लेखक परिचय

एस.के. चौधरी

एस.के. चौधरी

पेशे से पत्रकार हैं।

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खुर्शीद प्रकरण से साफ़ हो गया कि इस देश में वही होगा जो कांग्रेस चाहती है | चुनाव में कौन से मुद्दे चलेंगे यह भी कांग्रेस ही तय करती है और इस बार तो स्पष्ट तौर पर सरकारी मशीनरी और संवैधानिक संस्थाओं का दुरूपयोग जमकर किया गया है| ये वही चुनाव आयोग है जिसने 1999 में शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे को 2005 तक के लिए ना सिर्फ चुनाव लडने पर रोक लगाया बल्कि उनको मताधिकार से भी वंचित कर दिया था | बहुत पीछे जाने की जरुरत नहीं है इसी साल विधानसभा चुनाव मे चुनाव आयोग अपने हास्यास्पद फैसले में हाथी और मायावती की मूर्ती को ढंका ही एक जगह पर कांशीराम की मूर्ती को भी ढँक दिया था | फिर आज कौन सी मज़बूरी है कि सीधे अपने अधिकारों का प्रयोग करने से बचते हुए राष्ट्रपति के पास फ़रियाद की जा रही है ?सलमान खुर्शिद प्रकरण ने निश्चत रुप से कांग्रेस के मंशा पर सवाल तो खड़े किए ही है साथ हीं चुनाव आयोग जैस संवैधानीक संस्था को भी कटघरे मे खड़ा कर दिया है ।

उत्तर प्रदेश चुनाव मे कांग्रेस के द्वारा दिए गए 4।50 फिसदी मुश्लिम आरक्षण को न्यायालय के खारिज करने के बाद भी कांग्रेसी नेताओं की मुसलमानों के मुद्दे को लेकर लगातार बयानबाजी निश्चित ही कांग्रेस का चरित्र उजागर किया है । पहले बटला हाउस इनकाउंटर मामले को लेकर दिग्वीजय सिंह ने सरकार को कटघरे मे खड़ा कर दिया बाद मे पार्टी ने यह कहकर पीछा छुड़ाया की वो उनकी नीजी राय हो सकती है । देश के कानुन मंत्री अपनी पत्नी के लिए चुनाव प्रचार करते हुए आचार संहिता का उलंघन करते है तो चुनाव आयोग ने उन्हे नोटीस थमा देता है, फिर भी कानुन मंत्री चुनाव आयोग का माखौल उड़ाते रहते है, और अब कानुन मंत्री के ताजा बयान ने यह साबित कर दिया की इस देश मे कानुन बनाने वालों को कानुन तोड़ने का पूरा हक है । सलमान खुर्शिद ने कहा की “पिछड़े मुसलमानो को आरक्षण देने की बात करना गलत नहीं है और मैं उनको हक दिला कर रहूंगा चाहे चुनाव आयोग रहे ना रहे” मतलब कानुन मंत्री ने ना सिर्फ चुनाव आयोग को चुनौती दी बल्की हिन्दुस्तान के लोकतंत्र को चुनौती दी है, क्योकि आचार संहिता लागु होने के बाद वोटर को किसी तरह का प्रलोभन देना कानुन के खिलाफ है । पहले बटला हाउस की वकालत फिर सलमान खुर्शिद का लगातार चुनाव आयोग को ठेंगा दिखाना यह साबित करता है कि कांग्रेस का यह चुनावी एजेंडा है नेता बोलते रहे पार्टी उनके बयान से पल्ला झारते रहेगी । कांग्रेस को इस एजेंडे से कितना फायदा होगा फायदा होगा भी या नहीं यह तो चुनाव बाद ही पता चलेगा हां कहीं मुश्लिम बिरादरी की हिमायती करने के चक्कर मे हिन्दु वोटर नाराज हो गए तो राहुल का प्रधानमंत्री बनेने का सपना जरुर अधुरा रह जाएगा ।

सलमान खुर्शिद के पास कानुन मंत्रालय के साथ-साथ अल्पसंख्यक आयोग का मंत्रालय भी है लेकिन आपको बता दें की सलमान हीं नहीं कांग्रेस पार्टी भी कभी मुश्लिमो के हित मे कोई काम नहीं किया है । सलमान खुर्शिद एक राजनैतिक घराने से आते है, उनके दादा डॉ जाकिर हुसैन भारत के तीसरे राष्ट्पति थे तो पिता खुर्शिद आलम खां भारत सरकार के मंत्री रह चुके है । सलमान खुर्शिद मंत्री के साथ-साथ दिल्ली पब्लिक स्कूल सोसाईटी और डॉ जाकिर हुसैन स्टडी सर्किल के अध्यक्ष भी है, अगर वाकई उन्हे मुसलमानों की इतनी फिक्र है तो क्यों नहीं अपने स्कुल मे मुसलमानो के लिए किसी तरह का आरक्षण लागु कर देते । चेन्नई के एक जलसे में सलमान खुर्शिद सच्चर कमेटी पर सवाल उठाए थे उन्होने कहा की कमीटी की रिपोर्ट कुरान नहीं है कि उस पर सवाल नहीं उठाए जा सकते । अगर सलमान की बात मानी जाए तो मुसलमानों के हालात से मुताबिक सच्चर कमेटी की रिपोर्टस ही नहीं है और मुसलमानों के हालात इतने खराब नहीं है जितना इसका रोना रोया जाता है। याद रहे कि सच्चर कमेटी की रिपोर्ट नवम्बर 2006 में पेश हुई थी और तब से केन्द्र मे कांग्रेस की सरकार रही है । मुसलमानों की नजर में सलमान खुर्शीद का मतलब साफ है कि जिस तरह चौसठ सालों से मुसलमानों को बेवकूफ बनाया जा रहा है यह सिलसिला आगे भी जारी रहेगा। मुसलमानों के मफाद की मुखालिफत सलमान ने पहली बार नहीं की है। सच्चर कमेटी रिपोर्ट आने के बाद सरकार ने कहा कि मुसलमानों की सूरते हाल ठीक करने की गरज से एक कमीशन बनाया जाएगा जिसमे मनमोहन सिंह ने इसके लिए एक ग्रुप आफ मिनिस्टर्स चुना गया जिसमें पी।चिदम्बरम और कपिल सिब्बल के अलावा सलमान खुर्शीद भी शामिल है। आपको बता दें की इस ग्रुप की कई मीटिंगे होने के बावजूद पांच सालों में यह कमीशन सिर्फ इसलिए नहीं बन सका कि सलमान खुर्शीद इस की मुखालिफत करते है। वह कहते है कि इस किस्म का कमीशन सिर्फ मुसलमानों के लिए न होकर सबके लिए हो। जबकि कपिल सिब्बल और चिदम्बरम जैसे मंत्रीयों का यह कहना है कि यह कमीशन बनाने की बात सच्चर कमेटी की रिपोर्ट से निकली है और यह कमेटी मुसलमानों के हालात का पता लगाने के लिए बनी थी। सलमान खुर्शीद की वजह से ही वक्फ एक्ट भी लटका हुआ है, तो मुसलमानों के प्रति उनके ही नेता कितने सजग है सलमान खुर्शीद खुद इसके उदाहरण है ।

उन्नीस सौ नब्बे के दशक में बिहार में शुरू हुए पसमांदा आंदोलन का प्रसार बड़ी तेज़ी से हुआ। मुसलमानों की बड़ी आबादी वाले पसमांदा तबक़े के लिए यह आंदोलन एक उम्मीद की किरण बनकर सामने आया। लोगों ने इस आंदोलन के रहनुमाओं को सर आंखों पर बिठाया, लेकिन मात्र दस-बारह सालों में इसके नेता राजनीतिक कुर्सी की भीख के लिए अपने हाथ सत्ताधारियों के पास हाथ फैलाने लगे। जब किसी आंदोलन का रहनुमा सत्ता या राजनीतिक कुर्सी का हिस्सा बनता है तो सबसे पहले उसकी ज़ुबान बंद हो जाती है।फिर आंदोलन का यही गूंगापन उसे बेमौत मारने के लिए का़फी होता है। इसकी नुमाइश हाल ही में अररिया के भजनपुरा में मारे गए पसमांदा मुसलमानों के मामले में हुई। ऐसे बहुत से नाम है जो मक़सद की पूर्ति होते ही ऐसी जमात और विचारों को चूल्हे में डालने से नहीं चूकते है, लेकिन जब राजनीति की रोटी सेंकने की ज़रूरत पड़ती है तो फिर इस चूल्हे में फूंक मारकर अपना उल्लू सीधा कर लेते है। सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न कि क्या मुस्लिम मतदाता कांग्रेस के इस नकली और चुनावी मुस्लिम प्रेम को समझ पाएगी ?

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1 Comment on "मुस्लिम वोटबैंक।। कांग्रेस।। और चुनाव आयोग !"

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इक़बाल हिंदुस्तानी
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सलमान ने न तो कुछ गलत कहा है और न ही अदालत ने आरक्षण पर रोक लगाई है. भाजपा के मंदिर निर्माण के ऐलान पर रोक लगनी ज़रूरी है क्योंकि ये मामला अभी अदालत में विचाराधीन है.

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