लेखक परिचय

वीरेंदर परिहार

वीरेंदर परिहार

स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

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soniaवीरेन्द्र सिंह परिहार
2004 से 2014 तक केन्द्र की सत्ता में बैठी यू.पी.ए. को लेकर इधर कुछ ऐसा खुलासे हो रहे हैं, जिन्हें सुनकर पूरा देश सन्न है। लोगों को इस बात का भरोसा ही नहीं हो रहा है कि यह वही कांग्रेस पार्टी है, जिसने कभी देश की आजादी की लड़ाई लड़ी थी। अब वही कांग्रेस पार्टी भ्रष्टाचार के दलदल में धंसी तो दिखाई ही पड़ती है, राजनीतिक फायदे की दृष्टि से आतंकवादियों की पक्षधर होकर राष्ट्र की सुरक्षा से भी समझौता कर सकती है। सिर्फ इतना ही नहीं अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने की दृष्टि से आतंकवाद संबंधी गंभीर धाराएॅ लगाकर निर्दोष लोगों को जेल में भी ठूस सकती है।
पूरे देश के समक्ष यह सच सामने आ चुका है कि इशरतजहाॅ और उसके तीन सहयोगी लश्करे तोयबा के आतंकवादी थे और यह वर्ष 2004 में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को निपटाने जा रहे थे। यह बात अलग है कि खुफिया एजेन्सियों और पुलिस को इस बात की सूचना मिल गई और इन्हें निपटा दिया गया। वर्ष 2008 में केन्द्र सरकार ने जांच और खुफिया एजेन्सियों के आधार पर माना कि इशरतजहाॅ और उसके सहयोगी आतंकी थे, लेकिन डेढ़ महीने के अन्दर ऐसा क्या चमत्कार हो गया कि तात्कालीन गृहमंत्री पी. चिदम्बरम ने सर्वोच्च न्यायालय में दूसरा हलफनामा प्रस्तुत कर दिया कि इशरतजहाॅ आतंकी न होकर एक निर्दोष और मासूम लड़की थी। अब चिदम्बरम के पास इसका कोई जवाब नहीं है कि आखिर में हलफनामा बदलने की नौबत क्यों आई? ऐसी स्थिति में भाजपा को इस आरोप में दम दिखाई देता है कि यह शपथ-पत्र दस जनपथ के इशारे पर बदला गया। इसका तात्कालिक उद्देश्य तो यही मालुम पड़ता है कि ऐसा बता कर यह प्रचारित किया जाए कि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी इस हद तक मुस्लिम विरोधी हैं कि वह एक निर्दोष और मासूम मुस्लिम लड़की की हत्या आतंकवादी बता कर करा देते हैं। निश्चित रूप से इसके पीछे जहाॅ मुस्लिम वोट बैंक को अपने पीछे एकजुट करने की प्रवृत्ति थी, वहीं हिन्दू समुदाय में भी जो अमूमन सहिष्णु और उदार होता है, उसमें भी मोदी की छबि पर नकारात्मक प्रभाव पैदा करना था। इसके अलावा मोदी और उनके समर्थकों को सिर्फ राजनीतिक तौर से ही नहीं, बल्कि कानूनी तौर पर भी घेरना था। यह बात अलग है कि कांग्रेस पार्टी मोदी की दिल्ली में सत्तानशीनी नहीं रोक पायी और स्वतः मान्यता प्राप्त विपक्ष तक नहीं बन सकी। पर इस तरह से कूटरचित मुकदमे लगाकर बहुत से पुलिस अधिकारियों को ही नहीं, भाजपाध्यक्ष अमित शाह जो उस दौर में गुजरात के गृह राज्यमंत्री थे, उन्हें फंसाकर जेलों में डाल दिया गया। यह बात अलग है कि आदलत ने अमित शाह के प्रकरण में चार्ज लगाने योग्य नहीं पाया और उन्हें डिस्चार्ज कर दिया।
सिर्फ इशरतजहाॅ प्रकरण में ही नहीं, स्वामी असीमानन्द, कर्नल पुरोहित और प्रज्ञा भारती के मामले में ये तथ्य सामने आ रहे हैं कि आतंकवाद के प्रकरणों में इन्हें झूठा फंसाया गया। अभिनव भारत के यशपाल भड़ाना ने मजिस्टेªट के समक्ष बयान देकर कहा है कि असीमानन्द को फंसाने के लिए उस पर दबाव डाला गया। जिसके चलते उसने झूठ बोला कि बम का बदला बम से लेना है। जिन मालेगाॅव और समझौता ट्रेन में धमाकों के आरोप में इन्हें फंसाया गया, उसमें अब ऐसे पुष्ट तथ्य सामने आ रहे हैं कि एक साजिश के तहत यह सबकुछ किया गया, ताकि हिन्दू आतंकवाद के जुमले का सही ठहराया जा सके। उल्लेखनीय है कि दिग्विजय सिंह जैसे लोग आएदिन हिन्दू आतंकवाद की अथवा भगवा आतंकवाद की बातें करते थे। राहुल गांधी ने तो अमेरिकन राजदूत से स्पष्ट तौर पर कहा था कि हिन्दू आतंकवाद लश्करे तोयबा से ज्यादा खतरनाक है। लेकिन गौर करने का विषय यह है कि यह सब ऐसे ही नहीं, बल्कि एक योजना के तहत कहा जाता था और इसके लिए उपरोक्त निर्दोष लोगों को फंसाया गया। इतना ही नहीं उनके ऊपर मकोका लगाया गया, ताकि इनकी जमानत न हो सके। पर सच्चाई को कितना भी दबाया जाए एक दिन सामने आ ही जाती है। आठ साल बाद भी असीमानन्द, कर्नल पुरोहित और प्रज्ञा भारती के विरुद्ध चार्जशीट प्रस्तुत नहीं की जा सकी। चार्जशीट प्रस्तुत भी कैसे की जाए? आखिर में जब चार्जशीट प्रस्तुत करने लायक कोई साक्ष्य हो। अब इनकी जांच में जुटे अधिकारियों की ओर से भी ऐसे बयान आ रहे हैं कि इन्हें झूठा फंसाया गया। गत दिवस राष्ट्रीय जांच एजेन्सी यानी एन.आई.ए. के प्रमुख की ओर से भी यह कहा गया कि कर्नल पुरोहित के समझौता धमाके में लिप्त होने का कोई प्रमाण नहीं है। स्वतः यू.पी.ए. शासनकाल 2007 का एक गोपनीय नोट कह रहा है कि समझौता काण्ड, मालेगाॅव विस्फोट, अजमेर की दरगाह और हैदराबाद के मक्का मस्जिद में हुए धमाकों के पीछे हिन्दू संगठनों का कोई हाथ नहीं है।
यह भी उल्लेखनीय है कि मुम्बई में वर्ष 2008 में हुए 26/11 के बाद एन.आई.ए. का गठन किया गया था। इसका उद्देश्य यह बताया गया था कि आतंकी कृत्यों के संबंध में एक राष्ट्रीय जांच एजेन्सी होनी चाहिए, क्योंकि आतंकियों के तार कई राज्यों में जुड़े होने से एक राज्य की पुलिस उनसे नहीं निबट सकती। यद्यपि तब भी कई राज्यों ने इसके दुरुपयोग को लेकर आशंकाएॅ व्यक्त की थी, जो कि आगे चलकर सही साबित हुआ। क्योंकि हिन्दू आतंकवाद की थ्योरी को कार्यरूप में अंजाम देने और निर्दोष हिन्दुओं के विरुद्ध फर्जी मुकदमें गढ़ने में इस एजेन्सी की मुख्य भूमिका रही। दूसरी तरफ अमेरिका में 9/11 के बाद दो केन्द्रीय सुरक्षा एजेंसियाॅ बनायी गई, जिन्हें जांच-पड़ताल और कार्यवाही के व्यापक अधिकार दिए गए, लेकिन वहां एक भी ऐसा मामला नहीं आया, जिसके आधार पर यह कहा जा सके कि उपरोक्त एजेन्सियों ने कहीं अपने अधिकारों का दुरुपयोग किया है।
उपरोक्त बातों के सन्दर्भ में दो ही निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं। पहला यह कि यू.पी.ए. सरकार अथवा कांग्रेस पार्टी पूरी तरह हिन्दू विरोधी पार्टी थी, इसीलिए उसने हिन्दू आतंकवाद अथवा भगवा आतंकवाद के नाम पर सत्ता का दुरुपयोग कर इस हद तक फर्जीवाड़ा किया। लोगों को यह भी पता होगा कि इसी दौर में वर्ष 2011 में यू.पी.ए. सरकार साम्प्रदायिक हिंसा रोकने के नाम पर साम्प्रदायिक एवं लाक्षित हिंसा रोकथाम विधेयक 2011 लाने एवं पास कराने को प्रयासरत थी। यह बात अलग है कि राष्ट्रवादी ताकतों के विरोध के चलते उपरोक्त विधेयक पास नहीं हो पाया। कुल मिलकर उपरोक्त विधेयक में हिन्दू को ही अपराधी माने जाने की बात थी और उसे ही अपने को निर्दोष साबित करना पड़ता। इस तरह से हिन्दू जो को इस देश का राष्ट्रीय समाज है, वैसे भी हिन्दू मजहबी नहीं भौगोलिक और सांस्कृतिक शब्द है जो राष्ट्र का पर्याय है और कुल मिलाकर कांग्रेस पार्टी उस दौर में कहीं-न-कहीं राष्ट्र के खिलाफ खड़ी थी, क्योंकि सत्ता समीकरण में राष्ट्र उसके अनुकूल नहीं था। वैसे भी वर्ष 1998 से कांग्रेस जिस सोनिया गांधी की मुठ्ठी में है, उन्हें न तो इस राष्ट्र और सांस्कृति की कोई समझ है और न उससे कुछ लेना-देना है। उनका तो एकमेव लक्ष्य राजपाट और उसका भरपूर दोहन है। तभी तो जे.एन.यू. में जब राष्ट्र विरोधी नारे लगते हैं तो कांग्रेस के युवराज उसके समर्थन में खड़े होते हैं। दादरी में मुस्लिम समुदाय के एक व्यक्ति की हत्या पर पूरे देश में कुछ ऐसा प्रदर्शन किया जाता है, जैसे मोदी सरकार मुस्लिमों का सफाया करना चाहती है। वही दूसरी तरफ जब कर्नाटक में गौ-सेवक प्रशांत पुजारी तथा और दूसरे लोगों की हत्या की जाती है तो इन तत्वों की जुबान भी नहीं खुलती। इसकी बड़ी वजह है कि इन तत्वों को लगता है कि मुस्लिम तो संगठित हैं, उन्हें किसी भी कीमत पर खुश रखो, हिन्दू तो जाति-पाॅति में विभाजित है। बड़ी बात यह कि आरक्षण के बहाने और दूसरे तरीकों से उन्हें विभाजित बनाए रखना कांग्रेस पार्टी की नीति रही, ताकि अंग्रेजों की तर्ज पर फूट डालकर राज किया जा सके। हकीकत यह है कि तभी कांग्रेस पार्टी को हिन्दुत्व के सभी प्रतीकों से चाहे वह योग हो, गीता हो, संस्कृत भाषा हो, इनसे सिर्फ परहेज ही नहीं, उसके हिसाब से ये साम्प्रदायिक एजेण्डें के तहत आते हैं।
दूसरी महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि कांग्रेस ने लंबे समय से प्रत्येक संस्था का दुरुपयोग किया है, चाहे वह राज्यपालों के माध्यम से विरोधी दलों की सरकार गिराने का रहा हो, सी.बी.आई. और एन.आई.ए. के माध्यम से फर्जी मुकदमे लगाने का रहा हो। हाल के वर्षों में तो उसने संसदीय समितियों और संयुक्त संसदीय समितियों का दुरुपयोग कर अपने भ्रष्टाचार और घोटालों पर परदा डालने का काम किया है। अब इधर और जब उसका कोई वश नहीं चल रहा है तो राज्यसभा में अपने और अपने सहयोगियों के बहुमत के बल पर मोदी सरकार के महत्वपूर्ण विधेयक तो रोक ही रही है, सांसद के कामकाज में भी भयावह गतिरोध किसी-न-किसी बहाने खड़े कर रही है।
ऐसी स्थिति में लाख टके का सवाल यह- इसका आखिर समाधान क्या? निस्संदेह प्रधानमंत्री मोदी का कांग्रेस मुक्त भारत एक बड़ा समाधान है। लेकिन यह तो समस्या का राजनीतिक समाधान है। बड़ी बात यह कि इन्होंने इस तरह जो जघन्य अपराध किए हैं, अपनी वोट राजनीति के तहत निर्दोषों को हददर्जे तक प्रताड़ित किया है। आतंकवाद से समझौता कर देश विरोधी कृत्य किया है, उसके लिए उच्चाधिकार प्राप्त एस.आई.टी. बनाकर समय-सीमा में जांच कराकर स्पेशल कोर्ट में ट्रायल किया जाना उचित होगा।

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1 Comment on "राजसत्ता का ऐसा दुरुपयोग"

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mahendra gupta
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कांग्रेस ने अपने निहित स्वार्थों लिए देश को बहुत गुमराह किया है , व जब भी जहाँ भी मौका लगा है घोटाले गबन कर के देश को लूटा है ,भारत की नहीं विदेशी एजेंसीज जो आज सोनिया की खरबों की सम्पति बता रही हैं आखिर उसका स्रोत क्या है ?कोई भी साधारण व्यक्ति अंदाज लगा सकता है , इस पर तुर्रा यह है कि मैं देशभक्त परिवार की सदस्य हूँ यही मरूंगी , तो भई आपको मरने के लिए कौन कह रहा है , यह किसके वश में है कि वह कहाँ मरे , केवल भावनाओं को भड़का कर फिर… Read more »
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