लेखक परिचय

सिद्धार्थ शंकर गौतम

सिद्धार्थ शंकर गौतम

ललितपुर(उत्तरप्रदेश) में जन्‍मे सिद्धार्थजी ने स्कूली शिक्षा जामनगर (गुजरात) से प्राप्त की, ज़िन्दगी क्या है इसे पुणे (महाराष्ट्र) में जाना और जीना इंदौर/उज्जैन (मध्यप्रदेश) में सीखा। पढ़ाई-लिखाई से उन्‍हें छुटकारा मिला तो घुमक्कड़ी जीवन व्यतीत कर भारत को करीब से देखा। वर्तमान में उनका केन्‍द्र भोपाल (मध्यप्रदेश) है। पेशे से पत्रकार हैं, सो अपने आसपास जो भी घटित महसूसते हैं उसे कागज़ की कतरनों पर लेखन के माध्यम से उड़ेल देते हैं। राजनीति पसंदीदा विषय है किन्तु जब समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का भान होता है तो सामाजिक विषयों पर भी जमकर लिखते हैं। वर्तमान में दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, हरिभूमि, पत्रिका, नवभारत, राज एक्सप्रेस, प्रदेश टुडे, राष्ट्रीय सहारा, जनसंदेश टाइम्स, डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट, सन्मार्ग, दैनिक दबंग दुनिया, स्वदेश, आचरण (सभी समाचार पत्र), हमसमवेत, एक्सप्रेस न्यूज़ (हिंदी भाषी न्यूज़ एजेंसी) सहित कई वेबसाइटों के लिए लेखन कार्य कर रहे हैं और आज भी उन्‍हें अपनी लेखनी में धार का इंतज़ार है।

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सिद्धार्थ शंकर गौतम

आज संप्रग सरकार अपने द्वितीय कार्यकाल के तीन वर्ष पूर्ण करने जा रही है| इन तीन वर्षों में सरकार तथा जनता; दोनों खुद को कसौटी पर रखकर मनन कर सकते हैं कि हमने इन तीन वर्षों में क्या खोया-क्या पाया? हालांकि उपलब्धियों की चमक से नाकामी की फेरहिस्त अधिक लम्बी है संप्रग २ के कार्यकाल में| ये तीन वर्ष मात्र दिलासों में गुजार दिए संप्रग २ के कर्ताधर्ताओं ने| सरकार की अक्षमता, अशक्त व्यवहार एवं अनिर्णय के भंवर के फेर में उलझ कर कुछ न करने की प्रवृति ने संप्रग २ को भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास की सबसे कमजोर सरकार तो साबित कर ही दिया है वैश्विक परिदृश्य में भी भारत की जगहंसाई करवाई है| एक ओर जनता जहां नित बढ़ती महंगाई से त्रस्त है तो वहीं सरकार रोज उजागर हो रहे घोटालों से हलाकान है| संप्रग सरकार अपने पहले कार्यकाल से लेकर दूसरे कार्यकाल के तीन वर्षों में भी महंगाई से आम जनता को निजात दिलाने में असफल रही है| मई २००४ में सामान्य महंगाई दर औसतन ४-४.५ प्रतिशत थी वहीं २००९ में इसकी सालाना औसत दर १०.८३ फ़ीसदी तक पहुँच गई| यानी संप्रग सरकार के कार्यकाल में महंगाई दोगुनी रफ़्तार से बढ़ी है| खाद्य वस्तुओं की महंगाई ने जनता की कमर तोड़कर रख दी है| सरकारी आंकड़ों के अनुसार अप्रैल २००४ से अप्रैल २०१२ के बीच सभी जिंसों की कीमतों में ६३ फ़ीसदी का इजाफा हुआ है लेकिन जब खाद्य वस्तुओं की बात करें तो इसी समयावधि के दौरान यह ९८ से बढ़कर २०६.४ फ़ीसदी पर पहुँच गई है|

अर्थशास्त्री से प्रधानमंत्री बने मनमोहन सिंह की आर्थिक नीतियाँ भी जनता को महंगाई डायन के मुंह से नहीं बचा सकीं| अपने प्रथम कार्यकाल में मनमोहन सिंह ने भारत-अमेरिका परमाणु करार के वक्त जो दांव सरकार पर खेला था उससे लगने लगा था कि मनमोहन सिंह मात्र रबर स्टाम्प प्रधानमंत्री नहीं हैं किन्तु संप्रग २ कार्यकाल में उनका वह जोश न जाने कहाँ खो सा गया है| नीतिगत मोर्चे पर सफल रहने की कसक मनमोहन सिंह को ताउम्र सालती रहेगी| आर्थिक सुधारों के पुरोधा मनमोहन सिंह ने जब भारत में आर्थिक सुधारों की नींव रखी थी, तो उनका कहना था कि अब सोच बदलने का समय आ गया है। आज वही मनमोहन सिंह सोचविहीन नजर आते हैं। न तो उनके आर्थिक सुधारों में आज परिस्थितियों के लिहाज से दम बचा है, न ही देश को मूलभूत समस्यों से निजात भी मिली है। वैसे भी १९९२ के आर्थिक उदारीकरण के दौर में मनमोहन सिंह के आर्थिक सुधार अवश्य प्रासंगिक हुए थे किन्तु वर्तमान हालातों एवं वैश्विक अर्थव्यवस्था में आई गिरावट को देखते हुए उनका आर्थिक सुधार एजेंडा किसी भी सूरत में प्रासंगिक नहीं लगता| लक्ष्यहीनता की बदौलत सरकार ऐसे-ऐसे निर्णय ले रही है जो देश के लिए अधिक मुसीबतें पैदा कर रहे हैं| हाल ही में वित्त मंत्रालय के आर्थिक सलाहकार कौशिक वसु ने अमेरिका में यह कहकर सरकार की किरकिरी कर दी थी कि आर्थिक सुद्धारों के लिहाज से वर्तमान समय ठीक नहीं है और २०१४ के बाद ही स्थिति में सुधार होगा| सार्वजनिक रूप से दिए गए इस बयान ने यकीनन मनमोहन सरकार के झूठे दिलासे को उजागर किया था| देशहित से जुड़े किसी भी फैसले को लेकर १० जनपथ की ओर निहारना दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के प्रधानमंत्री की विवशता को प्रकट करता है|

जहां तक बात घपलों-घोटालों की है तो यह सर्वमान्य है कि जितने घोटाले संप्रग सरकार के कार्यकाल में हुए हैं उतने आज़ादी के बाद से २००४ तक भी नहीं हुए| टूजी स्पेक्ट्रम घोटाला, आदर्श सोसायटी घोटाला, राष्ट्रमंडल घोटाला और भी न जाने कितनी लम्बी फेरहिस्त है घोटालों की| मनमोहन सरकार घोटालों को रोकने में असफल और उन्हें दबाने में काफी हद तक सफल रही है| जनता की गाढ़ी कमाई का रूपया-पैसा मनमोहन मंत्रिमंडल डकार गया और इतने पर भी मनमोहन सिंह का यह कहना कि हम भ्रष्टाचार पर नकेल कसने में काफी हद तक कामयाब रहे हैं उनकी विफलता की कहानी बयां करता है| काले धन का मुद्दा आज भी मनमोहन सरकार ने लटका रखा है, लोकपाल विधेयक पर सरकार तथा संगठन दोनों एक सुर में इसका विरोध कर रहे हैं जिसमें इनका साथ अतिभ्रष्ट नेताओं की जमात भी दे रही है| गठबंधन के संकट को निर्णय न लेने की वजह बताकर हर बार प्रधानमंत्री अपनी जवाबदेही से नहीं बच सकते| आखिर गठबंधन में अविश्वास की शुरुआत भी तो आपकी ओर से ही हुई थी| जदयू प्रवक्ता शिवानंद तिवारी के अनुसार देश ने ऐसी अजीबो-गरीब सरकार कभी नहीं देखी जो रेल भाड़े को बढ़ाने का फैसला करने वाले अपने रेलमंत्री की रक्षा तक नहीं कर सकती| तिवारी की बात में दम तो है| यही अनिर्णय की स्थिति मनमोहन सरकार के साथ-साथ देश को भी भारी पड़ी है|

तीन वर्ष की असफलताओं को स्वीकारने के बावजूद सरकार कल ही तीन वर्षों का रिपोर्ट कार्ड पेश करने वाली है जिसमें निश्चित तौर पर अपनी पीठ थपथपाई जाएगी, स्वयं की शान में कसीदे गढ़े जायेंगे किन्तु आम आदमी की परेशानियों का कहीं ज़िक्र नहीं होगा| आने वालों २ वर्षों की नीतियाँ भी तय होंगी जिसमें सरकार की छवि सुधारने बाबत चर्चा होगी वहीं आम आदमी की हालत कैसे सुधरे; इस पर चर्चा का औचित्य ही नहीं है| जैसे-तैसे सरकार का तय समय पूरा करवाने की जद्दोजहद में मनमोहन सिंह देश की जनता को ऐसा ज़ख्म दे रहे हैं जिसे भरने में शायद दशकों का समय लगे| फिर यह स्थिति पार्टी के लिए भी ठीक नहीं है| बयानबाजी, तुष्टिकरण, छल-कपट से इतर यदि सरकार इमानदारी से काम करती तो शायद ३ वर्षों में सरकार की ऐसी दुर्गति नहीं होती| फिलहाल तो यह जश्न का नहीं आत्ममंथन का समय है, सरकार और आमजनता दोनों के लिए| शायद आने वाले समय में राजनीति करवट बदले?

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