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संजय चाणक्य

संजय चाणक्य

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Kargil Vijay Diwas 26 julyसंजय चाणक्य

 

‘‘ सीने में जूनून आखों में देशभक्ति की चमक रखता हू!

दुश्मन की सासें थम जाए आवाज में वो धमक रखता हू!!’’

आज से सत्रह साल पहले ‘आपरेशन विजय’ के तहत हमारे देश के वीर जवानों ने खून जमा देने वाली सर्द हवाओं के बीच कारगिल और द्रास की बर्फीली चोटियों पर कब्जा कर बैठें घुसपैठियों के रूप में पाकिस्तानी सैनिको को छठ्ठी का दूध याद दिलाते हुए अपनी मातृभमि से खदेड़ कर तिरंगा फहराया था। हमारें देश के जवानों ने सीने पर गोली खाकर पाकिस्तानियों को उनकी औकात दिखाई थी। मां भारती की आन,बान और शान के लिए हिन्द के 533 रणबाकुरों ने हंसते-हंसते वीरगति को प्राप्त कर लिया था। किन्तु नियंत्रण रेखा से भगौडो को खदेड़ कर ही दम लिया,पीठ नही दिखाये! इस दरम्यान न जाने कितनी मा के कोख सुने हो गए, कितनों के मांग की सिन्दूर घूल गया, न जाने कितने बहने अपने भाई की कलाई से मरहुम हो गई तो कितनों के सिर से पिता का साया उठ गया। उस समय भले ही देश के उन वीर शहीदों के परिवारो को तमाम सुविधाएं दी गई हो परन्तु आज भी उन वीरंगनाओं के सीने में कहीं न कही पति, बेटा और भाई को खोने का दर्द छिपा हुआ है। जिस पर आज तक हमारे देश के नीति-नियंताओं ने कभी मरहम रखने का प्रयास नही किया। अब यही देख लिजिए न! पिछले सात वर्ष पूर्व 26 जुलाई को कारगिल युद्ध के एक दशक पूरा होने पर द्रास में कारगिल योद्धाओं की याद में विजय दशमी मनायी गई। किन्तु उसके बाद इस देश का दुभाग्य यह रहा कि देश के नेताओं को सरहद की रक्षा करने वाले नायकों की वर्षगाठ में जाने की फुर्सत नही मिली ,धिक्कार है ऐसे स्वार्थी लोगों पर जिन्हे राष्ट के नायको की शहादत में शामिल होने के लिए फुर्सत नही मिला। हिन्दवासियों आइए हम सब मिलकर भारत मां के उन सपूतों को नमन करे। उन बीर शहीदों को कोटिशः नमन। इन योद्धाओं को जन्म देने वाली मा को कोटि कोटि प्रणाम! ‘‘ तुझे सलाम ’’!

‘‘ करता हू भारत मां से गुजारिश कि

तेरी भक्ति के सिवा कोई बंदगी न मिले!

हर जन्म मिले हिन्द की पावन धरा पर

या फिर कभी जिन्दगी न मिले !!’’

आपको याद होगा………! 6 मई वर्ष 1999 को कारगिल के वर्फ से ढके क्षेत्र में हमारे देश के बीर जवान गश्ती कर रहे थे,तभी उन्हे काला कोट पहिने नियंत्रण रेखा पर चहलकदमी करते हुए कुछ लोग दिखाई दिए। 7 मई को भरतीय सैनिक उनकी खोज में लग गये और आगें बढ़े। कि अचानक उन कायरों ने पीछे से बमबारी शुरू कर दिया। 8 मई को यह पता लग गया कि ये कोई और नही बल्कि हर बार पीठ बार कर उल्टे पाव पीठ दिखाकर भागने वाले घुसपैठियों के वेष मे कोई और नही पाकिस्तानी सैनिक है। उसके बाद पता चला कि ये पाकिस्तानी सैनिक द्रास, मशकोह, टाइगर हिल आदि स्थानों पर बंकर बनाकर छिपे हुए है। यह घुसपैठी नियंत्रण रेखा से पांच-छह किमी अन्दर भारतीय सीमाओं में प्रवेश कर चुके थे इनको पाकिस्तान द्वारा मशीन, मोर्टार एवं अन्य संवेदनशील शस्त्र के साथ-साथ पाक सेना के तोपखाने,वर्फ पर चलने वाले वाहन और हेलीकापटर भी प्राप्त थे। इतना ही नही ये घुसपैठी जमीन से हवा में मार करने वाली स्टिंगर मिसाइलो से भी लैस थे। जो हमारी मातृभूमि की सीमाओं को पार कर पन्द्रह हजार से उन्नीस हजार फीट उॅंची चोटियों पर मौर्चा सम्भाले बैठे हुए थे। उसके बाद शुरू हुआ वह जंग जो इसके पहले कभी नही हुआ था! ‘‘आपरेशन विजय’’ अपने आप में अनोखा था। इसके पहले हिन्द के योद्वाओं ने बहुत से लड़ाई लड़ी किन्तु यह लड़ाई बहुत कठिन था। हजारों फीट उपर छिपे हुए दुश्मनों का सामने से आकर निशाना लगाना कम जोखिम से भरा नही था। इसके बावजूद भारतीय सैनिक पीछे नही हटे,दुश्मनों का जमकर मुकाबला किया और उन्हे पीठ दिखाकर भागने के लिए मजबूर कर दिया!

कारगिल टेढ़ी-मेढ़ी चट्टानों का बर्फीला रेगिस्तान है,जहां हमारे देश के वीर योद्वा दुश्मनों का मुकाबला कर रहे थे। पन्द्रह हजार से उन्नीस हजार फीट तक विषम उची पहाड़िया ,जहां की हवा मे आक्सीन की कमी के कारण सांस लेना भी दूभर होता है,जहां घूप खिलने पर भी तापमान 2 डिग्री से उपर नही होता। हांड कपकपाने वाली ठण्ड मे तापमान शून्य नही बल्कि तीस से साठ़ डिग्री नीचे रहता है और तेज हवा चाकू की तरह काटती है। शीत से खुद को बचाने के लिए सौनिको को कम से कम सात पर्तो वाले वस्त्र पहनने पड़ते है। पहाड़ियों के चढ़ाई पर अपना पसीना बर्फ में बदल कर त्वचा पर खुजली करने लगता है, त्वचा लाल हो जाती है। जिन पहाड़ियों पर कब्जा पाने के लिए भारतीय सैनिक युद्व कर रहे थे सामान्यतः साठ से अस्सी अंश की खड़ी चढ़ाई थी वीर योद्धा सरहद की हिफाजत के लिए जान जोखिम में डालकर एक-दुसरे के कमर में रस्सी बांधकर एक-दुसरे को सहारा देते हुए उपर चढ़ते थे और उपर से दुश्मन बम की वर्षा करते थे। आक्सीजन की कमी के कारण जहां माचीस भी नही जल पाती थी जहा दस-पन्द्रह कदम चलने पर ही सांस फूलने लगता था, बावजूद इसके मां भारती के सपूतो ने अपने प्राणों की आहुति देते हुए आगे बढ़े और दुश्मनों को खदेड़कर चोटी पर तिरंगा लहराया! यह कैसी विडम्बना है कि भारत मां के उन सपूतो को याद करने के लिए हमारे पास वक्त नही है। हमारे शरीर का रोम-रोम जिसका कर्जदार है उनकी वर्षगाठ मनाने की फुर्सत हम हिन्दवासियों को नही है। सोचिए…. हम कितने स्वार्थी हो गए है! कारगिल युद्ध में शहीद हुए योद्धाओं की वर्षगाठ पर तो देश के कोने-कोने में गांव-गांव में श्रद्धांजली अर्पित करनी चाहिए थी, लेकिन हम स्वार्थी लोगों ने ऐसा कुछ नही किया।

‘‘ कभी ठण्ड में ठिठुर कर देख लेना !

कभी तपती धूप में जलकर देख लेना!!

कैसे होती है हिफाजत मूल्क की !

कभी सरहद पर चलकर देख लेना !!’’

जरा विचार कीजिए…..! क्या सिर्फ शहीदो के नाम पर चैक-चैराहे का नाम रखकर उनकी मूर्ति स्थापित कर शहीदो की कुर्बानी का कर्ज चुकाया जा सकता है। आखिर कब तक सिर्फ गिने-चुने दिनों पर उन्हे याद किया जायेगा। जिनके बदौलत हम हिन्दुस्तानी खुद को आजाद कहते है,जिनके रहमोकरम पर हम हर दिन , हर घण्टे और पल सांस लेते है जिनके बदौलत सूर्य ढलने के बाद हम खुद को महफूज होकर इस लिए सो रहे होते है कि सरहद पर मां भारती के जवान टकटकी लगाये दुश्मनों की हरकतो पर मुहतोड जबाब देने के लिए हर वक्त तैयार बैठे है ऐसे में उन्हे याद भी करते है तो सिर्फ-गिने चुने लोग वह गिने-चुने दिन। यह कैसी विडम्बना है जिनकी बहादूरी के किस्से कहते हमारे जुबान नही थकते, जिनकी बहादूरी पर हम हिन्दुस्तानी इतराते है चाहे वह कारगिल के सैनिक हो या महासंग्राम के योद्वा उन्हे साल में एक निश्चित दिन नही बल्कि हर दिन याद करने की जरूरत है!

‘‘ आजादी क्या होती है कोई क्या जाने, !

न अपनो को खोया न कोई किमत चुकाई ।।

अंगेंजों ने ऐसे बाटां दो टुकड़ों हमे ।

कि शहीदो को ही भूल गए लाज न आई’ ।। ’’

!! जय हिन्द , जय मां भारती !!

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