लेखक परिचय

अशोक मालवीय

अशोक मालवीय

लेखिका स्वेतंत्र टिप्प णीकार हैं।

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अशोक मालवीय

रात के अंधेरे में ट्रक में सैकड़ों बोरे भरा सड़ा गेहूं प्रशासन व जिम्मेदार विभाग ने भोपाल-बैतूल 67 नेशनल हाइवे रोड के किनारे इटारसी के पास बागदेव के घने जंगल में फेंककर ऊपर से काली मिट्टी डालकर दबा दिया। वहीं दूसरी ओर एक खबर यह भी है कि प्रदेश सरकार बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को गेहूं खरीदने की खुली छूट देने के लिये पीले चावल डालने पर उतारू है। किसानों ने अपने खून पसीने सींचकर तैयार किये दानों को प्रदेश सरकार सड़ा-सड़ाकर बर्बाद कर रही है या फिर कम्पनियों के हवाले करने जा रही है। यह कैसी बिडंबना है कि जहां प्रदेश में गेहूं बर्बाद हो रहा है, या पराये की झोली में छोड़ा जा रहा है, उसी राज्य में आदिवासी अंचलों में लोग भूख की तड़प से, बच्चें कुपोषण की चपेट से, महिलाएं एनिमिया की गिरफ्त से पके आम की तरह टपकते (मरना) जा रहे है। शासन द्वारा खरीदा हजारों टन गेहूं की बर्बादी एक राष्ट्रीय क्षति तो है ही किन्तु किसानों के अनमोल श्रम का माखौल उड़ाना भी है। किसानों ने प्रदेश को गेहूं उत्पादन में शिखर पर पहुंचाने में रात-दिन एक कर दिये, वहीं प्रदेश में दूसरी तरफ किसानों की आत्महत्या के इतिहास में कीर्तिमान बन रहे है। किसानों की आत्महत्याएं व आदिवासी अंचलों में भूख से घुटते दम के पीछे इनकी त्वरित दिक्कतें ही नहीं है बल्कि सरकार की दोष पूर्ण नीतियां व अंतराष्ट्रीय साजिशों का नतीजा ही है।

किसानों की जी तोड़ मेहनत का फल है कि प्रदेश इस बार भी गेहूं की उपज में अव्वलता हासिल करने में सफल रहा, परन्तु सरकार उनके भण्डारण की व्यवस्था तक करने में बोनी साबित हुई। और हजारों टन गेहूं जहां-तहां सड़ने गलने के लिये छोड़ दिया। इसके वितरीत बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को गेहूं खरीदने की खुली छुट देने के लिये नतमस्तक हो गई। प्रदेश सरकार ने गेहूँ खरीदी पर 2010-11 से क्रय कर (पर्चेस टेक्स) लागू दिया था, तब यह कम्पनियां पूर्व में की गई खरीदी के स्टाक व क्रय कर की अदायगी की वजह से खरीदी करने से मना कर दिया था। सरकार अब फिर कम्पनियों के दबाव से क्रय कर पर छूट की सीमा पांच गुना बढ़ाकर 5 करोड़ से 25 करोड़ करने जा रही है। वर्तमान में 5 करोड़ से अधिक की खरीद पर 5 प्रतिशत क्रय कर लागू है। जो छूट की सीमा बढ़ने पर खत्म हो जाऐगा। यदि पहले के वर्षो में कम्पनियों की खरीदी के अनुमान को देखें तो कर के रूप में 80 से 100 करोड़ रूपये का सरकारी खजाने को नुकसान का सामना करना पड़ेगा। सरकार कम्पनियों की भलाई के लिये बड़े से बड़े खर्चो को सहन करने के लिये तत्पर्य है, वहीं जब किसान समर्थन मूल्य बढ़ाने की मांग करता है, तो अनसुनी कर दी जाती है। खरीदी के लिये जिन कम्पनियों को आंमत्रित किया जा रहा है उनमें से अधिकतर तो यहीं से गेहूं खरीद कर आटा, बिस्कुट मेगी व अन्य उत्पाद बनाकर कर यहीं बेचकर मोटा मुनाफा कमाऐगी।

इससे पहले कारगिल प्रा.लि. व आई.टी.सी. 10-15 लाख मीट्रिक टन तक गेहूं खरीदती थी। आई.टी.सी. ने किसानों से खरीदी करने के लिये ई-चैपाल का विशाल चक्रव्यू रचा। सन् 2000 में 6 चैपालों से शुरू करते हुये 6500 ई-चैपालों का जाल बुनते हुये 40,000 गांवों तक घुसपैठ बना ली। तथा आगामी 10 वर्षो में 15 राज्यों के 1 लाख गांवों में घुसने का लक्ष्य लेकर चल रही है। सरकार व कम्पनी का निजी खरीदी के पीछे तर्क होता था कि विचौलियों की वजह से किसानों को कम दाम मिलता है। अब मुनाफा कम्पनी और किसानों में बंट जाएगा, जबकि कम्पनी अंतिम उपभोक्ता नहीं है, वह भी खरीदी से मुनाफा कमा कर निर्यात करती हैं। अर्थात कम्पनी भी एक बड़ी मछली है, जो छोटे व स्थानीय गल्ला व्यापारी रूपी छोटी मछली को निगलती है। उस वक्त कम्पनी ने किसानों को उपज की गुणवत्ता में अनेक कमियां निकालकर कम कीमत आंककर गेहूं खरीदी करती रही। खरीदी से मंडी में आवाक में कमी आने लगी, जिसके चलते मंडी से जुड़े तमाम मजूदर, हम्माल व गेहूं सफाई में लगी महिलाओं की आजीविका संकट के घेरे में पहुँच गई। तथा आई.टी.सी. ने गेहूं खरीदी के भुगतान में दिये पैसों को भी हथियाने की रणनीति को अंजाम देने के लिये सुई से लेकर टेक्टर तक बेचने के लिये चमाचम दुकान (सौया चैपाल) साथ में ही खोल डाली। अतिरिक्त उपज का निर्यात होना लाजमी है, परन्तु कम्पनियों की खरीदी से मंडी की आवक में कमी आने के साथ ही मंडी का अस्तित्व ही खतरे में पड़ गया। किसानों की उपज के लिये भण्डारण की व्यवस्था के टोटे थे, ऊपर से जितने भी वेयर हाऊस थे उनमें कारगिल प्रा. लि. व आस्ट्रेलियन ब्हीड बोर्ड जैसे कम्पनियों ने अड्डा जमा लिया था। खेर उस वक्त भी कम्पनियों द्वारा निजी खरीदी के खतरों को जानते-समझते हुये किसान, हम्माल, महिला मजदूर व छोटे-बड़े गल्ला व्यापारियों ने जमकर विरोध किया था।

मध्यप्रदेश में अगर गेहूँ उत्पादन को देखा जाये तो वर्ष 1951 के दौरान गेहूं का क्षेत्र 19.60 लाख हेक्टेयर और उत्पादन 7.71 लाख मैट्रिक टन होता था, जो वर्ष 1999- 2000 में जाकर 46.70 लाख हेक्टेयर व उत्पादन 86.87 लाख मैट्रिक टन हो गया। इसके बाद वर्ष 2010-11 में भी गेहूं के क्षेत्रफल तो नहीं बढ़ा लेकिन उत्पादन 92 लाख मैट्रिक टन अनुमान के समतुल्य पहुँच बना ली। एक समय था जब मध्यप्रदेश में गेहूं समर्थन मूल्य से कहीं अधिक कीमत पर हाथों हाथ बिकता था। गेहूं के अथाय उत्पादन व बर्बादी के पीछे का आलम यह भी है कि बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के इशारे पर मध्यप्रदेश से गेहूं निर्यात करने के इरादे से गेहूं निर्यात/उत्पादन जोन (एक्सपोर्ट जोन) में उज्जैन, धार, शाजापुर, देवास, रतलाम, मंदसौर नीमच, इन्दौर भोपाल, सीहोर, विदिशा रायसेन होशंगाबाद हरदा गुना और नरसिंहपुर कुल सोलह जिले को शामिल करके निर्यात व उत्पादन बढ़ाने की होड़ लग गई। अस्सी-नब्बे के दशक में उत्पादन प्रक्रिया का तीव्र गति से भूमण्डीकरण हुआ और विश्व बैंक और अंतराष्ट्रीय मुद्राकोष ने विकासशील देशों को दबाने की प्रक्रिया का नामकरण समायोजन कर दिया। उदारीकरण की नीतियों की वजह से खेती में सरकारी निवेश में कटौती होते-होते सिर्फ 3-4 प्रतिशत रहा गया है।

स्वतंत्रता के बाद किसानों ने खाद्यान्न संकट से निपटते-निपटते देश को आत्मनिर्भर बनाया दिया है। 2003 में राष्ट्रपति डॉ ए.पी.जे अब्दुल कलाम ने कहा था कि बढ़ती हुई जनसंख्या की 30 करोड़ टन खाद्यान्न आवश्यकता को पूरा करना होगा। राष्ट्रपति का अनुमान था कि देश में कृषि योग्य भूमि का रकबा 17 करोड़ हेक्टेयर से घटकर 2020 तक लगभग 10 करोड़ हेक्टेयर ही बचेगा, ऐसी स्थिति का सामना करने के लिये मौजूदा 20 करोड़ टन खाद्यान्न उपज में बढ़ोत्तरी करके 30 करोड़ टन के लक्ष्य को पूरा करना पड़ेगा। स्पष्ट है कि कृषि योग्य भूमि कम्पनी, कारखानें, बांध डूब क्षेत्र, कालौनी आदि के वजह से कम होने का अनदेशा/लक्ष्य पहले ही तय किया जा चुका है, जिसकी पूर्ति के लिये अधिक से अधिक उत्पादन पर होड़ मचा रखी है। खेती में कम्पनियों की घुसपैठ व कृषि भूमि का घटता रकबा का ही नतीजा है, कि पिछले 10 वर्षो में 80 लाख लोगों ने खेती-किसानी को त्याग दिया है तथा ग्रामीण क्षेत्र में 27 प्रतिशत कृषि भूमिहीनता बढ़ी है, बेरोजगारी बढ़ी है। साठ दशकों से चली आ रही यह अन्यायपूर्ण व असमानता वाली नीतियां, विश्व व्यपारी संगठन के समझौतों व बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की कृषि पर बढ़ती एकाधिकार की मार से और भी भयावह हो गई है।

 

 

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