लेखक परिचय

परमजीत कौर कलेर

परमजीत कौर कलेर

मैं प्रोडूयसर के तौर पर 4 रीयल न्यूज में काम कर रही हूं । फीचर लिखती हूं । प्रसार भारती दिल्ली के वूमेन सैक्शन के लिए भी लिखती हूं ।आकाशवाणी पटियाला में रिकार्ड हुए प्रोग्राम वेहड़ा शगना दा, तीआं तीज दीआं विभिन्न विषयों पर फीचर लिख सकती हूं। लिखने का है शौक पंजाब के मैगजीन समुदरों पार , चढ़दीकला पटियाला, पटियाला भास्कर, माईल स्टोन मैगजीन में प्रकाशित हुए हैं फीचर

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( 13 जनवरी विशेष)

नया साल क्या आता है वो अपने साथ लेकर आता है ढेरों खुशियां …उल्लास और नई उमंग इस के साथ ही शुरू हो जाता है…त्यौहारो का सिलसिला…साल के शुरू में ही आता है उमंग , उत्साह और आपसी भाईचारे का त्यौहार … खैर अब तो आप समझ ही गए होंगे कि हम किस त्यौहार की बात कर रहें हैं…जी हां हम बात कर रहें हैं रिश्तों में मिठास लाने के त्यौहार लोहड़ी की…

पंजाबी जिनके बारे में अक्सर कहा जाता है कि इन्हें कोई न कोई त्यौहार मनाने का बहाना चाहिए…जब असल में ही त्यौहार हो तो फिर तो पंजाबियों के क्या कहने …फिर तो हो जाती है बल्ले – बल्ले …मुंगफली , गजक, रेवड़ी …का त्यौहार यानि कि लोहड़ी क्या आता शुरू हो जाता है जश्न मनाने का सिलसिला…रिश्तों में आपसी भाईचारे को सृदढ़ करने का त्यौहार है लोहड़ी…लोहड़ी का ये पर्व 13 जनवरी को हर साल मनाया जाता है…जो पोष महीने की आखिरी तारीख को मनाया जाता है…पोष महीने की कड़काती सर्दी से बचने के लिए और आग का सुकून लेने के लिए …सभी आपसी सांझ के प्रतीक लोहड़ी को मिल जुल कर मनाते हैं …लोहड़ी जो कि बना तिल और रोड़ी से । जो कि नाम से ही स्पष्ट है तिल की रोड़ी…यानि तिल की रेवड़ी। जो समय के बदलाव के साथ बदल गया और बन गया…तिलोड़ी और बाद में इसका नाम लोहड़ी पड़ गया…पंजाब में लोहड़ी को लोई और लोही के नाम से भी जाना जाता है…लोहड़ी के सम्बंध में भी कई कहानियां जुड़ी है…मगर इस त्यौहार के मनाने के पीछे जुड़ी है लोक कथा…जिसका सम्बंध दुल्ला भट्टी से है…जो मुगलों के समय एक बहादुर योद्धा था…जिसने मुगलों के खिलाफ अपनी आवाज़ को बुलंद किया…कहा जाता है कि एक ब्राह्मण की दो लड़कियां थी सुन्दरी और मुन्दरी…मुगल शासक उनसे जबरदस्ती शादी करना चाहता था…जबकि उनकी सगाई कही और हो रखी थी …और इन दोनों लड़कियों के ससुराल वाले मुगल शासक के डर से ये शादी नहीं कर रहे थे…जब इस बात की खबर दुल्ला भट्टी के पास पहुंची तो …वो इस मुसीबत की घड़ी में ब्राहमण की मदद करने पहुंचे…लड़के वालों को मना कर …जंगल में आग जलाकर इन दोनों लड़कियों की शादी करवाई गई और खुद दुल्ला भट्टी ने इन दोनों लड़कियों का कन्यादान किया और उन्हें शगुन के रूप में शक्कर दी…इसीलिए तो बच्चे गाते हुए कहते हैं …

सुन्दर मुन्दरिए ….हो

तेरा कौन विचारा….हो

दुल्ला भट्टी वाला …हो

दुल्ले दी धी व्याही…हो

सेर शक्कर पाई …हो

दुल्ला भट्टी ने जुल्म के खिलाफ आवाज़ उठाई और मानवता की भलाई का काम किया आज भी लोग उस रात को दुल्ले भट्टी के साहस और दलेरी के रूप में मनाते है…जो मुसीबत में फंसे लोगों की ऐन वक्त पर आकर सेवा और मदद करता था।

वैसे तो लोहड़ी का त्यौहार लड़के के जन्म और लड़के की शादी की खुशी में मनाया जाता है …जिन लड़को की पिछले पूरे साल में शादी हुई होती है या जिन घरों में लड़के का जन्म हुआ हो की लोहड़ी मनाई जाती है…इस दिन सुबह औरतें लोगों के घरों में लोहड़ी बांटती हैं…इस लोहड़ी में मक्की के दाने , मुगफली और रेवड़ी होती हैं…जो औरतें लोगों के घरों में बांटती हैं… जिन घरों में लोहड़ी होती है यानि जिन घरों में लड़का या लड़के की शादी हुई हो ….शाम को लड़के लड़कियां अपनी अपनी टोलियां बना कर लोहड़ी मांगते हैं….

लड़कियां लोहड़ी मांगती हुई गीत गाती है…

मूली दा पत्ता हरिआ भरिया

वीर सौदागर घोड़ी चढ़ड़िया

आ वीरा तू जा वीरा

बन्नों नू लिया वीरा

बन्नो तेरी हरी भरी

फूल्ला दी चंगेर भरी

इक फुल्ल जा प्या

राजे नू दरबार प्या

राजा बेटी सुत्ती सी

सुत्ती नू जगा लिया

रत्ते ढोले पा लिया

रत्ता ढोला चीकदा

भाबो जी नू डीकदा

उह मेरा भतीजा

भतीजे पैरी लड़ियां

यश न्यारे जड़िया

लड़कों के विवाह से सम्बधित लोहड़ी के गीत गाती हुई वे कहती हैं …

तीली हरी ए भरी तीली मोतिया जड़ी

तीली उस वेहड़े जाए

जित्थे गीगे दा विवाह

गीगे वाल्डीए भाबो

नी तू सरनावे नाहवण जा

अग्गे आ गया जेठ

नी तू वड़ जा मंजी हेठ

बच्चे के जन्म की खुशी में वो गीत गाती हुई वो कहती हैं…

ऊखली च रोड़े वीरा चढ़िया घोड़े

घोड़े चढ़ के तीर घुमाया

तीर वज्जा तित्र ते

तित्रा तेरी मां वे

अंडा लिआवे का दा

दुध्ध पीवे गां दा

रोटी खावे कनक दी

वहूटी आवे छनकदी

वो लोहड़ी वाले घर में जाकर लोहड़ी मांगती हैं…लोहड़ी के गीत गाती और गिद्दा भी डालती है…जो औरतें लोहड़ी देने में धीरे धीरे करें वो गाती हुई कहती हैं…

अन्दर वट्टे न खड़का

सानू दूरों न डरा

और अगर कोई औरत उन्हें लोहड़ी कम दें और उन्हें तय की गई रकम न दें तो लड़कियां गाती हुई कहती हैं…

दो कू फूलड़ियां लिआई

ऊत्ते मेंगन धर लिआई

अगर कोई लोहड़ी के पैसे कम दे तो वे गाती हुई कहती हैं….

आपणे पैसिआ वल्ल वेख

साडीया कुड़िया वल्ल वेख

अगर कोई लोहड़ी देने से इंकार करें तो ये कहने से भी नहीं हिचकती…

कोठे ऊत्ते हुक्का इह घर भुक्खा

जिस घर से उन्हें तय की गई रकम मिल जाए …तो वो खुश होकर आशीष देती हुई कहती हैं…

कोठे उत्ते मोर

ऐथे मुंडा जम्मे होर

इस त्यौहार को मनाने में लड़के भी पीछे नहीं रहते वो भी ढोल धमाके के साथ लोहड़ी के गीत गाते हैं…वो भी लड़कियों से पीछे नहीं रहना चाहते …वो ढोल की थाप पर तो भंगड़ा तो डालते ही हैं साथ ही वो लोहड़ी के गीत गाते हैं…

कोठे ऊत्ते चाकू

गुड़ देवे मुंडे दा बापू

साथ ही वो हंसी मजाक करते हुए कहते हैं…

सानू दे लोहड़ी

तेरी जीवे जोड़ी

लड़कों के मशहूर गीत को हम कैसे भूल सकते हैं ….

सुन्दर मुन्दरिए …हो

तेरा कौन विचारा ….हो

दुल्ला भट्टी वाला …हो

दुल्ले दी धी व्याही … हो

सेर शक्कर पाई … हो

लोहड़ी वाले घर के लोगों का दिल बहलाने के लिए वो बहुत खूबसूरत गीत गाते है…

छोटे लड़के लड़कियां भी इस त्यौहार को मनाने में पीछे नहीं रहना चाहते…वो भी लोहड़ी मांगते हुए कहते हैं …

कुप्पीए नी कुप्पीए नी …हो

समान नू लूटीए …हो

समान पुराना ….हो

धोबी काना …हो

धोबी दे दो बच्चड़े …हो

बिल्ली मार गई … हो

चूहे नचड़े…हो

यही नहीं लोहड़ी वाले घर के सदस्यों को खुश करने के वो गाते हैं…

आखो मुंडियो ट्रक

ट्रक दे पहिए अट्ठ

विच्च बैठा जट्ट

जट्ट ने मारी ब्रेक

अग्गे आ गई तरेक

तरेक दी बोदी

अग्गे आ गया दोधी

दोधी ने पाईया दुध्ध

तुहाडा सारा कम्म सुध

छोटी लड़कियां गाती हुई कहती हैं कहती हैं …

अटुआ भई अटुआ

खोल भई बटुवा

अगर घर के लोग लोहड़ी देने में देर लगाए तो वो गाती हुई कहती हैं…

साडे पैरा विच्च सलाईयां

असी किहड़े वेले दीआ आईया

वो लोहड़ी जल्दी देने के लिए कहती हैं…

साडे पैरा विच्च रोड़

सानू छेती छेती तोर

अन्दर वट्टे न खड़का

सानू दूरों न डरा

और अगर कोई औरत उन्हें लोहड़ी कम दें और उन्हें तय की गई रकम न दें तो लड़कियां गाती हुई कहती हैं…

दो कू फूलड़ियां लिआई

ऊत्ते मेंगन धर लिआई

अगर कोई लोहड़ी के पैसे कम दे तो वे गाती हुई कहती हैं….

आपणे पैसिआ वल्ल वेख

साडीया कुड़ियां वल्ल वेख

अगर कोई लोहड़ी देने से इंकार करें तो ये कहने से भी नहीं हिचकती…

कोठे ऊत्ते हुक्का एह घर भुक्खा

जिस घर से उन्हें तय की गई रकम मिल जाए …तो वो खुश होकर आशीष देती हुई कहती हैं…

कोठे उत्ते मोर

ऐथे मुंडा जम्मे होर

इस त्यौहार को मनाने में लड़के भी पीछे नहीं रहते वो भी ढोल धमाके के साथ लोहड़ी के गीत गाते हैं…वो भी लड़कियों से पीछे नहीं रहना चाहते …वो ढोल की थाप पर तो भंगड़ा तो डालते ही हैं साथ ही वो लोहड़ी के गीत गाते हैं…

कोठे ऊत्ते चाकू

गुड़ देवे मुंडे दा बापू

साथ ही वो हंसी मजाक करते हुए कहते हैं…

सानू दे लोहड़ी

तेरी जीवे जोड़ी

लड़कों के मशहूर गीत को हम कैसे भूल सकते हैं ….

सुन्दर मुन्दरिए …हो

तेरा कौन विचारा ….हो

दुल्ला भट्टी वाला …हो

दुल्ले दी धी व्याही … हो

सेर शक्कर पाई … हो

लोहड़ी वाले घर के लोगों का दिल बहलाने के लिए वो बहुत खूबसूरत गीत गाते है…

छोटे लड़के लड़कियां भी इस त्यौहार को मनाने में पीछे नहीं रहना चाहते…वो भी लोहड़ी मांगते हुए कहते हैं …

कुप्पीए – कुप्पीए नी …हो

समान नू लूटीए …हो

समान पुराना ….हो

धोबी काना …हो

धोबी दे दो बच्चड़े …हो

बिल्ली मार गई … हो

चूहे नचड़े…हो

यही नहीं लोहड़ी वाले घर के सदस्यों को खुश करने के वो गाते हैं…

आखो मुंडियो ट्रक

ट्रक दे पहिए अट्ठ

विच्च बैठा जट्ट

जट्ट ने मारी ब्रेक

अग्गे आ गई तरेक

तरेक दी बोदी

अग्गे आ गया दोधी

दोधी ने पाइया दुध्ध

तुहाडा सारा कम्म सुध

छोटी लड़कियां गाती हुई कहती हैं …

अटुआ भई अटुआ

खोल भई बटुवा

अगर घर के लोग लोहड़ी देने में देर लगाए तो वो गाती हुई कहती हैं…

साडे पैरा विच्च सलाईयां

असी किहड़े वेले दीआ आईया

वो लोहड़ी जल्दी देने के लिए कहती हैं…

साडे पैरा विच्च रोड़

सानू छेती छेती तोर

पंजाबी स्वभाव के बड़े ही जोशीले होते है …लोहड़ी जैसा त्यौहार हो और पंजाबी थिरके न …ये तो हो ही नहीं सकता…भई सच में पंजाबी कर देते हैं बल्ले बल्ले…लड़किया और लड़के जो टोलिया बनाकर लोहड़ी घरों में लोहड़ी मांग कर वापिस आ जाते है….और लोहड़ी वाले घर से मिले पैसों को आपस में बांट लेते हैं… जिस घर में लोहड़ी होती है उस घर में लोहड़ी जलाई जाती है…रात को पुग्घा जलाया जाता है…ये पुग्घा उपलों का बनाया जाता है… उपलों को इस तरह गोल तरीके से बड़े ही सुन्दर ढंग से चिन चिन कर लगाया जाता है…उपलों को आग लगाई जाती है…सबसे पहले अग्नि देवता के आगे सबके भले के लिए प्रार्थना की जाती है…फिर तिल, गजक , गुड़, मुंगफली और मक्की के दानें अग्नि देवता को सुपुर्द किए जाते हैं…और लोक गीत गाए जाते हैं…घर के सभी सदस्य अग्नि देवता को ये वस्तुएं भेंट करते हैं…और माथा टेककर फिर शुरू हो जाता है…लोक गीतों का सिलसिला अलाव के चारों और बैठकर तिल , मुगफली और रेवड़ियां खाई जाती हैं और सभी को बांटी जाती हैं…ढोल की थाप पर शुरू हो जाता है गाने बजाने का सिलसिला …जिसमें होते हैं सभी गलतान …तिल फेंकते हुए सब कहते हैं

ईश्र आए दलिद्दर जाए…

दलिद्दर दी जड़ चुल्हे पै

इसका मतलब यह है कि सर्दी में जो आलस और सुस्ती है वो उतर जाए …सारे प्रकिरमा में बैठ जाते हैं …और सारी रात ढोल की थाप पर भंगड़ा और गिद्दा डाला जाता है…अन्त की पड़ती सर्दी से ये अलाव हर एक को सुखदायी प्रतीत होती है…आग की लपटें बड़ा ही मनोहारी दृश्य पेश करती हैं…जब सारे गा कर और थिरक कर चूर हो जाते हैं तो सभी अपने अपने घर में जाने लगते हैं तो लोहड़ी वाले घर के सदस्य सभी को लोहड़ी देते हैं इसमें होती है मुगफली, तिल , रेवड़ी और मक्की के दानें । सभी को लोहड़ी की शुभकामनाएं दी जाती हैं …

सुख , शांति और आपसी भाईचारे के प्रतीक लोहड़ी के त्यौहार पर भी लगता है आधुनिक रंग चढ़ता जा रहा है …और इन त्यौहारों में वो अपनापन सा कही खो कर रह गया है …इस भागती दौड़ती जिन्दगी में त्यौहार अपना अस्तित्व खोते जा रहें हैं …अगर देखा जाए तो आज लोगों के पास इतना समय ही नहीं है …समय के साथ साथ गीत भी आधुनिक होते जा रहें हैं …

पहले क्या होता था कि पहले लड़कियां – लड़के लोगों के घरों में लोहड़ी के रूप में मुगफली रेवड़ियां मांगते थे …यही नही पुग्घा बनाने के लिए उपले भी मांगते थे …

लड़के गाते हुए कहते थे

दे माई पाथी

तेरा पुत्त चढ़ेगा हाथी

लोहड़ी में वो रूपए या पैसे की मांग नहीं करती थे जबकि आज कल के लड़के लड़कियां लोहड़ी मांगने के लिए फिक्स रकम मांग जाती है और जिन घरों में लड़के का विवाह या शादी हुई हो…वहां पर तो जिद्द करके ये फिक्स रकम मांगती हैं।पहले क्या होता था कि सारे लोग ही इक्ट्ठे होकर एक पुग्घा जलाते थे…और सारे अपने अपने घर से उपले और लकड़ियां लाते थे…और सारे गांव में एक ही पुग्घा जलाया जाता था सभी एक दूसरे को लोहड़ी की बधाईयां देते थे और सारी सारी रात लोक गीत गाए जाते थे और ढोल पर थाप लगती थी तो कोई भी थिरके बिना नहीं रह सकता था लोक बोलियों पर गिद्दा डाला जाता था कि देखने वाले देखते ही रह जाते थे…एक से बढ़कर एक बोलियां डाली जाती थी …

पंजाबी नौजवानों का जोश तो देखते ही बनता था…औरतें , आदमी, लड़के लड़कियां बाल बच्चे सभी इस जश्न में शरीक होते थे…उत्सव का उत्साह तो उनके चेहरों पर साफ झलकता था…कड़ाके की सर्दी और ऊपर से जलता विशाल पुग्घा लोगों की एकजुटता और आपसी भाईचारे का प्रतीक था…सारी रात गाते गाते वो जश्न में इस कद्र गलतान हो जाते थे कि उन्हें पता ही नहीं चलता कि कब सुबह हो जाती थी…

छोटे बच्चे लोक गीतों की धुनों को सुन कर मदमस्त हो जाते है और उन्हें ऐसे लगता कि मानो वो जन्नत में हो…जबकि आज के दौर में लोहड़ी में सारा गांव या कस्बे के लोग इक्टठे होकर नहीं मनाते….मानो वो अपनत और अपनापन कही खो गया है…आजकल सारी सारी रात लोक गीत नहीं गाए जाते बल्कि डी जे की धुनों पर ही थिरक लिया जाता है…लोक गीतों की जगह ले ली है…डी जे ने…लोक गीत मानो कही खो गए हैं…यही नहीं पहले औरतें शगुन के रूप में लोगों के घरों में बांटी जाने वाली लोहड़ी में होता था गुड़ और मक्की के दाने…जबकि अब मुंगफली , रेवड़ी, और मक्की के दाने होते हैं…सच में लोहड़ी पर चढ़ता जा रहा है आधुनिकता का रंग मगर जो भी हो हम उत्सव और साहस के इस त्यौहार में हर कोई होना चाहता है शरीक… बेशक लोहड़ी पर भी आधुनिकता का रंग चढ़ता जा रहा है…मगर फिर भी स्नेह और आपसी भाईचारे के प्रतीक इस त्यौहार को हम बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है लोहड़ी का सम्बंध नए जन्में बच्चों और लड़कों के विवाह से है…जो पुराने समय से चली आ रही रीत से है…जिस घर में लड़के ने जन्म लिया हो और जिस घर में लड़के की शादी हुई हो उसके घर में लोहड़ी का जश्न तो देखते ही बनता है…अब लड़के और लड़की में कोई अन्तर न होने के चलते सभी लोग नई जन्मी लड़कियों की लोहड़ी मनाते हैं क्योंकि लड़कियां किसी भी क्षेत्र से लड़को में कम नहीं…जो कि एक अच्छा सन्देश है… इस दिन सरसों साग बनाया जाता है…और जो कि हरियावल का प्रतीक है… और ऐसा विश्वास किया जाता है कि सभी में परिवारों में यूं ही खुशियां बरकरार रहें ।लोहड़ी की रात को साग के अलावा गन्ने की खीर और खिचड़ी बनाई जाती है जो कि जो लोहड़ी की अगली सवेर में खाई जाती है…इसलिए तो कहा भी गया है…

पोह रिधी ते माग खादी

लोहड़ी है रिश्तों में मधुरता , आपसी स्नेह और प्यार का त्यौहार …इस त्यौहार के जश्न में हर कोई डूब जाना चाहता है इस दिन से दिन बढ़ने शुरू हो जाते हैं क्यों कि किसानों को भी अपनी फसल का फिक्र नहीं होता और न करनी पड़ती है फसलों की राखवाली…दुल्ला भट्टी के गीतों में किसान भी मदमस्त हुए लगते हैं …हर तरफ छाई होती है …खुमारी वो भी सिर्फ जश्न मनाने की…और ढोल की थाप पर थिरकने के लिए…हंसी मजाक, नाच गाना , रिश्तों में भरता है मिठास और सिर्फ अपनापन । सभी बड़े ही जोशो खरोश से जलती लोहड़ी के इर्द गिर्द झूमते नज़र आते हैं…और अग्नि देवता के आगे सभी के सुख समृद्धि के लिए कामनाएं करते हैं कि लोहड़िया यूं ही जलती रहें और हर घर में आए सुख और समृद्धि …यही हमारी तमन्ना है।

परमजीत कौर कलेर

 

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