लेखक परिचय

प्रवीण गुगनानी

प्रवीण गुगनानी

प्रवीण गुगनानी, दैनिक समाचार पत्र दैनिक मत के प्रधान संपादक, कविता के क्षेत्र में प्रयोगधर्मी लेखन व नियमित स्तंभ लेखन.

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इस बात से कोई अबोध भी इनकार नहीं कर सकता कि इस देश में हिन्दू शब्द के प्रयोग पर वितंडा या बवाल केवल तभी उठता है जब इस शब्द का उच्चारण कोई हिंदूवादी व्यक्ति कर ले. यदि हिन्दू शब्द या इस टर्म का उपयोग कोई तथाकथित सूडो सेकुलर या अन्य व्यक्ति कर ले तो उसे बुद्धिजीवी या इंटेलेक्चुअल कहा जाता है फिर भले ही उसकी बात कितनी ही बर्बर और मध्युगीन क्यों न हो. अब जबकि आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने कहा है कि अगर इंग्लैंड में रहने वाले अंग्रेज हैं, जर्मनी में रहने वाले जर्मन हैं और अमेरिका में रहने वाले अमेरिकी हैं तो फिर हिन्दुस्तान में रहने वाले सभी लोग हिन्दू क्यों नहीं हो सकते, सभी भारतीयों की सांस्कृतिक पहचान हिंदुत्व है और देश में रहने वाले इस महान सस्कृति के वंशज हैं. उन्होंने चिरंतन-पुरातन उदार हिंदुत्व की भाषा में कहा कि हिंदुत्व एक जीवन शैली है और किसी भी ईश्वर की उपासना करने वाला अथवा किसी की उपासना नहीं करने वाला भी हिंदू हो सकता है तब इस पर भी अनावश्यक विवाद-वितंडा “प्रायोजित” कर दिया गया है. कौन बुद्धिजीवी और इंटेलेक्चुअल है जिसनें संघप्रमुख के इस उदार की व्याख्या और प्रशंसा की हो या उन्हें पुनरुद्दरित किया हो. जब हिन्दू शब्द से मूंह टेढ़ा करनें वालों की बात करें तो कुछ दिन पूर्व कि इनकी बुद्धिहीनता,बर्बर,विवेकहीन या अन्धें बहरे होनें शुतुर्मुगी आचरण याद आता है- स्मरण करिए कि पिछले ही सप्ताह जब गोवा के उप मुख्यमंत्री फ्रांसिस डिसूजा ने कहा था कि मैं एक हिन्दू ईसाई हूँ तब भी इस हिन्दू शब्द से भड़कने और मूंह टेढ़ा करनें वाली इस प्रजाति ने ऐसा ही व्यवहार किया था. प्रश्न है कि यदि फ्रांसिस डिसूजा ने कहा कि मैं इसाई हिन्दू हूँ तो उन्होंने उस हिन्दू शब्द का प्रयोग किया जिसे इस देश के दसाधिक उच्च न्यायालयों और उच्चतम न्यायालय ने हिन्दू शब्द को असाम्प्रदायिक करार देते हुए एक जीवन पद्धति ठहरा दिया है. तब इस देश के ये बुद्धिजीवी उस व्यक्ति की धार्मिक स्वतंत्रता के सन्दर्भ में मध्ययुगीन,बर्बर और आदि मानव जैसी बात क्यों कर रहे थे? यदि फ्रांसिस डिसूजा ने स्वयं को इसाई हिन्दू कहा तो उन्होंने उनकी संविधान प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता का उपयोग किया तब उनकी इस स्वतंत्रता पर टिप्पणी और उसका हनन अपराध कहलाया था या नहीं? इस देश के बुद्धिजीवी और इंटेलेक्चुअल्स को तब सांप क्यों सूंघ गया था जब फ्रांसिस डिसूजा के मामलें में इस देश के एक राजनैतिक दल ने गोवा चर्च से सार्वजनिक बयान में कहा था कि फ्रांसिस डिसूजा को वे धर्म से निष्काषित कर दें या उनसे स्पष्टीकरण मांगें कि वे ईसाई हैं या हिन्दू? क्या इस देश के मतिभ्रमित मीडिया को एक संविधान बद्ध राजनैतिक दल का इस प्रकार चर्च से संवाद और उसे किसी व्यक्ति के निष्कासन का परामर्श करना सेकुलर लगता है?
इस देश में आज जो संघ सर संघ चालक के हिन्दू शब्द प्रयोग पर लाठी पीट रहे हैं उन नव बुद्धिजीवियों की बुद्धि तब कहाँ गई थी जब दो वर्ष पूर्व इस देश के एक निर्वाचित मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने यह कहते हुए साम्प्रदायिकता फैलाई और सामाजिक वातावरण विषैला करनें का प्रयास किया था कि इस देश का प्रधानमन्त्री कोई हिंदूवादी व्यक्ति नहीं बन सकता!! आज जो मीडिया संस्थान,नेता,बुद्धिजीवी संघ प्रमुख के “हिन्दू” शब्द पर सवाल उठा रहें हैं उनमें से किसी एक ने भी उस समय मुख्यमंत्री के संवैधानिक दायित्व का निर्वहन कर रहे व्यक्ति पर कोई प्रश्न उठानें या आक्षेप करनें जैसा पुण्यकर्म नहीं किया था!! आज मोहन भागवत द्वारा “हिन्दू” शब्द के सकारात्मक उपयोग करनें पर उन्हें संविधान अध्ययन का परामर्श देनें वाले ही थे जो तब तो चहक चहक उठे थे!! अब आज वे स्वयं अपनें विवेक से पूंछे कि संविधान का उनका ज्ञान उस दिन तेल लेनें कहाँ गया था? निपट राजनीति करते हुए जब कुछ लोग हिन्दू शब्द का उपयोग इस देश के मूल निवासियों को छेड़ने और उत्तेजित और भावनाओं को साशय आहत करनें के लिए करतें हैं तब कथित मीडिया का उत्तरदायित्व जानें क्यों कोमाग्रस्त हो जाता हैं? इस देश में हिन्दू शब्द को स्वाभिमान से उच्चारित करनें की स्वतंत्रता का निरंतर हनन करते मीडिया को समझना और जानना होगा कि किसी हिंदूवादी,संघी,भाजपाई ने अब तक यह तो नहीं कहा कि कोई मुस्लिमवादी या इसाईवादी इस देश का प्रधानमन्त्री नहीं बन सकता है!! जिम्मेदार लोगों के इस प्रकार के हिंदु विरोधी मुखर आचरण से लगनें लगा है कि कि हिन्दुत्ववादी होना कोई अपराध हो गया है!! इस आचरण से देश के भोले भाले करोड़ों हिन्दुओं को यह भी लगने लगा था कि हिन्दुत्ववादी होने से उन्हें या उनकी संततियों को किसी संवैधानिक राजनैतिक पद पर आसीन होने का अवसर नहीं मिल पायेगा!!! ये तो अच्छा हुआ कि भ्रम तत्काल ही दूर हो गए और एक स्वघोषित हिन्दू राष्ट्र वादी व्यक्ति इस देश की जनता ने प्रधानमन्त्री चुन लिया!
आज मोहन भागवत की हिंदूवादी टिपण्णी या तर्क पर ऊंगली उठा रहा व्हाईट कालर्ड वर्ग स्मरण रखें कि संघ की हिन्दू अवधारणा ऊपर से टपकी नहीं है बल्कि विधिजन्य है. संविधान निर्माताओं ने इस बात को स्पष्ट रूप से समझा था कि इस देश की और इसके रहवासियों की आत्मा हिंदुत्व में बसती है और पारिभाषिक रूप से यह भारत वस्तुतः हिन्दुस्तान ही है. संविधान की रूपरेखा भी विभिन्न प्रकार से इस तथ्य को सम्पुष्ट करती-कहती है कि हिंदुत्व एक धर्म या सम्प्रदाय नहीं बल्कि एक जीवन शैली है. इसीलिए धर्म की स्वतन्त्रता के मौलिक अधिकारों की गारंटी देते हुए अनुक्छेद 25 में खंड (2)के उपखंड (ख) में स्पष्ट किया गया है कि हिंदू के अंतर्गत अन्य बहुत से धर्मावलंबी भी समावेशित व समाहित होते है. महात्मा गांधी से लेकर महामना, लोकमान्य और अनेकों नेताओं ने इस पुनीत संवैधानिक तथ्य में प्रारम्भ में ही प्राण प्रतिष्ठित कर दिए थे. हिंदुत्व शब्द के इस अर्थ से इन इतिहास हंताओं को भान हो जाना चाहिए कि हिन्सायाम दुस्य्ते या सा हिंदू अर्थात जो अपने मन वचन कर्मणा से हिंसा से दूर रहे वह हिंदू है. यहाँ हिंसा की परिभाषा को भी समझे जो कर्म अपने हितों के लिये दूसरों को कष्ट दे वह हिंसा है. इतने व्यापक ब्रह्माण्ड सदृश शब्द हिंदू”को इस देश का तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग और छदम धर्मनिरपेक्षता वादी लोग क्यों राजनैतिक बलिवेदी पर टांगें खड़े हैं? यह अबूझ ही है!! स्वाभाविक है कि पिछले दशकों से चला आ रहा तुष्टिकरण की राजनीति का झमाझम दौर एकाएक समाप्त नहीं हो सकता है!!! तुच्छ और स्वार्थी विचारों से हिन्दू विरोध की राजनीति कर रहे राजनीतिज्ञों,नव बुद्धिजीवियों,मीडिया संस्थानों और दलों का अस्तित्व संकट में पड़ जाएगा यदि उन्होंने लोकमान्य तिलक द्वारा दी गई हिंदुत्व की परिभाषा को नहीं समझा! लोकमान्य ने कहा था कि –
असिंधो सिन्धुपर्यंत यस्य भारत भूमिका
पितृभू पुण्यभूश्चेव स वै हिंदू रीति स्मृतः
-अर्थात जो सिंधु नदी के उद्गम से लेकर हिंद महासागर तक रहते है व इसकी सम्पूर्ण भूमि को अपनी मातृभूमि पितृभूमि पुण्यभूमि मोक्षभूमि मानते है वे हिंदू है.
आरएसएस प्रमुख की बात पर उन्हें संविधान अध्ययन का परामर्श देनें वाले ये तथाकथित नव बुद्धिजीवी और सेकुलर यदि वेदों,विद्वानों,राष्ट्र पुरुषों के हिन्दू आख्यानों को नजरअंदाज भी कर दें तो वे संयुक्त राष्ट्र संघ की इस परिभाषा से भारत यानि हिन्दुस्तान के हिन्दू राष्ट्र होनें को विलग करके बताएं. यूएनओ द्वारा दी गयी राष्ट्र की परिभाषा इस प्रकार है: एक ऐसा क्षेत्र जहाँ के अधिकांश लोग एक सामूहिक पहचान के प्रति जागरूक हों और एक सामूहिक संस्कृति साझा करते हों इस परिभाषा के अनुसार राष्ट्र के लिये आवश्यक घटक हैं: एक भौगोलिक क्षेत्र जिसमें कुछ लोग रहते हों उस क्षेत्र के(अधिकांश)निवासियों की एक साझा संस्कृति हो उस क्षेत्र के निवासी अपनी विशिष्ट सामूहिक पहचान के प्रति जागरूक हों और वहां एक पूर्ण स्वतंत्र राजनैतिक तंत्र स्थापित हो. इन सब तथ्यों और अर्थों के आलोक में यदि आज इस देश के एक सौ दस करोड़ लोगों को लगता है कि मोहन भागवत सही कह रहें हैं तो कृपया अन्य सोच रखनें वालें व्यक्ति या समूह चुप ही रहें तो उचित होगा अन्यथा वे इतिहास के गाल में नहीं बल्कि कबाड़ में बैठे नजर आयेंगे.

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1 Comment on "संविधान और लोक सम्मत है संघ प्रमुख का हिन्दू आग्रह"

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परशुराम कुमार
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परशुराम कुमार

अब भी इन लोगों को काल कलवित कबाड़ में नहीं मानेगे तो कहाँ मानिएगा ? 20साल बाद इनके (मैकाले पूत्रों के )भेजा में घुसेगा क़ि भारत ;हिन्दुस्थान ;आर्यावर्त;में रहने वाले क्या कहलाएंगे

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