लेखक परिचय

अरुण तिवारी

अरुण तिवारी

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प्रस्तुति : अरुण तिवारी
प्रो जी डी अग्रवाल जी से स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद जी का नामकरण हासिल गंगापुत्र की एक पहचान आई आई टी, कानपुर के सेवानिवृत प्रोफेसर, राष्ट्रीय नदी संरक्षण निदेशालय के पूर्व सलाहकार, केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के प्रथम सचिव, चित्रकूट स्थित ग्रामोदय विश्वविद्यालय में अध्यापन और पानी-पर्यावरण इंजीनियरिंग के नामी सलाहकार के रूप में है, तो दूसरी पहचान गंगा के लिए अपने प्राणों को दांव पर लगा देने वाले सन्यासी की है। जानने वाले, गंगापुत्र स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद को ज्ञान, विज्ञान और संकल्प के एक संगम की तरह जानते हैं।

पानी, प्रकृति, ग्रामीण विकास एवम् लोकतांत्रिक मसलों पर लेखक व पत्रकार श्री अरुण तिवारी जी द्वारा स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद जी से की लंबी बातचीत के हर अगले कथन को हम प्रत्येक शुक्रवार को आपको उपलब्ध कराते रहेंगे यह हमारा निश्चय है।
आपके समर्थ पठन, पाठन और प्रतिक्रिया के लिए फिलहाल प्रस्तुत है :

स्वामी सानंद गंगा संकल्प संवाद – 18वां कथन

निलय के बाद बोर्ड मीटिंग की अध्यक्षता कौन करे ? मौजूद सदस्यों में कर्नाटक प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के हनुमत राव ही सीनियर मोस्ट थे। उन्होने ही चेयर किया। कार्य समिति ने केस करने हेतु अप्रूव कर दिया। अगले दो दिन में मैने मिनिट्स (बैठक की कार्यवाही रिपोर्ट) तैयार कर दिए। मिनिट्स को साइन के लिए निलय चौधरी के पास भेजा। आमतौर पर वह किसी भी फाइल में अधिकतम 15 दिन में साइन कर देते थे। मिनिट्स पढ़कर वह बोले कि इसे रहने ही दो। मैने ऐसा करने से मना किया, तो बोले – ’’ अच्छा इसमें बदलो। लिखो कि इस पर अगली बोर्ड बैठक में निर्णय किया जायेगा।’’ इससे देरी होगी; जानने के बावजूद मैने मंजूर कर लिया।
बोर्ड बैठक में खेल
अगली बोर्ड बैठक तीन महीने बाद हुई। इसमें कुछ पुराने लोग नहीं आये। इस बोर्ड बैठक में एक नया मुद्दा उठा दिया गया – ’’ हम प्राइवेट और पब्ल्कि को एक जैसा ट्रीट कर सकते हैं, लेकिन वाटर सप्लाई के लिए ट्रीटमेंट तो जन सेवा का कार्य है। यूं भी सेक्रटरी – सेन्टल पॉल्युशन कंट्रोल बोर्ड का काम तो पॉल्युशन कंट्रोल करने का है; तो हम उसे कैसे रोक सकते हैं ?’’
मंत्री की मंशा
उस वक्त गुजरात वाले दिग्विजय सिंह, यहां सेंट्रल में पर्यावरण के स्टेट मिनिस्टर थे। दो दिन बाद उन्होने मुझे बुलाया। मुझे समझाया – ’’देखो, अभी प्राइवेट और पब्लिक में फर्क है। आगे जब ऐसी स्टेज आयेगी कि दोनो में फर्क नहीं रहेगा, तब हम भी फर्क नहीं करेंगे। अभी तो यही स्थिति है।’’
मुझे अजीब सा लगा। मैने फिर कहा – ’’ पॉल्युशन इज पॉल्युशन। अब यदि आप यह नहीं मानते, तो आजीविका के लिए नौकरी करना मेरे लिए कोई विवशता नहीं है। ऐसे में इस्तीफा के अलावा मेरे पास क्या विकल्प बचता है ?’’

उन्होने मेरी पीठ थपथपाई। बोले कि ऐसा ही आदमी चाहिए, लेकिन अभी थोङा ढीला होने की जरूरत है।
सिद्धांत पुनः आया आङे ; छोङी नौकरी
वहां से लौटकर मैने इस्तीफा दे दिया। देखिए कि जो निलय चौधरी बिना एप्लीकेशन दिए मुझे पद पर ले आये थे, वे ही मिनिस्ट्री के सेक्रेट्री बृजकिशोर से कह रहे थे कि देखना, कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारा छोटा मंत्री जी डी का इस्तीफा स्वीकार ही न करे।
एन्वायरोटेक कंपनी बनी नया ठिकाना
इसके बाद 1984 से 1992 तक एन्वायरोटेक कंपनी के लिए काम किया। 1989 में बांग्ला देश का काम मिला, तो सोचा कि वहां से मिले पैसे बचा लेने हैं; सिर्फ उसके ब्याज से काम चलाना है। खैर ये सब तो हुआ, लेकिन सच कहूं तो मेरा सबसे वाइड एक्सपोजर तो इंस्टीट्युशन्स के साथ हुआ।
तरुण भारत संघ से पहला परिचय
1989 में पहली बार तरुण भारत संघ गया। पहले नहीं गया था। तरुण भारत संघ का आश्रम, अलवर के गांव भीकमपुरा में है। उस वक्त वहां…जोहङ रिचार्ज के लिए लगाये जंगल को बचाने को लेकर लङाई थी।

आप अग्निवेश जी को जानते हैं। उनके संगठन बंधुवा मुक्ति मोर्चा को जानते हैं। उन्होने कुछ बंधुवा मज़दूर मुक्त कराये थे। उन्हे लेकर वे कलेक्टर के पास गये होंगे। मुक्त हुए वे मज़दूर अपनी बकरी, परिवार वगैरह लेकर भीकमपुरा आ गये।
तब तक तरुण भारत संघ के लगाये पेङ छोटे ही थे। मज़दूरों ने क्या किया कि पेङ काट दिए। इस पर राजेन्द्र जी ने अनिल अग्रवाल ( विज्ञान पर्यावरण केन्द्र, नई दिल्ली के संस्थापक ) से संपर्क साधा। उन्होने एक समूह बना दिया। समूह में अनिल तो थे ही। प्रभाष जोशी, अच्युतानंद मिश्र, सुनीता नारायण के अलावा मुझे भी कहा। हम वहां गये; एक गाङी सी. एस. सी. की और एक एन्वायरोटेक की।
जहां आज डाइनिंग हॉल है, तब वहां टिन का बरामदा था। पहुंचे, तो राजेन्द्र एक चारपाई पर बैठे थे। उन्होने समस्या बताई। वे हमें लेकर साइट पर गये। हमने उनके जोहङ देखे। बाद में गांव में बैठक हुई। अब यह था कि बंधुवा मज़दूरों के साथ भी सहानुभूति होनी चाहिए। अनिल ने कहा कि कलेक्टर से बात करते हैं। गांव को जंगल लगाने में सहायता करेंगे। ऐसा तय करके हम लौट आये। वापस आते हुए एन्वायरोटेक की गाङी का एक्सीडेंट हो गया। सुनीता, उसी गाङी में थी।
जी डी की डाक पर राजेन्द्र का जवाब
वहां से लौटकर मैं बांग्ला देश चला गया। बांग्ला देश से लौटकर मुझे हुआ कि मैं जोहङ के काम से जुङूं; इरीगेशन में रहूं। यह बात 1991 की है। मैने राजेन्द्र सिंह को एक पोस्टकार्ड लिखा। जवाब में राजेन्द्र सिंह का पत्र आया -’’आइये, स्वागत है। लेकिन अपनी इंजीनियरिंग वहीं छोङकर आना।’’
मैने सोचा कि ठीक है, यही सही। इस बार मैं दो-तीन दिन के लिए गया। फिर उनसे साथ संपर्क बढ़ता गया। उन्होने दो ट्रेनिंग प्रोग्राम किए। उसमें मुझे बुलाया। साइट सेलेक्शन, डिजायन वगैरह पर ट्रेनिंग रखी। उनमें भी बुलाया। तरूण भारत संघ में मेरा ज्यादा संपर्क मैनपाल सिंह से रहता था। अलवर बाढ़ के समय प्रो. मिश्र, दिनेश मिश्र भी आये। उस समय 80 प्रतिशत काम मैने और मैनपाल को ही करना पङा। फिर तो राजेन्द्र सिंह से पारिवारिक संबंध हो गये। मौलिक से भी मेरी पटती थी; रेनु से तो और भी। फिर राजेन्द्र सिंह ने कभी नहीं कहा कि अपनी इंजीनियरिंग छोङकर आना।
(तरुण भारत संघ के कार्यकर्ताओं को तकनीकी तौर पर सक्षम बनाने के काम में स्वामी सानंद के योगदान से मैं काफी-कुछ परिचित हूं। गंगा समस्या के समाधान की रणनीति को लेकर स्वामी जी और राजेन्द्र सिंह जी के बीच मत भिन्नता से भी मेरा परिचय है। एक तरफ उतने समर्पण के साथ दिया गया योगदान और दूसरी तरफ मत भिन्नता; ये व्यवहार बताते हैं कि स्वामी जी की दृष्टि साफ है और निर्णय के मामले में भावुकता से दूर है। अतः मैने स्वामी जी से इस पर प्रतिक्रिया जाननी चाही कि कई लोग उन्हे स्वभाव से काफी रूखा और व्यक्तिवादी पाते हैं। अगले कथन में पढ़िए स्वामी सानंद स्वयं क्या कहते हैं अपने स्वभाव के बारे में। – प्रस्तोता )

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