लेखक परिचय

पुनीता सिंह

पुनीता सिंह

हिन्दी से एम.ए, साहित्य पढना व लिखना आपकी रुची है। उपल्ब्धि के तौर पर अभिवयाक्ति (कव्य संग्रह) का प्रकाशन, आकाशवाणी से कई रचनाएँ प्रसारित, पत्र - पत्रिकाओं आदि मे पचास से भी अधिक रचनाएँ प्रकाशित।

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मानवीय मूल्यों के प्रसंग मेंmirror

आदर्शो की बात करते है सब,

एक आईना

लगा है

हर घर के आँगन मे

दूसरो के दोष उसमें दिखते हैं

अपनी आकॄति सुन्दर॥

क्यो होता है ऐसा?

खेल क्यो समझते है वो

खिल्ली उडाना,

मजे लेना,

दिल्लगी करना।

समय काटना/दूसरो को हँसाना

हो सकती है उनकी आदत

पर किसी दु:खी दिल को

कर सकती है आहत

आपकी हँसाने कि आदत।

आप दूसरों के लिये

अपने आँगन में

लगाते है आईना।

कोई और भी लगा सकता है

आपके लिये अपने घर में

ऐसा आईना-

जिसमें अपका कद बौना दिखता है।

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1 Comment on "आईना"

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श्‍यामल सुमन
Guest

बहुत खूबसूरती से आपने आइना दिखाया है पुनीता जी। वाह। किसी की पंक्तियाँ हैं कि

खुद खक्स ही उलट जाये तो क्या दोष है मेरा
मैं वक्त का आइना हूँ सच बोल रहा हूँ

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