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प्रवक्‍ता ब्यूरो

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images36मध्यप्रदेश में मीसा बंदियों के साथ भेदभाव का मामला सामने आया है। यहां आपातकाल के दौरान मीसा के तहत बंदी बनाए गए लोगों को उनकी पार्टीगत निष्ठा को देखते हुए पेंशन दिया जा रहा है।साथ ही जिला स्तर पर गहरी छानबीन किए बगैर कई आपराधिक प्रवृति के लोगों को भी यह सम्मान दिया गया है। राज्य सरकार ने 20 जून 2008 को घोषणा की थी कि आपातकाल के दौरान मीसा कानून के तहत बंदी बनाए गए सभी लोगों को अप्रैल 2008 से प्रत्येक माह आजीवन जयप्रकाश नारायण सम्मान पेंशन दिया जाएगा। घोषणा के मुताबिक जिन लोगों को आपातकाल के दौरान छह माह से कम अवधि तक जेल में बंद रखा गया था, उन्हें तीन हजार रुपये और उससे अधिक समय तक जेल में बंद रहे लोगों को छह हजार रुपये दिए जाएंगे। लेकिन, जिला स्तर पर इसके क्रियान्वयन को लेकर कई सवाल उठने लगे हैं।

समाजवादी जन परिषद (मध्यप्रदेश) के प्रदेश अध्यक्ष अजय खरे ने बताया, “जयप्रकाश नारायण सम्मान निधि नियम-6 की गलत व्याख्या कर जिला प्रशासन ने समाजवादी पृष्ठभूमि वाले संघर्षशील नेताओं को सम्मान पेंशन पाने से वंचित कर दिया है।” रीवा जिला प्रशासन के इस रवैये से अजय खरे समेत कई हकदार लोग पेंशन पाने से वंचित रह गए हैं। इनमें वर्तमान सांसद चंद्रमणि त्रिपाठी समेत कई लोग शामिल हैं।

खरे के मुताबिक सम्मान पेंशन स्वीकृत करने को लेकर जिला स्तर पर जो भी कार्यवाई हुई उसमें सभी कायदे-कानूनों को ताक पर रख दिया गया। उन्होंने कहा, “संघ परिवार से संबंध रखने वाले नारायण प्रसाद, श्रीनाथ पटेल जैसे कई लोगों को पेंशन स्वीकृत कर दिया गया। लेकिन, नियमों की गलत व्याख्या और तत्समय जैसे महत्वपूर्ण शब्दों की हेराफेरी कर समाजवादी धारा से जुड़े लोगों को इस सम्मान से वंचित रखा गया है।”

गौरतलब है कि सरकार की और से जारी दिशा निर्देश के अनुसार सम्मान पेंशन के लिए उपयुक्त व्यक्ति की अनुशंसा के लिए जिला स्तर पर एक समिति बनाई गई थी। जिला कलेक्टर व दंडाधिकारी, जिला पुलिस अधीक्षक और जेल अधीक्षक इस समिति के सदस्य हैं, जबकि जिले के प्रभारी मंत्री को समिति का अध्यक्ष बनाया गया है।

इस समिति की ओर से जिला रीवा में सम्मान पेंशन की पात्रता के लिए 26 फरवरी 2009 को जो कार्यवाही हुई, उसपर कई सवाल खड़े किए जा रहे हैं। साथ ही रीवा की जिला समिति के गठन की प्रक्रिया ही गलत बताई गई है। प्राप्त जानकारी के मुताबिक रीवा की जिला कलेक्टर व दंडाधिकारी ने डा. एम. गीता ने जिले के अतिरिक्त जिलाध्यक्ष को भी बतौर सदस्य समिति में शामिल किया है, जो कानून सम्मत नहीं है।

खरे ने समिति के फैसले पर कड़ी आपत्ति दर्ज करते हुए कहा, “जिले में समिति के गठन की प्रक्रिया ही अवैधनिक है। इसलिए समिति की ओर से लिए गए सभी निर्णय को अमान्य करार देते हुए नए सिरे से सम्मान पेंशन प्रक्रिया का निपटारा होना चाहिए।”

उन्होंने कहा, “आपातकाल के दौरान 22 जुलाई 1977 को रीवा के तत्कालीन जिलाध्यक्ष एवं दंडाधिकारी के आदेश पर मुझे गिरफ्तार किया गया था। डेढ़ वर्ष तक मुझे जेल में रखा गया। हालांकि, इससे पहले आपराधिक गतिविधि में शामिल रहने का मेरे ऊपर कोई आरोप नहीं था। इसके बावजूद मुझे सम्मान पेंशन के योग्य नहीं समझा गया। ऐसे और भी साथी हैं। दूसरी ओर घोर आपराधिक पृष्ठभूमि वाले सुशील पांडे की विधवा ममता पांडे, प्रमोद सिंह, दलबीर सिंह जैसे लोगों को सम्मानित किया गया है। यह मीसा बंदियों के लिए अपमान की बात है।”

संपूर्ण क्रांति के नायक लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि आने वाले समय में आंदोलन में भाग लेने वाले मीसा बंदी अपराधी करार दिए जाएंगे, जबकि कई अपराधियों को मीसा बंदी बतलाकर सरकार सम्मानित करेगी।

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