लेखक परिचय

तारकेश कुमार ओझा

तारकेश कुमार ओझा

पश्चिम बंगाल के वरिष्ठ हिंदी पत्रकारों में तारकेश कुमार ओझा का जन्म 25.09.1968 को उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में हुआ था। हालांकि पहले नाना और बाद में पिता की रेलवे की नौकरी के सिलसिले में शुरू से वे पश्चिम बंगाल के खड़गपुर शहर मे स्थायी रूप से बसे रहे। साप्ताहिक संडे मेल समेत अन्य समाचार पत्रों में शौकिया लेखन के बाद 1995 में उन्होंने दैनिक विश्वमित्र से पेशेवर पत्रकारिता की शुरूआत की। कोलकाता से प्रकाशित सांध्य हिंदी दैनिक महानगर तथा जमशदेपुर से प्रकाशित चमकता अाईना व प्रभात खबर को अपनी सेवाएं देने के बाद ओझा पिछले 9 सालों से दैनिक जागरण में उप संपादक के तौर पर कार्य कर रहे हैं।

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-तारकेश कुमार ओझा-
sania mirza

मेरे स्वर्गीय पिता के दसवें पर श्मशान घाट पर कर्मकांड कराने वाले महाब्राह्णण ने कुछ घंटे की पूजा के एवज में परिजनों से मोटी रकम वसूल ली। तिस पर तुर्रा यह कि पुरानी जान – पहचान के चलते उन्होंने अपनी ओर से कोई विशेष मांग नहीं रखी। जो दे दिया, उसी में संतोष कर लिया। वर्ना गोदान से लेकर शैय्या दान आदि के मद में खर्च इससे कई गुना ज्यादा होनी तय थी। मैं मन ही मन सोच रहा था कि कुछ देर की पूजा के लिए पंडितजी ने जितनी रकम झटक ली, वह देश के हजारों लोगों की महीने भर की तनख्वाह होगी। जिससे वे अपने पूरे परिवार का खर्च चलाते होंगे। श्मशान से घर लौटे तो शुद्धिकरण के तहत एक और पूजा हुई, जिसे परिवार के परंपरागत पंडित ने संपन्न कराया। पूजा संपन्न होने के बाद बात लेने -देने की अाई तो पंडितजी ने पूछा… स्वर्गीय पिता का सवाल है, सच-सच बताना, श्मशान में महाब्राह्मण को कितना दिया था…। जो दिया उसका दोगुना लूंगा। क्योंकि परिवार के सारे शुभ कार्य मैं संपन्न कराता हूं…। पंडितजी के मुंह से यह सुन कर मैं हक्का-बक्का रह गया था। कर्मकांड पर होने वाले खर्च को वहन कर पाने में इधर हमारी कमर ढीली हुई जा रही थी, उधर पंडितों की टोली मांगों की फेहरिस्त सामने रख रहीथेी।इसी तरह कुछ साल पहले घर के एक बच्चे के मुंडन संस्कार के लिए परिवार के लोग चारपहिया वाहन से एक तीर्थ स्थल पर गए। वाहन का मालिक व चालक मोहल्ले का ही रहने वाला था। परिजनों की वापसी के बाद मुझे पता चला कि लाखों रुपए के वाहन को खुद चला कर लाने-ले जाने वाले ने जितनी रकम ली, लगभग उतनी ही रकम तीर्थ स्थल पर मुंडन संस्कार कराने वाले पंडितों ने वसूल ली। मेरे ख्याल से अपने देश में तथाकथित ब्रांड एंबेसडरों की हालत भी इन पंडितों की तरह ही है। जब तक कुछ बनने-बनाने की कष्ट साध्य प्रक्रिया चलेगी, इनका कहीं अता-पता नजर नहीं आएगा। लेकिन जैसे ही कहीं कुछ तैयार होगा ये कथित सेलीब्रिटीज कृपापूर्वक चेक हासिल करने वहां पहुंच जाएंगे। देश के सबसे बड़े उत्तर प्रदेश में जैसे ही मुलायम सिंह यादव की समाजवादी सरकार बनी। अमिताभ बच्चन.. यूपी में है दम… जैसा कुछ कहते हुए वहां के ब्रांड एंबेसडर बन गए। इसके एवज में बच्चन साहब ने क्या लिया, यह तो पता नहीं. लेकिन इतना तय है कि उनके ब्रांड एंबेसडर बनने से यूपी का जरा भी भला नहीं हुआ। इसी तरह पश्चिम बंगाल में भारी उथल-पुथल और खून-खराबे के बाद कम्युनिस्टों के लगातार 34 साल के शासनकाल का खात्मा हुआ, और ममता बनर्जी मुख्यमंत्री बनी। लेकिन सत्ता परिवर्तन के साथ ही शाहरुख खान राज्य के कथित ब्रांड एंबेसडर बने या बना दिए गए। सुना है कि यूपीए सरकार में मंत्री रही अंबिका सोनी आमिर खान को अपने विभाग का ब्रांड एंबेसडर बनाने कोे इस कदर उतावली थी कि उन्होंने इसके एवज में मोटी रकम के साथ ही उन्हें हेलीकाप्टर तक देने की पेशकश कर दी थी। इसी तरह तेलंगाना राज्य के अस्तित्व में आने की पृष्ठभूमि में इतना पता है कि इस राज्य के बनने तक भारी अराजकता व हिंसा लगातार होती रही। इधर राज्य बना उधर सानिया मिर्जा प्रदेश की ब्रांड एंबेसडर बना दी गई। राज्य के मुख्यमंत्री चंद्रशेखर राव के साथ एक करोड़ रुपयों का चेक थामे दोनों की मुस्कुराती फोटो अखबारों में छपी। हालांकि समझना मुश्किल है कि किसी राज्य का ब्रांड एंबेसडर बनने – बनाने से आखिरकार उस प्रदेश का क्या और कितना भला होता है। साथ ही यह भी कि राजनेताओं की यह आखिरकार कैसी मजबूरी या बीमारी है कि सत्ता संभालते ही सारी बातें भूल कर उन्हें सबसे पहले ब्रांड एंबेसडर की तलाश जरूरी लगती है। इस पर पैसा पानी की तरह बहाने से भी उन्हें गुरेज नहीं होता।

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