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डॉ. बचन सिंह सिकरवार

पड़ोसी देश म्यांमार में कोई दो दशक बाद हाल में हुए तथाकथित संसदीय आम चुनाव के वैसे ही नतीजे अब गए हैं जैसा कि इनके होने से पहले दुनिया भर के लोगों ने सोच रखा था। कारण ये चुनाव-चुनाव नहीं ,बल्कि चुनाव के नाम पर इस देश की जुण्टा(सैन्य) सरकार को दुनिया को चुनाव कराने का दिखावा करना भर था। ऐसा करके अब म्यांमार की सैन्य सरकार अपनी पीठ खुद ही खुद भले थपथपा ले और ज्यादा से ज्यादा उसका पड़ोसी चीन अपने तमाम फायदों को मद्देनजर रखते हुए उसकी इस धोखाधड़ी को सही ठहरा रहा है। नहीं तो, दुनिया के ज्यादातर मुल्कों को इस सैन्य सरकार के असल इरादों का पहले से ही अच्छी तरह पता था।

अब सैन्य सरकार ने इस चुनावी नाटक से अपने ही सैन्य अधिकारियों में से कुछ को बवर्दी तो कुछ को बगैर वर्दी के चुना हुआ दिखा दिया है,ताकि उस पर आर्थिक पाबन्दियाँ हट सकें। हाल में हुए इस चुनाव में मुख्य मुकाबला सैन्य जनरलों के छद्म राजनीतिक दल ‘यूनियन सॉलिडरिटी एण्ड डेपलपमेण्ट पार्टी’ (यू.एस.ए.डी.पी.) और सेना समर्थित ‘नेशनल यूनिटी पार्टी'(एन.यू.पी.) के बीच था। इनमें ‘यू.एस.डी.पी.’के नेता सेना द्वारा मनोनीत प्रधानमंत्री थेन सेन (थीन सीइन) हैं तो दूसरी ‘नेशनल यूनिटी पार्टी’ के नेता उप सेनापति तुनयी,जो खाकी वर्दीधारी हैं। आंग सान सू की के नेतृत्व वाले देश के प्रमुख राजनीतिक दल ‘नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी’ (एन.एल.डी.) ने इस चुनाव का बहिष्कार किया हुआ था, जिसने 27मई, 1990 के आम चुनाव में अस्सी प्रतिशत सीटें जीती थीं। लेकिन सैन्य सरकार ने उसे सत्ता नहीं सौंपी थी। इसके विपरीत इसकी नेता आंग सान सू की को नजरबन्द कर दिया। यहाँ तक उन्हें मताधिकार से भी वंचित कर दिया। अब जिन विपक्षी राजनीतिक दलों ने इस चुनाव में भाग लिया। उनके नेताओं ने भी धमकाए जाने और चुनाव में अनियमितताओं की शिकायत की है। सबसे बड़ी विपक्षी राजनीतिक दल ने 1159 संसदीय सीटें में से केवल 164पर ही प्रत्याशी खड़े किये थे ,जबकि यू.एस.डी.पी. ने सभी स्थानों पर।

गत रविवार 7 नवम्बर को पड़ोसी म्यांमार में हुए संसदीय चुनाव में सैन्य सरकार ने अपनी मनमानी करने के इरादे से न केवल सेना के लोग के तथाकथित राजनीतिक दलों का गठन किया ,बल्कि विपक्षी राजनीतिक दलों को इस चुनाव में हिस्सा न लेने के लिए तमाम हथकण्डे अपनाये। उसने प्रमुख विपक्षी दल ‘नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी'(एन.एल.डी.)पर यह प्रतिबन्ध लगाया कि वह अपनी सर्वोच्च नेता आंग सान सू की का नाम अपनी सदस्यता सूची से हटाए। ऐसा किये बगैर उसे चुनाव लड़ने की मान्यता न मिलेगी। इस सरकार ने यह नियम बना रखा कि जिन राजनीतिक दलों के नेता या कार्यकर्ता जेल में हैं उन्हें चुनाव लड़ने की अनुमति नहीं है। इस स्थिति में ‘एन.एल.डी.’ने चुनाव न लड़ने का फैसला किया। दूसरे विपक्षी दलों के उम्मीदवारों को रोकने के लिए जमानत राशि 25000रुपए रखी ,जिसे भरना हर किसी के लिए सम्भव नहीं था। सभी उम्मीदवारों को मतदाता सूची उपलब्ध नहीं करायीं गयीं।कुछ प्रत्याशियों को मूल्य लेकर भी टुकड़ों में मतदाता सूचियाँ दी गयीं। इस चुनाव में प्रचार करने पर रोक लगी थी। यहाँ तक कि राजनीतिक दलों के जन सभाएँ करने पर भी प्रतिबन्ध था। इसके अलावा प्रसारण और पोस्टर लगाने की भी अनुमति नहीं थी। वैसे भी म्यांमार में जन संचार माध्यम(मीडिया) पर राज्य का पूरा नियंत्राण है। इस देश में सिर्फ एक ऍंग्रेजी भाषा का दैनिक समाचार-पत्र प्रकाशित होता है उसमें भी अस्सी प्रतिशत सरकारी विज्ञप्तियाँ ही छपती हैं। इस तथाकथित चुनाव की असलियत दुनिया के सामने न आने पाए इस लिए सैन्य सरकार ने विदेशी पत्रकारों और पर्यवेक्षकों के आगमन पर रोक लगा दी। सैन्य सरकार ने बड़ी मुश्किल से संयुक्त राष्ट्र संघ के पर्यवेक्षकों को ‘कन्डक्टेड टूर’ पर मतदान केन्द्रों पर घुमाने की अनुमति दी थी।

यह संसदीय आम चुनाव 2008 में बनाए नए संविधान के अन्तर्गत हुए हैं। यह अलग बात है कि इस मुद्दे पर हुए जनमत संग्रह का बड़ी संख्या में लोगों ने बहिष्कार किया था। नए संविधान के अन्तर्गत संसद की एक चौथाई स्थान सैन्य शासन द्वारा मनोनीत सदस्य से भरे जाने का प्रावधान है। इस बार लगभग 57 जगहों पर केवल एक ही नामांकन स्वीकारा गया है। परिणामतः वे सभी बिना किसी चुनाव के ही निर्वाचित हो गए। इनमें विदेश मंत्री न्यान बिन भी शामिल थे। 14 प्रदेशीय और राष्ट्रीय संसद के दोनों सदनों के 1158 सदस्यों के लिए कुल सवा तीन हजार प्रत्याशी खड़े हुए थे, जिनमें 82 निर्दलीय और शेष 37 दलों द्वारा नामित थे। निर्दलीय प्रत्याशी सेना द्वारा समर्थित थे। संवाद समितियों की रपट के अनुसार मतदान का समय दस घण्टे था। फिर भी लगभग सभी मतदान केन्द्र खाली पड़े रहे। केवल एक मतदान केन्द्र पर एक ही व्यक्ति ने अपनी परिवार के शेष नौ मतपत्राों पर मुहर लगा दी। अब नतीजा यह है कि यूएस डीपी को 77 प्रतिशत यानी 878 स्थानों पर सफलता मिली है।

भारत के उत्तर-पूर्व में म्यांमार का क्षेत्रफल 676,553वर्ग किलोमीटर है। इसकी राजधानी यंगून(रंगून) और ,मुद्रा ‘क्यात’ है। यहाँ के लोग बौध्द धर्म के अनुयायी है जो बर्मी ,कबायली भाषाएँ बोलते हैं। इसके अन्य प्रमुख शहर-माण्डले, बैसीन, मालमीन हैं। यहाँ की मुख्य उपज मक्का, चावल, तम्बाकू, कपास, सागौन की लकड़ी आदि तथा खनिज सम्पदा टीन, चाँदी, पेट्रौल इत्यादि हैं। बर्मा में लाल मणि और नीलम अद्वितीय हैं।

वर्तमान ‘म्यांमार’ पूर्व का ‘बर्मा’ या ‘ब्रह्म देश ‘शुरू में ऍंग्रेज के भारत पर शासन के समय यानी 1885 से अप्रैल, 1937 तक इसी का प्रदेश बना रहा। इसके पश्चात् ब्रिटिश कामनवेल्थ का एक अलग राज्य बन गया। द्वितीय विश्व युध्द के समय बर्मा पर जापान ने कब्जा कर लिया। 14 अगस्त, 1945 में जनरल आंग सांग ने लोकतंत्र की पुनर्स्थापना की माँग की और इसी वर्ष उनकी हत्या कर दी गयी। 4 जनवरी, 1948 को बर्मा स्वतंत्राता प्राप्त हो गयी और इसका नाम यूनियन ऑफ बर्मा रखा गया। सन् 1961 मेंं बर्मा ने देश का राष्ट्रीय धर्म बौध्द धर्म घोषित कर दिया।

सन् 1962 में जनरल नेविन की क्रान्तिकारी परिषद् ने इस देश की सत्ता ने सम्भाली। सन् 1971 में बर्मा ने समाजवाद का कार्यक्रम स्वीकार किया। नेविन ने 26 साल तक शासन किया। लेकिन 1988 में जन असन्तोष ने उन्हें सत्ता छोड़ने को विवश कर दिया। 27सितम्बर,1988 को आंग सान सू की ने ‘नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी’ का गठन किया। मई, 1989 में बर्मा ने नया यूनियन ऑफ म्यांमार कर दिया गया।

ऑंग सांग सू की ने अपने 20 वर्ष के संघर्ष में से आठ साल से अधिक समय नजरबन्दी में गुजारे हैं। अब विश्व जनमत के दबाव में 9नवम्बर,2010 को उन्हें नजरबन्दी से रिहा कर दिया है। इस पर भारत सहित दुनिया के अनेक देशों ने प्रसन्नता और संतोष व्यक्त किया है।

भारत को अपने इस पड़ोसी देश में सैन्य शासन को लेकर कोई खुश नहीं है लेकिन चीन की इस मुल्क में सक्रियता के कारण वह भी अपनी जुबान बन्द रखने को मजबूर है। दरअसल, चीन म्यांमार में अपने आर्थिक तथा सामरिक हितों को देख रहा है। चीन के उत्पादों के लिए म्यांमार के सैन्य सरकार ने अपना बाजार खोल दिया है। द्वीप स्थल तक तेल की पाइप लाइन बिछ रही है जिससे चीन की सस्ते में तेल की पाइप लाइन तैयार हो रही है। अफ्रीकी बन्दरगाह से हिन्द महासागर के रास्ते सम्पर्क सूत्रा मिल जाएगा। इससे चीन को पूर्वोत्तर भारत पर जासूसी और सामरिक केन्द्र बनाने का अड्डा मिल जाएगा। ‘भारत को घेरे’ वाली रणनीति के अन्तर्गत बलूचिस्तान से लेकर श्रीलंका तक चीन की तैयारियाँ में म्यांमार एक अतिरिक्त कड़ी उपलब्ध कराएगा।

चीन की इस नीति के जवाब में भारत ने भी म्यांमार के साथ सुरक्षा समेत पाँच समझौतों पर हस्ताक्षर किये हैं। ये हैं-आतंकवाद रोकने में दोनों देश के मध्य सहयोग के साथ-साथ ऊर्जा तथा विकासात्मक परियोजनाएँ भी सम्मिलित हैं। भारत ऊर्जा, विज्ञान, प्रौद्योगिक, औद्योगिक प्रशिक्षण, रेल, सड़क, जलमार्ग विकास , दूर संचार संबंधी परियोजनाओं में में म्यांमार की सहायता कर रहा है। म्यांमार ने भारत से सूचना प्रौद्योगिकी, औद्योगिक विकास और आधारभूत विकास में सहायता की माँग की है। भारत ने इन सभी माँगों को मान लिया है। भारत ने म्यांमार के सबसे महत्त्वपूर्ण पर्यटन स्थल बागान के आनन्द मन्दिर को सजाने एवं संवारने हेतु समझौते पर हस्ताक्षर किये हैं। वह इस देश में ऊर्जा के क्षेत्रों में एक अरब डॉलर का निवेश करने जा रहा है। इसकी भारत- म्यांमार -थाईलैण्ड राजमार्ग विकास परियोजना,एनएचपीसी की ओर से एक जल विद्युत परियोजना ,टाटा मोटर्स द्वारा निर्मित ट्रकों के पुर्जे जोड़ने (असेम्बली) संयंत्रा लगाये जाने की योजना है। भारत-म्यांमार सीमा पर व्यापार चौकी स्थापित किया जाना भी प्रस्तावित है। हालाँकि भारत की इस नीति पर नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्राी अमर्त्य सेन ने क्षोभ व्यक्त करते हुए कहा, ‘चीन की भूमिका से चिन्तित होकर महात्मा गाँधी का देश भारत उसी का अनुसरण कर रहा है और अपने आदर्शों को खो रहा है।’

जब म्यांमार में चुनाव हो रहे थे, ठीक उसी समय अमरीका के राष्ट्रपति बराक ओबामा आशा व्यक्त कर रहे थे कि म्यांमार के चुनाव न स्वतंत्र होंगे और न निष्पक्ष ।

अब जहाँ सैन्य सरकार का कहना कि यह चुनाव लोकतंत्र की तरफ एक बड़ा कदम है, वहीं दूसरी ओर अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा समेत कई आलोचकों ने इन चुनावों का धोखाधड़ी बताया है। म्यांमार की ‘नेशनल डेमोक्रेटिक फोर्स पार्टी’के

अध्यक्ष थान नयेन ने कहा ,’गलत तरीके अपनाये जाने के कारण यह चुनाव अपेक्षाओं से बहुत अलग रहा। मतदान के दौरान धोखाधड़ी के सबूत मौजूद हैं। उम्मीदवारों ने शिकायत भी की थी। संयुक्त राष्ट्र संघ ने म्यांमार में 7नवम्बर को हुए संसदीय चुनावों में पारदर्शिता का अभाव था। 8नवम्बर को संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बान की मून ने कहा कि म्यांमार की सैन्य सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वहाँ लोकतंत्र की शुरुआत के साथ ही राष्ट्रीय स्तर पर सुलह और मानवाधिकारों का पूरा सम्मान किया जाएगा। मून ने म्यांमार की जेल में बन्द लोकतांत्रिाक कार्यकर्ता आंग सान सू की सहित सभी राजनीतिक बन्दियों का रिहा किया जाने का आह्नान किया था। इन चुनावों के कारण 8 नवम्बर को म्यांमार के कारेन राज्य के म्यावेडी कस्बे में हुई भारी हथियारों से की गोलीबारी में कम से कम की तीन लोगों की मौत हो गयी तथा 11 अन्य घायल हो गए। इस हिंसा के चलते जातीय विद्रोहियों और सरकारी सेना के बीच गृह युध्द की आशंका उत्पन्न हो गयी थी। इन लोगों की म्यांमार में अल्पसंख्यकों की जनसंख्या 40प्रतिशत के करीब है। इसके साथ लगभग 20हजार लोगों को पड़ोसी थाइलैण्ड की तरफ भागना पड़ा है।

अब म्यांमार की जुण्टा सरकार ने दिखावे को ही सही लोकतंत्र समर्थक नेता आंग सान सू की की रिहाई के साथ कुछ राजनीतिक गतिविधियाँ करने की छूट दी है लेकिन अभी भी इस मुल्क में 2200 के करीब राजनीतिक बन्दी हैं जिन्हें अपनी मुक्ति की प्रतीक्षा है। अब देखना यह है कि यह सैन्य सरकार सचमुच इस मुल्क में लोकतंत्र की वापसी चाहती है या सिर्फ इसका दिखावा।

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