लेखक परिचय

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

यायावर प्रकृति के डॉ. अग्निहोत्री अनेक देशों की यात्रा कर चुके हैं। उनकी लगभग 15 पुस्‍तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। पेशे से शिक्षक, कर्म से समाजसेवी और उपक्रम से पत्रकार अग्निहोत्रीजी हिमाचल प्रदेश विश्‍वविद्यालय में निदेशक भी रहे। आपातकाल में जेल में रहे। भारत-तिब्‍बत सहयोग मंच के राष्‍ट्रीय संयोजक के नाते तिब्‍बत समस्‍या का गंभीर अध्‍ययन। कुछ समय तक हिंदी दैनिक जनसत्‍ता से भी जुडे रहे। संप्रति देश की प्रसिद्ध संवाद समिति हिंदुस्‍थान समाचार से जुडे हुए हैं।

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hari singh डा० कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

                जम्मू कश्मीर के पिछले लगभग सात दशकों के इतिहास को देखकर एक अजीब विरोधाभास दिखाई देता है । इस इतिहास को देखकर लगता है कि मानों बल्तीस्तान , गिलगित, लद्दाख , जम्मू और कश्मीर समेत पाँच विशाल संभागों वाला राज्य केवल कश्मीर घाटी में कश्मीरी भाषा बोलने वाले मुसलमानों तक सिमट कर रह गया हो । १९३१-१९३६ के जिस आन्दोलन की राज्य में सर्वाधिक चर्चा होती है , वह भी कश्मीर घाटी तक ही सीमित था । १९४६ का 'कश्मीर छोड़ो आन्दोलन' तो केवल घाटी तक ही सीमित नहीं था , बल्कि अन्य संभागों का परोक्ष रुप से विरोधी भी था । लोगों को आशा थी कि स्वतंत्रता के बाद राज्य के बारे में समग्र रुप से विचार किया जायेगा । परन्तु राज्य के लोगों की यह आशा तभी धूमिल होनी शुरु हो गई थी जब १९४७ में राज्य पर पाकिस्तानी आक्रमण के समय , कश्मीर घाटी को आक्रमणकारी से मुक्त करवाने के बाद , यह मान लिया गया मानों पूरा राज्य मुक्त हो गया हो । गिलगित , बल्तीस्तान और जम्मू के अधिक्रान्त क्षेत्र को मुक्त करवाने के गम्भीर प्रयास करने की बजाय , युद्ध विराम घोषित कर , यह ज़िम्मेदारी संयुक्त राष्ट्र संघ को सौंप कर भारत सरकार एक प्रकार से उदासीन हो गई । यह उदासीनता इस हद तक बढ़ी , कि १९६५ और १९७१ के युद्धों में , भारतीय सेना ने , राज्य के पाक अधिक्रान्त क्षेत्र के जिस थोड़े भूभाग को मुक्त करवाया , उसको भी सरकार ने वापिस पाकिस्तान को सौंप दिया । भारत सरकार के इस पूरे आचरण से , कश्मीर घाटी के कश्मीरी भाषा बोलने वाले मुसलमानों के अलावा , राज्य के बाक़ी लोग स्वयं को परित्यक्त महसूस करते हैं , जिनकी हर प्रकार से अवहेलना की जा रही हो । 
                  इस पृष्ठभूमि में एक प्रश्न और उठता है । क्या यह मान लिया जाय कि कश्मीर घाटी में कश्मीरी भाषा बोलने वाले मुसलमान सांस्कृतिक व भावात्मक स्तर पर , राज्य के सभी संभागों के लोगों का प्रतिनिधित्व करते है ? ज़मीनी सच्चाई इसके विपरीत है । कश्मीर घाटी में नैशनल कान्फ्रेंस की स्थापना से लेकर १९४६ में उसके कश्मीर छोड़ो आन्दोलन तक , पार्टी का जम्मू, लद्दाख , गिलगित और बल्तीस्तान में कोई बजूद  नहीं था । ( अब भी नाममात्र को छोड़ कर लगभग नहीं ही है) रियासत के संघीय व्यवस्था का अंग बन जाने के उपरान्त यह स्थिति और भी ज़्यादा स्पष्ट होने लगी थी । नैशनल कान्फ्रेंस जिन नीतियों पर चल रही थी , जम्मू व लद्दाख संभाग में उसका तीव्र विरोध होने लगा था । कान्फ्रेंस ने राज्य में केवल तीन विषयों सुरक्षा , संचार और विदेश सम्बध के लिये ही संघीय सांविधानिक व्यवस्था स्वीकार करने की रट लगाई तो जम्मू व लद्दाख संभाग में इसका तीव्र विरोध होने लगा । इन दोनों संभागों के लोग राज्य में पूर्ण रुप से संघीय सांविधानिक व्यवस्था लागू करने के पक्ष में थे । यह मांग इतनी प्रबल हो उठी कि लद्दाख के लोगों ने तो लद्दाख को पंजाब तक में शामिल करने की बात कहनी शुरु कर दी । राज्य में दो समानान्तर आन्दोलन शुरु हो गये । नैशनल कान्फ्रेंस का स्वायत्ततावादी आन्दोलन , जो संघीय सांविधानिक व्यवस्था को तीन विषयों तक सीमित कर , शेष विषयों पर राज्य की अलग सांविधानिक व्यवस्था का पक्षधर था । दूसरी ओर राष्ट्रवादी शक्तियों का एकीकरण आन्दोलन, जो राज्य में पूर्ण संघीय सांविधानिक व्यवस्था का पक्षधर था । दूसरे आन्दोलन का नेतृत्व जम्मू संभाग में प्रजा परिषद और लद्दाख में लद्दाख बौद्ध एसोसिएशन कर रही थी । इस पूरे परिदृश्य में नेहरु स्पष्ट ही शेख अब्दुल्ला के साथ थे , जो प्रथम पक्ष का नेतृत्व कर रहे थे । 
                    जिस दिन शेख अब्दुल्ला के दबाव में नेहरु ने महाराजा हरि सिंह को राज्य छोडने के लिये विवश किया , उस दिन नैशनल कान्फ्रेंस के श्रीनगर कार्यालय में तो दीपमाला की जा रही थी , लेकिन जम्मू में वह काला दिवस था । स्वायत्ततावादी पक्ष के शेख अब्दुल्ला राज्य के लिये अलग ध्वज की मांग को लेकर अडे हुये थे और उन्होंने सरकारी कार्यक्रमों में ही नैशनल कान्फ्रेंस का झंडा फहराना शुरु कर दिया तो जम्मू में १९५२ के शुरु में ही छात्रों ने इतना शक्तिशाली जनान्दोलन खडा कर दिया कि सरकार को सेना बुलानी पडी और ७२ घंटे का कर्फ्यु लगाना पडा । जुलाई १९५२ में नेहरु और शेख की राज्य के भावी संविधान को लेकर कुछ मुद्दों पर सहमति बनी । यह सहमति एक प्रकार से पूरे राज्य की सांविधानिक व्यवस्था को ही कश्मीर केन्द्रित करने का प्रयास था । इसका जम्मू क्षेत्र में विरोध ही नहीं हुआ , बल्कि जनता सड़कों पर उतर आई । प्रजा परिषद को पहले ही आशंका होने लगी थी कि कश्मीरी नेताओं और नेहरु में कुछ खिचड़ी पक रही है , जो राज्य का हाज़मा दुरुस्त करने की बजाय उसको और बिगाड़ देगी , इसलिये वे अपना ज्ञापन लेकर जून में ही राष्ट्रपति के पास जा पहुँचे थे । 
                       स्वायत्ततावादी पक्ष की  नैशनल कान्फ्रेंस ने राज्य की संविधान सभा में प्रस्ताव पारित कर आनुवांशिक राजवंश की समाप्ति कर दी और महाराजा हरि सिंह के ही सुपुत्र कर्ण सिंह को राज्य का पहला निर्वाचित प्रधान चुन लिया । उस दिन ख़ुशी से फूली न समा रही नैशनल कान्फ्रेंस श्रीनगर में उन्हें तोपों की सलामी देकर जश्न मना रही थी , लेकिन जम्मू क्षेत्र में उस दिन पूर्ण बन्द था । जिस घटना को कश्मीर घाटी की नैशनल कान्फ्रेंस अपनी विजय बता रही थी , वही जम्मू व लद्दाख संभाग के लोगों के लिये उनकी पराजय थी । जम्मू कश्मीर की नई सांविधानिक व्यवस्था में राज्य के लिये निर्वाचित प्रधान , अलग संविधान और अलग ध्वज का प्रावधान किया गया । नैशनल कान्फ्रेंस के अध्यक्ष शेख अब्दुल्ला इसे कश्मीर के लोगों के लम्बे संघर्ष के बाद प्राप्त लोकतांत्रिक विजय बता रहे थे , वहीं दूसरी ओर जम्मू क्षेत्र के लोगों ने प्रजा परिषद के नेतृत्व में इन्हीं तीनों प्रावधानों को समाप्त करवाने के लिये मोर्चा लगा दिया था । यह आन्दोलन अल्पकाल में ही संभाग के दूरस्थ गाँवों तक पहुँच गया और पूरा क्षेत्र इसके ताप से झुलसने लगा । पन्द्रह लोगों ने इस आन्दोलन में आत्माहुति दी । 
                 कहने का अभिप्राय यह है कि राज्य में नैशनल कान्फ्रेंस का स्वायत्तता आन्दोलन और प्रजा परिषद के नेतृत्व में राष्ट्रवादी शक्तियों का एकीकरण आन्दोलन एक साथ समानान्तर चल रहे थे । ( या अभी भी चल रहे हैं ) स्वायत्तता या अलगाववादी आन्दोलन कश्मीर घाटी में कश्मीरी भाषा बोलने वाले मुसलमानों तक सीमित है जब कि एकीकरण आन्दोलन जम्मू संभाग , लद्दाख संभाग ,बल्तीस्तान की कारगिल तहसील समेत कश्मीर के गुज्जरों, बकरबालों , पहाड़ियों व जनजाति समाज में भी प्रचलित था । लेकिन इसे इतिहास की त्रासदी कहा जाये या षड्यंत्र कि कश्मीर घाटी के स्वायत्तता या अलगाववादी आन्दोलन पर तो अकादमिक क्षेत्र में बहुत शोध कार्य हुआ है । देशी विदेशी विद्वानों ने इस पर अपनी अपनी दृष्टि से विश्लेषण किया है और अपने अपने निष्कर्ष प्रस्तुत किये हैं । लेकिन इसी आन्दोलन के समानान्तर चले सशक्त एकीकरण आन्दोलन की कहानी अकादमिक जगत में अनकही ही रही है । राज्य के बारे में , उसकी तथाकथित समस्या के बारे में , एक ही पक्ष पर लिखा , पढ़ा और सुना गया है । स्वभाविक ही इस प्रकार के अध्ययनों के निष्कर्ष एकांगी और अधूरे ही होंगे । जब इन्हीं अधूरे निष्कर्षों को स्वीकार कर , समाधान के प्रयास किये जाते हैं तो मामला सुलझने की बजाय और उलझ जाता है । विदेशी विद्वानों की इस विषय पर एक सीमा है , या फिर उनके जातीय हित हैं , यह बात समझ में आ सकती है । लेकिन भारतीय समाजविज्ञानी इस विषय पर मौन क्यों रहे , यह आश्चर्यचकित करने वाली बात है । जम्मू कश्मीर की यह गाथा अकादमिक जगत में अनकही क्यों रही, इसका उत्तर नहीं मिल रहा । जम्मू में जम्मू विश्वविद्यालय स्थापित हुये भी चार दशक से ज़्यादा हो गये हैं । विश्वविद्यालय ने प्रजा परिषद और उस के एकीकरण आन्दोलन पर कोई योजनापूर्वक शोध प्रकल्प प्रारम्भ किया हो , ऐसा ध्यान में नहीं आता । इक्का दुक्का एम फ़िल और पीएच .डी के शोध प्रबन्ध की बात छोड़ दी जाये तो चारों ओर सन्नाटा ही दिखाई देता है । यहाँ तक कि विश्वविद्यालय महाराजा हरि सिंह और पंडित प्रेमनाथ डोगरा की अभी तक कोई प्रामाणिक जीवनी तक नहीं निकाल पाया । १९३६ से चली यह प्रवृत्ति राज्य को लेकर किये जा रहे अध्ययनों में अभी भी विद्यमान है । 
                      आज भी पूरे राज्य में रुप रंग और शब्द बदल कर स्वायत्तता बनाम एकीकरण का यह आन्दोलन चल रहा है । लद्दाख और जम्मू संभाग के स्वर कश्मीर घाटी के स्वरों से भिन्न हैं । लेकिन सरकार को क्योंकि कश्मीर घाटी के स्वर सुनने की ही आदत पड़ गई है ,( ख़ासकर जब से वहाँ विदेशी आतंकवादियों की बन्दूकें भी शामिल हो गई हैं) । लद्दाख के लोगों ने लम्बा संघर्ष करके अपने लिये लद्दाख पर्वतीय विकास परिषद हासिल की है । इससे मिलता जुलता सुझाव १९४८ में कुशल बकुला ने दिया था , तब नैशनल कान्फ्रेंस व नेहरु ने उसे सिरे से ख़ारिज कर दिया था । २००८ में जम्मू में अमरनाथ यात्रा को लेकर जो विवाद खड़ा हुआ था और उसमें जम्मू क्षेत्र के हिन्दुओं , मुसलमानों , गुज्जरों और पहाड़ियों ने जिस प्रकार कन्धे से कन्धा मिला कर संघर्ष किया था , उसे प्रकारान्तर से १९५२-१९५३ में प्रजा परिषद द्वारा चलाये गये एकीकरण आन्दोलन का विस्तार ही मानना चाहिये । शायद यह पहली बार था कि २००८ में हुये अमरनाथ आन्दोलन पर जम्मू विश्वविद्यालय में गुलाब सिंह पीठ के अध्यक्ष प्रो० हरि ओम ने अंग्रेज़ी भाषा में 'जम्मू कश्मीर-कनफलिकटिंग प्रसैप्शन्ज' नाम से विश्लेषणात्मक ग्रन्थ की रचना की । इसके लिये उन्हें विश्वविद्यालय के अधिकारियों का कोप भाजक भी बनना पड़ा । 
           कुल मिला कर यह कहा जा सकता है कि जम्मू कश्मीर म अल्पमत , पूरे राज्य के नाम पर अलगाव या स्वायत्तता का राग अलापता है । इसके समानान्तर राज्य का बहुत बड़ा वर्ग , इस स्वायत्तता आन्दोलन का विरोध करता है , वह एकीकरण का समर्थक है , लेकिन दुर्भाग्य से भारत सरकार एकीकरण आन्दोलनकारियों से बात करने को तैयार नहीं है । १९५२-५३ में जिस प्रकार नेहरु किसी भी हालत में एकीकरण आन्दोलन की जनक प्रजा परिषद से बात करने के लिये तैयार नहीं थे , उसी प्रकार आज की निराकार सरकार एकीकरण समर्थकों की बात सुनने को तैयार नहीं है । पिछले दिनों केन्द्र सरकार ने अपने तीन नुमांयदे राज्य के लोगों से बातचीत करने के लिये भेजे । इन नुमांयदों से , अलगाववादियों ने तो बात करने से ही इन्कार कर दिया और राज्य में ,एकीकरण के समर्थक ,जो लोग इनसे बात करना चाहते थे , उनको इन नुमांयदों ने भाव देना उचित नहीं समझा । जम्मू कश्मीर को लेकर दिल्ली इसी मानसिक अपंगता से कार्य करती आ रही है । राज्य में क़ानून व्यवस्था की अराजकता के लिये तो सीमा पार के विदेशी आतंकवादियों को दोषी ठहराया जा सकता है , लेकिन मानसिक अराजकता के लिये भारत सरकार का यही असंतुलित व्यवहार है , जो एकीकरण के समर्थक हिन्दु मुसलमानों को साम्प्रदायिक मानता है और अलगाव के समर्थकों को पंथनिरपेक्ष । दिल्ली जितनी जल्दी अपनी मानसिक अपाहिजता से मुक्त हो जायेगी , जम्मू कश्मीर की सेहत के लिये उतना ही श्रेयस्कर होगा ।

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