लेखक परिचय

श्‍वेता यादव

श्‍वेता यादव

जन्‍म -17 अप्रैल 1987। मूलत: आजमगढ़, उत्तर प्रदेश की रहनेवाली। वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय से जनसंचार विषय में स्नातकोत्तर की डिग्री प्राप्‍त। वर्तमान में स्वयंसेवी संस्था जनसेवाश्रम में जन संपर्क अधिकारी के पद पर कार्यरत और स्वतंत्र लेखन।

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तेरे माथे पे ये आँचल बहुत ही खूब है लेकिन !

तू इस आँचल से एक परचम बना लेती तो अच्छा था ।

–मजाज़ की कलम से

21_04_2013-rape19aयह तो सभी मानते हैं कि लिखना एक अच्छी विधा है और सभी लोगों से (जो पढना-लिखना जानते है) उनसे यह उम्मीद की जाती है कि वो पढ़ें और जिन मुद्दों पर उन की समझ बनती है, फिर चाहे वह पक्ष में बने या विपक्ष में उन्हें लिखना चाहिए। मेरे लिए लिखना इसलिए भी जरूरी हो गया है क्योंकि मैं एक नारी हूँ और उससे भी ज्यादा मैं इस देश का एक हिस्सा हूँ। उस देश का हिस्सा जहाँ आये दिन दुनिया की आधी आबादी मानी जाने वाली महिलाओं के साथ कुछ न कुछ गलत घट रहा है। हर तीसरे मिनट कुछ ऐसा घट रहा है जिससे पूरे विश्व में देश का सर शर्म से निचे झुक रहा है। चिंता का विषय यह है कि जिस देश में नारी को देवी का दर्ज़ा देकर पूजा जाता है उसी देश में उसका इतना बुरा हाल आखिर क्यूँ? क्या यह उन वहशियों की गलती है या फिर समाज या आखिरी तोहमद के रूप में सरकार की। खैर! गलती चाहे जिसकी भी हो सजा अन्तत: नारियों को ही मिल रही है। सजा भी ऐसी जो ताउम्र शायद भुलाये न भूले ।

अब तो अख़बार उठाने खबर पढने में भी डर लगता है कि पता नहीं आज कौन सी सोनाली का चेहरा तेजाब से बिगड़ा होगा, पता नहीं आज देश के किस हिस्से में गोहाटी या फिर राजस्थान जैसी शर्मिंदा करने वाली घटना घटी होगी। आज दुःख है शर्मिंदगी है गुस्सा और खीझ है। लेकिन यह गुस्सा और खीझ सिर्फ मर्दों तक ही सीमित नहीं है। आज यह गुस्सा उन औरतों से भी है जो समाज में ऊँचे कहे जाने वाले पदों पर आसीन है, पर क्या वह इतनी ऊंचाई पर पहुंच चुकी है कि मनुष्य होने के नाते उनसे जिन संवेदनाओं की उम्मीद की जाती है वह उसे भी भूल चुकी है। जींस पहनने से रोक देना या फिर यह सलाह देना कि लड़कियों को अपने पहनावे पर ध्यान देना चाहिए। इन वाहियात बातों से अगर ये घटनाएँ रूकती हैं तो नतीजन सोनाली जैसी घटना नहीं होनी चाहिए थी।

आज कुछ मुद्दों पर देश में जोरों से बहस चल रही है। जिसमे अलका लांबा को गुवहाटी की पीडि़ता का नाम सार्वजनिक करना चाहिए था कि नहीं, क्या सोहांबरी देवी (अध्यक्ष भारतीय महिला किसान सभा) को यह अधिकार है की वो यह फैसला लें कि उनके यहाँ लड़कियां क्या पहनेंगी और क्या नहीं,या फिर राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष ममता शर्मा द्वारा महिलाओं के पहनावे को लेकर की गयी टिप्पणी। हम सभी इन मुद्दों पर इतना उलझ गए है कि असली बात हमसे कहीं दूर छूट गई है। हमें जरुरत यह समझने की है कि आये दिन ऐसी घटनायें क्यों हो रही हैं। इनके पीछे की राजनीति क्या है ? क्यों कानून समाज या सरकार इतनी लचर, मजबूर या निक्कमी हो गई है कि इस पर कोई रोक नहीं लगा पा रही है। अगर रेप कपड़ों की वजह से हो रहे हैं लोगों की बीमार मानसिकता की वजह से नहीं तो, फिर दो साल की बच्ची के साथ रेप का मामला सामने नहीं आना चाहिए, जबकि ऐसा एक नहीं बल्कि बहुत सारे मामले हमें और हमारी व्यचवस्थाक तथा समाज को मुंह चिढ़ा रहे हैं। चलिए अगर एक पल के लिए इस बात को मान भी लें कि रेप कपड़ो की वजह से होते हैं तो फिर ऐसी मानसिकता वाले व्यक्ति से तो उसकी अपनी माँ, बहन, बेटी भी सुरक्षित नहीं हो सकती। ये मामले इतने आसन नहीं है जितना कि दिखते हैं। यह हैवानियत लड़कियों के पहनावा बदल लेने से नहीं रुकने वाली हमे अपने सोच को बदलने की जरुरत है। हम खुद को मजबूत करें और हर उस छोटी से छोटी बात का विरोध करें जो गलत है।

ये जितने भी बयान आये हैं वो महिलाओं को सुरक्षा नहीं बल्कि और असुरक्षा की तरफ धकेलते हैं। यह तो वही बात हो गई कि पागल के सामने यह कहो कि देखो वह पत्थर उठा कर मार न दे। पागल को खबर नहीं थी पत्थर की लेकिन कहने से उसका ध्यान पत्थर पर चला गया। ठीक इसी तरह हम मुजरिमों को उनकी गलतियों का अहसास दिलाने की बजाय उनके हाँथ में पत्थर पकड़ाने का काम कर रहे हैं। उन्हें यह सिखा रहे है कि जुर्म करो और उसकी सफाई ऐसे दो कि लड़की ने कपडे़ सही नहीं पहने थे इसलिए मेरी कुंठित मर्दानगी जग गई और मैंने ऐसा किया। शायद बयानबाजी करती इन महिलाओं को यह अहसास भी नहीं है कि वो ऐसा करके अपना निजी स्वार्थ तो सिद्ध कर लेंगी, लेकिन वे यह भूल जाती हैं कि बकरी की माँ कब तक खैर मनाएगी। आज़ादी के 65 साल पश्चात् भी देश में बहस नारियों के पहनावे को लेकर हो रही है यह इस देश की सबसे बड़ी विडम्बना है। हम पहनावे पर जोर न देकर के इस बात पर ध्यान दें कि महिलाओं को सबल कैसे बनाया जाये। ऐसे क्या-क्या उपाय हैं जिससे महिला अपने को सुरक्षित रख सके। तब जाकर शायद हम इन अपराधों को रोक सकेंगे। और तब सही मायनों में एक सभ्य भारत का निर्माण संभव है। यह तो सभी मानते हैं कि जिस प्रकार गाड़ी बिना दो पहियों के नहीं चल सकती उसी प्रकार जीवन भी। फिर जीवन के एक पहिये का इतना निरादर क्यों? क्यों इतनी कुंठा है इस पहिये के प्रति? क्या यह नारी होने की सजा है?

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1 Comment on "क्या यह नारी होने की सजा है?"

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इक़बाल हिंदुस्तानी
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Desh में आज भी जगल का कानून चल रहा सलिए जो कमजर है वेह पिट हाइ. नारी भी कमजोर है इसलिए उको सशक्त bnana hi ekmaatra समाधान है.

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