लेखक परिचय

शादाब जाफर 'शादाब'

शादाब जाफर 'शादाब'

लेखक स्‍वतंत्र टिप्‍पणीकार हैं।

Posted On by &filed under जन-जागरण.


  शादाब जफर ‘‘शादाब’’

शिक्षा के नाम की दलाली खाने वाले स्कूल क्या हमारे बच्चो और देश का भविष्य बना सकते है ?। आज हर अभिभावक के मन में ये सवाल है क्यो कि पिछले दिनो जिस प्रकार से नजीबाबाद में शिक्षा के माफियाओ द्वारा नगर में संचालित अधिकतर फर्जी तौर पर बिना मान्यता के चल रहे बडे बडे नामचीन प्राईवेट पब्लिक इंग्लिश मीडियम स्कूलो की जब हकीकत सामने आई तो तमाम बच्चे के भविष्य को लेकर उन के माता पिता का चिंतित व गम्भीर होना स्वाभाविक है। वास्तव में किसी भी देश के लिये बच्चो को दी जा रही प्रारम्भिक शिक्षा, बच्चे और देश के लिये मजबूत बुनियाद का काम करती है। किंतु हमारे देश में प्राईमरी शिक्षा के मामले में ये बात बिल्कुल उल्टी है। दुनिया भर के शोध बताते है कि किसी देश की आर्थिक और सामाजिक सेहत उस की बुनियादी शिक्षा पर निर्भर करती है, पर जिस प्रकार का प्रकरण नजीबाबाद जैसे छोटे से कस्बे में सामने आया वो पूरे देश में जाॅच का विषय होने के साथ ही ये मुद्दा गम्भीर बहस के लिये भी उपयोगी लगता है। शिक्षा विभाग की नाक के नीचे नजीबाबाद जैसे छोटे से कस्बो में मात्र हिंदी की मान्यता प्राप्त अधिकतर स्कूल, इंग्लिश मीडियम, सीबीएसई पैट्र्न की आड़ और नाम लेकर बच्चो के भविष्य से खिलवाड़ करके बिल्डिग फन्ड व मोटी फीस की आड में अभिभावको से करोडो का धंधा कर के अपनी अपनी तिजोरी भर रहे थे। वही शिक्षा को काली कमाई कमाई का धंधा बना दिया गया था, शिक्षा के मंदिरो को पूरे तौर पर लूटतंत्र की एक और शाखा बनने के साथ ही यूनिफार्म और किताबे इन प्राईवेट स्कूलो के लिये मोटी कमाई का धंधा बने हुए थे। देश के कर्णधारो और उन के भविष्य का सौदा इन दलालो ने तथाकर्थित शिक्षिकाओ, शिक्षको और शिक्षा के नाम पर चंद रूपयो में शासन, प्रशासन से कर के उसे भी गूंगा और बेहरा बना कर आॅख मूंदकर बैठे रहने के लिये राजी कर लिया था, जो बडा अजीब लगता है।

आज बच्चे की पैदाईश के साथ ही उस के अच्छे भविष्य के बारे सोचना शुरू हो जाता है कुछ लोग बीमा पालिसी कराते है कुछ इधर उधर बच्चे के नाम से इन्वेस्टमेंट करते है पर सब से ज्यादा चिंता बच्चे के स्कूल एडमिशन को लेकर रहती है। बच्चा जैसे जैसे बढता है अभिभावको की चिंता भी बढती रहती है। हर कोई अपने बच्चे को अच्छे स्कूल में एडमिशन दिला कर उसके जीवन की नीव को मजबूत करना चाहता है। इन में से अधिकतर लोग ये भी चाहते है कि उनका बच्चा ऐसे स्कूल में जाये जहाॅ प्रवेश करने के बाद वह इन्टर कर के ही बाहर निकले क्यो के बार बार स्कूल बदलना न तो आज अभिभावको के हित में रहता है और न बच्चे के। आज मजदूरी का पेशा करने वाला व्यक्ति भी अपने बच्चो को अच्छे से अच्छे इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढाना चाहता है। उस के लिये चाहे उसे अलग से कितना ही श्रम क्यो न करना पडे। आज शिक्षा में प्रतिस्पर्धा के इस दौर में हर कोई अपने बच्चे को तरक्की करते हुए फटाफट अग्रेजी बोलते हुए देखना चाहता है। ये ही कारण है कि आज शिक्षा के प्रति गांव के अभिभावक भी जागरूक होने लगे है। अपने बच्चो को अग्रेजी पढाई में दक्ष बनाने के लिये गांवो में रहने वाले माॅ बाप भी बच्चो को शहरो के स्कूलो में पढने के लिये पूरी जिम्मेदारी के साथ भेज रहे है। जिस कारण आज स्कूलो में एडमीशन के लिये मारा मारी होने लगी है। हर कोई अपने बच्चे का एडमिशन इंग्लिश मीडियम स्कूलो में कराने के लिये दौडने लगा है। जिस कारण स्कूल प्रबंधको का ये हाल है कि वो बडा बडा डोनेशन लेने के बावजूद अपनी अपनी शर्तों पर एडमीशन ले रहे है। गरीब, और गरीब का बच्चा इन स्कूलो के बाहर खडा है। पिछले दिनो केन्द्रीय मंत्री कपिल सिब्बल द्वारा दिया गया बयान ‘‘शिक्षा को निजी क्षेत्र की कमाई का धंधा नही बनने दिया जायेगा’’ झूठा लगता है। जिस की वजह से आज गली गली मौहल्लो मौहल्लो कुकरमुत्तो की तरह प्राईवेट पब्लिक स्कूल खुलते चले जा रहे है।

पहले के मुकाबले आज बच्चो को पढाना अभिभावको के लिये ज्यादा मुश्किल हो गया है खास कर मुस्लिम अभिभावको के लिये जहॅा एक कमाई में दस दस आठ आठ लोग पलते है ऐसे में बच्चो की पढाई का खर्च कहा से निकाला जाये क्यो की अधिकतर गरीब मुस्लिम परिवारो में न तो कोई बजट ही बनाया जाता है और न ही इस ओर सोचा जाता है। ये ही कारण है कि आज आजादी के 65 साल बाद भी मुसलमान की समाजी, आर्थिक और तालीमी हैसियत में कोई खास बदलाव नही आया है। शिक्षा को मौलिक अधिकार कानून के द्वारा सरकार ने प्राईवेट स्कूलो पर पिछले साल यह जिम्मेदारी डाली थी कि वे समाज के वंचित वर्ग के 25 फीसदी बच्चो को अपने यहा मुफ्त शिक्षा दे। शिक्षा के मौलिक अधिकार के इस नये कानून की अधिकतर प्राईवेट पब्लिक स्कूलो ने पिछले वर्ष से ही मुखालफत शुरू कर दी थी कुछ निजी स्कूलो ने तो इस कानून को असंवैधानिक बताते हुए इस के खिलाफ कोर्ट में याचिका भी दाखिल कर दी थी। इस वर्ष जब सरकार इस कानून को लागू करने में कामयाब हां गई है देखिये इस से गरीब बच्चे को कितना फायदा मिलता है और प्राईवेट स्कूल कितना कितना शोर मचाते है आने वाले वक्त में ही इस का पता चलेगा और कुछ समझा जा सकता है। आज उत्तर प्रदेश राज्य की आर्थिक स्थिति और सरकारी स्कुलो में इस समय बुनियादी शिक्षा काफी कमजोर है। उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती जी के कार्यकाल में उत्तर प्रदेश में मूर्तियो और महापुरूषो के नाम पर बडे बडे पार्क बनाने के लिये करोडो अरबो रूपया सरकारी खजाने से दिल खोलकर बसपा सरकार द्वारा खर्च किया गया पर प्रदेश के गरीब बच्चे की शिक्षा के नाम पर प्रदेष सरकार आधे से भी कम रूपया खर्च करने को तैयार हुई। शिक्षा के मुद्दे पर देश में कभी भी राजनीति नही होनी चाहिये क्यो की ये भारत के उन गरीब नौनिहालो के भविष्य से जुडा सवाल है जिन को अक्सर पेट भर रोटी मय्यसर नही होती। आखिर क्या प्रदेष सरकार सौ दौ सौ करोड रूपये भी अपने प्रदेश के गरीब बच्चो की बुनियादी शिक्षा पर खर्च नही कर सकती थी। ये ही वजह रही की मायावती उत्तर प्रदेश की सत्ता से हाथ धो बैठी। अब शिक्षा का मौलिक अधिकार कानून पास होने पर देखिये उत्तर प्रदेश के युवा मुख्यमंत्री कितना सहयोग करते है।

प्राइवेट पब्लिक स्कूल देश के नौनिहालो के बीच प्राथमिक शिक्षा में ही अमीर गरीब व जात पात की एक ऐसी खाई बना रहे है जो आगे चलकर देश को नुकसान पहूचा सकती है एक ओर जहाॅ सरकारी प्राईमरी स्कूल बच्चो और उन के अभिभावको को प्रोत्साहित करने के बजाये हतोसाहित कर रहे है वही ये प्राईवेट पब्लिक स्कूल गरीब बच्चो की हीनता के केन्द्र बनते जा रहे है यदि जीवन की नींव के स्तर पर ही बच्चो की शिक्षा में इस प्रकार का भेदभाव बरता जायेगा तो आज भारत के ये कर्णधार कल भारत को किस और ले जायेगे ये सोचा जा सकता है। प्राईमरी शिक्षा किस तरह की हो ,उस का उददेश्य क्या है,उस की जरूरत क्यो है। बुनियादी शिक्षा का उददेश्य वैष्वीकरण का पोषण है या आने वाली पीढी को आत्मनिर्भरता और समानता की और ले जाना है यह सरकार बन्द कमरो में तय ना करे जनता से विचार विमर्ष करे। क्यो कि शिक्षा राजनीति नही है, भले ही आज वो राजनीतिज्ञो के व्यवसायिक चंगुल में फंसी हो,और ना ही शिक्षा जरूरत की पूर्ति के लिये उत्पादन बढाने का जरिया हो सकती है। शिक्षा को हमारे महापुरूषो ने देश की बोद्धिक जरूरत और मानसिक विकास का साफ सुथरा सीधा रास्ता बनाया है। अगर हमारी सरकार इन सब बातो पर ध्यान दे तो आज ये तमाम प्रश्न एक अच्छी पहल और बहस का मुददा हो सकते है।

Leave a Reply

2 Comments on "मिशन नर्सरी एडमीशन और टैंशन"

Notify of
avatar
Sort by:   newest | oldest | most voted
आर. सिंह
Guest

विकसित देशों ने अपने यहाँ जिस तरह के प्राथमिक शिक्षा का प्रावधान किया है ,हम जब तक उसको नहीं अपनाएंगे,तब तक शिक्षा के नाम पर इसी तरह की लूटपाट चलती रहेगी.

rtyagi
Guest

शादब्जी सही कहा आपने परन्तु इस इस्थिति के लिए हम सब ही जिम्मेदार हैं. जिस चीज़ की जितनी मांग अधिक होगी वह उतनी ही महंगी होगी जबकि उसकी सप्लाई कम हो. हर व्यक्ति अपने बच्चो को इन तथाकथित civilized and highly cultured स्कूल्स में पढाना अपनी शान एवं हिंदी मीडियम स्कूल्स को हेय दृष्टि से देखते हैं.

गवर्नमेंट लैपटॉप एवं वजीफों को देने की बात तो करती है पर बसिक शिक्षा को प्राइवेट स्कूलों के स्तर का नहीं बनती.

हर व्यक्ति एवं सरकारें दिखावे की दुनिया में ही जीना चाहते हैं… बाकी का तो भगवन ही मालिक है…

अच्छे लेख के लिए बधाई..!!
रवि

wpDiscuz