लेखक परिचय

नरेश भारतीय

नरेश भारतीय

नरेश भारतीय ब्रिटेन मे बसे भारतीय मूल के हिंदी लेखक हैं। लम्बे अर्से तक बी.बी.सी. रेडियो हिन्दी सेवा से जुड़े रहे। उनके लेख भारत की प्रमुख पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहते हैं। पुस्तक रूप में उनके लेख संग्रह 'उस पार इस पार' के लिए उन्हें पद्मानंद साहित्य सम्मान (2002) प्राप्त हो चुका है।

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आज मेल के माध्‍यम से श्री नरेश भारतीय का पत्र प्राप्‍त हुआ। आप सब जानते ही हैं कि नरेश जी ब्रिटेन में रहते हैं और लम्बे समय तक बी.बी.सी. रेडियो हिन्दी सेवा से जुड़े रहे। उनके जीवन से हम स्‍वदेश प्रेम और प्रखर राष्‍ट्रवाद की सीख लेते हैं। गत 5 वर्षों की प्रवक्‍ता टीम की मेहनत रंग ला रही है। उनका यह पत्र हम सबके लिए प्रमाण-पत्र हैं।

१० अक्तूबर, २०१३

pravaktaप्रिय संजीवजी,

यह आनन्द का विषय है कि प्रवक्ता आपके सुयोग्य नेतृत्व में अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का विजय ध्वज फहराता अपने पहले पांच वर्ष पूर्ण करते हुए मज़बूती के साथ आगे बढ़ रहा है. ऐसी शानदार सफलता के लिए आपको और आपके सहयोगियों का शत शत अभिनन्दन और बधाई.

पचास वर्ष के लम्बे कालखंड में विदेशवासी होते हुए भी मैंने भारत में हिन्दी पत्रकारिता जगत के साथ यथासंभव सम्बन्ध बनाए रखे हैं. विदेश में भारतीयता और हिन्दी के प्रचार प्रसार में जुटे रहते अपने मूल देश भारत में बढती वैदेशिक सोच और आचार व्यवहार को पनपते देख मन में कष्ट महसूस होता है. भारत में बोलचाल की भाषा के रूप में इंग्लिश को हिन्दी पर हावी होते देख और इस अशोभनीय अतिक्रमण को कुछ लेखकवर्ग के द्वारा भी मान्यता मिलते और निर्भीक राष्ट्रहितपरक पत्रकारिता के अभावग्रस्त होने से मन क्षुब्ध होने लगा था. तभी अंतर्जाल पर ‘प्रवक्ता’ के साथ परिचय हुआ. इसके रूप रंग, भाषा, विषय, विचार, विमर्श और भावभूमि में जैसी उन्मुक्तता एवं निर्भीकता की पुट दिखाई दी उससे मन प्रफुल्लित हुआ. इसमें लिखने की इच्छा जाग्रत हुई. बरसों से लेखनी का ही उपयोग करता आया था लेकिन प्रवक्ता के लिए लिखने हेतु पहली बार हिन्दी में टंकण का अभ्यास किया.

पांच वर्ष के अल्पकाल में प्रवक्ता अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का ही प्रतीक नहीं बना है अपितु मैं इसे निर्भीक राष्ट्रवादी पत्रकारिता का नवपुनरोदय भी मानने लगा हूँ. आज देश जैसी चुनौतीपूर्ण स्थितियों का सामना कर रहा है उनके समाधान के लिए ‘प्रवक्ता’ विचार वैविध्य को उन्मुक्त प्रोत्साहन देता जनहितपरक चिन्तन और विमर्श का श्रेष्ठ माध्यम बनता जा रहा है. चुनाव जीत कर राजनीतिक नेता जब जनप्रतिनिधित्व की भावना से शून्य हो कर व्यवहार करने लगते हैं तो लोकतंत्र में प्रबुद्ध पत्रकारों से जनसामान्य यह उम्मीद करने लगता है कि वे उनकी भावनाओं को मुक्त अभिव्यक्ति देंगे. प्रवक्ता के साथ जुड़े लेखक पत्रकार अपने स्वतंत्र लेखन में यही भूमिका निभाने का एक पुष्ट आधार इसमें प्राप्त कर सके हैं. निस्संदेह, वेब पत्रकारिता में प्रवक्ता अपना श्रेष्ठ स्थान बना चुका है.

विश्वास है कि जिस पथ पर और जिस गति के साथ हम सबका अपना बना ‘प्रवक्ता’ प्रतिपल अनेक श्रेष्ठ लेखक पत्रकारों को अपने साथ जोड़ता राष्ट्रहित सर्वोपरि की भावना के साथ आगे बढ़ रहा है श्रेष्ठ जनप्रतिनिधि पत्रकारिता के कीर्तिमान स्थापित करेगा. आपके उत्साह, गति और उत्तम निर्देशन की भरपूर झलक प्रवक्ता के आगे बढ़ते कदमों में मिलती है.

अगले सप्ताह दिल्ली में आप सबके साथ मिल बैठने को उत्सुक हार्दिक शुभकामनाओं के साथ,

भवदीय, 

नरेश भारतीय

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