लेखक परिचय

संजय स्‍वदेश

संजय स्‍वदेश

बिहार के गोपालगंज में हथुआ के मूल निवासी। किरोड़ीमल कॉलेज से स्नातकोत्तर। केंद्रीय हिंदी संस्थान के दिल्ली केंद्र से पत्रकारिता एवं अनुवाद में डिप्लोमा। अध्ययन काल से ही स्वतंत्र लेखन के साथ कैरियर की शुरूआत। आकाशवाणी के रिसर्च केंद्र में स्वतंत्र कार्य। अमर उजाला में प्रशिक्षु पत्रकार। दिल्ली से प्रकाशित दैनिक महामेधा से नौकरी। सहारा समय, हिन्दुस्तान, नवभारत टाईम्स के साथ कार्यअनुभव। 2006 में दैनिक भास्कर नागपुर से जुड़े। इन दिनों नागपुर से सच भी और साहस के साथ एक आंदोलन, बौद्धिक आजादी का दावा करने वाले सामाचार पत्र दैनिक १८५७ के मुख्य संवाददाता की भूमिका निभाने के साथ स्थानीय जनअभियानों से जुड़ाव। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के साथ लेखन कार्य।

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-संजय स्वदेश-
monsoon

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यह पहला ऐसा मौका नहीं है जब मानसून ने दगाबाजी की हो। आजाद भारत में दर्जनों बार सूखा पड़ा। लेकिन इससे न कोई सबक लिया गया और न ही इससे निपटने कोई ठोस और सार्थक तैयारी ने मूर्त रूप लिया। मौसम विभाग इस बात का आश्वासन दे रहा है कि जून में हुई बारिश की कमी की भरपाई अगस्त में हो जाएगी। लेकिन अगस्त तक ऐसी राहत रामचरितमानस की पंक्ति-का बरखा जब कृषि सुखानी को चरितार्थ करती है।
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असाढ़ के दिनों में झमाझम बारिश से तरबतर होते जनजीवन के दृश्यों से साहित्य संसार समृद्ध है। लेकिन व्यवहारिक धरातल पर 21वीं सदी के असाढ़ का मूड़ कुछ अलग है। बीते जून में शेयर बाजार का सूचकांक कुलांचे भरता रहा। इसी महीने के अंतिम दिनों में असम भीषण बारिश के बाद बाढ़ से कराह उठा। लगातार बारिश और बाढ़ से करीब दजर्न भर लोग अकाल काल के ग्रास बन गए। वहीं देश का पश्चिमी हिस्सा आधा असाढ़ गुजरने के बाद भी बारिश की बाट जोह रहा है। मानसून दगा दे गया। जिस आषाड़ में जब तक देश को तरबतर हो जाना चाहिए था, वहां इंद्रदेव के मेघों ने आधी मेहरबानी भी नहीं दिखाई। मानसून के शुरुआती बौछार से अन्नदाता किसान के चेहरे की रौनक बढ़ा दी थी। उम्मीद में किसानों ने खोतों की निराई, बुआई भी कर दी। लेकिन अब पश्चिमी भारत के करीब बीस लाख किसान बारिश की बाट जोहते हुए भविष्य की चिंता में डूब गए हैं। फसल तैयार होने से पहले बीज धरती के गर्भ में ही चौपट हो रही है। इधर केंद्र सरकार ने भी यह घोषणा कर दी कि देश के कुछ हिस्सों में इस बार सूखा पड़ सकता है। महंगाई की मार झेल रही जनता को सरकार ने अगाह कर दिया कि हमे सूखे को लेकर तैयार रहना चाहिए।

संयुक्त राष्ट्र नेशनल ओसियनिक एंड एटमोस्फोरिक एडमिनिस्ट्रेशन के आंकड़ों के अनुसार इस वर्ष मई माह इतिहास में सबसे गर्म रहा है। धरती तपती रही। धरती और समुद्र का औसत तापमान 0.74 सेल्सियस अधिक रहा। 20वीं सदी में यह तापमान औसतन 14.8 सेल्सियस रिकॉर्ड किया गया था। इस भीषण गर्मी के बाद मानसून से राहत की उम्मीद थी। लेकिन जून महीने में बारिश के आंकड़ों पर नजर डाले तो पता चलता है कि जून माह में 100 मिमी से कम बारिश केवल दो साल हुई है, लेकिन वह भी इस वर्ष के आंकड़े 43.4 मिमी से अधिक ही रही। 2009 में जून माह में 85.7 मिमी और 1926 में 97.2 मिमी बारिश हुई थी। पिछली सदी में जून माह में सबसे कम बारिश 1905 में हुई थी, जो महज 88.7 मिमी रही थी। कुल मिलाकर अब तक करीब सामान्य से 45 फीसदी कम बारिश हुई है। यह पहला ऐसा मौका नहीं है जब मानसून ने दगाबाजी की हो। आजाद भारत में दर्जनों बार सूखा पड़ा। लेकिन इससे न कोई सबक लिया गया और न ही इससे निपटने कोई ठोस और सार्थक तैयारी ने मूर्त रूप लिया। बड़े-बड़े डैम बने तो उसके दरवाजे तब खुलते हैं, जब पानी की जरूरत नहीं होती है। महाराष्ट्र में हजारों एकड़ जमीन में कपास, सोयाबीन और दूसरी फसलें बो चुके किसान वर्षा के अभाव में नुकसान को लेकर डरे हुए हैं। किसानों ने मानसून की आहट से ही जून महीने की शुरुआत में बुआई के साथ ही उर्वरक और कीटनाशकों का भी खेतों में छिड़काव कर दिया था। अनेक किसानों ने यह कार्य भारी भरकम कर्ज लेकर किया है। अब उनके आंखों के सामने फसल चौपट होने के साथ कर्ज में डूबने का अंधकारमय भविष्य नजर आने लगा है। हालांकि मौसम विभाग इस बात का आश्वासन दे रहा है कि जून में हुई बारिश की कमी की भरपाई अगस्त में हो जाएगी। लेकिन अगस्त तक ऐसी राहत रामचरितमानस की पंक्ति-का बरखा जब कृषि सुखानी को चरितार्थ करती है।

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