लेखक परिचय

राकेश कुमार आर्य

राकेश कुमार आर्य

'उगता भारत' साप्ताहिक अखबार के संपादक; बी.ए.एल.एल.बी. तक की शिक्षा, पेशे से अधिवक्ता राकेश जी कई वर्षों से देश के विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। अब तक बीस से अधिक पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। वर्तमान में 'मानवाधिकार दर्पण' पत्रिका के कार्यकारी संपादक व 'अखिल हिन्दू सभा वार्ता' के सह संपादक हैं। सामाजिक रूप से सक्रिय राकेश जी अखिल भारत हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय प्रवक्ता व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और अखिल भारतीय मानवाधिकार निगरानी समिति के राष्ट्रीय सलाहकार भी हैं। दादरी, ऊ.प्र. के निवासी हैं।

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modiप्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की सरकार के दो वर्ष पूर्ण हो रहे हैं। इस काल में उनकी सरकार ने जहां कई अच्छे अन्य कार्य किये हैं, वहीं देश की प्राचीन और सर्वोत्तम चिकित्सा प्रणाली आयुर्वेद को पुनर्जीवन देने के लिए भी ठोस पहल की है। उनके विरोधी चाहे उन पर जो आरोप लगायें पर इन दो वर्षों में उन्होंने बिना अधिक शोर मचाये कई बातों को लेकर लोगों की सोच की दिशा परिवर्तित करने में सफलता प्राप्त की है। यही कारण है कि उनके प्रति लोगों के आकर्षण में अभी कमी नही आयी है।

मोदी सरकार से पूर्व सं.प्र.ग. की सरकार के चलते राष्ट्रवादी लोगों को और इस देश की संस्कृति, धर्म और इतिहास से प्रेम करने वाले लोगों को चुन-चुनकर उत्पीडि़त किया जा रहा था उस उत्पीडऩ का शिकार योगक्रांति के अग्रदूत बाबा रामदेव भी बने थे। जब उन्हें दिल्ली के रामलीला मैदान में सरकार के संकेत पर पुलिस के प्राणलेवा अत्याचारों का सामना करना पड़ा और परिस्थितिवश ‘रण छोडऩा’ पड़ गया था। बाबा ने योगक्रांति में ही सफलता प्राप्त नही की थी, अपितु उन्होंने सारे देश में स्वदेशी और स्वचिकित्सा के प्रति भी लोगों को जागरूक कर डाला था। जिससे बड़े-बड़े औद्योगिक घराने ही नही विदेशी कंपनियों के भी बड़े-बड़े स्वामी हमारे ‘स्वामी’ के प्राणों के शत्रु बन गये थे। ऐसा होना स्वाभाविक भी था, क्योंकि बाबा ने देश की जिस रग को पकडक़र कार्य करना आरंभ किया था वहां से देश के दलाल राजनीतिज्ञ, दलाल उद्योगपति और देश के लोगों को मारने के काम में लगे दवाई निर्माता कंपनियों के स्वामियों की चूलें हिल गयी थीं। उन्हें पसीना आ गया था और बाबा थे कि उनके पसीना को सूखने ही नही दे रहे थे।

जिस समय बाबा दिल्ली को हिला रहे थे उसी समय गुजरात की भूमि से उन्हें ‘महाभारत’ के युद्घ में सफलता प्राप्ति के लिए एक ‘अर्जुन’ मिलने जा रहा था। भारत की परंपरागत ब्रह्मशक्ति और क्षात्रशक्ति का अदभुत संयोग था यह। इतिहास के इन दुर्लभ क्षणों को हमने अपनी आंखों से देखा जिन्होंने इतिहास की धारा में परिवर्तन ला दिया। श्री नरेन्द्र दामोदर मोदी 26 मई 2014 को देश के प्रधानमंत्री बने। उन्होंने बाबा के अभियान को आगे बढ़ाने के लिए उन्हें पूरी सुरक्षा दी और उन्हें ऐसे महान कार्यों के संपादन में सहायता देने का वचन दिया जिनसे देश के लोगों का भला हो, और भारतीय संस्कृति का उज्ज्वल और गौरवमयी पक्ष लोगों के सामने स्पष्ट हो सके।

इससे पूर्व देश के लोगों के स्वास्थ्य के साथ ‘मौन सरकारी आतंकवाद छल और घात’ किये जा रहा था। मौन इसलिए कि जो कुछ किया जा रहा था उसका कहीं शोर नही था, ‘सरकारी आतंकवाद’ इसलिए कि हर आतंकवादी की भांति इस ‘सरकारी आतंकवाद’ का अंतिम लक्ष्य भी मानव स्वास्थ्य और जीवन को हानि पहुंचाना या समाप्त करना था और ‘छल व घात’ इसलिए कि इस सारे कार्य को जनहित में बता-बताकर किया जा रहा था। क्या था यह सारा खेल और कैसे हो रहा था, यह? इसे पिछले दो वर्ष में मोदी सरकार की उपलब्धियों के परिप्रेक्ष्य में समझने की आवश्यकता है।

1947 में देश जब स्वतंत्र हुआ तो 1951 में पूरे भारत में 4780 अंग्रेजी डाक्टर थे। उस समय देश की जनसंख्या 34 करोड़ थी। इतनी बड़ी जनसंख्या के लिए 1947 में अंग्रेजी दवा बनाने वाली कुल 10-12 कंपनियां ही थीं। 1951 में देश में रोगियों की संख्या केवल पांच करोड़ थी। कहने का अभिप्राय है कि देश की 1/7 जनसंख्या ही बीमार थी। यह चमत्कार इसलिए था कि देश के लोगों को देश की परंपरागत आयुर्वेदिक चिकित्सा प्रणाली स्वस्थ रखती थी। देश की राजनीति में दलाली का खेल अंग्रेजों के काल से ही चला आ रहा था उन्हें इस देश के लोगों से कुछ लेना-देना नही होता था, उन्हें अपनी दलाली निकालनी होती थी। क्योंकि शासन का उद्देश्य लूटना था। ‘बहती गंगा’ में हर कोई हाथ धोना चाहता था। सरकारी कोष से जो वेतन मिलता था वह तो था ही उससे अलग जो मिल जाए वह उसी का उसी का हो जाता था जिसे मिल गया। इस प्रकार की नीति शासन की थी। 1947 के पश्चात शासन के चेहरों में परिवर्तन आ गया पर प्रशासन वही रहा जो अंग्रेजों का था। उसने शासन को कमाने के ढंग सिखा दिये। फलस्वरूप देश के नेता देश के शासन की परंपरागत ‘लूटनीति’ में बड़ी सहजता से रंग गये।

इन नये शासकों ने देश की आयुर्वेदिक चिकित्सा प्रणाली को मिटाने का बीड़ा उठाया। उस लूट भरी पाखण्डी नीति का ही परिणाम रहा कि 2012 तक आते-आते देश की चिकित्सा प्रणाली शीर्षासन कर गयी। 2012 तक देश में अंग्रेजी चिकित्सकों की संख्या 4780 से बढक़र 18 लाख हो गयी। डाक्टर बनने का अर्थ लोगों ने रातों रात महल बना लेना लगा लिया किसी ने भी विचार नही किया कि जिस देश की सरकारी नीति नि:शुल्क स्वास्थ्य सेवा देने की युग-युगों (आयुर्वेद के चिकित्सक लोग आज भी अपना पारिश्रमिक नही के बराबर लेते हैं) पुरानी रही है, उसी देश की चिकित्सा प्रणाली रातों रात महंगी क्यों होती गयी। एक षडय़ंत्र के अंतर्गत इस प्रणाली को आगे बढ़ाया गया, जिसमें नेता, अधिकारी, पढ़ा-लिखा वर्ग और दवाई माफिया सम्मिलित हो गया। इसके बारे में यह ढिंढोरा पीटा गया कि यही चिकित्सा प्रणाली हमें स्वस्थ रखेगी। सारे देश का ध्यान इस ओर खींचते हुए इस धनाढय़ों की चिकित्सा प्रणाली को निर्धनों को मारने के लिए उन पर थोप दिया गया।

1975 में जयसुखलाल हाथी कमीशन ने अपनी रिपोर्ट दी थी कि भारत के मौसम, वातावरण और स्वास्थ्य आवश्यकताओं के दृष्टिगत केवल 117 दवाईयां रखनी ही आवश्यक है। इन 117 दवाईयों से छोटी बीमारियां तो जैसे खांसी बुखार आदि समाप्त हो जानी थीं और बड़ी बीमारियां कैंसर आदि होनी नही थी। कालांतर में विश्व स्वास्थ्य संगठन के दबाव में इन दवाओं की इस सूची को बढ़ाकर 350 कर दिया गया। पर आज क्या स्थिति है? आज ये जरूरी दवायें बढक़र 84000 हो गयी हैं। हर दवा निर्माता कंपनी ने भारत में व्यापार करने और भारत के लोगों के स्वास्थ्य से खिलवाड़ करने का लाइसेंस लेना आरंभ कर दिया और देश की युवा पीढ़ी को रोगी करने लगे। उसे नशीली दवाओं का चस्का लगा दिया, विद्यालयों में लडक़े लड़कियों को साथ पढ़ाकर उनका यौवन और रूप नष्ट करके अपना ग्राहक बनाने का पूर्ण प्रबंध कर लिया गया। फलस्वरूव आज देश में 1947 की 10-12 दवा निर्माता कंपनियों की तुलना में 20000 दवा निर्माता कंपनी खड़ी हैं, जो देश को लूट रही हैं। 1951 में देश में यदि 5 करोड़ लोग बीमार थे तो आज उनकी संख्या सौ करोड़ हो गयी है। दवा निर्माता कंपनी हजार गुणा बढ़ीं, चिकित्सक लाखों गुणा बढ़े तो बीमारी घटनी चाहिए थी-पर हमारी नीतियों का चमत्कार देखिए कि देश में रोगी भी बीस गुणा बढ़ गये। दवाओं का यह पूरा खेल पूरे देश को रूग्ण करने का था। हमारी सरकारें स्वास्थ्य सेवाओं पर पचास लाख करोड़ रूपया खर्च कर स्वयं को कल्याणकारी योजनाओं के प्रति समर्पित दिखाती रहीं, पर भारत नीरोग नही हो सका। देश में लगभग छह करोड़ मधुमेह के रोगी हैं, लगभग 5 करोड़ हृदय रोगी हैं, 8 करोड़ कैंसर के रोगी हैं, 12 करोड़ आंखों के रोगी हैं, 14 करोड़ छाती रोगों के रोगी हैं, 14 करोड़ गठिया रोग से पीडि़त हैं, 20 करोड़ उच्च रक्तचाप से पीडि़त हैं, 27 करोड़ हर समय खांसी, जुकाम आदि से पीडि़त रहते हैं, 30 करोड़ महिलाएं खून की कमी से पीडि़त हैं। इस प्रकार पूर्णत: विध्वंसित व्यवस्था को सुधारने के लिए मोदी जी और बाबा रामदेव की जोड़ी ने कार्य करना आरंभ किया। अब जिन लोगों को ब्रह्मशक्ति और क्षात्रशक्ति के इस मिलन से घृणा है और जिनका व्यापार चौपट हो गया है वे इनके प्रयासों को सीधे न कोसकर केवल व्यवस्था का ‘भगवाकरण’ करना कह कर कोस रहे हैं। मोदी जी देश में आयुष मंत्रालय की पहली बार स्थापना करके यह संकेत दिया है कि वह भारत की मूल चिकित्सा प्रणाली आयुर्वेद के प्रति पूर्णत: संकल्पबद्घ है। उन्होंने रोग के मूल पर प्रहार किया है, इसके परिणाम चाहे थोड़ी देर से आयें पर इतना निश्चित है कि यदि मोदी जी का प्रयास सफल होता है तो भारत की चिकित्सा प्रणाली फिर से निर्धन वर्ग की चिकित्सा प्रणाली फिर से निर्धन वर्ग की चिकित्सा प्रणाली बन जाएगी। ‘अस्वस्थ भारत’ को स्वस्थ करने के अभियान पर निकले, स्वच्छता अभियान के नायक मोदी जी को उनकी सरकार के दो वर्ष पूर्ण होने पर हार्दिक बधाई।

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