लेखक परिचय

देविदास देशपांडे

देविदास देशपांडे

Journalist from Pune.

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हमारे यhindiहां एक आम धारणा है, कि अंग्रेजी भविष्य की भाषा है और आनेवाले समय में रोजगार कमाना हो, तो अंग्रेज का कोई विकल्प नहीं है। फर्राटे से अंग्रेजी बोल पानेवाले लोगों की चालढाल से अभिभूत लोगों के गले से यह भ्रांति आसानी से उतारी जा सकती है। लेकिन वास्तविकता कुछ और कहती है। यह अब स्पष्ट हो रहा है, कि प्रादेशिक भाषा के तौर पर उपहास की जानेवाली भारतीय भाषाएं उतनी ही समर्थ है और आगामी समय में रोजगार हो अथवा व्यापार, डंका इन्ही भाषाओं का बजेगा।

इंटरनेट एंड मोबाईल असोसिएशन ऑफ इंडिया (आयएएमआय) नामक संगठन मोबाईल कंपनियों और इंटरनेट आपूर्तकों की देश में सबसे बड़ा संगठन है। पिछले महिनें इस संगठन ने अपनी एक रपट जारी की, जिसमें कहा है, कि इस वर्ष के अंत तक भारत में इंटरनेट का प्रयोग करनेवालों की संख्या ३९ प्रतिशत से बढ़ेगी और यह मुख्यतः स्थानिक भाषाओं में उपलब्ध सामग्री के कारण होगा। इसका कारण यह है, कि आज इंटरनेट का प्रयोग करनेवाले अधिकांश लोग अंग्रेजी जाननेवाले अथवा बोलनेवाले ही है, इसलिए यहां से आगे जो वृद्धि होगी वह देशी भाषाओं में ही होगी। आजकल चायना फोन में भी देवनागरी टाईप करने की सुविधा दी जाती है, वह यूं ही नहीं दी जाती।

यह रिपोर्ट बताती है, कि देश में शहरी इलाकों में इंटरनेट का प्रयोग करनेवालों की संख्या लगभग 20 करोड़ है और उनमें से लगभग 9 करोड़ लोग अपनी भाषाओं में ही इंटरनेट का प्रयोग करते है। यह अनुपात लगभग 45 प्रतिशत होता है जबकि ग्रामीण इलाकों में 8 करोड़ 10 लाख लोग इंटरनेट का प्रयोग करते है। इनमें से 57 प्रतिशत यानि 4 करोड़ 60 लाख लोग अपनी भाषा में उसका प्रयोग करते है। रिपोर्ट में यह भी कहा है, कि भारतीय भाषाओं से इंटरनेट के प्रयोगकर्ताओं की संख्या प्रति वर्ष 47 प्रतिशत से बढ़ रही है।

अब आप पूछेंगे, कि केवल इंटरनेट के प्रयोगकर्ताओं की संख्या बढ़ने से भाषा का कल्याण कैसे होगा। तो उसका उत्तर भी तैयार है। स्वभाषा में इंटरनेट के प्रयोगकर्ता जिस तादाद में बढ़ेंगे उसी तादाद में संबंधित भाषाओं से डिजिटल विज्ञापन भी बढ़ेंगे। एक अनुमान के अनुसार, आगामी पांच वर्षों में भारतीय भाषाओं में डिजिटल विज्ञापन 30 प्रतिशत से बढ़ेंगे।

सिर्फ आईएएमआई ही क्यों, गुगल जैसी विश्वव्यापी कंपनी भी अब भारतीय भाषाओं पर अधिक ध्यान केंद्रीत कर रही है। पिछले वर्ष नवंबर में गुगल ने खास भारतीय भाषाओं के लिए इंडियन लँग्वेजेस इंटरनेट अलाईन्स (आयएलआयए) नामक संस्था की स्थापना की। इसके अंतर्गत इंटरनेट पर उपलब्ध हिंदी सामग्री एकत्रित करनेवाले एक पोर्टल – हिंदीवेब।कॉम – का आगाज किया गया। अन्य भारतीय भाषाओं का उसमें धीरे धीरे समावेश होगा, यह पत्थर की लकीर है। इस संस्था का उद्घाटन करते हुए सूचना एवं प्रसारण मंत्री प्रकाश जावेडकर ने बाकायदा घोषित किया, कि भारत सरकार इस संस्था को संपूर्ण सहयोग प्रदान करेगी।

इंटरनेट के प्रारंभिक समय में अर्थात् वर्ष तक 2000 इंटरनेट पर अंग्रेजी का आधिपत्य था। इंटरनेट के प्रयोगकर्ता तथा इंटरनेट पर उपलब्ध सामग्री, इन दोनों से अंग्रेजी का ही अविभाज्य संबंध होता। वर्ष 2000 में इंटरनेट की कुल सामग्री में अंग्रेजी सामग्री का हिस्सा 51।3 प्रतिशत था, जो वर्ष तक 2005 में 32 प्रतिशत तक नीचे आया। अमेरिका में किए गए सर्वेक्षणों से पता चला है, कि कोई वेबसाईट यदि दो भाषाओं में उपलब्ध हो, यानि स्थानीय भाषा और अंग्रेजी भाषा में हो, तो वेबसाईट के अंग्रेजी संस्करण का प्रयोग कम होता है।

‘आईएलआईए’ में इंटरनेट उद्योग के 18 भागीदार है और भारतीय भाषाओं में उपलब्ध ऑनलाईन सामग्री का सर्जने, एकत्रीकरण और उसकी खोज के लिए ये भागीदार प्रयास करनेवाले है। ये सब मिलकर इसके लिए प्रयास करेंगे, कि वर्ष 2017 तक 40 करोड़ भारतीय लोग उनकी भाषाओं में इंटरनेट का प्रयोग कर पाए।

इंटरनेट के पार भी, पिछले वर्ष के भारतीय पाठक सर्वेक्षण (आईआरएस) के आंकडों पर नज़र डाले, तो अधिकांश अंग्रेजी समाचारपत्रों की वृद्धि या तो कुंठीत हुई है अथवा रुक चुकी है। अधिकांश समाचारपत्रों की वृद्धि वाढ दोयम और तियम स्तर के शहरों में (महानगरों के अलावा) हुई है और वह भी मुख्यतया भारतीय भाषाओं के प्रकाशनों में ही हुई है।

अंग्रेजी के अति प्रसार का एक नुकसान कैसे होता है, इसका उदाहरण खुद एक अंग्रेज लेखक की किताब से हम जान सकते है। पांच-छह वर्षों पूर्व अंग्रेजी भाषा के भविष्य को लेकर ब्रिटीश कौन्सिल ने डेव्हिड ग्रॅडॉल नामक विशेषज्ञ को अध्ययन करने के लिए कहा था। ग्रॅडॉल की रिपोर्ट ‘इंग्लिश नेक्स्ट’ नाम से प्रसिद्ध है (और अंग्रेजी के अन्य साहित्य की तरह ही इंटरनेट पर मुफ़्त उपलब्ध है)। इसमें ग्रॅडॉल कहते है, “युरोपीय महासंघ में (और विश्व में अन्यत्र भी) अंग्रेजी सीखना तुलनात्मक रुप से सस्ता है किंतु अन्य भाषाएं सीखने के लिए अधिक खर्चा करना पड़ता है। इसलिए विदेशी भाषा के रुप में अंग्रेजी सीखने से मिलनेवाला उत्पन्न आगामी समय में कम होने की संभावना है।”

अब इंग्लैंड सरकार को मिलनेवाला उत्पन्न जिस तरह कमी होगा, उसी तरह हमारे यहां अंग्रेजी के अध्यापकों को मिलनेवाली राशि कैसे कम होगी, एक कल्पनाचित्र बनाइए, तो आप समझेंगे मैं क्या कह रहा हूं। आज ही गांव गांव में पर्सनिलिटी डेव्हलपमेंट (व्यक्तित्व विकास) के नाम में अंग्रेजी सीखानेवाले क्लासेस कुकुरमुत्ते की तरह फैलने के कारण उनके शुल्क और मार्जिन कैसे कम हुए है, इसकी कई कहानियां सुनी जा सकती है।

इंग्लैंड में पिछले चुनाव के दौरान डेविड कॅमेरून ने जिस प्रकार हिंदी भाषा में मतदाताओं को गुहार लगाई और अमेरिका में जब बुश जैसा कन्झर्वेटिव्ह पार्टी का उम्मीदवार स्पैनिश में बोलकर मतदाताओं को रिझाने की जॉर्ज बुश और बराक ओबामा की परंपरा चला रहा है, इनका मतलब है, कि बहुभाषिकता अभी भी कायम है। अमेरिका में भी और अन्यत्र भी।

कहने का मथितार्थ इतना ही है, कि केवल अंग्रेजी जानना ही विकास के दरवाजे अपने आप खोलना नहीं है। इतने आंकड़े विस्तार से देने का कारण यह है, कि मेरी भाषा शायद विश्व की भाषा न हो, लेकिन उसे भविष्य है और वह भविष्य की भाषा है, यह आत्मविश्वास उसमें से मिल सकता है। इतना हो पाए तो भी बस है।

 

  • देविदास देशपांडे

 

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2 Comments on "मेरी भाषा – भविष्य की भाषा"

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देविदास देशपांडे
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लक्ष्मीरंगमजी
यह होगा। जरूर होगा।

Laxmirangam
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देवीदास जी,

काश ! आपकी कीमना इच्छा या कहें कथन मेरे जीते जी स्त्य होता देख सकूँ.

आशान्वित…

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