लेखक परिचय

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

‘नेटजाल.कॉम‘ के संपादकीय निदेशक, लगभग दर्जनभर प्रमुख अखबारों के लिए नियमित स्तंभ-लेखन तथा भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष।

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patna-muslims-storyकेरल में संपन्न हुए भाजपा के सम्मेलन से पता नहीं उसके कार्यकर्त्ता कितने उत्साहित हुए लेकिन एक बात बहुत अच्छी हुई कि नरेंद्र मोदी ने भाजपा के दिवंगत शीर्ष नेता दीनदयालजी उपाध्याय की बात को दोहराया। यह दीनदयालजी का शताब्दि वर्ष है और अब से 49 साल पहले वे केरल में ही जनसंघ के अध्यक्ष बने थे। उन्हें यह अध्यक्षता प्रो. बलराज मधोक के बाद मिली थी। दीनदयाल उपाध्याय एकात्म मानवतावाद में विश्वास करते थे। वे धर्म, जाति, वर्ग और वर्ण के भेदों से ऊपर उठकर ‘वसुधैव कुटुबकम’को अपना आदर्श मानते थे।
वे बेहद सज्जन और साधु-स्वभाव के व्यक्ति थे। वे कहा करते थे कि भारत के मुसलमान अपने ही परिवार के सदस्य हैं। उन्हें हम अपने से अलग न समझें। न तो उनका तिरस्कार करें और न ही उनको फुसलाने के लिए उन्हें पुरस्कार देने की कोशिश करें। वे अल्पसंख्यकवाद और बहुसंख्यकवाद के खिलाफ थे। जब सारे भारत की आत्मा एक है याने एकात्म है तो ये सब भेद ऊपरी सिद्ध हो जाते हैं। इसी बात को जब हम नरेंद्र मोदी के मुंह से सुनते हैं तो यह हमें और अच्छी लगती है। यदि जो कहा है, वही किया जाए तो इससे मोदी का भी भला होगा और भारत के मुसलमानों का भी!
भारत के मुसलमानों को हमारी राजनीति में वोटों की थोक मंडी मानकर चला जाता है। उन्हें सभी दल कभी उकसा कर, कभी लालच देकर, कभी डरा कर, कभी फुसला कर और कभी सब्जबाग दिखा कर थोक में वोट देने के लिए मजबूर कर देते हैं। भारत का औसत मुसलमान गरीब है, अशिक्षित है, अभावग्रस्त है, डरा हुआ है, इसीलिए वह आसानी से नेताओं के बहकावे में आ जाता है। धर्म-निरपेक्षता के नाम पर अल्पसंख्यक सांप्रदायिकता को भड़काया जाता है। उन्हें भी नौकरियों में आरक्षण मांगने के लिए उकसाया जाता है। कई शिक्षित और मालदार मुसलमान अपने मुसलमान होने का फायदा उठाकर बड़े-बड़े पद हथिया लेते हैं। वे सरकार की जी-हुजूरी करते रहते हैं लेकिन करोड़ों मुसलमान जहां सड़ते रहे हैं, वहीं सड़ते रहते हैं।
जरुरी यह है कि किसी भी व्यक्ति के हिंदू या मुसलमान होने और ब्राह्मण या शूद्र होने का विचार न किया जाए बल्कि राजकीय सुविधाएं देते समय सिर्फ इस बात का ध्यान रखा जाए कि वह आदमी वास्तव में जरुरतमंद है या नहीं? मनुष्यों को मनुष्य मानकर चला जाए, न कि जानवरों की तरह झुंड या रेवड़ मान लिया जाए। जिस दिन भारत का हर नागरिक अपने विवेक का इस्तेमाल करेगा और अपने आप को रेवड़ का हिस्सा नहीं बनने देगा, उस दिन भारत में सच्चा लोकतंत्र कायम हो जाएगा।

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