज़्यादा होंगे । इस नैटवर्क में जमायते इस्लामी क्या भूमिका निभाती है , इसकी भी जाँच होनी चाहिए । इस नैटवर्क में काम करने वाले लोग ऐसे पैरासाईट हैं जो आम कश्मीरी का ख़ून चूस कर पलते बढ़ते हैं । इनको एक ज़िन्दा कश्मीरी को लाश में तब्दील करने में भी गुरेज़ नहीं होता क्योंकि इनका करोड़ों का धन्धा इन्हीं लाशों पर फलता फूलता है । महबूबा मुंफ्ती के बयान से लगता है कि वे यह सारा गोरखधन्धा जानती हैं । यदि जानती हैं तो उन्हें कश्मीरियों के ख़ून पर फल फूल रहे इस रैकेट को नष्ट करना चाहिए ।

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