लेखक परिचय

राजीव गुप्ता

राजीव गुप्ता

बी. ए. ( इतिहास ) दिल्ली विश्वविद्यालय एवं एम. बी. ए. की डिग्रियां हासिल की। राजीव जी की इच्छा है विकसित भारत देखने की, ना केवल देखने की अपितु खुद के सहयोग से उसका हिस्सा बनने की। गलत उनसे बर्दाश्‍त नहीं होता। वो जब भी कुछ गलत देखते हैं तो बिना कुछ परवाह किए बगैर विरोध के स्‍वर मुखरित करते हैं।

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pravaktaलिखने – पढ़ने का शौक तो मुझे बचपन से ही था पर मेरे मन में एक सपना था कि काश ! मैं भी कहीं छपता और लोग मुझे भी पढते.

एक दिन विश्व हिन्दू परिषद कार्यालय में मैंने देखा कि मेरे एक मित्र श्री लक्ष्मण जी प्रवक्ता डॉट काम की साइट पर सुरेश चिपलूनकर जी का एक लेख ‘राष्ट्रीय मीडिया में देशद्रोही भरे पड़े हैं… सन्दर्भ – कश्मीर स्वायत्तता प्रस्ताव’ पढ रहे थे और उस लेख को मुझे भी पढने के लिए कहा. मैंने पूरा लेख पढा और मेरे विचारानुकूल होने के कारण मुझे बहुत पसन्द आया. उत्सुकतावश मैंने लक्ष्मण जी से पूछा कि ये सुरेश चिपलूनकर जी हैं कौन ? मुझे इनके और लेख कहाँ मिल सकते है ? श्री लक्ष्मण जी ने मुझे प्रवक्ता डॉट काम पर दिखाया कि आप जिस भी लेखक को पढ़ना चाहें यहाँ पर पढ सकते है. इतना ही नहीं अगर आप चाहे तो आप भी लिख सकते है और उसे संजीव जी प्रवक्ता डॉट काम पर छाप भी देंगे. आभासी दुनिया के राष्ट्रवादी विचारवान लोगों से यह मेरा पहला परिचय था.

कालांतर में मैंने एक लेख ‘जनता जनार्दन है : सच या झूठ’ प्रवक्ता डॉट काम पर छापने हेतु संजीव जी को भेजा. संजीव जी ने मेरे उस लेख को प्रवक्ता डॉट काम पर न केवल छापा अपितु मुझे फोन कर बधाई भी दी. बस फिर क्या था, संजीव जी के फोन ने मेरे हौसले को उड़ान और पहचान दोनों दी. संजीव जी से मार्गदर्शन लेने हेतु निरंतर मैं उनके संपर्क में जुडा रहा.

शुरुआत दौर के लेखन में मैं ‘कापी-पेस्ट’ करता था पर हर बार संजीव जी मेरी उस हल्केपन को पकड़कर अच्छी तरह डांट लगाते थे. पर ज्यों – ज्यों मैं अपने लेखन के प्रति गंभीर होता गया संजीव जी का मेरे ऊपर स्नेह बढ़ता गया. कालांतर में मुझे हिन्दी अखबारों में जगह भी मिलने लगी.

इतना ही नहीं मैने एक पुस्तक “संघ अछूत है क्या” भी लिख डाला और उस पुस्तक की पहली प्रति संजीव जी को भेंट कर उनका आशीर्वाद और स्नेह भी प्राप्त किया.

प्रवक्ता डॉट काम के पाँच साल पूरे होने उपलक्ष्य में 18 अक्टूबर 2013 के कार्यक्रम हेतु प्रवक्ता डॉट काम से जुडे सभी लोगों को बधाई.

संक्षेप में, संजीव जी को दोहे की कुछ पक्तियाँ समर्पित करता हूँ –

‘गुरू कुम्हार शिष्य कुम्भ है, गढि-ग़ढि खाडे खोट, भीतर हाथ सहार दे, बाहर मारे चोट’ 

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