लेखक परिचय

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

वामपंथी चिंतक। कलकत्‍ता वि‍श्‍ववि‍द्यालय के हि‍न्‍दी वि‍भाग में प्रोफेसर। मीडि‍या और साहि‍त्‍यालोचना का वि‍शेष अध्‍ययन।

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जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

नामवर सिंह को युवालेखन पसंद है। युवाओं को प्रोत्साहित करना उनके स्वभाव का सामान्य अंग है। लेकिन युवा संस्कृति को वे सरलीकरणों के जरिए व्याख्यायित करते हैं। युवाओं को सरलीकरणों के जरिए नहीं समझा जा सकता। युवाओं के साहित्य को परिवार,स्कूली शिक्षा के दर्शन ,मासकल्चर और मासमीडिया के प्रभाव के बिना नहीं समझा जा सकता।

युवामन का सारा तानाबाना परिवार और शिक्षा के मूल्यों से गुजरते हुए बनता है।इसको पूंजीवादी आग्रहों- पूर्वाग्रहों के जरिए गति मिलती है। विद्रोही युवामन को फार्मूलों से नहीं समझा जा सकता। नामवरसिंह का एक महत्वपूर्ण लेख “युवा लेखन पर बहस” हमारे सामने है। यह फार्मूलेबाजी में लिखा गया आदर्श लेख है। नेट पर यह पाखी पत्रिका के नामवरसिंह विशेषांक में उपलब्ध है। यह लेख 1968 में लिखा गया। यानी नामवरसिंह उस समय युवा थे। इस लेख में नामवरसिंह ने कई महत्वपूर्ण बातों की ओर ध्यान खींचा है। पहली मार्के की बात कही है “बहुतों के लिए आज भी युवा पीढ़ी ”काल्पनिक” नहीं तो ”अमूर्त” अवश्य है।” लेकिन युवाओं के बारे में अमूर्तन तो इस लेख में भी है।

सवाल यह है कि यह अमूर्तबोध कहां से आता है ? यह अमूर्तबोध युवाओं के प्रति यथार्थज्ञान के अभाव से पैदा होता। युवाओं के प्रति अमूर्तनता का गहरा संबंध बच्चे के प्रति पिता-माता के उपेक्षाभाव से है। यह उपेक्षाभाव हिन्दीभाषी परिवारों में बच्चे के प्रति बचपन से ही व्यक्त होना शुरू हो जाता है। जिस जमाने में नामवर सिंह ने यह लेख लिखा था उस समय हिन्दीभाषी समाज में बच्चों के प्रति उपेक्षा का भावबोध चरम पर था। आज भी है। हिन्दीभाषी परिवार बच्चे की देखभाल सही ढ़ंग से नहीं करता। बच्चा रामभरोसे बड़ा होता है। घनघोर उपेक्षा और प्यार का अभाव हिन्दी युवा मानस को किस रूप में बनाता होगा इस ओर नामवर सिंह ने एकदम ध्यान नहीं खींचा है। हमारे युवालेखकों की मनोदशाएं परिवार और स्कूली शिक्षा के ढ़ांचे से गहरे प्रभावित रही । युवामन कैसा होगा,यह फैसला इस आधार पर होगा कि परिवार और स्कूली शिक्षा का बच्चे के प्रति नजरिया क्या है ? जिन युवा विद्रोही लेखकों की नामवर सिंह ने विवेचना की है। आश्चर्य की बात है उनके विद्रोह के भावबोध में स्कूली शिक्षा और परिवार की भूमिका को नामवरसिंह भूल गए। क्या भूलना अनायास है ? हमें यह बात कभी भी नहीं भूलनी चाहिए कि व्यक्तित्व निर्मआम में परिवार और स्कूली शिक्षा की बड़ी भूमिका होती है। हिन्दी आलोचना की मुश्किल यह है कि वह कहानी से कहानी, कविता से कविता की ओर विचरण करती है। नामवर सिंह की समूची सैद्धांतिकी रूपवादी है।वह एक विद्रोहीभाव से दूसरे विद्रोही भाव की ओर विचरण करती है। उसमें युवाओं के बारे में सरलीकरण और पापुलिज्म एक साथ चले आया है। युवाओं की पीठ थपथपाकर, प्रशंसा करके या महज उनके लिखे के आधार नहीं समझा जा सकता। युवा के मन की संरचनाओं का परिवार और स्कूली शिक्षा के ताने-बाने और मूल्यबोध के साथ गहरा संबंध है।

किसी भी लेखक को जानने के लिए बचपन बहुत बड़ा आईना है। बागी लेखक उन्हीं परिवारों में जन्म लेते हैं जहां बच्चे उपेक्षा के शिकार हैं या जहां पर शिक्षा से बच्चे को मानसिक संतोष और सुख नहीं मिलता। शिक्षा जब अशांत रखती है तो बागी भावबोध पैदा होने की संभावनाएं ज्यादा होती हैं। अतःप्रत्येक कवि की अलग- अलग विवेचना की जानी चाहिए। इस मामले में सरलीकरण और सार्वभौमत्व से काम वहीं लेना चाहिए। हमारी स्कूली शिक्षा बच्चों को स्मार्ट कम और भोंदू ज्यादा बनाती थी।

साठोत्तरी दौर के लेखकों की स्कूली शिक्षा के दर्शन पर ध्यान दें , उस जमाने में शिक्षा में हुनर नहीं सिखाया जाता था। सत्तर के बाद के वर्षों में हुनर की शिक्षा का तंत्र व्यापक पैमाने पर सामने आता है। विभिन्न लेखक अलग-अलग पृष्ठभूमि से आए हैं , उसका भी उनकी स्कूली शिक्षा पर गहरा असर पड़ता है। उसकी भाषा, विचार,आचार-संहिता आदि पर भी असर पड़ता है।मध्यवर्गीय परिवार और गरीब परिवार के बच्चे की मनोदशा एक जैसी नहीं हो सकती।इनका व्यक्तित्व विकास भी भिन्न ढ़ंग से होगा। प्रत्येक बच्चा अपने परिवार के सांस्कृतिक स्तर के साथ दाखिल होता है।यदि एक जैसी पृष्ठभूमि से दो लेखक आ रहे हैं तो उनकी व्यक्तिगत क्षमताएं और सर्जनात्मकता तय करेगी कि कौन किससे बेहतर है कितनी लंबी रेस का घोड़ा है। हमारी स्कूली शिक्षा छोटे-बड़े, अमीर-गरीब के भेद को बच्चों के ज़ेहन में बिठाती है। वर्गीय पूर्वाग्रहों और वर्गीय प्रवृत्तियों को जीवन काअंग बनाती है। कुलीन,खेतमजदूर,किसान,ज्ञानी,अज्ञानी आदि में विभाजित करके देखने की बुद्धि देती है। बच्यों में आरंभ से ही अहंकारबोध पैदा किया जाता है।स्कूली शिक्षा में संघर्षभावना का एकसिरे अभाव है।गरीब और निम्नमध्यवर्ग के बच्चों को हमेशा सहिष्णुता का पाठ पढ़ाया जाता है। इस सहिष्णुता से वास्तव जिंदगी का कोई मेल नहीं है। हमारी स्कूली शिक्षा बच्चे में प्रश्नाकुलता पैदा नहीं करती थी। वह बच्चों को अधीनता और आलोचनारहित भावना की शिक्षा देती रही है। इतिहास के नाम पर छद्म-देशभक्ति का पाठ पढ़ाया जाता है। उस समय लोकतंत्र का कोई भी पाठ स्कूली शिक्षा में नहीं पढ़ाया जाता था। लोकतंत्र हमेशा बच्चों की शिक्षा में उपदेशधर्मी भाव सेपढ़ाया जाता है। बच्चे के मन में आरंभ से एक ही शिक्षा दी जाती है कि वह अधीन है। कहा जाता है वह माता-पिता के अधीन है, शिक्षक के अधीन है। अधीन भावबोध को पैदा करने में स्कूली मास्टर का अनुशासन सबसे बड़ा स्रोत है। बच्चे को कोई ऐसी चीज करने नहीं दी जाती थी जो वह करना चाहता था,क्योंकि वह अधीन है।वह ऐसी सामग्री है जिसके जरिए राज्य अपने काम पूरे करेगा और उसे लूटेगा। यही वह स्कूली शिक्षा का पुराना परिवेश है जिसमें साठोत्तरी युवालेखन पैदा हुआ है। साठोत्तरी युवा लेखकों में अधिकतर गैर-अभिजन पृष्ठभूमि से आए थे। उनके अंदर जो आक्रोश था वह देशज शैक्षणिक और पारिवारिक अंतर्विरोधों की देन था। आलोचकों ने इसे इस पहलू से जोड़कर देखा ही नहीं। नामवर सिंह के अनुसार “कहने की आवश्यकता नहीं कि प्रायः हर दशक बाद साहित्यों में एक नयी पीढ़ी का उदय होता है। युवा-सुलभ विद्रोह भर पीढ़ी में दिखता है। विद्रोह के ये अंदाज भी उतने ही जाने-पहचाने हो चले हैं जितने प्रतिरोध के प्रयास, जैसे परंपराद्रोह, विदेशी अनुकरण, असाहित्यिकता, असामाजिकता अश्लीलता आदि। आरोप-प्रत्यारोप का ढाँचा वही रहता है, मुहावरे अलबत्ता बदल जाते हैं। मजा उस ढाँचे को दुहराने में नहीं, नए मुहावरों में है, क्योंकि हर पीढ़ी के साथ साहित्य में जो कुछ नया आता है वह इन्हीं मुहावरों के सहारे समझा जा सकता है। मुहावरे स्वयं रचना नहीं होते, यहाँ तक कि कभी-कभी वास्तविक रचना के सर्वथा विरोधी भी होते हैं, इसलिये दोनों को एक समझ लेने वाले अक्सर चक्कर में भी आ जाते हैं, किन्तु यदि यह तथ्य ध्यान में हो तो उन्हें सहायक ठट्ठर के रूप में इस्तेमाल करना उपयोगी है, उपयोग के बाद वे अपने आप फालतू हो जाते हैं। युवा लेखन के संदर्भ में इस्तेमाल किये जाने वाले विद्रोह, आक्रोश, अस्वीकृति, असहमति, आक्रामकता आदि अमूर्त भाव वाचक संज्ञाए इसी प्रकार के नये मुहावरे हैं। इतिहास में जिस प्रकार युवा पीढ़ी के साथ ये नये मुहावरे आए उनसे और कुछ नहीं तो इतना तो स्पष्ट हो ही जाता है कि सोचने समझने की दिशा में परिवर्तन हो रहा है।”

नामवर सिंह साठोत्तरी पीढ़ी को पुराने किस्म के वर्गीकरण में बाँधकर देखते हैं। वे पीढ़ियों का अंतर देखते हैं इसमें पुरानी पीढ़ी वह है जो आजादी कीजंग में तपकर आयी थी , नई पीढ़ी आजादी के बाद आई है। लिखा है ,

” ‘नाम’ की तलाश से स्पष्ट है कि यह युवा पीढ़ी भी हर पीढ़ी की तरह अपनी भिन्नता और विशिष्टता के लिये आग्रहशील है। विभिन्नता का आग्रह यदि पहले से अधिक है तो इसलिए कि इतिहास में उसकी स्थिति पहले की सभी पीढ़ियों से नितान्त भिन्न है यदि औरों का एक पाँव आजादी के पहले भारत में है तो युवा पीढ़ी ने एकदम आजादी के बाद के भारत में ही आँखें खोलीं। और मामूली मालूम होने वाला यह अंतर मानसिक गठन के स्तर पर बहुत बड़ा अन्तर डाल देता है। व्यक्ति के रूप में युवा लेखकों का मानस-संस्कार स्वातंत्र्योत्तर भारत में बना तो इतिहास के रूप में फैलने को मिला साठोत्तरी युग-परिवर्तन! व्यक्तित्व भी भिन्न, परिवेश भी भिन्न। परिवेश और व्यक्तित्व का यह विशिष्ट घात-प्रतिघात ही युवा लेखन की भिन्नता का आधार है।”

इस अमूर्त पीढ़ी भेद में सबसे मूल्यवान चीज है लोकतंत्र और स्वाधीनता का वातावरण। नामवर सिंह लोकतंत्र का उल्लेख नहीं करते। नयी पीढ़ी के पास लोकतंत्र का माहौल था। लोकतंत्र में मानसिक गठन एकदम भिन्न किस्म का होता है। लोकतंत्र अभिव्यक्ति,कार्य-व्यापार ,साहित्य आदि में असंख्य विकल्प देता है। प्रतिवाद उसका अन्तग्रथित हिस्सा है। लोकतंत्र में उनके लिए भी जगह है जो उसे स्वीकारकरते हैं और उनके लिए भी जगह है जो उसे अस्वीकार करते हैं। खासकर अल्पसंख्यकों को ,जिनमें लेखक भी आता है, उसे लोकतंत्र इफरात में स्थान देता है। अभिव्यक्ति के अनंत चैनल और मीडियम प्रदान करता है। लोकतंत्र का वातावरण पुराना साम्राज्यवादी शासन के भारत से एकदम भिन्न था। वहां पराएपन का माहौल था,इसलिए उस समय हर व्यक्ति देश खोज रहा था। अपने लिए जगह खोज रहा था।लोकतंत्र में यह माहौल बुनियादी तौर पर बदल जाता है। आजादी के भारत पुराने भारत से भिन्न रूप में सामने आता है। नया संविधान, नई आजादी,नई स्वाभिमान की भाषा,नए किस्म का औद्योगिक विकास और नए किस्म का कल्याणकारी पूंजीवादी राज्य और स्वतंत्र मीडिया और न्यायपालिका। लोकतंत्र के माहौल ने हठात सामाजिक जीवन में एक छलांग का काम किया है, व्यक्ति के विवेक और परिवेश को बुनियादी रूप से बदला है। साठोत्तरी प्रतिवादी साहित्यिक तेवर ,लोकतंत्र के बदले माहौल के साथ युवालेखक की कशमकश की देन है। यह कशमकश कमोबेश उन लेखकों में भी है जो बतर्ज नामवरजी पुरानी पीढ़ी के हैं। युवालेखकों ने नए बदले लोकतांत्रिक माहौल को जल्दी समझा और उसके साथ सामंजस्य बिठाया है बनिस्पत पुरानी पीढ़ी के। लोकतंत्र और लोकतांत्रिक माहौल बुनियादी प्रस्थान बिंदु है साठोत्तरी साहित्य का। सारी मुठभेडें लोकतंत्र से हैं और लोकतंत्र के साथ एडजेस्टमेंट या सामंजस्य-विरोध के आधार पर विकसित हुई हैं। साठोत्तरी साहित्य का प्रस्थान बिंदु लोकतंत्र है यह बात नामवरजी स्पष्ट ढ़ंग से नहीं मानते बल्कि गोलमोल बातें कहते हैं।यहां वे पीढ़ियों का संघर्ष देखते हैं। लिखा है, ” यह व्यक्तिगत दुर्घटना नहीं बल्कि एक ऐतिहासिक अंतर है, जिसे स्वीकार किए बिना परिस्थिति को समझना असंभव है। इसी तरह साठोत्तरी युग-परिवर्तन को लेकर उलझना भी कठमुल्लापन है।”

नामवरसिंह ने साठोत्तरी साहित्य के प्रस्थान बिंदु का निर्धारण करते हुए लिखा है , “युवा लेखक के मिजाज को समझने का एक तरीका यह हो सकता है कि उसमें सम्मूर्तित आदमी की ठोस तस्वीर से शुरू किया जाय, जैसे कुछ लोगों ने ‘लघु मानव’ के द्वारा ‘नयी कविता’ को परिभाषित करने का प्रयास किया। इस दृष्टि से इतना तो तुरन्त कहा जा सकता है कि युवा लेखन उस ‘लघु मानव’ का साहित्य नहीं है। केदारनाथ सिंह ने इस दिशा में एक संकेत दिया है कि ”आज के कवि का ‘मैं’ एक वचन उत्तम पुरुष का ‘मैं’ न होकर ‘हम’ की तरह अमूर्त और व्यापक हो गया है। और ऐसा किसी बड़े आदर्श के प्रति आग्रह के कारण नहीं, बल्कि अमानवीयकरण की एक बृहत्तर प्रक्रिया के अंतर्गत अपने आप और बहुत कुछ कवि के अनजान में ही हो गया है।” कहानियों में यही ‘मैं’ व्याकरण की दृष्टि से उत्तम पुरुष एकवचन होते हुए भी अर्थ की दृष्टि से प्रायः अन्य पुरुष एकवचन ‘वह’ के रूप में आता है। हर हालत मं नियामक है अमानवीकरण की प्रक्रिया। ‘महामानव’, ‘साधारण मानव’ और ‘लघु मानव’ की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए चाहें तो इसे ‘नगण्य मानव’ भी कह सकते हैं। कविता हो या कहानी- अधिकांश युवा-लेखन में निहित मानव में गहरे स्तर पर अपनी नगण्यता का बोध बद्धमूल है। आत्मदया, असहायता, आक्रोश, जिज्ञासा, उदासीनता आदि सभी मनःस्थितियाँ इस नगण्यता से ही उत्पन्न और परिचालित होती है।”

इस समस्या को कम भिन्न नजरिए से देखना होगा।उपरोक्त धारणा से चीजें और भी उलझी हैं। असल में नयी पीढ़ी को आजादी मिलते ही लगा कि देश आजाद हुआ है तो अब तो सारी जिम्मेदारी राज्य उठेगा। जबकि लोकतंत्र में राज्य कभी व्यक्ति का बोझ नहीं उठाता। बल्कि व्यक्ति को अपने जीवन को अपने आप तैयार करना होता है। कहीं न कहीं यह धारणा थी कि आजादी मिलते ही दूध-घी की नदियाँ बहने लगेंगी। राज्य संस्कृति और सभ्यता की रक्षा करेगा। कला और साहित्य को फलने-फूलने का आधार प्रदान करेगा। इस काल्पनिक दारणा का लोकतंत्र के माहौल से कोई संबंध नहीं था। लोकतंत्र मनुष्य को संघर्ष के लिए लंबे पंजे और तेज दांत प्रदान करता है। व्यक्ति को अपना व्यक्तित्व प्रतिस्पर्धी. पैना और धारदार बनाना होता है। लोकतंत्र में हर चाज अर्जित करनी होती है।यहां तक कि अपनी पहचान भी अर्जित करने के लिए संघर्ष करना होता है। लोकतंत्र में न तो शिक्षा अपने आप मिलती है, न नौकरी मिलती है और न माव-सम्मान मिलता है और न लेखक की पहचान ही अपने आप मिलती है। हर चीज पाने के लिए पहल और संघर्ष करना होता है। लोकतंत्र में कोई भी चीज खैरात में नहीं मिलती ।लोकतांत्रिक हक या लोकतांत्रिक माहौल धर्मादा दान-पुण्य में नहीं मिलते।वे मात्र सदइच्छा से नहीं मिलते।उन्हें अर्जित करना पड़ता है। इसके लिए संघर्ष या प्रयास करने होते हैं। हिन्दी लेखकों की बड़ी संख्या इस तथ्य से उस समय तक अनभिज्ञ थी। एक चीज और वह यह कि लोकतंत्र नारेबाजी या विचारधारा या आंदोलन मात्र से अर्जित नहीं हो सकता आपको अपना निजी कौशल पेशेवराना ढ़ंग से विकसित करना होता है। व्यक्तित्व को सजाना-संवारना होता है। व्यक्तित्व को सजाए-संवारे बिना यदि कोई लोकतंत्र में पाना चाहता है तो उसे असफलता मिलने के चांस ज्यादा हैं। दूसरी एक बड़ी आयरनी यह थी कि युवालेखकों में बुर्जुआ लोकतंत्र को व्यापक असंतोष था वे इसमें कोई भी सकारात्मक तत्व देख ही नहीं पा रहे थे। इस असंतोष के तीन प्रधान कारण हैं। पहला, लेखकों पर शीतयुद्धीय राजनीति के तहत समाजवादी विचारों का प्रभाव और दूसरा लोकतंत्र के अनुरूप निजी संसार को रूपान्तरित करने में असमर्थता,तीसरा ,शार्टकट में हासिल करने का नजरिया। लोकतंत्र में कोई चीज शार्टकट से नहीं मिलती। लोकतंत्र शार्टकट नहीं है बल्कि एक प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया में यदि आप अधीर हो जाएंगे तो गहरी निराशा,कुण्ठा,पराजयबोध आदि की भावना पैदा होगी। साठोत्तरी युवालेखकों में ये तीनों लक्षण मिलते हैं।

साठोत्तरी दौर के युवालेखन में नगण्यताबोध खूब है। नामवर सिंह ने लिखा है, ” नगण्यता का यह बोध युवा-लेखन के संदर्भ को देखते हुए बेमेल नहीं लगता। यह तथ्य है कि युवा पीढ़ी को न तो आजादी की लड़ाई में हिस्सा लेने का मौका मिला और न स्वाधीन भारत के निर्माण में योग देने की सुविधा ही मिली। अतीत से बाहर वर्तमान से बाहर और भविष्य तो अनिश्चित होने के कारण यों भी बाहर है। इस प्रकार युवा पीढ़ी इतिहास से ‘बाहर’ रही। बाहर मैं कर दिया गया हूँ, भीतर पर भर दिया गया हूँ -निराला की यह पंक्ति जैसे आज के युवक की ओर से ही कही गई है। बाहर कर दिए जाने के कारण ही वह भीतर से भर दिया गया है। यही नहीं, बल्कि वह इतिहास के बाहर रहकर ही इतिहास में हिस्सा भी ले रहा है। इतिहास में वह बाहर से शरीक है। नितांत ‘बाहरी’ होने की यह मनःस्थिति युवा-लेखन के हर स्तर पर सक्रिय दिखाई पड़ती है। अपने-आपको ‘फालतू पुर्जा’ और बाकी साथियों को भी एक ही भाग के फालतू पुर्जों का ढेर समझना इसी बोध का सूचक है। जो ‘अंदर’ है और जो काम में लगे हैं उनकी नजर में यह स्थिति भले ही अजीब हो, लेकिन जिस राष्ट्र के निर्माण कार्य में भाग लेने से समूची जनता को बाहर रखा गया हो और जिसमें बेकार तो बेकार, राजकाज की मशीन में काम से लगे पुर्जें भी किसी स्पष्ट उद्देश्य के अभाव में अपने-आपको बेकार समझ रहे हों, यह मनःस्थिति अनपहचानी नहीं हो सकती।”

इस प्रसंग में पहली बात यह कि लोकतंत्र में देश-निर्माण का जज्बा पैदा करने में शासकवर्ग को सफलता तब तक नहीं मिलती जब वह शिक्षा की आधारभूत संरचनाएं तैयार न कर दे। साठोत्तरी दौर में जिस चीज ने तकलीफ पैदा की है और पुराने पिछड़े मानसिक सोच को बनाए रखा, वह है फैक्ट्री और उससे जुड़े तंत्र का विरोध। पंडित नेहरू ने आह्वान किया था नए भारत के लिए हमें ज्यादा से ज्यादा इंजीनियर,कुशल कारीगर और पेशवर लोग चाहिए। उनकी नजर तकनीकी प्रगति पर थी। मुश्किल यहां पर है कि तकनीकी प्रगति का अर्थ हमने वैज्ञानिक प्रगति लगा लिया। बल्कि होता यह है कि तकनीकी प्रगति ,वैज्ञानिक प्रगति का प्रतिवाद करती है। नेहरूयुग में जो शिक्षातंत्र खड़ा किया गया उसका लक्ष्य था बुर्जुआ सामाजिक प्रतिस्पर्धा के लिए जुझारू व्यक्ति तैयार करना। मसलन् जब एक बच्चे से पूछा गया कि आप पढ़ते क्यों हैं तो उसका जबाव होता है कि “मैं विश्वविद्यालय में दाखिला ले सकूँ”, “विश्वविद्यालय में दाखिला किसलिए ?”,”ताकि आवश्यक पद पा सकूँ। ” यानी शिक्षा को मुझे आसानी से पद पाने में मदद करनी चाहिए।यानी व्यक्ति इस या उस पद को पाने के लिए प्रयास करता रहता है। पद पाने के लिए शिक्षा की उपाधियों के ततमगे हम अपने सीने पर लगाए घूमते रहतेहैं. ये एक तरह से नागरिकचेतना से उलट चेतना है। भारत में शासकवर्ग ने एक ओर उपाधियों और पदों की भूख पैदा की तो दूसरी ओर ऐसे व्यक्ति का निर्माण किया जो नागरिकचेतना से शून्य ङै। इस प्रक्रिया में लोकतंत्र तो फला-फूला लेकिन बगैर लोकतांत्रिक नागरिकचेतना के। साठोत्तरी लेखक इस अमानवीयकरण और अ-नागरिकीकरण के कारण नगण्यताबोध की भावना से ग्रस्त प्रतीत होते हैं।

नामवर सिंह ने सही लिखा है ,” नगण्यता के इस बोध ने जागरूक युवक लेखक को नगण्य-से-नगण्य वस्तु और व्यक्ति को देख सकने की क्षमता दी है। यदि बारीक-से-बारीक ब्यौरे की दृष्टि से युवा लेखन समृद्धतर है तो इसी क्षमता के कारण। इसे यथार्थ-चित्रण और वस्तु-अंकन की दिशा में विकास कहा जाएगा। इस लेखन में गली-कूचे, खेत-खलिहान के मामूली आदमी अपनी सारी नगण्यता के साथ सजीव रूप में जिस प्रकार आए हैं वह इसी दृष्टि का परिणाम है। वैसे, ये प्रतिमाएँ पिछले प्रगतिशील दौर में भी दिखाई पड़ी थी किन्तु इनके निर्माण में प्रायः ‘दृष्टि’ से ज्यादा ‘कोण’ उभर जाता था। ”

“पहले के लेखक जहाँ सत्य की तलाश में सतह पर तैरने वाली वस्तुओं और घटनाओं को पार करके तल में डुबकी लगाते थे, युवा-लेखक तथाकथित सतही वस्तुओं और घटनाओं को ही सत्य की व्यंजकता में समर्थ मानते हैं। पूर्ववर्ती लेखकों के मानस में वेदान्त का मायावाद कुछ इस तरह बद्धमूल था कि उनके लिए ‘तत्व तल से ही निकलता’ था तथा सोनेवाली मछली निस्तल जल में ही रहती थी’ और प्रयोग का ‘मोती’ लाने के लिए गोताखोर पनडुब्बी होने की आवश्यकता महसूस होती थी। इसके विपरीत युवा लेखक सतह पर सुलभ वस्तुओं को ही सत्य का वाचक मानता है और इस दृष्टि से युवा लेखन ‘सुपरफिशलिटी’ या ‘सतहीपन’ का सार्थक साहित्य है। कहने वाले इस आधार पर इसे एकदम सतही और ‘सुपरफिशल’ भी कह सकते हैं और ऐसी व्याख्या के लिए रोक कौन सकता है।”

“नगण्यता-बोध का प्रभाव युवा-लेखन की भाषा पर भी देखा जा सकता है। अनेक कृतियों में नगण्य -से -नगण्य शब्दों से सारी रचना का विधान किया गया है कभी-कभी शब्दों की उस नगण्यता को ‘कृत्रिमता’ की हद तक भी पहुँचा दिया जाता है -एक विशेष प्रकार का प्रभाव उत्पन्न करने के लिए। यह प्रवृत्ति कविता और कहानी दोनों क्षेत्रों में देखी जा सकती है। इसके साथ ही प्रभामंडित बड़े शब्दों से परहेज भी साफ है। निश्चय ही सर्वत्र ऐसा नहीं हो सका है, लेकिन जहाँ ऐसा हुआ है वहाँ नगण्य शब्दों के जरिए भी ऐसे भयावह वातावरण की सृष्टि कर दी गई है जो बड़े-बड़े शब्दों के भी वश से बाहर है। छोटे-से-छोटे शब्द द्वारा बड़े-से-बड़ा विस्फोटक प्रभाव उत्पन्न करके युवा-लेखकों ने दिखला दिया कि साहित्य के अंदर भी परमाणु युग आ गया। कहते हैं कि युवा-लेखकों ने शब्द और अर्थ का संबंध तोड़ दिया। हुआ यह कि जिंदगी में जिन शब्दों का संबंध अपने अर्थ से टूट गया था और फिर भी उनके जुड़े होने का ढोंग किया जाता था, उस ढोंग को इन लेखकों ने तोड़ दिया। उन्होंने कुछ पूर्ववर्ती लेखकों की तरह शब्द में नए अर्थ भरने के नाम पर मुलम्मा चढ़ाने का काम नहीं किया। इसी से भाषा में यथातथ्यता की भी प्रवृत्ति बढ़ी है, यहाँ तक कि तथ्य ही भाषा बन गया।”

साठोत्तरी लेखकों में सेक्स एक प्रमुख विषय है। नामवरजी ने सेक्स के चित्रण को लेखकों के इतिहास से पलायन और आदिम मनोभाव से जोड़ा है। लिखा है – “अपने इतिहास से बाहर रहने के कारण ही कुछ युवा-लेखकों में इतिहास से एकदम बाहर चले जाने की आकांक्षा दिखाई पड़ती है। संपूर्ण पंरपरा को एकदम नकार देने के मूल में यही आकांक्षा है। उधर भविष्य का दरवाजा पहले ही से बंद है, इसीलिए इतिहास से बाहर जाने की चेष्टा अदबदाकर उन्हें ‘आदिमपन’ में ला छोड़ती है। जब इतिहास एक व्यर्थ का भार है और सभ्यता एक अभिशाप, तो आदिम अवस्था ही काम्य बच रहती है। इस आदिम मनोदशा में सारा संसार जंगल मामूल होता है और सारे आदमी पशु। कवि का मन ”चिड़ियों का व्याकरण” सीखने के लिए बेचैन हो उठता है। इसी मनोदशा का एक रूप है ”अपनी जड़ों की खोज”, जिसका संकेत ‘आरंभ’-२ के इस उ(रण में देखा जा सकता है ”आज इस वक्त की कविता अपनी जड़ों की खोज की बेचैन कविता है। ” इस दृष्टि से युवा-लेखन को ‘मूलगामी’ कहा जा सकता है। शायद हर नई शुरुआत के लिए एक बार जड़ों में जाने की जरूरत पड़ती है। इतिहास की अभीष्ट व्याख्या करने के लिए मार्क्स ने भी इतिहास से बाहर छलांग लगाई थी और प्रागैतिहासिक साम्यवादी समाज के मूल तत्वों की खोज की, इतिहास के बाहर एक बार अतीत की दिशा में तो दूसरी बार भविष्य की दिशा में किन्तु उनके पाँव बराबर इतिहास के अंदर वर्तमान की ठोस जमीन पर टिके रहे। ‘आदिमपन’ की दिशा में युवा-लेखन का मूलगामी प्रयास भी बहुत-कुछ वर्तमान का ही सृजनात्मक रूपांतर है और इससे सृजन के ध्रातल पर निश्चय ही नई संभावनाएँ व्यक्त हुई हैं।”

साठोत्तरी कवि की सेक्स अभिव्यक्तियां ,सेक्सुअल अंग-प्रत्यंगों का अभिव्यक्ति के उपकरण के रूप में इस्तेमाल विभिन्न किस्म की व्याख्याओं की संभावनाँ पैदा करता है। इस प्रसंग में पहली बात यह सेक्स और कामुक अंगों और क्रीडाओं की ओर हिन्दी का लेखक पहलीबार नहीं आया बल्कि पहले भी मध्यकाल में हिन्दी और संस्कृत में इसका विषय के रूप में खूब प्रयोग मिलता है। सेक्स का सर्जना में सार्वजनिक प्रयोग एक ओर वचेतन को अभिव्यक्त करता है। तो दूसरी सामाजिक जीवन में ऐहिकतामूलक नजरिए को विस्तार देता है। इसे आज की भाषा में धर्मनिरपेक्ष नजरिया कहते हैं। मध्यकालीन श्रृंगार साहित्य की इसी ऐहिकतामूलक भूमिका की ओर आचार्यय हजारीपप्रसाद द्विवेदी ने ध्यान खींचा है। सेक्स की ओर जाने का र्थ आदिममन या आदिम गुफाओं में जाना नहीं है और न यह इतिहास से पलायन है। सेक्स की थीम रवीन्द्रनाथ टैगोर की सबसे प्रिय थीम थी। उन्होंने 60साल की उम्र केबाद कई हजार न्यूड चित्र बनाए और स्त्री के मांसल शरीर का सबसे सुंदर कलात्मकक चित्रण किया। सेक्स पर लिखने का अर्थ है स्त्री के शरीर को सार्वजनिक बहस के न्द्र में लाना उस पर पड़े हुए पर्दों को गिराना। सेक्स के प्रति अकुण्ठितत भावबोध पैदा। सेक्स पर खुली बहस लोकतांत्रिक मनोभावों के पुष्ट होने का संकेत है। यह लोकतंत्र का बाइप्रोडक्ट है।

‘बाहरीपन’ के बोध से एक प्रकार की तटस्थता का उदय होता है जो किसी वस्तु को अपने रागबोध से रंजित करके देखने की अपेक्षा वस्तु को उसकी वस्तुमयता में देखने और दिखाने की क्षमता प्रदान करती है। जो हमेशा अपने-आपको ‘बाहर’ समझने का आदी है वह पूर्ववर्ती लेखकों की तरह अन्य व्यक्तियों और वस्तुओं को अंदर से जानने की सर्वज्ञता का भ्रम नहीं पाल सकता। ‘बाहरी’ व्यक्ति के लिए शेष सभी व्यक्ति और वस्तुएँ ‘वह’ या ‘वे’ हैं जिनकी रहस्यमयता को भेदने के लिए वह सतत प्रयत्नशील रहता है। सीमा का यह बोध एक ओर उसके स्वर को निस्संग बनाता है तो दूसरी ओर उसके सृजन को निर्वैयक्तिक रूप भी देता है। नितांत वैयक्तिक होते हुए भी प्रभाव में निर्वैयक्तिकता युवा-लेखक का विचित्र विरोधभास है। अपने चरम रूप में यह कभी-कभी अमानवीयता का रूप धारण कर लेता है, जिसका आभास युवा-लेखन की नितांत निर्ममता या निष्ठुरता में परिलक्षित होता है। इस ठंडेपन को गुण और दोष-दोनों की संज्ञा दी जा सकती है। उसे गैर-रूमानी कहने का आधार यही है।

इसी प्रकार ‘बाहरीपन’ से पैदा होनेवाली दूरी वस्तुओं के चित्रण में कभी-कभी ऐसी ‘रहस्यमयता’ का प्रभामंडल डाल देती है कि वे अनपहचान हो जाती हैं। किंतु युवा-लेखन की यह रहस्यमयता छायावाद अथवा नई कविता के रहस्यवाद से भिन्न एक प्रकार के भयावह दुःस्वप्न के समान मालूम होती है। युवा-लेखन में भयावनी ‘फैंटेसी’ की प्रवृत्ति इसी रहस्यमयता की सृष्टि है। इस कारण वस्तु- चित्रण में एक प्रकार के अमूर्तन का भी आविर्भाव हुआ है, जिसे कविता से अधिक कहानी में स्पष्ट देखा जा सकता है। अपने विरोध में युवा-लेखन जहाँ अमूर्त और सामान्य दिखाई पड़े, बाहरीपन का परिणाम समझना चाहिए। ऐसी स्थिति में लक्ष्य को ठीक-ठीक विविक्त करने के स्थान पर सरसरी तौर से सबको एक नजर से बुहारने की प्रवृत्ति भी देखी जाती है। युवा-लेखन में कहीं-कहीं जो एक ही सांस में सबको नकारने का अंदाज दिखाई पड़ता है, इसी का परिणाम है। नितांत बाहर होने अथवा अपने-आपको बाहर समझने के कारण व्यक्ति कभी-कभी ‘निहिलिस्ट’ या नकारवादी हो जाता है। इसीलिए जिस प्रकार संसार से सन्यास लेनेवाले साधु सारे संसार को माया एवं सारे सामाजिक संबंधों को निस्सार बताते पाए जाते हैं, उसी प्रकार कुछ युवा-लेखक भी संपूर्ण सामाजिक संबंधों की निरर्थकता घोषित करते रहते हैं। इस नैतिक अतिवाद की अनिवार्य विडंबना यह है कि सारी दुनिया को पाप-पंक में सनी कहने के साथ ही वह अपने-आपको भी ‘मो सम कौन कुटिल खल कामी’ कहकर कोसता रहता है। विरोधियों की भर्त्सना से भी अधिक आत्मभर्त्सना की झलक कुछ युवा-लेखकों में स्पष्ट है जो कभी-कभी काव्य के स्तर तक भी पहुँच जाती है।

किंतु इतिहास से बाहर जाने का एक प्रफॉयडीय मनोविश्लेषणात्मक प्रयास भी है जिसमें व्यक्ति के शिशु-मन की तथाकथित आदिम अंध्ेरी गुपफा है। युवा-लेखन का एक अंश ऐसा भी है जो सीध्े प्रफॉयड से प्रेरित या प्रभावित न होते हुए भी, मन की आदिम अंध्ेरी गुपफाओं से निकलने वाले प्रतीकों और मिथकों में अपने-आपको व्यक्त करता है। इसके मूल में एक विशेष प्रकार की अबौ(किता अथवा बु(विरोध् है। सामान्य बोध् का अतिक्रमण करके कुछ युवा-लेखन मानसिक अंध्ेरे की इसी दृष्टि से आज के संसार को देखते हैं और उसके आधर पर एक भयावह ‘पफैंटेसी’ के संसार की सृष्टि करते हैं। ऐसे लेखन का रूपगठन भी बौ(कि गठन से भिन्न बहुत कुछ अतार्किक होता है। यह प्रवृत्ति कविता और कहानी दोनों में दृष्टिगोचर होती है। एक उदाहरण दूध्नाथ सिंह की रचनाएँ हैं।

सेक्स-चित्रण में अतिरिक्त रुचि इसी आदिम मनोदश का दूसरा परिणाम है। ‘एलिएनेशन’ अथवा निर्वासन के परिणामों का वर्णन करते हुए मार्क्स ने लिखा है कि ”निर्वासन की स्थिति में जब तमाम सामाजिक और मानवीय संबंध व्यर्थ प्रतीत होने लगते हैं तो जो पाशव है वही मानवीय हो जाता है और मानवीय पाशव। इसलिए संभोग की शारीरिक क्रिया-जैसा ‘पाशव’ कर्म एकमात्र ऐसा कर्म बच रहता है जिसमें निर्वासित व्यक्ति अपने-आपको ‘मानव’ समझता है, अगर्चे स्तर गिरकर पशुता तक पहुँच जाता है।” युवा-लेखन में जहाँ नग्न सेक्स-चित्राण दिखाई पड़ता है, उसका रहस्य यही है। इसे व्यावसायिक लेखन की अश्लीलता के साथ गड्डमड्ड करना दृष्टि-भ्रम है।

किंतु सतर्क युवा लेखकों ने निर्वासन की इस आदिम एवं पाशव परिणति से मुक्त होने के लिए पूरा संद्घर्ष किया है। खुले सेक्स-चित्राण के लिए ‘बदनाम’ राजकमल चौध्री ने इसी प्रकार के एक अन्य युवतर लेखक श्रीराम शुक्ल को १.७.६६ के पत्रा में लिखा था ”स्त्राी- शरीर बहुत स्वास्थ्यप्रद वस्तु है-लेकिन कविता के लिए नहीं, संभोग करने के लिए। कविता में स्त्राी-शरीर अन्य सभी विषयों की तरह मात्रा एक विषय है-कविता का कारण या कविता का प्रतिपफल नहीं, मैं ऐसा ही मानता हूँ।… अब कविता के लिए हमारी राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक मान्यताएँ अध्कि आवश्यक विषय हैं। स्त्राी-शरीर को राजनीतिज्ञों, सेठों, बनियों और इनके प्रचारकों ने अपना हथियार बनाया है-हम लोगों को अपना क्रीतदास बनाए रखने के लिए। बेहतर हो, हम पत्रिाकाओं के कवर पर छपी हुई, कैलेंडरों पर छपी हुई अध्नंगी स्त्रिायों और अपने पब्लिक सेक्टर और प्राइवेट सेक्टर के मालिकों के लिए हमारा ईमान, हमारा जेहन, हमारी ताकत खरीदकर हमें नपुंसक बनानेवाली अध्नंगी स्त्रिायों को अब अपने साहित्य में उसी प्रकार प्रश्रय नहीं दें, न आत्मरति के लिए ओर न पर-पीड़ा के लिए! मैं श्लील-अश्लील नहीं मानता हूँ, लेकिन हम कवि हैं, हमें न तो नपुंसक, और न स्त्राी-अंगों का वकील बनना चाहिए।” ;युयुत्सा, अगस्त’ ६७, पृष्ठ १८७-८८द्ध

ऐसे सापफ वक्तव्य के बाद भी सारे युवा-लेखन को ‘देह की राजनीति’ का पर्याय कहने के पीछे और राजनीति ही हो सकती है। स्वयं राजकमल चौध्री को भी ऐसे आरोप का निशाना बनना पड़ा है, लेकिन उनके बारे में ज्यादा सच वह है जो एक दूसरे युवा कवि ध्ूमिल ने कहा हैः

जीभ और जाँद्घ के चालू भूगोल से

अलग हटकर उसकी कविता

एक ऐसी भाषा है ;भरोसे कीद्ध

जिसमें कहीं भी

‘लेकिन’,’शायद’,’अगर’ नहीं है

उसके लिए हम इत्मीनान से कह सकते हैं कि वह

एक ऐसा आदमी था जिसका मरना-

कविता से बाहर नहीं है।

जिस नंगे और बेलौसपन के साथ यहाँ एक सच बात कही गई है वह भी कुछ लोगों को ‘नंगई’ मामूल हो सकती है, लेकिन सच कहने के लिए अनेक युवा-लेखकों ने ऐसी नंगई को जान-बूझकर अपनाया है, क्योंकि बड़े-बड़े पहाड़ों को तोड़ने के लिए ऐसे शब्द ‘डाइनामाइट’ अथवा विस्पफोटक का कार्य करते हैं और रचना में मितव्ययिता की दृष्टि से उनका उपयोग आवश्यक है। एक ऐसे विस्पफोटक शब्द को वर्जित मान लेने के बाद जब दूसरे शब्दों का सहारा लिया जाता है। तो यही नहीं कि कलात्मक दृष्टि से रचना अनावश्यक रूप में पसर जाती है बल्कि मूल कथ्य भी बदल जाता है और कभी-कभी वह सच सच भी नहीं रह जाता। किन्तु उक्त उ(रण से स्पष्ट है कि युवा-लेखन में कहीं-न-कहीं जीभ और जाँद्घ का चालू भूगोल है, जिसे अनायास ही कुछ-एक ‘अकवियों’ में देखा जा सकता है।

वैसे, सेक्स-नैतिकता के मामले में सामान्यतः आज के युवा लेखक पूर्ववर्ती पीढ़ियों की तुलना में अध्कि वर्जना-मुक्त हैं। युवा -लेखकों के इस दावे में कापफी सच्चाई है कि उनमें अपने पूर्वजों का-सा ढोंग नहीं है। औरों ने जो किया लेकिन कहाँ नहीं, उसे स्वीकार करने का साहस आज के युवक में है, क्योंकि वह ढोंग को अनैतिक कार्य-विशेष से भी अध्कि अनैतिक मानता है। अतिरिक्त साहसिकता और आत्म-प्रदर्शन के बावजूद यह मानसिक खुलापन कुल मिलाकर साहित्य के लिए स्वास्थ्यप्रद है।

लेकिन जैसा कि राजकमल चौध्री के उस पत्रा से स्पष्ट है, आज की स्थिति में युवा लेखक स्त्राी-शरीर की अपेक्षा देश और संसार की राजनीतिक-आर्थिक समस्याओं को साहित्य-सृजन के लिए अध्कि महत्वपूर्ण मानता है। इसी दृष्टि से आज की कविता ‘नई कविता’ से कहीं अध्कि ‘राजनीतिक’ है। जिन भारत-व्याकुल लोगों की नजर में चीनी और पाकिस्तानी खतरा ही सबसे बड़ी समस्या है और इस दृष्टि से जो युवा-लेखकों से देशभक्ति के उद्बोध्न-गीतों की अपेक्षा रखते हैं, उनके लेखे युवा-लेखन निश्चय ही देशद्रोही है। लेकिन राजनीति को व्यापक अर्थ में लेने वाले देख सकते हैं कि युवा-लेखक कहीं अध्कि मूलगामी या ‘रेडिकल’ है-उग्रवाद की सीमा तक। बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के अकाल पर युवा लेखकों ने जो सशक्त रचनाएँ कीं, उनसे युवा-लेखन की जागरूकता ही नहीं बल्कि दूसरी पीढ़ी के लेखकों से उनकी विशिष्टता भी स्पष्ट हुई है। इस दृष्टि से लखनऊ से निकलने वाली लद्घु-पत्रिाका ‘आरंभ’ का अकाल-अंक एक मिसाल ही नहीं, चुनौती है।

अपनी बाहरी स्थिति के कारण अध्किांश युवा-लेखक राजनीतिक पार्टियों और राजनीतिक मतवादों से भी बाहर हैं, यहाँ तक कि कभी-कभी उन सबको निकम्मा भी कह बैठते हैं, किंतु ”आज की तीव्रतम राजनीतिक स्थिति और उसकी सारी तार्किक परिणतियों को अपने नितांत व्यक्तिगत और छोटी-से-छोटी अनुभूतियों के साथ संबं( कर लेने” का प्रयास निरंतर बढ़ता जा रहा है। इस प्रकार राजनीतिक युवा-लेखन में कविता ‘ज्वलंत प्रश्नों’ और बड़ी-बड़ी द्घटनाओं के निर्वैयक्तिक वर्णन के रूप में नहीं, बल्कि रोजमर्रा के व्यक्तिगत अनुभवों के बीच से निकलती हुई-सी व्यक्त हुई है और इस दृष्टि से वह चौथे दशक की सामान्य राजनीतिक कविताओं से प्रकृत्या भिन्न है। चौथे आम चुनाव के बाद देश में जो राजनीतिक विकल्प प्रकट हुआ उसने इस दिशा में युवा-लेखन को और भी जागरूक कर दिया है। साथ ही वियतनामी जनता के मुक्ति-संर्द्घष में युवा-लेखकों ने जैसी दिलचस्पी ली है उससे स्पष्ट है कि वह अपनी राजनीतिक दृष्टि में नितांत स्थानीय नहीं, बल्कि विश्व की व्यापक गतिविधियों के प्रति भी पर्याप्त संवेदनशील है। इस संदर्भ में कभी-कभी युवा लेखकों की ‘प्रतिब(ता’ का प्रश्न भी उठाया जाता है। इस मामले में सभी युवा-लेखकों की स्थिति एक-सी नहीं हैं: किंतु एक बात स्पष्ट है कि पिछली पीढ़ी के कुछ व्यक्ति-स्वातंत्रयवादी लेखकों के समान इस पीढ़ी में एक भी लेखक अंध्-कम्युनिस्ट-विरोध्ी तथा प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से रूस के विरु( अमरीका के साथ रागात्मक संबंध् रखने वाला नहीं है। युवा-लेखक सामान्यतः वामपक्षी राजनीति के हिमायती हैं और कुछ तो किसी-न-किसी वामपक्षी दल से संबं( भी हैं, लेकिन अध्किांश में प्राक्‌-प्रतिब(ता ;प्रीकमिटमेंटद्ध है, उन्होंने अप्रतिब(ता ;नान-कमिटमेंटद्ध का अंतिम निर्णय नहीं कर लिया है।

अप्रतिब(ता प्रायः मोहभंग की उपज है, जिसकी बहुलता पिछली पीढ़ी के लेखकों में पाई जाती है। युवा-लेखन मोहभंग का साहित्य नहीं है। युवा-लेखकों ने कभी कोई मोह पाला ही नहीं जो उसका भंग होता । वह तो मोहभंग के बाद के वातावरण की उपज है, इसलिए न तो उस रूप में ‘रोमैंटिक’ है और न उस रूप में ‘एंटी-रोमैंटिक’। उसकी तल्खी का रंग ही और है। जहाँ तक युवा लेखकों की ‘प्राक्‌-प्रतिब(ता’ के विकास की दिशा का संबंध् है, उसके बारे में इतना तो स्पष्ट है कि ऐतिहासिक विकास के समानांतर उनमें भी एक निश्चित प्रकार की स्पष्टता और दिशोन्मुखता आ रही है। शुरू में जो चेतना एक तथाकथित ‘ इस्टैब्लिशमेंट’ के विरु( अस्पष्ट से असंतोष के रूप में मुखर हो रही थी, वह अब प्रतिष्ठित सत्ता के आधरों को विविक्त करने लगी है। पिछले दशक में युवकों को जिस प्रकार राजनीति से बाहर रखने की मिली-जुली साजिश की गई और वामपंथी दलों ने भी युवकों के प्रति जैसी उदासीनता दिखलाई, उसे देखते हुए युवा-लेखकों की इतनी जागरूकता भी गनीमत है।

इस प्रकार युवा-लेखन जिस ‘बोध्’ के आधर पर निर्मित हुआ है वह वस्तुनिष्ठ ऐतिहासिक स्थिति के सम्मुख बहुत-सी मनोगत सीमाओं के बावजूद वस्तुस्थिति को यथासंभव साहस के साथ देख सकने का आभास देता है। ‘मानवीय नियति का साक्षात्कार’ और ‘वास्तविकता का नंगे बदन संस्पर्श’ की आवाज इसी दौर में उठाई गई और उस दिशा में प्रयास भी किया गया है। समाजशास्त्राीय ‘वस्तुनिष्ठ’ औजारों से आज की स्थिति को देख सकने में समर्थ विद्वानों को युवा-लेखन का संसार एकांगी, अधूरा, कुछ विकृत, कुछ अतिरंजित भी लग सकता है किंतु इतना निश्चित है कि वह आदर्श-रंजित नहीं है। एक विशेष कोण से देखे जाने के कारण परिप्रेक्ष्य में अंतर हो सकता है, लेकिन रोशनी की तेजी में कमी नहीं है। यह तेजी ही युवा-लेखन की शक्ति है, और वैचारिक प्रतिज्ञाओं का ढाँचा गिर जाने के बाद भी सर्जनात्मक कृतियों को कायम रखती है। युवा-लेखन का रचना-संसार निस्संदेह बेहद खूँखार, भयावह और अजनबी है, किंतु अपनी सृजनशीलता के द्वारा वह यह भी व्यंजित कर देता है कि यह यथार्थ नहीं बल्कि यथार्थ का ‘कलात्मक भ्रम’ है और यह मायावीपन ही उसकी कलात्मकता का रहस्य है।

युवा-लेखन कविता और कथा दोनों विधओं के समान रूप से व्यक्त होने वाला एक समेकित आंदोलन है, पिछले युग के नवलेखन के समान ‘नई कविता’ में कुछ और तथा ‘नई कहानी’ में कुछ और ,जैसा विभक्त एवं खंडित युगबोध नहीं। यह समग्रता उसकी विशेषता है। युवा-लेखन ‘प्रयोगवाद’ की तरह न तो शिल्पगत प्रयोग का आंदोलन है और न ‘नई कविता’ की तरह अनुभूतियों की अद्वितीयत का आग्रह। यह ”परिस्थिति की तात्कालिक भाषा” है जिसे युवा-लेखक इतिहास में अपनी विशेष ‘स्थिति’ के कारण पकड़ने के समर्थ हो सके। युवा-लेखन का महत्त्व ‘आवाँ गार्द’ होने में नहीं है-‘आवाँ गार्द’ होने की दिशा में उसका प्रयास भी नहीं है। ‘समकालीनता’ उसकी सार्थकता है और संभवतः नियति भी। इस ‘ऐतिहासिक’ अभियान में जो ‘साहित्यिक’ उपलब्ध्ि हुई है उसका अनुमान सिपर्फ इस बात से लगाया जा सकता है कि -‘अकविता’ और अकहानी’ तक की ध्ज्जियाँ उड़ाने वाले भी इनकी कमजोरियाँ तो गिना देते हैं, लेकिन वहीं इनके समानांतर ‘नई कविता’ और ‘नई कहानी’ को बेहतर साबित करने का साहस नहीं जुटा पाते। इस लेखन से सामाजिक स्थिति भले ही न बदली हो, साहित्यिक स्थिति निश्चय ही बदल गई है, जिसका प्रमाण यह है कि पूर्ववर्ती लेखक भी इसी भाषा में बोलने का प्रयास करने लगे हैं। यह छायावाद की शक्ति थी कि मैथिलीशरण गुप्त भी ‘झंकार’ लिखने के लिए विवश हो गए थे। युवा-लेखन ने भी बहुतों को मैथिलीशरण बनने के लिए बाध्य कर दिया है।

जरूरी नहीं कि इतिहास को इसी तरह दोहराया जाए। अपनी जगह से भी एक वास्तविकता का साक्षात्कार तो किया ही जा सकता है, लेकिन इससे भी आगे बढ़कर जो युवा-लेखन के विकास में सक्रिय भाग लेना चाहते हैं और केवल मुहावरे में नहीं, बल्कि सच्चे मन से युवकों को भविष्य मानते हैं और उस भविष्य के निर्माण की चिंता करते हैं, उनके लिए एक युवा-कवि धूमिल के शब्दः

तुम मेरी चिंता मत करो। उनके साथ

चलो। इससे पहले कि वे

गलत हाथों के हथियार हों

इससे पहले कि वे नारों और इश्तिहारों से

काले बाजार हों

उनसे मिलो। उन्हें बदलो। 

;१९६८

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1 Comment on "नामवर सिंह और युवालेखन की उलटबाँसी"

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GGShaikh
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एक ही बैठक में पढ गया पूरा आलेख… जोकि ऐसा मेरे साथ कम ही होता है… लोकतंत्र’ पर इतना विषद विश्लेषण अभी-अभी पढ रहा हूँ…इस आलेख में आपने कहा है: “लोकतंत्र में कोई भी चीज खैरात में नहीं मिलती…अर्जित करने को संघर्ष करना पडता है, यहाँ तक कि अपनी पहचान को भी अर्जित करना पडता है… लोकतंत्र का शोर्टकट नहीं है. – युवामन का तानाबाना परिवार और शिक्षा के मूल्यों से गुज़रते हुए बनता है. – स्कूली शिक्षा में संघर्ष भावना का एक सिरे से अभाव है.. – विद्रोही युवामन को फार्मूलों से नहीं समझा जा सकता… – अधीनता शिखाती… Read more »
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