लेखक परिचय

डा.राज सक्सेना

डा.राज सक्सेना

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maa sकण-कण तन का उज्ज्वल करदे |
एक नवल तेज, अविकल  करदे |
माँ सरस्वती आ,    कंठ समा,
मन-मस्तक को अविरल करदे |
वाणी में मधु की,    धार बहा |
हो सृजनशील,  मस्तिष्क महा |
हर शब्द बने,  मानक जग में,
हर रचना को,  इतिहास बना |
जन की जिव्हा पर,   नाम चढ़े,
इतना मधुमय, अविचल करदे |
माँ सरस्वती आ,     कंठ समा,
मन मस्तक को अविरल करदे |
हो सृजित नया, जन के मन का,
हर शब्द लगे, नव उपवन का |
परिपूरित,      अद्भुत गंधों से,
वैकुण्ठ लोक के,   मधुवन सा |
रचना में,     श्रेष्ट समन्वय  हो,-
हर शब्द दिव्य-परिमल करदे |
माँ सरस्वती आ,     कंठ समा,
मन मस्तक को अविरल करदे |
                 -डा. राज सक्सेना

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1 Comment on "माँ सरस्वती"

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आर. सिंह
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उत्कृष्ट सरस्वती वंदना.

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