लेखक परिचय

अरुण तिवारी

अरुण तिवारी

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प्रस्तुति : अरुण तिवारी
प्रो जी डी अग्रवाल जी से स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद जी का नामकरण हासिल गंगापुत्र की एक पहचान आई आई टी, कानपुर के सेवानिवृत प्रोफेसर, राष्ट्रीय नदी संरक्षण निदेशालय के पूर्व सलाहकार, केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के प्रथम सचिव, चित्रकूट स्थित ग्रामोदय विश्वविद्यालय में अध्यापन और पानी-पर्यावरण इंजीनियरिंग के नामी सलाहकार के रूप में है, तो दूसरी पहचान गंगा के लिए अपने प्राणों को दांव पर लगा देने वाले सन्यासी की है। जानने वाले, गंगापुत्र स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद को ज्ञान, विज्ञान और संकल्प के एक संगम की तरह जानते हैं।

पानी, प्रकृति, ग्रामीण विकास एवम् लोकतांत्रिक मसलों पर लेखक व पत्रकार श्री अरुण तिवारी जी द्वारा स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद जी से की लंबी संवाद श्रृंखला का यह अंतिम कथन है।
स्वामी सानंद गंगा संकल्प संवाद – 21वां कथन
तैने तो मेरे मन की कह दी
तरुण के भविष्य को लेकर मेरी चिंता बढ़ती गई। मैं क्या करुं ? इस प्रश्न के उत्तर की तलाश में मैं घर गया; पिताजी के पास। मेरी मां तो तब नहीं थी। मैने पिताजी को अपनी चिंता से अवगत कराया। उसके बाद मैं दिल्ली लौट आया। लौटने पर सोचता रहा कि क्यों न मैं तरुण को गोद ले लूं। मैने पिताजी को अपना विचार बताया, तो वह बहुत खुश हुए। भरे गले से बोले – ’’तैने तो मेरे मन की कह दी।’’ अब तरुण की मां को तैयार करने की बात थी। यह जिम्मेदारी मैने बाबा को दे दी। इस तरह आर्यसमाजी संस्कार विधि के साथ 1984 में मैने तरुण को विविधत गोद ले लिया।

मैने अपनी वसीयत तरुण के नाम कर दी
उस वक्त तरुण चौथी कक्षा में था। मैं एन्वायरोटेक में था। मैने सोचा कि अकेला रहता हूं; तरुण को बुला हूं। मैने बुलाकर सरस्वती शिशु मंदिर में एडमिशन करा दिया। कुछ दिन तो वह रह गया, लेकिन उसका मन नहीं लगा। मैं उसे लेकर घर गया। वहां उसकी मां अङ गई कि उसे मेरे साथ नहीं जाने देगी। मैने सोचा कि मैने तरुण को सभी के सामने गोद लिया है। लोग मेरे साथ खङे होंगे। लेकिन कोई मेरे साथ खङा नहीं हुआ। तरुण वहीं रह गया। दिल्ली आकर भी मेरा मन बेचैन ही रहा। मैं फिर गांव आया। पिताजी से अपनी बेचैनी बताई। पिताजी ने कहा कि अपनी वसीयत कर दो, तो ये झगङेंगे नहीं। 1986 में मैने अपनी वसीयत तरुण के नाम कर दी। उस वसीयत को मैने कभी बदला नहीं।
मेरा श्राद्ध न किया जाये
1982 में मैने अपनी आंखे ’राजेन्द्र आई बैंक’ को डोनेट कर दी थी। विल (वसीयत) में मैने लिखा है कि मेरी बॉडी का जो भी भाग जिसके उपयोग में आये, उसे दे दिया जाये। शेष किसी मेडिकल कॉलेज को दे दिया जाये। फिर भी कोई हिस्सा शेष रह जाये, तो उसका अंतिम संस्कार आर्यसमाज की पद्धति से हो। कोई श्राद्ध न किया जाये। मेरा प्राणांत कहीं अन्यत्र हो, तो मेरे शरीर के हिस्से का कहां उपयोग हो सकता है; पता करके शरीर वहां देने की बात लिखी है। मैने जेल में भी यह लिखकर दिया है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी के पास भी लिखकर दिया है। उन्होने कहा है कि अक्षरंश पालन होगा।
मैं भू-समाधि या जल-समाधि नहीं चाहता
मैने तरुण से कहा है कि एक सन्यासी के रूप में शिष्य पर गुरु का अधिकार है। मैंने यह भी कहा कि मैं भू-समाधि या जल-समाधि नहीं चाहता।
अविमुक्तेश्वरानंद जी के स्नेह पर भरोसा
मैं तो यह चाहता हूं कि मेरे प्राण निकलते हैं, तो जल्दी निकलें। इससे वर्तमान केन्द्र सरकार (तत्कालीन संप्रग सरकार) पर इतना दबाव तो बढ़ ही जायेगा कि वह रह नहीं पायेगी। मुझे तो यह भी लगता है कि यदि मेरे प्राण निकलते हैं, तो अविमुक्तेश्वरानंद जी ही जितना मुझे स्नेह करते हैं; वह ही नहीं रह पायेंगे। चुनाव (लोकसभा चुनाव-2014) से पहले ही निकल जायें, तो अच्छा।
उन्हे मेरी मृत्यु की प्रतीक्षा है
भाजपा, विश्व हिंदू परिषद व हंसदेवाचार्य प्रतीक्षा कर रहे हैं कि चुनाव से पहले निकल जायें, तो वे इसे चुनाव में मुद्दा बनायें। मैने तरुण से कहा है कि हो सकता है कि मेरे मरने के बाद शंकराचार्य (स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी) मेरे शव पर अधिकार जतायें; कहें कि भू-समाधि ही होगी। तरुण से कहा है कि वह न होने देना। इसके लिए झगङा भी करना पङे, तो झगङ लेना।
(स्वामी सानंद द्वारा अपनी वसीयत और वसीयत में मृत्योपरांत अपेक्षित व्यवहार जैसे बेहद निजी तथ्यों का खुलासा किए जाने से एकबारगी मुझे भ्रम हुआ कि कहीं स्वामी जी को अपनी मृत्यु का पूर्वाभास तो नहीं हो रहा। किंतु मेरा भ्रम, सचमुच एक भ्रम ही था। स्वामी ने स्वयं यह भ्रम तोङा। : प्रस्तोता)
मोदी घोषणा या फिर प्राण त्याग
देखो, मई, 2014 से पहले तो केन्द्र की यह सरकार बदलेगी नहीं और इतना ऐसे इतना लंबा मैं खिंचने वाला नहीं। मैं यह जानता हूं कि मेरे जीवित रहते यह सरकार कुछ करेगी नहीं। लेकिन फिर मैं सोचता हूं कि प्राण देना तो मेरा उद्देश्य है नहीं। मेरा उद्देश्य तो गंगाजी है। ऐसे में यही रास्ता देखता हूं कि यदि प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में मोदी जी घोषणा करें कि उनके नेतृत्व में शासन आया, तो वह गंगाजी पर निर्णय करेंगे; नहीं तो मुझे अपने प्राण त्यागने के अलावा कोई रास्ता नहीं दिखता।
फै्रंकली स्पिकिंग, यदि कोई मुझे मेरे प्राण लेने का कोई साधन मुहैया करा दे, तो मैं उसका मेरी अम्मा (चाची) से भी ज्यादा आभारी रहूंगा।
( विदित हो कि स्वामी सानंद को प्राण लेने वाले साधन की जरूरत नहीं पङी। पुरी के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती जी के आश्वासन पर स्वामी जी वृंदावन पहुंचे। पुरी शंकराचार्य भाजपा के करीबी माने जाते हैं। उन्होने स्वामी सानंद को आश्वस्त किया कि यदि भाजपा सत्ता में आई, तो वह गंगा के पक्ष में निर्णय करेगी। पुरी शंकराचार्य के आश्वासन पर स्वामी सानंद ने भरोसा किया। उन्होने 11 अक्तूबर, 2013 को पुरी शंकराचार्य के हाथों अपना 121 दिन लंबा अनशन संपन्न किया। अनशन संपन्न करते हुए स्वामी सानंद ने कहा कि भाजपा के सत्ता में आने के बाद तीन महीने प्रतीक्षा करुंगा। यदि तीन महीने में प्रधानमंत्री ने अनुकूल घोषणा नहीं की, तो अपने निर्णय पर पुनः विचार करुंगा। – प्रस्तोता)
सभी का आभार
यह और कहना चाहता हूं कि अर्जुन, संदीप पाण्डे और सजल.. ये तीन लङके मेरे सहयोगी रहे; पवित्र भी। अब मैं किसी को वेतन देकर अपने पास नहीं रखना चाहता। हॉस्पीटल (सरकारी अस्पताल, देहरादून) के स्टॉफ…नर्स वगैरह ने मेरा पूरा ख्याल रखा। उन्हे भी दिल से आभार देना चाहूंगा।
साधु समाज से विशेष अपेक्षा
अंत में यही कहूंगा कि जिम्मेदारी सिर्फ सामाजिक संस्थाओं या वैज्ञानिकों की नहीं है। सरकार, तीर्थयात्री, वैज्ञानिक और गंगा पर काम करने वाली तथाकथित संस्थाओं को गंगा की वाकई में चिंता करनी चाहिए। जिन्हे गंगा की सबसे ज्यादा जरूरत है, उन साधु संतों को करनी चाहिए। नहीं करने के सबसे पहले दोषी साधु-संत ही हैं।
( इस 21वां कथन के साथ स्वामी सानंद गंगा संकल्प संवाद श्रृंखला संपन्न हुई। गांधी शांति प्रतिष्ठान के वर्तमान अध्यक्ष कुमार प्रशांत जी ने इसे लेखमाला कहा। प्रस्तोता ने इसेएक ऐसी पाठमाला के रूप में पाया, जिसे पढ़कर सचमुच समझा जा सकता है कि एक व्यक्ति संकल्पित हो जाये, तो क्या कर सकता है; यह भी कि एक व्यक्ति के संकल्प का सहयोग और विरोध किस हद तक हो सकता है। इस पाठमाला से धर्मक्षेत्र और राज्यक्षेत्र की सत्ताओं का वर्तमान चरित्र भी कुछ-कुछ समझा जा सकता है।
जो पाठक और प्रकाशक इस संवाद यात्रा में साथी बने; जिन्होने अपनी प्रतिक्रियाओं से अपनी संवेदना और सुझाव साझा किए; संवाद पढ़कर जिन्होने गंगा कार्य करने का कोई संकल्प मन ही मन तय किया; कुछ मित्रों ने इस संवाद को पुस्तकाकार देने का सुझाव भी दिया; उन सभी का प्रस्तोता हृदय से आभारी है। )

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