लेखक परिचय

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

‘नेटजाल.कॉम‘ के संपादकीय निदेशक, लगभग दर्जनभर प्रमुख अखबारों के लिए नियमित स्तंभ-लेखन तथा भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष।

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ऐसा लगता है कि अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की भारत यात्रा आशा से अधिक सफल रही, क्योंकि उनकी यात्रा से बहुत आशाएं किसी ने नहीं लगा रखी थीं। भारत सरकार को भी पता नहीं था कि सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता को लेकर वे क्या कहेंगे या भारत को वे विश्व परमाणु शक्ति के रूप में मान्यता देंगे या नहीं।

यह भी ठीक से पता नहीं था कि आतंकवाद पर पाकिस्तान की भूमिका के बारे में वे भारत में अपना मुंह खोलेंगे या नहीं। ऐसा नहीं लगता था कि वे राष्ट्रपति जॉर्ज बुश की बराबरी कर पाएंगे, लेकिन भारत की संसद में उन्होंने जो जोशीला भाषण दिया,

उन्होंने और उनकी पत्नी मिशेल ने सार्वजनिक हेल-मेल की जो कोशिश की और भारत को उदीयमान नहीं, उदित महाशक्ति घोषित किया आदि ने ऐसा मनमोहक वातावरण बना दिया कि उनकी यात्रा से भारत गदगद हो गया। लेकिन यदि जरा गहरे उतरें तो मालूम पड़ेगा कि इस यात्रा से अधिक लाभ अमेरिका को हुआ है।

सबसे पहले सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता को लें। क्या अमेरिका के कहने से भारत को स्थायी सदस्यता मिल जाएगी? क्या संयुक्त राष्ट्र संघ अमेरिका की कोई प्रांतीय विधानसभा है? संयुक्त राष्ट्र संघ में अमेरिका की हैसियत वही है, जो अन्य वीटोधारी सदस्यों की है।

जब तक पांचों वीटोधारी सदस्य एकमत से भारत का समर्थन नहीं करेंगे, भारत सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य नहीं बन सकता। अभी भी चीन और रूस तो इस मुद्दे पर हकला रहे हैं। दो टूक राय जाहिर नहीं कर रहे हैं।

ओबामा ने भी भारत के बारे में गोलमाल शब्दावली का प्रयोग किया है। उन्होंने कहा है कि ‘आगे आने वाले वर्षो में मैं ऐसी बदली हुई सुरक्षा परिषद देखना चाहता हूं, जिसमें भारत स्थायी सदस्य बन सके।’ भारत के मुकाबले इसी मुद्दे पर मार्च 2005 में बुश की विदेश मंत्री कोंडोलीजा राइस ने जापान के बारे में कहा था कि अमेरिका ‘संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद में जापान की स्थायी सदस्यता का स्पष्ट समर्थन करता है।’

यहां असली प्रश्न यह है कि संयुक्त राष्ट्र का सुधार कब होगा और कैसे होगा और उसमें भारत की स्थायी सीट के लिए पता नहीं क्या-क्या अड़ंगे लगेंगे? चीन और पाक तो अभी से टांग खींचने में लगे हुए हैं। चीन के वुहान में भारत, रूस, चीन के सम्मेलन में जो संयुक्त विज्ञप्ति जारी हुई, उसमें भी इस मुद्दे पर कन्नी काट ली गई है।

जहां तक अमेरिका का सवाल है, उसके उच्च अधिकारियों ने ओबामा की घोषणा के पहले और बाद में भी यह साफ-साफ बता दिया है कि यदि भारत जैसे देशों को सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट मिलेगी तो भी उन्हें वीटो का अधिकार नहीं मिलेगा। ऐसी नख-दंतहीन सीट लेकर भारत क्या करेगा?

ओबामा की घोषणा से भारत का दावा जरूर मजबूत हुआ है, लेकिन जो निचुड़ा हुआ नींबू अमेरिका भारत को थमाना चाहता है, वह भारत के किस काम का है? अमेरिका ने पिछले कुछ हफ्तों में यह भी साफ-साफ कहा है कि वह अगले दो साल तक सुरक्षा परिषद में भारत के आचरण पर निगरानी रखेगा कि वह अमेरिका का कहां तक समर्थन करेगा।

यह काफी अपमानजनक शर्त है। इसी प्रकार भारत को वास्तविक महाशक्ति कह देना अतिथि की विनम्रता ही है। शिष्टाचारभर है। वरना क्या वजह है कि म्यांमार और ईरान पर ओबामा भारत को उपदेश दे गए और भारत ने इराक, फलस्तीन, ईरान और अफगानिस्तान में की जा रही अमेरिकी ज्यादतियों के बारे में मुंह भी नहीं खोला?

अभी भारत विश्वस्तरीय महाशक्ति तो क्या, दक्षिण एशिया की महाशक्ति भी नहीं बना है। यदि बना होता तो वह खुद से पूछता कि अफगानिस्तान किसकी जिम्मेदारी है? अमेरिका की या भारत की? यदि भारत सचमुच विश्व शक्ति होता तो क्या अभी तक वह अफगानिस्तान को लंगड़ाते रहने देता? अमेरिका की भोंदू नीतियों के चलते वहां तालिबान को पनपने देता? आश्चर्य है हमारी सरकार ने ईरान और म्यांमार के बारे में हमारी व्यावहारिक नीति से ओबामा को परिचित क्यों नहीं करवाया?

पाकिस्तान में पनप रहे आतंकवाद के विरुद्ध बोलकर और ताज होटल में ठहरकर ओबामा ने स्पष्ट संदेश दिया है। लेकिन किसको दिया है? यह पाकिस्तान को नहीं दिया है। अमेरिकी जनता को दिया है। ताज होटल और यहूदी घर में मरे अमेरिकी नागरिकों के जरिये ओबामा ने अमेरिकी जनता की नब्ज पर अंगुली रखी है।

इससे पाकिस्तान को क्या सबक मिला? ओबामा ने जो दिल्ली में कहा, वह दर्जनोंबार वॉशिंगटन में कह चुके हैं। पाक को सबक तो तब मिलता, जब वे उसकी फौज और आईएसआई का हुक्का-पानी बंद करने की घोषणा करते। इन दोनों संस्थाओं ने पाकिस्तानी लोकतंत्र का गला घोंट रखा है और ये ही दो संस्थाएं तालिबान की अम्मा हैं।

उनकी भारत यात्रा ने पाकिस्तान के साथ अमेरिका के संबंधों में रत्तीभर भी फर्क नहीं डाला है। जहां तक भारत को परमाणु शक्ति का दर्जा देने का सवाल है, उसमें भी भारत को कौन-सी विशिष्टता मिली है। जैसे इजरायल और पाकिस्तान, वैसा भारत। यानी अब पांच परमाणु शक्तियां भारत से नहीं, इजरायल और पाकिस्तान से भी खुलकर बात करेंगी।

यह ठीक है कि भारत की तरह इजरायल और पाकिस्तान ने भी परमाणु अप्रसार संधि पर दस्तखत नहीं किए थे, लेकिन क्या इनके परमाणु हथियार अवैध तरीके से नहीं बनाए गए हैं? क्या ये उद्दंड राष्ट्र (रोग स्टेट्स) की श्रेणी में नहीं हैं? भारत को इनकी पंगत में बिठाना कहां तक उचित है?

ओबामा ने भारत को दोहरी तकनीक देने और परमाणु संबंधी चार अंतरराष्ट्रीय संगठनों की सदस्यता दिलाने की बात कहकर प्रसन्न जरूर किया है, लेकिन इस सुखद प्रदाय में दो पेंच हैं। एक तो क्या यह सुविधा इजरायल और पाकिस्तान को भी मिलेगी? दूसरा इससे भारत से ज्यादा लाभ उन देशों का होगा, जो अपना परमाणु माल भारत को बेचेंगे।

इसमें संदेह नहीं है कि ओबामा की इस भारत यात्रा से अमेरिका और भारत के द्विपक्षीय संबंध मजबूत हुए हैं। ओबामा और उनकी पत्नी ने जनसंपर्क के सभी गुर भारत में आजमाए हैं। बच्चों के साथ नाचने, हिंदी के कुछ शब्द बोलने, गांधी, विवेकानंद, आंबेडकर आदि का स्मरण करने और भारत के नेता और अन्य लोगों के साथ अनौपचारिक हेल-मेल ने ओबामा की यात्रा को अत्यंत प्रभावपूर्ण और चमत्कारी जरूर बनाया है, लेकिन इस एक यात्रा से उन्होंने अपने दो शिकार एक साथ किए हैं।

एक तो लगभग 20 व्यापारिक समझौते किए, जिससे अमेरिका को एक ही झटके में लगभग 45 हजार करोड़ के सौदे मिल गए। इससे भी बड़ा दूसरा फायदा यह हुआ कि इन सौदों से पैदा होने वाली ५क् हजार नई नौकरियां ओबामा के लिए नकद चेक सिद्ध होंगी।

वे इसे अपनी घरेलू राजनीति में भुनाएंगे। अमेरिकी अखबार भी इसे ही ओबामा की सबसे बड़ी उपलब्धि मान रहे हैं। उनकी भारत यात्रा को अमेरिकी अखबार अन्य तीन देशों की यात्रा के मुकाबले बेजोड़ बता रहे हैं, क्योंकि अमेरिका जैसे पूंजीवादी राष्ट्र में डॉलरानंद ही ब्रमानंद माना जाता है। उन अखबारों का मानना यह भी है कि ओबामा ने भारत को शब्दों की चाशनी चटाई है, जबकि अमेरिका के लिए वे सगुण-साकार मक्खन बिलो लाए हैं।

 – वेदप्रताप वैदिक

लेखक भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष हैं।

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