लेखक परिचय

प्रवीण दुबे

प्रवीण दुबे

विगत 22 वर्षाे से पत्रकारिता में सर्किय हैं। आपके राष्ट्रीय-अंतराष्ट्रीय विषयों पर 500 से अधिक आलेखों का प्रकाशन हो चुका है। राष्ट्रवादी सोच और विचार से प्रेरित श्री प्रवीण दुबे की पत्रकारिता का शुभांरम दैनिक स्वदेश ग्वालियर से 1994 में हुआ। वर्तमान में आप स्वदेश ग्वालियर के कार्यकारी संपादक है, आपके द्वारा अमृत-अटल, श्रीकांत जोशी पर आधारित संग्रह - एक ध्येय निष्ठ जीवन, ग्वालियर की बलिदान गाथा, उत्तिष्ठ जाग्रत सहित एक दर्जन के लगभग पत्र- पत्रिकाओं का संपादन किया है।

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breadप्रवीण दुबे
दुनिया का सबसे बड़ा बाजार और उसका लाभ उठाने की आड़ में तमाम देशी-विदेशी खाद्य सामग्री उत्पादक कम्पनियां और विविध क्षेत्रों में कारोबार करने वाले उद्योगपति आम देशवासियों के स्वास्थ्य से खुलेआम खिलवाड़ कर रहे हैं। आखिर सरकार इसको लेकर कड़े नियम क्यों लागू नहीं करती?

जो नियम हैं वो केवल कागजों तक ही सिमट कर क्यों रह जाते हैं? सीएसई की प्रदूषण निगरानी प्रयोगशाला द्वारा दो दिन पूर्व देश की तमाम शीर्ष ब्रांड के ब्रेड के नमूनों में कैंसर कारक रसायन होने का सनसनी खेज खुलासा किया गया है

इसके लिए सीएसई का दावा है कि उसने प्रयोगशाला में की गई सघन जांच और अध्ययन के आधार पर यह दावा किया है। उसका कहना है कि पाव और बन सहित ब्रेड के सामान्य रूप से उपलब्ध 38 ब्रांड में से 84 प्रतिशत में पोटेशियन ब्रोमेट और पोटेशियम आयोडेट पाया गया यह दोनों रासायनिक तत्व कई देशों में प्रतिबंधित हैं क्योंकि इसे जनस्वास्थ्य के लिए खतरनाक श्रेणी में सूचीबद्ध किया गया है

वैज्ञानिकों का कहना है कि इसमें से एक रसायन 2-बी श्रेणी का कार्सिनोजेन है तथा दूसरा रसायन थायराइड ग्लैंड को प्रभावित करता है जिससे शरीर में थायराइड विकार हो सकते हैं। इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद जब देश के मीडिया ने खोज खबर की तो सबसे हैरान कर देने वाली बात यह सामने आई कि दुनिया के अधिकांश शहरों में यह रसायन प्रतिबंधित हैं।

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर क्यों भारत में इसका इस्तेमाल प्रतिबंधित नहीं किया गया है। देश में यह ऐसा अकेला उदाहरण नहीं है जहां मानव द्वारा रोजमर्रा में इस्तेमाल की जाने वाली सामग्रियों में जहरीले रासायनों के इस्तेमाल की बात सामने आई है।

अभी कुछ समय पहले ही सरकार ने देश में तीन सौ से ज्यादा ऐसी दवाएं प्रतिबंधित की हैं जो मानव शरीर के लिए खतरनाक थीं। दुनिया के तमाम बड़े देश बहुत पहले से ही इन पर प्रतिबंध लगा चुके हैं। अफसोस की बात है कि अभी भी ऐसी तमाम दवाएं धड़ल्ले से बन रही हैं जिनका रासायनिक मिश्रण बेहद खतरनाक साइड इफेक्ट पैदा करता है।

देश अभी एक बड़ी बहुराष्ट्रीय कम्पनी के नूडल्स में खतरनाक रसायन की मिलावट के सामने आने को भी नहीं भूला है इसमें जानलेवा रसायन लेड का इस्तेमाल सामने आया था। सबसे ज्यादा चिंता की बात तो यह है कि उत्पाद को सर्वाधिक देश के बच्चे उपयोग करते हैं।

जरा सोचिए जब हमारी आने वाली पीढ़ी का स्वास्थ्य ही ठीक नहीं होगा तो फिर देश का भविष्य कैसे बेहतर बनेगा? इससे पूर्व पेप्सी और कोक जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा भारत में निर्मित ठंडे पेय में कीटनाशकों के इस्तेमाल का भी मामला सामने आ चुका है। योग गुरु बाबा रामदेव ने तो पेप्सी और कोक जैसे ठंडे पेय पदार्थों को टॉयलेट क्लीनर तक की संज्ञा दी हुई है। इनसे भी पेट का अल्सर, कैंसर जैसे रोग होने की बात सामने आई है।

सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि हमारे देश में मानव शरीर से यह खिलवाड़ क्यों बर्दाश्त किया जा रहा है? कहने को तो यहां एफएसएसएआई जैसी जांच एजेंसियां सक्रिय हैं। बावजूद इसके तमाम खाद्य उत्पादक कंपनियां खतरनाक रसायनों के इस्तेमाल को कैसे उपयोग में ला रही हैं, ये कैसे खुलेआम अपने उत्पाद बाजार में बेच रही हैं। क्या यह हमारी सरकार की ढील-पोल को उजागर नहीं करता। यह एक गंभीर विषय है और सरकार को इस दिशा में कड़े नियम व कड़ी सजा का प्रावधान करने की जरुरत है। जब तक कड़ी सजा का कोई मामला सामने नहीं आएगा तब तक मानव शरीर से खिलवाड़ करने वाले ये बाजार के लुटेरे हमें और आपको ठगते रहेंगे।
यह सच है कि आज का युग विज्ञान का युग है। विज्ञान के इस युग में खान-पान की वस्तुओं को और अधिक चकाचौंध भरा, और अधिक चटकारा और अधिक बाजारू बनाने के लिए वैज्ञानिक तकनीकों का जायज और नाजायज इस्तेमाल जमकर किया जा रहा है। यही वजह है कि तमाम रसायनों, भले ही वह मानव शरीर के लिए कितने ही अनुपयोगी क्यों न हो उनका जमकर इस्तेमाल किया जाता है।

यह इस्तेमाल केवल खानपान की वस्तुओं तक ही सीमित नहीं रह गया है। जैसा कि हमने शुरुआत में ही संकेत किया कि चूंकि भारत दुनिया का सबसे बड़ा बाजार है अत: दुनियाभर की तमाम बड़ी बहुराष्ट्रीय कम्पनियां न केवल यहां पैर पसार रही हैं बल्कि मानव को होने वाले नुकसान को दरकिनार करके खाद्य पदार्थ हों या अन्य उत्पाद उनमें खतरनाक रसायनों का जमकर इस्तेमाल करती हंै। खाद्य पदार्थों में लेड, पोटेशियम, ब्रोमेट, पोटेशियम आयोडाइड कीटनाशक जैसे रसायन ही उपयोग नहीं किए जा रहे बल्कि खेतों में पेस्टीसाइड के रूप में ऐसे खतरनाक जहरीले रसायनों को बाजार में बेचा जा रहा है जो मानव द्वारा उपयोग में लाई जाने वाली फल, सब्जियों और अनाजों को बुरी तरह जहरीला बना रहे है। इनका उपयोग करने से तमाम तरह की जानलेवा बीमारियों के होने की बात भी सामने आ चुकी है।
इसी प्रकार के खतरनाक रसायनों का इस्तेमाल इंजेक्शन के रूप में मवेशियों का दुग्ध उत्पादन बढ़ाने, फलों को जल्दी पकाने से लेकर सिंथेटिक दूध, खोया आदि तैयार करने और अनेक प्रकार की प्राकृतिक जड़ी-बूटियों के जैसे कत्था, बंस लोचन, शहद, केसर आदि के कृत्रिम स्वरूप को तैयार करने में धड़ल्ले से किया जा रहा है।
क्या ये सब यूं ही चलता रहेगा? क्या हमारा देश एक बड़ा बाजार होने की सजा अपने यहां निवास करने वाले लोगों के स्वास्थ्य की बलि चढ़ाकर देते रहेंगे? इन सवालों के उत्तर सीधा है या तो हम अपनी पुरानी संस्कृति की ओर लौट जाएं और जहरीले रसायनों से भरे पड़े बाजार का बहिष्कार करें, दूसरा विकल्प यह है कि हमारी सरकार देश में इस्तेमाल होने वाले खतरनाक रसायनों के इस्तेमाल पर गंभीरता से विचार करे, इसके लिए एक नीति का निर्धारण करे और नियम तोडऩे वालों को कानून की कड़ी धाराओं के तहत सजा का प्रावधान करे। ऐसा होगा तभी मानव शरीर से हो रहे खिलवाड़ पर लगाम लगेगी।

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