लेखक परिचय

डॉ. मधुसूदन

डॉ. मधुसूदन

मधुसूदनजी तकनीकी (Engineering) में एम.एस. तथा पी.एच.डी. की उपाधियाँ प्राप्त् की है, भारतीय अमेरिकी शोधकर्ता के रूप में मशहूर है, हिन्दी के प्रखर पुरस्कर्ता: संस्कृत, हिन्दी, मराठी, गुजराती के अभ्यासी, अनेक संस्थाओं से जुडे हुए। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति (अमरिका) आजीवन सदस्य हैं; वर्तमान में अमेरिका की प्रतिष्ठित संस्‍था UNIVERSITY OF MASSACHUSETTS (युनिवर्सीटी ऑफ मॅसाच्युसेटस, निर्माण अभियांत्रिकी), में प्रोफेसर हैं।

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Castes of Mind पर आधारित

द्रविडि़यन -आर्यन भेद का धूर्त निर्माता- मिशनरी रॉबर्ट काल्डवेल

 

(१) रॉबर्ट काल्डवेल 
रॉबर्ट काल्डवेल जब पहले पहल, (१८३८ में ) दक्षिण भारत आया , तब हमारे नये धर्मांतरित ईसाइयों को ”चावल भूखे ख्रिष्टान” (Rice Christians) कहकर शासक (अंग्रेज़ ) भी उनका तिरस्कार किया करते थे। हर वर्ष काल्डवेल अपनी वार्षिक रपट में धर्मांतरित आत्माओं की फसल” (Harvest in souls) का आंकडा- लिखा करता था। धर्मांतरण की खाता बही में ”मुक्ति चाहकों ” के आंकडे बहुत कम, और निराशा जनक हुआ करते थे।
(२)आलोचना
उधर (शायद इंग्लैंड में) भी आलोचना हुआ करती थी, और कहा जाता था, कि निर्धनों का मतांतरण तो, केवल भौतिक प्रलोभनों से, और धन की लालच से ही प्रेरित है। इसी लिए वह वास्तविक सच्चे मनसे स्वीकारा हुआ मतांतरण, या सच्चा मतान्तरण नहीं माना जा सकता।
आलोचना होती थी, और प्रश्न किया जाता था, कि, मतांतरण करने में सारी मिशनरी यंत्रणा अंग्रेजी कंपनी का राज होते हुए भी, क्यों बिलकुल असफल रही है? इसके उत्तर में काल्डवेल बहुत कुछ लिखते थे। वे कहते थे, कि उन्हें मतांतरित करने में (Motivation) प्रेरणा उनकी नहीं , पर हमारी है। { वाह, वाह काल्ड्वेल महाराज यह तो हम भी कहते हैं, कि प्रेरणा आप ही की है। –लेखक } काल्डवेल कहते थे, कुछ समय जाने पर उन्हें भी सच्ची प्रेरणा होगी।
(३) झगडों का कारण
मतांतरित ईसाइयों के अपने पडौसियों से नए झगडे शुरू हुआ करते थे। वास्तव में धर्मांतरित इसाइयों से, अपेक्षा थी कि, पडौसियों को समझा, ललचा कर, कन्वर्ज़न में, ईसाइयत को फैलाने में सहायक होना, पर उलटे, धर्मांतरण ही झगडों का मूल बन जाता था। कभी कभी कानूनी कार्यवाहियां भी चला करती थी। आपसी बंधुभाव के, मेल को खतम करने में भी धर्मांतरण ही, बडा कारण (तब भी) हुआ करता था।
(४) विशुद्ध आध्यात्मिक (Genuine Theological Triumph)विजय?
कोई इक्का दुक्का पढा लिखा देशी यदि धर्मांतरित होता था, तो इसाइयत की विशुद्ध आध्यात्मिक (Genuine Theological Triumph)विजय की डींग हाँकी जाती थी, उसका एक उत्सव सा मनाया जाता था। लेकिन इस आध्यात्मिक विजय में भी दुविधा हुआ करती थी। एक तो, पढे लिखे देशी का मतांतर बडी विजय थी, पर ऐसे मतांतर के संख्या की अल्पता और नगण्यता स्पष्ट हो कर उभर आती थी। और ”पढे लिखे” मतांतरित देशियों की ”अल्पता? इसाइयत की तर्क शुद्धता” में ही सवाल खडे करती थी। पढे लिखे मतान्तरित इसाइयों की संख्या बढाने की दृष्टिसे मिशन की शालाओं में पढे हुए इसाइयों की ओर काल्डवेल को आशा बंधी रहती थी। यही था, मिशन की शालाओं को खोलने का रहस्यमय कारण। शालाएं शिक्षा की दृष्टि से नहीं, पर अन्तमें ईसाइयत फैलाने के उद्देश्य से ही चलायी जाती थी। जैसे ”फूट डालो और राज करो” की नीति थी; बस कुछ वैसे ही ”शाला खोलो और कन्वर्ज़न करो” की रीति थी। पर इसी कन्वर्जन के काम में भी पर्याप्त रूकावटे हुआ करती थी। एक झायगनबाल्ग नामका ईसाई मिशनरी १८ वी शता ब्दि में बार बार विद्वानों से वाद विवाद करने के बाद हार मानकर उन्हीं पंडितों की तर्क शक्ति की प्रशंसा भी कर चुका था। उसने मान लिया था, कि यदि पण्डितॊ को तर्क से हराया, तो उनके साथ साथ बाकी का हिन्दू समाज मतांतरित होने में कुछ कठिनाइ नहीं होगी। पर उसे इस काममें सफलता नहीं मिली।

 

(५) संस्कृत में इसाइयत पर उपनिषद
Muir नामक मिशनरी, यह मान कर कि, संस्कृत में अगर इसाइयत पर उपनिषद लिखा जाय, तो हिन्दू इसाइयत को सहजता से स्वीकार कर लेगा; इस लिए उसने बहुत सारे मिशनरियों को संस्कृत सीखने का आग्रह किया। और फिर क्या था, १८४० में, एक १०३२ श्लोकोंका अनुष्टुभ छंदमें ”मतपरीक्षा ” नामक संवाद रूपी, (जैसा उपनिषदों में होता है,) वैसी पुस्तक लिखी गयी। बहुत सारे संदर्भ भी दिए गए थे, उस पुस्तक में। Muir महोदय हिन्‍दुओं को संस्कृत ज्ञान से प्रभावित करना चाहते थे, ताकि कनवर्ज़न आसान हो सके।
पर उसके छपते ही, २-३ वर्षों में तीन विद्वानों ने उसकी चुनौती को स्वीकार कर, एक महाराष्ट्रीयन सुबाजी बापु ने,पुणे से, शुद्ध संस्कृत में एक पुस्तक रूपी उत्तर लिख दिया। उसी प्रकार हरचंद्र तर्कपंचानन नामक पण्डित ने भी कलकत्तेसे उसी का उत्तर दे दिया। नीलकण्ठ गोरे नामक महाराष्ट्रीयन ने वाराणसी से भी एक पुस्तक लिखकर उनकी चुनौती स्वीकार कर Muir साहब की योजना की धज्जियां उडा दी।
मिशनरियों ने तब से गांठ बांध ली है,कि ”तर्क से सनातन धर्म पण्डितों को कभी जीता नहीं जा सकता। ”
ऐसी अनेक घटना ओं से जन्मी हताशा के कारण ही, काल्डवेल को, हिन्दू विद्वानों के, ज्ञान और सामर्थ्य के प्रति कुछ ऊंचा भाव (सुप्त आदर) भी जन्मा था।
पाठकों को यहां साहजिक अनुमान करने में कठिनाई नहीं होगी, कि क्यों इसाई मिशनरी चुन चुन के निर्धन, बेकार, वनवासी ऐसे समस्या से घिरे हुए, जनों को ललचा लुभाकर इसाइयत को बेच रहें हैं। जब आध्यात्मिकता का आधार नहीं दिखाया जा सकता, तो फिर धन के सहारे ही दिव्य(?) संदेश फैलाओ।
हिन्दुत्व तो मानता है, कि यः तर्केण अनुसंधते स धर्मो वेत्त नेतरः {जो तर्कसे प्रमाणित हो, वही धर्म है, दूजा नहीं} हिन्दुत्व के सामने तर्क, प्रमाण देकर, कभी जीता नहीं जा सकता; यह मिशनरियों को १५० वर्षॊं के दीर्घ अनुभवसे ठीक ठीक पता चल चुका है।

 

(६) धर्मांतरित देशीयों से अपेक्षा

धर्मांतरित देशीयों से अपेक्षा थी, कि वें अपने आस पास के पडौसियों में ईसाइयत का प्रचार करने में सहायता करें। ब्राह्मणों को धर्मांतरित करने में काल्डवेल को सफलता इस लिए चाहिए थी, कि यदि सनातन धर्म-धुरंधर ब्राह्मण यदि कन्वर्ट हो जाता है, तो सारा हिन्दू समाज चुटकी में इसाइयत स्वीकार कर लेगा, ऐसी अपेक्षा थी।

यह जानकारी भारत वासियों के लिए नहीं थी। यह तो मिशनरियों के कन्वर्जन के एन्टर प्राइज़ के सिक्रेटस है।जो उनके आपसी निजी (गुप्त?) पत्रव्यवहार के अंश है,; जो भाग्य-वशात आज इस Castes of Mind की पाठ्य पुस्तक में उपलब्ध है। सोचता हूँ, कितना अच्छा होता, यदि यह सारी जानकारी (Data) विवेकानन्द जी को, योगी अरविन्द को, गांधीजी को, और अन्य देशके नेतृत्व को उपलब्ध होती ?
तो, शायद गत ७५-१०० वर्ष का इतिहास अलग होता, शायद हमारे देशमें विभाजन-कारी पार्टियां ना होती। शायद देशका भूगोल अलग होता। आप के परिवार में फूट डालने वाला आप का मित्र तो कैसे हो सकता है? उन्हें मित्र मानने वालों को क्या आप बुद्धिमान मान लोगे? बार बार, इस लेखक को लगता है, कि ऐसी पुस्तक का (३७२ बडे आकार की) कमसे कम संक्षिप्त अनुवाद १००-१२५ पृष्ठों में भारत में छपना चाहिए। पहले हिन्दी में, बादमें शीघ्राति शीघ्र प्रादेशिक भाषाओं में।
(७) आर्य-द्रविड भेद का धूर्त बीजारोपण करने वाला भी एक पादरी काल्डवेल ही था।
उसके पहले आर्य द्रविड भेद कहीं नहीं था। उलटे आप सभीको जान कर हर्ष होगा कि हिंदु के चार आचार्यों में से तीन आचार्य द्रविडी प्रदेशों से थे। रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, शंकराचार्य यह तीन आचार्य दक्षिण के द्रविड प्रदेश से थे। केवल वल्लभाचार्य उडिसा से थे।
काल्ड्वेल की मृत्यु जब १८९१ में हुयी, तो उनकी असामान्य सफलता की उपलब्धि ”तिनेवेल्ली मिशन की स्थापना” मानी गयी थी।
और दूसरी उपलब्धि थी, आर्य-द्रविड का भारतीयों की मानसिकता में धूर्त बीजारोपण। इसी बीजा रोपण के कारण, हमारा भारी घाटा हुआ है। वैसे विवेकानन्द जी की उक्ति स्मरण है, वे कहते थे, ”मुझे मेरे द्रवीड पूरखों का उतना ही गौरव है, जितना मुझे मेरे आर्य पूरखोंका।”–
हमारे D N A का डेटा भी आज यही प्रमाणित कर रहा है। दो वर्ष पहले University of Massachusetts के Center for Indic Studies में आयोजित कान्फ़रेन्स में, D N A डेटा पर शोध पत्र पढे गए थे। उस से भी यही प्रमाणित किया गया था।
पर, जहां हमारे पूरखें ”विविधता में एकता” देखने का युगों युगों से एक सफल उद्यम आरंभ कर चुके थे, वहां एक मिशनरी अपने मत से भिन्न मतवालों को नर्क में भेजने वाली विचार प्रणाली के प्रचार में, एकता में ही भिन्नता दिखाकर अपना कन्वरजन का धंधा चलाना था। द्रविडियिन भाषा ओं का इतिहास और ढांचे के विषयमें भाषा शास्त्रीय खोज(?) यही काल्डवेल का योगदान माना जाता है।
उन्हों ने दक्षिण में धर्मांतरण करने के उद्देश्य से ”द्रवीडियन-आर्यन” भेद को उकसा कर उन्हें आर्यों से अलग दिखा ने का प्रयास किया। पर वहां की जनता और उनका नेतृत्व, अपनी संस्कृति को ब्राह्मणों से, अलग मानने के लिए तैय्यार नहीं था।
यह ”कृण्वन्तु विश्वम आर्यम ” की प्रक्रिया (जो शतकों तक चलती है) की सफलता का परिचायक है। {यह सब कुछ आप पृष्ठ १४० के आस पास देख पाएंगे।} जिसका अर्थ है, सारे विश्व को ”आर्य” अर्थात सुसंस्कृत बनाने से है, न कि किसी भेद भाव की दूषित मनो वृत्ति से।
(८) समन्वयकारी विचारधारा
भारत (हिंदुत्व) की विचार-धारा समन्वय कारी है। हमारे बीच असंख्य देवी देवता, कुछ तो वनवासी, आदिवासी समाज की प्रथाएं, पहाड पत्थर की पूजा, नाग-पूजा, वृक्ष-पूजा, हमारे देवी देवताओं के वाहन रूपी चूहा, हंस, बाघ, सिंह, हाथी के मुख वाले देव, वानर-मुख वाले देव, इत्यादि इत्यादि इसी समन्वय कारी ”कृण्वन्तु विश्वम्‌ आर्यम्‌ ” की अभिव्यक्ति है। जब हमारे पूरखें किसी वनवासी क्षेत्र में गए, और वहां ‚ के लोगों को वन्य वस्तुओं के प्रति आदर भावसे प्रेरित पाया, तो उन्होंने उनका , गोरे लोगों की भांति संहार नहीं किया, पर उनके भी देवी देवताओं को सम्मान पूर्वक अपने असंख्य देवों के गणॊं में सम्मिलित कर लिया। हमारी इसी सहिष्णुता के आयाम का अतिरेक कभी कभी हमारे दुर्गुण में परिवर्तित हुआ है। इसे ही ”सदगुण-विकृति” कहा जाता है।पर दूसरों की रेखा को काटकर अपनी रेखा बडी दिखाने वाली मनो वृत्ति की गुलाम विचार प्रणाली से प्रेरित काल्ड वेल और क्या देख सकते थे?
संदर्भ: (1) Castes of Mind, और (2)Hindu Christian Encounters
॥समाप्त॥

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