लेखक परिचय

गौतम चौधरी

गौतम चौधरी

लेखक युवा पत्रकार हैं एवं एक समाचार एजेंसी से जुडे हुए हैं।

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भावनगर जिले के महुआ प्रखंड में निरमा डिटरजेंट प्राईवेट लि0 को गुजरात सरकार ने सीमेंट उद्योग लगाने के लिए 4500 हेक्टर जमीन आवंटित की है। निरमा ने 4500 हेक्टर भूमि के अलावा जिलाधिकारी से 10 हेक्टर जमीन की अलग से मांग की। सरकार ने निरमा कंपनी को 200 एकड ऐसी जमीन भी आवंटित कर दी है जो तालाव की जमीन है तथा उस तालाव से स्थानीय किसानों को सिंचाई एवं पीने का पानी प्राप्त होता है। यही नहीं अगर निरमा का प्रस्तावित एक लाख मैटि्रक टन सीमेंट उत्पादन वाला कारखना यहां लग गया तो समुद्री क्षारीय जल सुरक्षा के लिए बनाये गये बांधों को क्षतिग्रस्त होने से बचाया नहीं जा सकता है, जिससे पूरा इलाका क्षारयुक्त भूमि में बदल जाएगा तथा मिट्टी में क्षार की मात्रा बढने से इस इलाके की खेती चौपट हो जाएगी। किसानों का आरोप है कि गुजरात सरकार और निरमा कंपनी साजिस के तहत ऐसा इसलिए कर रही है कि यहां के किसान पलायन कर जाएं और क्षेत्र की भूमि पर और कई बडे सीमेंट उद्योग लगा दिये जायें। जानकारों का मानना है कि सीमेंट उद्योग के लिए आवष्यक कच्चेमाल की वहुलता के कारण निरमा की गिद्धदृष्टि महुआ के इस समुद्री किनाने वाले इलाकों पर है। निरमा का अभियान अगर सफल रहा तो लगभग 40 हजार किसानों को अपने पारंपरिक पेषे को छोड कही और पलायन करना होगा। गुजरत सरकार की सह पर निरमा उद्योग समूह अपना उद्योग लगाने के लिए तैयारी कर रहा है लेकिन स्थानीय किसानों के प्रतिरोध के कारण निरमा का यह सीमेंट प्रोजेक्ट इतना आसान नहीं है। महुआ के भारतीय जनता पार्टी विधायक डॉ0 कनुभाई कलसरिया का मानना है कि महुआ के किसान इस लडाई को अगर हार गये तो इसका प्रभाव गुजरात के अन्य क्षेत्रों पर भी पडेगा और किसान कमजोर पड जाऐंगे तथा उद्योग समूह अपनी मनमानी करता रहेगा। डॉ0 कलसरिया अपनी ही सरका के खिलाफ मोर्चा ले रहे हैं। कलसरिया का यह भी आरोप है कि गुजरात सरकार ने निरमा को बिना ग्राम पंचायत की अनुमति के गोचर, एवं तालाव की जमीन आवंटित की है। इस मामले में डॉ0 कलसरिया ने एक याचिका गुजरात उच्च न्यायालय में भी दाखिल की थी लेकिन वे कानूनी लडाई हार गये। इस बावत कलसरिया और किसान आन्दोलन के अन्य कार्यकर्ताओं का आरोप है कि किसान इस कानूनी लडाई में इसलिए हार गये क्योंकि गुजरात सरकार के महाधिवक्ता ने माननीय न्यायालय को गलत सूचना दी।

भावनगर जिले के समुद्री किनारे पर बसा नैप, कलसर, वांगर, माढीया, गुजरडा, दूधेरी, दूधाला, पढीयारका, डोलीया आदि कई गांव बसे हैं। इन्हीं गांवों के इर्द-गीर्द की सरकारी परती, तालाव और गोचर की जमीन निरमा डिटरजेंट प्रा0 लि0 को दिया गया है। कुल 45 सौ हेक्टर जमीन में से 200 एकड भूमि तालाव की है। यही नहीं सरकार ने उस भूमि का आवंटन भी निरमा को कर दिया है जो गोचर की जमीन है। गुजरात में गोचर की भूमि को आवंटित करने के लिए ग्राम पंचायत की स्वीकृति आवष्यक है लेकिन गुजरात सरकार ने बिना ग्राम प्रचायत की अनुमति के गोचर की भूमि निरमा के नाम कर दी है। चौकाने वाला तथ्य तो यह है कि जिस तालाव की जमीन को निरमा के हवाले किया गया है उस जमीन को भी सरकारी संचिकाओं में सरकारी परती जमीन ही दिखाया गया है। निरमा डिटरजेंट प्रा0 लि0 का इस क्षेत्र में एक इकाई पहले से काम कर रहा है। इस इकाई के विस्तान के लिए निरमा ने वर्ष 2004 में सरकार को आवेदन किया था। इस आवेदन के आलोक में गुजरात सरकार ने सन 2008 के इनवेस्टर समिट में निरमा कंपनी को लीज विस्तान और भूमि आवंटन का प्रमाण-पत्र सौंपा। अब निरमा डिटरजेंट प्रा0 लि0 इस क्षेत्र में प्रति वर्ष एक लाख मैटि्रक टन सीमेंट उत्पादन वाली एक इकाई लगाने की योजना में है। स्थानीय किसानों का मानना है कि निरमा के इस इकाई से क्षेत्र का वातावरण प्रदूषित होगा। यही नहीं यहां की खेती भी चौपट हो जाएगी। जानकारी में रहे कि महुआ का यह समुद्री किनाने वाला इलाका गुजरात के कश्‍मीर के रूप में जाना जाता है। यहां आम, चीकू, नरियल जैसे फलों की खेती होती है। जमीन हरा भर है तथा यहां के किसान खुसहाल है। निरमा का षडयंत्र है कि यहां की खेती चौपट हो जाये और किसान अपनी जमीन बेच कर कही अन्य जगह पलायन कर जाएं। इसकी वजह यह बतायी जाती है कि सीमेंट उद्योग में प्रयुक्त होने वाले कच्चे माल की यहां वहुलता है। निरमा कंपनी की दृष्टि लाईम स्टोन पर है। इस लिए निरमा ने ऐसे बांधों को भी अपने स्वामित्व में लिया है जिससे समुद्री क्षारीय जल को रोका जाता है। जिससे क्षारीय पानी से उपजाउ जमीन बची आज तक बची हुई है तथा जोरदार खेती होती है। निरमा की योजना अगर सफल रही तो इन बांधों को तोड दिया जाएगा, जिससे क्षेत्र में क्षारीय जल प्रवेश कर जाएगा और इस इलाके की खेती चौपट हो जाएगी। जब खेती चौपट हो जाएगी तो किसान अपनी जमीन बेच कर चले जाएंगे तथा निरमा को विना किसी लाग लपेट के लाई स्टोन शोषण का अवसर मिल जाएगा।

इस लडाई का नेतृत्व भारतीय जनता पार्टी के स्थानीय विधायक डॉ0 कनुभाई कलसरिया कर रहे हैं। ममले को तूल देने के लिए डॉ0 कलसरिया लडाई के कई मोर्चों पर सक्रिय हैं। गुजरात विधानसभा के चालू सत्र में भी उन्होंने इस मामले को उठाया और सरकार से यह पूछा कि गुजरात की सरकार चार उद्योग समूहों के लिए है या फिर गुजरात के आवाम के लिए है। विधायक डॉ0 कनुभाई कलसरिया के नेतृत्व में राजकोट, महुआ प्रखंड मुख्यालय, अहमदाबाद आदि कई स्थानों पर धरना और प्रदर्षन हो चुका है। महुआ किसान आन्दोलन की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि विगत दिनों जब किसानों ने अहमदाबाद से रैली निकाली तो हजारों प्रदर्षनकारियों को गिरफ्तार कर लिया गया। प्रशासन ने प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी। महुआ में पुलिस ने तो हद ही कर दी प्रदर्शन कर रही महिलाओं को बरबरतापूर्ण पीटा गया। हालांकि कलसरिया मामले को एक बार फिर न्यायालय में ले जाने की योजना बना रहे हैं लेकिन इधर आन्दोलन भी तेज होता जा रहा है। कनुभाई के साथ और कई शक्तियों का ध्रुवीकरण हो रहा है। इससे इस आषंका को बल मिल रहा है कि महुआ का आंदोलन आने वाले समय में एक निर्णायक आन्दोलन साबित होगा।

महुआ आन्दोलन के साथ कई शक्तियों के ध्रुविकरण के संकेत मिल रहे हैं। जहां एक ओर गांधीवादी धारा के लोग महुआ किसान आन्दोलन से जुड रहे हैं वही साम्यवादी खेमा ने भी महुआ के किसानों के साथ अपनी हमदर्दी दुहराई है। इस आन्दोलन से राज्य में एक नये राजनीतिक समिकरण के भी संकेत मिल रहे हैं। विगत दिनों भारतीय जनता पार्टी से टुट कर बनी महागुजरात जनता पार्टी के नेताओं ने भी राज्य सरकार पर किसाना विरोधी होने का आरोप लगाया था। फिर एसयुसीआई और माक्र्सवादी वाम धारा से भी डॉ0 कलसरिया को समर्थन मिल रहा है। यही नहीं राज्य में सक्रिय गांधीवादी, सर्वोदयी और लोहिलयावादी कलसरिया के नेतृत्व वाले इस आन्दोलन को अपना समर्थन देने लगे हैं। हालांकि राज्य की प्रधान प्रतिपक्षी पार्टी कांग्रेस उद्योग विरोधी नहीं दिखना चाहती है लेकिन राज्य की जनता का मिजाज भंप विगत दिनों चालू विधानसभा सत्र में कांग्रेस ने भी कलसरिया का समर्थन किया तथा अपनी सीट से उठकर सरकार विरोधी नारे लगाये। कनुभाई के नेतृत्व वाले आन्दोलन का रूख क्या होगा यह तो भविष्य के गर्भ में है लेकिन इस आन्दोलन से राज्य में नऐ राजनीतिक ध्रुविकारण की सुगबुगाहट को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। कलसरिया इस आन्दोलन के लिए अपना पूरा कैरियर दाव पर लगा रखे हैं। इस विषय पर डॉ0 कलसरिया ने कहा कि महुआ के किसानों के लिए एक क्या सौ सौ भारतीय जतना पार्टी कुरवान कर सकता हूं। इस आन्दोलन को धारदार बनाने के लिए डॉ0 कलसरिया ने देशभर के सामाजिक कार्यकर्ताओं से संपर्क करना प्रारंभ कर दिया है। इधर क्षेत्र के किसानों का मनोबल भी उंचा है और आन्दोलन को लक्ष्य तक पहुंचाने के लिए वे किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं।

-गौतम चौधरी

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1 Comment on "मोदी के लिए नासूर बनता जा रहा है महुआ का किसान आन्दोलन"

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Dr. Rajesh Kapoor
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Modi ji, aapse esi ummid nahin thi.

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