लेखक परिचय

सिद्धार्थ शंकर गौतम

सिद्धार्थ शंकर गौतम

ललितपुर(उत्तरप्रदेश) में जन्‍मे सिद्धार्थजी ने स्कूली शिक्षा जामनगर (गुजरात) से प्राप्त की, ज़िन्दगी क्या है इसे पुणे (महाराष्ट्र) में जाना और जीना इंदौर/उज्जैन (मध्यप्रदेश) में सीखा। पढ़ाई-लिखाई से उन्‍हें छुटकारा मिला तो घुमक्कड़ी जीवन व्यतीत कर भारत को करीब से देखा। वर्तमान में उनका केन्‍द्र भोपाल (मध्यप्रदेश) है। पेशे से पत्रकार हैं, सो अपने आसपास जो भी घटित महसूसते हैं उसे कागज़ की कतरनों पर लेखन के माध्यम से उड़ेल देते हैं। राजनीति पसंदीदा विषय है किन्तु जब समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का भान होता है तो सामाजिक विषयों पर भी जमकर लिखते हैं। वर्तमान में दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, हरिभूमि, पत्रिका, नवभारत, राज एक्सप्रेस, प्रदेश टुडे, राष्ट्रीय सहारा, जनसंदेश टाइम्स, डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट, सन्मार्ग, दैनिक दबंग दुनिया, स्वदेश, आचरण (सभी समाचार पत्र), हमसमवेत, एक्सप्रेस न्यूज़ (हिंदी भाषी न्यूज़ एजेंसी) सहित कई वेबसाइटों के लिए लेखन कार्य कर रहे हैं और आज भी उन्‍हें अपनी लेखनी में धार का इंतज़ार है।

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modi newगुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को भारतीय जनता पार्टी की केंद्रीय चुनाव समिति का मुखिया बनाकर संघ ने परोक्ष रूप से पार्टी में यह संकेत देने की कोशिश की थी कि अब मोदी ही संघ का एजेंडा पार्टी के मार्फ़त देशभर में लागू करेंगे। हालांकि संघ की इस मंशा पर पहले तो पार्टी के ही वयोवृद्ध नेता लालकृष्ण आडवाणी ने पलीता लगाने की कोशिश की जिन्हें काफी मान-मनव्वल के बाद मनाया गया। संसदीय बोर्ड की बैठक में पार्टी के सभी क्षत्रपों के एक मंच पर आने से भी यह दृष्टिगत हुआ मानो स्थिति अब संघ के हाथों में है। पर क्या वाकई भाजपा में सब ठीक है? फौरी तौर पर देखें तो सब ठीक नज़र आ रहा है किन्तु अंदरखाने मोदी की स्वीकार्यता को लेकर बगावती सुर सुनाई व दिखाई देने लगे हैं। पूर्व में यशवंत सिन्हा द्वारा पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को उचित मान-सम्मान की दुहाई देकर मोदी को नेपथ्य में धकेलने की कोशिश की गयी थी और अब अभिनेता से नेता बने शत्रुघ्न सिन्हा ने भी वरिष्ठता का राग अलापकर मोदी और संघ के माथे पर शिकन ला दी है। उन्होंने अपने मन की व्यथा बताते हुए आडवाणी को ही पार्टी का खेवनहार बताया है। बकौल शत्रुघ्न सिन्हा आडवाणी ने पार्टी को बहुत कुछ दिया है और इस बहुत कुछ के चलते ही प्रधानमन्त्री पद के भावी उम्मीदवार का फैसला भी उन्हीं के आशीर्वाद से होना चाहिए। हालांकि उन्होंने मोदी की जनस्वीकार्यता पर सीधे कोई कटाक्ष नहीं किया किन्तु आडवाणी के कद को वे मोदी से बड़ा ज़रूर ठहरा गए। देखा जाए तो शत्रुघ्न सिन्हा ने एक तरह से मोदी-आडवाणी विवाद को नई ऊर्जा दे दी है। हाल ही में मोदी के नेतृत्व में संसदीय बोर्ड ने जिन चुनावी उपसमितियों का गठन किया है उनमें चुन-चुन कर आडवाणी खेमे के नेताओं को आइना दिखाया है। या तो उन्हें किसी भी तरह की जिम्मेदारी से मुक्त रखा गया है और यदि उन्हें जिम्मेदारी सौंपी भी गयी है तो उनके ऊपर भी संघ की पसंद के नेता को स्थान मिला है। सुषमा स्वराज, अरुण जेटली जैसे वरिष्ठ नेताओं तक को जिन समितियों का मुखिया बनाया है; उनका चुनावी दृष्टिकोण के मद्देनज़र कोई ख़ास मकसद नहीं है। कुल मिलाकर मोदी ने संघ की मंशानुरूप ही समितियों को गठित किया और उन्हें मंजूरी भी दिलाई। ज़ाहिर है ऐसे में पार्टी के आडवाणी खेमे में बगावत तो होनी ही थी। मोदी की राजनीतिक शैली के बारे में प्रचलित है कि वे अपने विकल्प के रूप में किसी को खड़ा ही नहीं होने देते। गुजरात इसका उदाहरण है। वहां मोदी के बाद कौन पर एक बड़ा प्रश्नचिंह है। हालांकि राज्य के कई नेताओं को मोदी का विकल्प कहा जाता रहा है किन्तु मोदी ने कभी इस विषय पर अपना मुंह नहीं खोला है। जब अपने गृहराज्य में मोदी ने वन मैन आर्मी की भांति अपनी सत्ता चलाई है तो निश्चित रूप से केंद्र की राजनीति में भी यह होने वाला है। आडवाणी और उनके गुट को निस्तेज कर मोदी ने इसकी शुरुआत भी कर दी है। ज़ाहिर है ऐसे में बगावती सुर तो उठेंगे ही।
फिर ऐसा भी नहीं है कि मात्र वरिष्ठ भाजपा नेता ही मोदी की स्वीकार्यता से सहमे हुए हैं। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भी इन दिनों मोदीफोबिया से ग्रस्त हैं। दरअसल शिवराजसिंह भी आडवाणी के उसी खेमे से आते हैं जिन्हें भाजपा की राजनीति में दरकिनार कर दिया गया है। पिछले तीन वर्षों में शिवराजसिंह ने जितने भी राजनीतिक कार्यक्रम किए हैं; सभी में मुख्य अतिथि के रूप में आडवाणी को ही मंचासीन किया है। वहीं मोदी से अदावत के चलते आडवाणी ने भी शिवराजसिंह को मोदी के समकक्ष खड़ा करने में कोई कसर बाकी नहीं रखी है। कुछ राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो आडवाणी की नज़र इस बार मध्यप्रदेश की किसी सुरक्षित सीट पर है। उनका मन अब गांधीनगर से उचट चुका है। फिर एक उन्हें एक डर यह भी है कि कहीं मोदी ही गांधीनगर में उनकी राजनीतिक पारी का अंत न करवा दें। और कहीं न कहीं ऐसा संभव भी है। लिहाजा आडवाणी ने शिवराजसिंह की जिस तरह से मोदी के समकक्ष ब्रांडिंग की है, वह अब शिवराज के लिए भारी पड़ती नज़र आ रही है। आंकडें भी मोदी-शिवराज को एक-दूसरे की टक्कर का बता रहे हैं। गुरु पूर्णिमा से राज्यभर में अपनी जनआशीर्वाद यात्रा पर निकले शिवराज और उनकी योजनाओं से जुड़े होर्डिंग और विज्ञापनों से राज्य का कोना-कोना पटा हुआ है। इन होर्डिंगों में अटल, आडवाणी से लेकर राजनाथ सिंह के मुस्कुराते चेहरे देखे जा सकते हैं किन्तु पार्टी की केंद्रीय प्रचार समिति के मुखिया नरेन्द्र मोदी का चेहरा गायब होना पार्टी की अंदरूनी राजनीति के लिहाज से ठीक नहीं माना जा सकता। मीडिया द्वारा जब इस मुद्दे को प्रमुखता से उछाला गया तब जाकर मोदी का चेहरा इनमें नज़र आया किन्तु शिवराज और आडवाणी के मुकाबले यह अनुपात अभी काफी कम है। दरअसल शिवराजसिंह को प्रदेश की सत्ता जिन परिस्थितियों में प्राप्त हुई थी, उनमें अब काफी अंतर आया है। लगातार दूसरी बार निर्वाचित मुखिया के रूप में प्रदेश की कमान संभालने के चलते उनपर दबाव तो है ही; आडवाणी खेमे से जुड़े रहने का खामियाजा भी भुगतने की आशंका के चलते उनका डर स्वाभाविक है। संघ का एक खेमा शिवराजसिंह को पसंद नहीं करता और मोदी से तुलना पर उसे लगता है कि इससे मोदी की भावी राह कुंद होती है। वहीं जिस तरह शिवराजसिंह ने उमा भारती, प्रभात झा, राघव जी आदि को किनारे लगाया; उससे भी संघ और मोदी खेमा नाराज तो है ही। शिवराज के समक्ष एक संकट यह भी है कि वे चाहकर भी आडवाणी खेमे को दरकिनार नहीं कर सकते। चूंकि उनकी राजनीतिक पृष्ठभूमि का आधार ही आडवाणी खेमा है, लिहाजा ऐसा जान पड़ता है मानो उन्होंने भी मोदी विरोध का आडवाणी खेमे का एजेंडा बुलंद करने की ठान ली है। वैसे अंदरूनी राजनीति के लिहाज से शिवराजसिंह की स्थिति मोदी के मुकाबले काफी कमजोर है। मोदी का गुजरात में कहीं कोई विरोध नहीं है किन्तु शिवराजसिंह के विरुद्ध मध्यप्रदेश में विरोध की चिंगारी धीरे ही सही मगर सुलग रही है। अन्य वरिष्ठ भाजपाइयों का तो पता नहीं किन्तु शिवराजसिंह के लिए यक़ीनन परिस्थितियां काफी जटिल नज़र आ रही हैं।
अब जबकि शत्रुघ्न सिन्हा और शिवराजसिंह का मोदी विरोध अखबारों की सुर्ख़ियों से लेकर प्राइम टाईम में बहस का मुद्दा बन चुका है, ऐसे में देखना दिलचस्प होगा कि मोदी या संघ की ओर से डैमेज कंट्रोल करने के क्या प्रयास किए जाते हैं? राजनाथ सिंह की स्वदेश वापसी भी जल्द होने वाली है।निश्चित रूप से दिल्ली और नागपुर की नज़रें उनके रुख पर टिकी होंगी क्यूंकि अब तक वे ही मोदी के लिए ढाल का कार्य करते आए हैं। भाजपा को अभी कांग्रेस से नहीं बल्कि अपने ही नेताओं की बेरुखी और संताप से लड़ने में दिक्कत आ रही है और इसके मूल में कहीं न कहीं मोदी फैक्टर भी जिम्मेदार है। कुल मिलाकर भाजपाई कुनबा इस समय अजीब से स्थितियों से दो चार हो रहा है जो उसके भावी भविष्य के लिए नुकसानदेह है। समय रहते यदि इन पर काबू नहीं पाया गया तो निश्चित रूप से इसका खामियाजा पूरी पार्टी को उठाना पड़ेगा।
सिद्धार्थ शंकर गौतम 

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3 Comments on "मोदी की स्वीकार्यता से भाजपा में बगावत"

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डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
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इस बार ये तो तय है कि संघ को भारत की सत्ता प्लेट में सजी हुई दिख रही है, इसलिए संघ किसी की परवाह पालता नहीं दिख रहा है और संघ के एजेंडे को भारत में लागू करने के लिए नरेन्द्र मोदी से अधिक खतरनाक हिंदूवादी कौन हो सकता है? इसलिए मोदी के लिए न जाने कितने भाजपाईयों को किनारे किया जायेगा या नेस्तनाबूद किया जायेगा!

suresh maheshwari
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सही कहा. जब भाज्पा मे शत्रुघन सिन्हा जैसे थालि के बैगन और बे पैन्दी के लोते है तब कोन्ग्रेस् को
हार् ने कि फिक्र नही होनि चहिये

सुरेश माहेश्वरी

mahendra gupta
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ये भा ज पाई खुद ही लड़ भिड कर खेत हो जायेंगे.जब तक चुनाव आयेंगे तब तक ये इतने थक चुके होंगे कि कांग्रेस को कुछ भी करने की जरूरत नहीं पड़ेगी.

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