लेखक परिचय

सुधा सिंह

सुधा सिंह

विजिटिंग प्रोफेसर, ओरिएंटल लैंग्वेज डिपार्टमेंट, इंस्टीट्यूट ऑफ वर्ल्ड लैंग्वेज, तुर्कमेनिस्तान.

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आखिरकार शाहरूख की फिल्म ‘माई नेम इज़ खान’ रिलीज हो ही गई। देश के अन्य हिस्सों की तरह मुंबई में भी यह हाउसफुल गई। हर तरफ फिल्म का स्वागत किया गया। बर्लिन फिल्म फेस्टिवल में भी यह फिल्म क़ामयाब रही। अमेरिका, पाकिस्तान और अन्य देशों में भी यह स्थिति है। लेकिन इस फिल्म के रिलीज के पहले और रिलीज के दौरान भी कई तरह की राजनीति चल रही थी। हिन्दुत्ववादी मुद्दा हिन्दुस्तान में और ज्यादा नहीं चल सकता शिवसेना को भी यह समझ लेना चाहिए। फिल्म की सफलता को देखकर यही कहा जा सकता है कि जनता सबसे बड़ी है। जनता से ऊपर कुछ नहीं है। जनता ने अपना फैसला कर लिया। जनता का हीरो बाल ठाकरे नहीं शाहरूख खान हैं, यह जनता ने साबित कर दिया। भेदवादी दृष्टि को एक सिरे से नकार कर साबित कर दिया कि वह परिपक्व है और अपने फैसले लेना जानती है। बस मौका और समय का इंतजार करती है। बालीवुड ने भी इस मुद्वे पर अपनी एकजुटता दिखाई। बालीवुड की नामी हस्तिया फिल्म देखने गईं। कइयों को लौटना पड़ा क्योंकि फिल्म हाउसफुल थी। कबीर बेदी जैसे अनेक कलाकार टिकट न मिलने के कारण लौटने पर मज़बूर हुए।

चाहे यह कहा जाए कि फिल्म मुंबई और हिन्दुस्तान के अन्य जगहों पर सुरक्षा के साए में कहें तो हमलों की आशंका के बीच रिलीज हुई। लेकिन फिल्म को लेकर जनता के उत्साह और भारी संख्या में मल्टीप्लेक्स और सिनेमाघरों की तरफ उसके रूख ने भय और आतंक की राजनीति को धता बता दी। जनता ने समझा दिया कि सेलेक्ट या रिजेक्ट वही करेगी। यह हक किसी और को नहीं देगी। जनता के रवैय्ये के कारण मल्टीप्लेक्स मालिकों को भी अपने रूख में परिवर्तन करना पड़ा। एक दिन बाद ही सही कई मल्टीप्लेक्सों ने अपने यहा¡ फिल्म रिलीज की। हमें यह देखना चाहिए कि बाल ठाकरे बनाम शाहरूख खान के इस पूरे विवाद में मूल मुद्वा न तो ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाना है न ही सस्ती लोकप्रियता हासिल करना बल्कि यह है कि बाल ठाकरे और शिवसेना की जो हेज़ेमनी मुम्बइया फिल्मों पर है उसे शाहरूख मानते हैं कि नहीं मानते।

हमेशा सांप्रदायिक ताकतें सामान्य और गैर ज़रूरी मुद्दों पर हंगामा शुरू करती हैं और पूरा का पूरा स्पेस अपने लिए ले लेती हैं। शाहरूख के धर्मनिरपेक्ष रवैये और टेलीविजन चैनलों के अहर्निश सहयोग ने शाहरूख को नैतिक तौर पर बाल ठाकरे की तुलना में ऊपर रखा उससे टेलीविजन चैनल का एक नया स्वरूप सामने आ रहा है। चैनलों ने आम तौर पर बाल ठाकरे और उनके अनुयायियों के खिलाफ नरम रूख़ रखा है कि ऐसा पहली बार हुआ है कि वे शाहरूख के साथ एकजुट रहे। यह ठीक है कि फिल्म व्यवसाय के लिए ही तैयार की गई है। लेकिन शाहरूख और बाल ठाकरे का विवाद बुनियादी तौर पर शिवसेना के वर्चस्व के खिलाफ जो अंतर्विरोध जो फिल्म उद्योग में बन रहा है उसकी मुखर अभिव्यक्ति है।

फिल्म को रिलीज न करने के पीछे मल्टीप्लेक्स मालिकों की यूनियन का सांप्रदायिक नजरिया व्यक्त होता है जो पहले भी अनेक मौकों पर अपनी इस वैचारिक पक्षधरता को अभिव्यक्त करता रहा है। उल्लेखनीय है कि मुम्बई के मल्टीप्लेक्स मालिकों ने बाल ठाकरे के दबाव में आकर यह निर्णय लिया। बालठाकरे और शिवसेना ने जब ये देखा कि तथाकथित ‘जनता’ और हिंसा के दबाव से फिल्म को प्रदर्शित होने से नहीं रोक पा रहे हैं तो उन्होंने मल्टीप्लेक्स मालिकों की लॉबी पर दबाव डाला ओर मुम्बई के बड़े हिस्से में और खासकर मल्टीप्लेक्सों में फिल्म को रिलीज होने से रोका। शिवसेना के वरिष्ठतम नेता मनोहर जोशी स्वयं एक मल्टीप्लेक्स में फिल्म बंद कराने पहुँचे। उल्लेखनीय है कि मनोहर जोशी बाल ठाकरे के बाद शिवसेना में सबसे बुजुर्ग नेता हैं। राजनीतिक इतिहास में किसी भी दल के इतने बड़े राष्ट्रीय नेता के द्वारा सिनेमाघर बंद कराने की घटना अपने आप में अनूठी घटना है। इससे यह भी पता लता है कि महाराष्ट प्रशासन ने जिस सख्ती के साथ शिवसेना के कार्यकताओं की धरपकड़ की, उन्हें थानों में बंद किया उसके चलते शिवसेना के पास हॉल बंद कराने के लिए कार्यकर्ताओं का भी अकाल पड़ गया। बाल ठाकरे और उनके अनुयायी कम से कम एक सबक लें कि जनता और राज्य अगर मिल कर कार्रवाई करते हैं तो सांप्रदायिक शक्तियों को आसानी से अलग-थलग किया जा सकता है। दूसरा सबक शाहरूख के रवैय्ये से लेना होगा कि कलाकार को अपने विचारों के लिए किसी भी हद तक कुर्बानी देने के लिए तैयार रहना चाहिए और सांप्रदायिक ताक़तों की प्रेशर पॉलिटिक्स के सामने झुकना नहीं चाहिए। उल्लेखनीय है कि यही बाल ठाकरे मणिरत्नम की ‘बाम्बे’ और अमिताभ की ‘सरकार’ फिल्म में भी अपनी दबाव की राजनीति के चलते दर्जनों दृश्यों को कटवा चुके हैं। कम से कम शाहरूख खान ने अभी तक न तो माफी मांगी और न ही किसी भी क़िस्म के दबाव के आगे समर्पण किया है। शाहरूख खान का बाल ठाकरे के खिलाफ़ खड़े होना इस बात का भी संकेत है कि अब शिवसेना का मुम्बई फिल्म उद्योग में प्रभाव घटना शुरू हो गया है और ये भविष्य के लिए सिर्फ एक ही चीज का संकेत है कि मुम्बई फिल्म उद्योग में बाल ठाकरे के दिन अब लदने शुरू हो चुके हैं।

(सुधा सिंह, एसोसिएट प्रोफेसर, दिल्ली विश्वविद्यालय)

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14 Comments on "“बाल ठाकरे के वर्चस्व की विदाई का शोकगीतः माई नेम इज़ खान”"

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p.c.rath
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mujhe achha laga ki amitabh jase mega star ke thakare charanchumban se hat kar shahrukh ne is sandesh se bhari hui film ke liye jhukane se inkar kiya . aise aalekho se ghina kee rajneeti karne walo ko sabak milega aur bal thakare jaisi marati hui takato ke chita me eak lakadi aur badegi.
P.C.RATH

om prakash shukla
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सुधाजी,आपका लेख कांग्रेस के प्रेस विज्ञप्ति का एहसास महसूस होती है जिसे किसी खास मकसद से लिख गस्य लगता है क्योकि जबतक बालठाकरे क्यों सक्रिय हुए इसपर विचार नहीं होगा आपका लाख एक्पचिया ही होगा,यद् कीजिये सबसे पहले सत्तारूढ़ दल दुओरा राजठाकरे को छुट दे कर पुरबियो को गलिय दिलाई गयी या उनकी उपचा केर राजठाकरे को हीरो बनाने का अपराध करने वाले कांग्रेस नीट सर्कार को क्यासे माफ़ किया जा सकता है.हिन्दुस्ता में वोट बैंक की राजनीत की मज़बूरी है की अपने वोट बैंक के लिए और विरोधियो को कमजोर करने के लिए कांग्रेस हमेश ही यही कराती रही… Read more »
pragya
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भारत राजकिशोर जी की बात से हम शत पतिशत सहमत हैं कि क्या वन्देमातरम के मुद्दे पर भी लोग इस तरह सामने आयेंगे ? क्या हुसैन की पेंटिंग्स के विरोध पर प्रशासन इस तरह शामिल होगा ? नहीं ऐसा हरगिज़ नहीं होगा . धर्म निरपेक्ष केवल वह है जो मुसलमान के दुःख दर्द की बात करे! बिरले ही देश – हित के असली मुद्दों पर मुंह खोलने की सामर्थ्य रखते हैं !यह एक बहुत बड़ा सच है . . .

Prem Prabhakar
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सुधाजी, आपने लेख में यह तो दिखाया की जनता और राज्यशक्ति के संगठित प्रयास से सांप्रदायिक सक्तियों का विरोध संभव है. किन्तु यह मुस्तैदी आम आवाम की नहीं बल्कि मल्टीप्लेक्स में फ़िल्म देखनेवालों ,फिल्म-इंडस्ट्री और जनता के बीच रसूख रखनेवालों ने दिखाई व्यापारिक लाभ-हानि के प्रत्यक्ष और परोक्ष –दोनों प्रकार के ख्याल से भी यह विरोध संचालित था. एक जनतांत्रिक देश में आम जनता की ओर से ऐसा प्रयास होता तो और अच्छा था …दरअसल ,ऐसी परिस्थिति गांवों और छोटे शहरों में नहीं बन पाती. प्रशासन और मीडिया यहाँ सांप्रदायिक तत्वों की आवाज इस तरह प्रस्तुत करते हैं गो की… Read more »
Dr.Lal Ratnakar
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“ब्लॉग पढ़ा कोई बहुत अच्छा इसलिए नहीं लगा क्योंकि मुंबई तो इन्हें नज़र आयी पर उत्तर प्रदेश जिसके पूर्वांचल का ज्यादा आदमी मुंबई में पर ‘माई नेम इज पुरबिया’ कभी कहा होता तो उसका भी विरोध नहीं होता ! पर उत्तर प्रदेश का वह पुरबिया पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भी बाहरी है, पर दिक्कत यही है कि जब मुसलमान चुनौती देता है तब ठाकरे हो या देश का कोई हिस्सा हो वही मिलेंगे विरोध कराने वाले जिनमे दम होता है, यही कारण है कि मुसलमान ‘खान’ इज खान ‘मुंबई’ इज मुंबई एंड ठाकरे इज ओनली ठोकरें,”

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