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निर्भय कर्ण

निर्भय कर्ण

स्वतंत्र लेखक व् टिप्पणीकार

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-निर्भय कर्ण-

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26 मई को नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री के रूप में अपना कार्यकाल का एक साल पूरा कर लिया। इसी के साथ तमाम लोग मोदी सरकार के बीते एक साल के कार्यकाल की सफलता व असफलताओं का आकलन करने लगे। किसी ने मोदी को तानाशाह करार दिया तो किसी ने विकास का प्रतीक। लेकिन जहां तक मैं सोचता हूं, उसमें मोदी को मैं तानाशाह नहीं मानता। यदि कैबिनेट को नियंत्रित कर देश के विकास के लिए मंत्री व अधिकारी को सही काम करने के लिए सख्ती नहीं की जाएगी, तो देश की प्रगति संभव नहीं है। ऐसे में नरेंद्र मोदी का मंत्रियों पर अंकुश लगाने जैसे कार्य तानाशाह नहीं करार दिया जा सकता। भारतीय जनता को बीते एक साल में इतना जरूर एहसास हो गया है कि नरेंद्र मोदी काल में ही भारत का कायाकल्प पलट सकता है, वरना नहीं। जनता मानती है कि नरेंद्र मोदी की सरकार पिछली सरकार की तुलना में कहीं अधिक अच्छी है। मतलब साफ है कि ‘‘मोदी सरकार इज बेटर दैन मनमोहन सरकार।’’ यानि कि पिछली सरकारों की तुलना में मोदी सरकार का कार्यकाल बेहतर चल रहा है।

गौर करें तो, बीते 365 दिन में केंद्र में कोई घोटाले की खबर सुनने को नहीं मिली, जो कि भारत के लिए बहुत बड़ी राहत है। स्मरण रहे कि जनता की सारी उम्मीदें नरेंद्र मोदी पर ही टिका हुआ था क्योंकि यूपीए के 10 साल के कार्यकाल में घोटालों की संख्या,भ्रष्टाचार व महंगाई से जनता त्राहिमाम कर रही थी। नरेंद्र मोदी के लिए यह समय सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा थी और आशानुरूप, नरेंद्र मोदी ने शपथ लेते ही कड़ा और स्पष्ट संदेश दिया कि अफसर सहित मंत्री, सांसद सभी को जनता के लिए ईमानदारी से काम करना होगा और मेहनत से काम करने के लिए हमेशा तत्पर रहे। मंत्रालयों में हफ्ते में 6 दिन कार्य करने एवं सुबह 9 बजे पहुंचने जैसा कड़ा आदेश देकर नौकरशाहों पर लगाम लगाने का सफल प्रयास किया। परिणामस्वरूप, नौकरशाही नियंत्रित होने लगा है। खास बात यह है कि मंत्रियों के कामकाज ही नहीं उनकी गतिविधियों पर भी प्रधानमंत्री की पैनी नजर है। शपथ ग्रहण के तुरंत बाद काले धन पर एसआईटी, गंगा सफाई अभियान की शुरुआत, योजना आयोग की समाप्ति, मेक इन इंडिया, न्यायिक आयोग गठन, प्रधानमंत्री जन-धन योजना जैसे अनेकों कार्य करके लोगों के विष्वास को ही नहीं बल्कि दिल भी जीता है। इसके बाद गंगा नदी, पर्यावरण और साफ-सफाई अभियान, स्मार्ट सिटी-स्मार्ट इंडिया आदि की रफ्तार मोदी सरकार की कामयाबी की दास्तां बयां कर रही है।

इस बीच कुछ ऐसी भी घटना घटी जिससे सरकार की काफी किरकिरी हुयी जैसे -राज्यपालों को हटाने की प्रक्रिया ने सरकारी की मंशा पर सवाल खड़े किए। कई राज्यों के राज्यपालों को दबाव में आकर इस्तीफा देना पड़ा। हालात यहां तक पहुंच गया कि उत्तराखंड के राज्यपाल इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गए। इसके अलावा भूमि अधिग्रहण बिल, लव जिहाद को लेकर काफी हो-हल्ला मचा। साथ ही धर्म के नाम पर उनके मंत्री व सांसद की बेबाकी बोल ने सरकार को कई बार मुष्किल में डाला जिससे नरेंद्र मोदी बार-बार बचने की कोशिश करते रहे और अपने सांसदों को नसीहत और हिदायत देते रहे कि इस तरह के बयानों से बचे और सरकार को मुसीबत में न डालें। खैर वाद-विवादों के बीच भी नरेंद्र मोदी अपने दृढ़ संकल्प से देश की प्रगति के लिए संघर्शरत है। इससे साबित होता है कि यह पहली सरकार है जो समावेशी विकास और रोजगार दिलाने वाले मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र की अहमियत को न केवल पहचानती-समझती है बल्कि उसे स्थापित करने में अपना सर्वोत्तम योगदान देने के लिए जुटी है।

वहीं विदेश नीति के मामले में नरेंद्र मोदी ने अब तक 18 देशों की यात्रा कर विदेश में 53 दिन बिताया और वह जहां-जहां गये, वहां की सरकार और जनता का दिल जरूर जीता है जिससे विदेश नीति नए तरीके से मजबूती की ओर जाता दिख रहा है। मोदी की विदेश नीति में चीन, अमेरिका, रूस, कनाडा और यूरोप तो महत्वपूर्ण है ही साथ ही नेपाल, भूटान, मंगोलिया और सेशेल्स जैसे छोटे देश भी प्राथमिकताओं में शामिल हैं। नरेंद्र मोदी ने शपथ लेते ही सबसे पहले पड़ोसियों पर ध्यान देते हुए वहां की यात्रा की और विचारधारा के बजाय व्यावहारिकता पर जोर देते नजर आ रहे हैं। इसके अलावा यह भी देखने को मिला कि मोदी सरकार ‘लुक ईस्ट’ की जगह ‘एक्ट ईस्ट’ की नीति पर बल दे रही है। इसके बावजूद विपक्षी द्वारा नरेंद्र मोदी के विदेश दौरे पर सवाल खड़े करना न केवल आश्चर्यजनक है बल्कि निंदनीय भी।

इन सबके बीच मोदी सरकार अभी भी भ्रष्टाचार को रोकने में विफल रही है। जैसे पिछले सरकार के समय भ्रष्टाचार चरम पर था, कमोबेश वही स्थिति अभी भी है। ‘न खाऊंगा, न खाने दूंगा’ जैसा वक्तव्य प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मुंह से सुनना लोगों को काफी अच्छा लगा लेकिन हकीकत यही है कि आम आदमी को इन बातों से कोई विशेष लाभ नहीं हो रहा है। वहीं बेरोजगार युवा रोजगार के लिए कोई चमत्कार का सपना देख ही रहा है। नरेंद्र मोदी युवाओं की आवष्यकताओं को ध्यान में रखते हुए ही ‘मेक इन इंडिया’ लेकर आये जिसे अब धरातल पर लाने पर एक-एक कर कदम उठाया जा रहा है। लेकिन इस पर तेजी से काम करने की आवश्यकता है जिससे युवा हतोत्साहित नहीं हो सके और लगे कि उनका भी अच्छा दिन जल्द आने वाला है।

कुल मिलाकर देखा जाए तो बीते 365 दिनों में सरकार ने उम्मीद से बढ़कर अब तक काम किया है लेकिन उसका फायदा अब तक लोगों को नहीं मिल सका है। फिर भी सरकार में लक्ष्यों को पाने की प्रतिबद्धता एवं चुनावों के दौरान किए गए वादों को पूरा करने का हौसला भारतीय जनता की उम्मीदों को जिंदा रखा है जिससे लगने लगा है कि वास्तव में भारत का अच्छा दिन आने वाला है, लेकिन वह दिन कब आएगा, यह कोई नहीं जानता। यह सभी को समझना होगा कि मोदी सरकार को महंगाई, बेरोजगारी, निराशा का वातावरण, नौकरषाही में पनपा नकारात्मक पहलू आदि तो विरासत में मिला है जिसे दूर करने में ही ज्यादातर ऊर्जा चली जा रही है और इसका परिणाम धीरे-धीरे ही जनता के सामने आ पाएगा।

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1 Comment on "पिछली सरकारों की तुलना में मोदी सरकार बेहतर"

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इंसान
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मैं तो कहूँ गा कि १८८५-जन्मी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और उसके अन्य अवतारों में सत्तारूढ़ सरकारें तथाकथित स्वतंत्रता के पश्चात अंग्रेजों के कार्यवाहक प्रतिनिधि के रूप में किसी प्रकार लड़खड़ाते देश को चला रही थीं| राष्ट्रवादी मोदी-सरकार स्वतन्त्र भारत की राष्ट्रीय सरकार है| बेहतर तो होनी ही चाहिए लेकिन यदि किन्हीं परिस्थितियों में बेहतर नहीं भी हो तो हम सब को मिल इसे बेहतर बनाना ही होगा| भारत का भविष्य दाव पर लगा हुआ है|

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