लेखक परिचय

अरुण तिवारी

अरुण तिवारी

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प्रस्तुति: अरुण तिवारी

प्रो जी डी अग्रवाल जी से स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद जी का नामकरण हासिल गंगापुत्र की एक पहचान आई आई टी, कानपुर के सेवानिवृत प्रोफेसर, राष्ट्रीय नदी संरक्षण निदेशालय के पूर्व सलाहकार, केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के प्रथम सचिव, चित्रकूट स्थित ग्रामोदय विश्वविद्यालय में अध्यापन और पानी-पर्यावरण इंजीनियरिंग के नामी सलाहकार के रूप में है, तो दूसरी पहचान गंगा के लिए अपने प्राणों को दांव पर लगा देने वाले सन्यासी की है। जानने वाले, गंगापुत्र स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद को ज्ञान, विज्ञान और संकल्प के एक संगम की तरह जानते हैं।

मां गंगा के संबंध मंे अपनी मांगों को लेकर स्वामी ज्ञानस्वरूप सांनद द्वारा किए कठिन अनशन को करीब सवा दो वर्ष हो चुके हैं और ’नमामि गंगे’ की घोषणा हुए करीब डेढ़ बरस, किंतु मांगों को अभी भी पूर्ति का इंतजार है। इसी इंतजार में हम पानी, प्रकृति, ग्रामीण विकास एवम् लोकतांत्रिक मसलों पर लेखक व पत्रकार श्री अरुण तिवारी जी द्वारा स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद जी से की लंबी बातचीत को सार्वजनिक करने से हिचकते रहे, किंतु अब स्वयं बातचीत का धैर्य जवाब दे गया है। अतः अब यह बातचीत को सार्वजनिक कर रहे हैं। हम, प्रत्येक शुक्रवार को इस श्रृंखला का अगला कथन आपको उपलब्ध कराते रहेंगे यह हमारा निश्चय है।

इस बातचीत की श्रृंखला में पूर्व प्रकाशित कथनों कोे पढ़ने के लिए यहंा क्लिक करें।
आपके समर्थ पठन, पाठन और प्रतिक्रिया के लिए प्रस्तुत है:

स्वामी सानंद गंगा संकल्प संवाद – 14वां कथन
1916 में जिस सरकार के राज्य में सूरज नहीं डूबता था। भारत में उसका गर्वनर बैठता था। फिर भी सरकार ने समझौता किया। आप याद कीजिए कि 1916 के गंगा समझौते में क्या हुआ था। 75 लोग थे; 35 सरकारी और 40 गैरसरकारी। केन्द्र, राज्य, इंजीनियरिंग, स्वास्थ्य .. ये सभी प्रथम समूह में थे। गैरसरकारी में प्रजा, संत, सन्यासी, सामाजिक कार्यकर्ता और गंगा रिवर बेसिन के राजा-महाराजा थे। कौन नहीं था ? एक तरह से सभी के प्रतिनिधि थे। सरकारी अधिकारी भी निश्चय करके हस्ताक्षर कर सके; समूह बैठकर निर्णय ले सके। किंतु यह अब कैसे हो ?

लोग सुविधाओं के लिए वोट देते हैं, पर्यावरण के लिए नहीं

हमने हरसंभव कोशिश की। अविमुक्तेश्वरानंद जी व मैने कोशिश की कि कैसे गंगा मुद्दा बने। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के श्री मोहन भागवत जी से बात हुई, तो उन्होने कहा कि इलेक्शन तक हमारी बात होगी। दरअसल, अब गंगा से हिंदू वोट नहीं मिलता। नहर के नाम से वोट मिलता है। उन्हे भय रहता है कि नहरों के कारण गांव, गंगा से नहरों में पानी निकासी कम करने का विरोध करेंगे। शहर, बिजली के लालच में होते हैं। शायद इसीलिए लोग जुङ नहीं पाते। विकास का मतलब ही सुविधा हो गया है। लोग सुविधाओं के लिए वोट देते हैं, पर्यावरण के लिए नहीं। नहर सुविधा है, गंगा पर्यावरण; कैसे हो ?

(स्वामी जी का यह कथन सच है और विचारणीय भी। विचार करने की बात है कि वह क्या परिस्थितियां होंगी, जब लोग पर्यावरण के लिए वोट करेंगे ? क्या यह महज् जागरुकता से होगा या इसके लिए करना कुछ और पङेगा ?? – प्रस्तोता )

इको सेंसिटिव ज़ोन की व्यावहारिकता-अव्यावहारिकता

अब इको सेंसिटिव ज़ोन को लेकर देखिए कि विरोध हो रहा है। क्यों ? यह सही है कि भागीरथी इको सेंसिटिव ज़ोन को लेकर जो मांगा, वह उससे कई गुना अधिक है। लेकिन मुझे लगता है कि वह अव्यावहारिक है, इसलिए विरोध हो रहा है। अव्यावहारिक यह कि भागीरथी से एक किलोमीटर का भाग इको संेसेटिव होना चाहिए। समुद्री कोस्टल रीजनल ज़ोन 500 मीटर की बात करता है, तो गंगाजी के लिए एक किलोमीटर रखें। यह मैने कहा। अन्य नदियों के लिए कम हो।

इस मांग का व्यावहारिक पहलू यह है कि जो मांगो, वह नहीं मिलता। पहले मिनिस्ट्री की तरफ से आया कि 100 मीटर कर देते हैं। 100 मीटर पर मैं नहीं माना, तो 500 मीटर पर समझौता करना पङा। उन्होने पूरी भागीरथी घाटी के लिए नोटिफिकेशन जारी कर दिया। उसमें जाङगंगा, भिलंगना…. सब घाटियां आ गईं, तो यह विरोध का कारण बना। कई बार मांग को जानबूझकर भी अव्यावहारिक करार दिया जाता है; ताकि विरोध हो और हम कैंसल करें। उसे अव्यावहारिक करार देने से अलकनंदा और मंदाकिनी की राह कठिन हो गई है।

गंगा अथाॅरिटी को मोडिफाई करने की जरूरत

मैं, एक इंजीनियर हूं। मैं सुझाव की व्यावहारिकता देखता हूं। मैं विकल्पों को देखता हूं। यह भी देखता हूं कि विकल्पों के बीच क्या अधिकार होना चाहिए। वह अधिकार किसे हो; यह भी स्पष्ट होना चाहिए। यह भी देखता हूं कि निर्णय की प्रक्रिया क्या हो ? ग्राउंड लेवल से लेकर संेट्रल लेवल तक प्रबंधन को देखता हूं। आज मैं इस नतीजे पर पहुंचा हूं कि गंगा बेसिन अथाॅरिटी को मोडिफाई करना पङेगा। पर्यावरण एवम् वन मंत्रालय इस काम के लिए सुटेबल नहीं है। अथाॅरिटी के भीतर फुलटाइम मशीनरी रखनी होगी। इसीलिए मैने बिल बनाया है। गंगा महासभा, सरकार आदि के साथ उस पर बहस की जरूरत है।

(शाम घिर आई थी।एक तहर से यह मेरा स्वार्थ ही था कि मैं उनकी बात रोकने के पक्ष में नहीं था। मैं ज्यादा से ज्यादा जान लेना चाहता था। इस लालच में मैने सोचा था कि मैं वहीं अस्पताल के कमरे में एक कोने ज़मीन पर सो रहूंगा। किंतु उन्हे मेरी चिंता थी। स्वामी जी ने मेरे रहने की व्यवस्था, श्री रवि चोपङा जी के घर में की थी। बसंत विहार – मुझे वहीं रात बितानी थी। मैं देहरादून के रास्तों से अनजान था। इसीलिए स्वामी जी ने मुझे शाम के आठ बजते-बजते विदा कर दिया। अच्छा लगा कि रवि चोपङा जी भाईसाहब ने मुझे पूरे उत्साह से लिया। सुबह जल्दी उठकर खुद अपने हाथ से मेरे लिए चाय व नाश्ता बनाया। नाश्ते पर रवि जी से अमेठी, कांग्रेस, गंगा, तरुण भारत संघ, राजेन्द्र सिंह से लेकर घर-परिवार की कई बातें हुईं। अच्छा लगा कि उन्होने यह जानने की कोशिश नहीं कि स्वामी जी से मेरी क्या बात हुई। मैने रात ही सोच लिया था कि अगले दिन गंगा हेतु किए जा रहे प्रयासों को लेकर स्वामी जी के मन की आशा और निराशा को टटोलुंगा। कुछ निजी परिचयात्मक जीवनगाथा के बारे में जानूंगा। सोचा था कि स्वामी जी के समक्ष लोगों की इस अनुभूति को भी रखूंगा, जो स्वामी को स्वभाव से रूखा और निजी निर्णय को आगे रखने वाला पाती है। सो, साढे़ आठ बजे अस्पताल पहुंच गया। एक अक्तूबर, 2013 – आज यही तारीख है। आज स्वामी के उपवास का 111वां दिन है। उनके साथ संवाद का मेरा दूसरा दिन है। मेरे पहुंचने से पहले ही स्वामी जी तैयार बैठे थे। जैसे मेरा ही इंतजार कर रहे हों। रवि जी के यहां अथवा घर ढूंढने में कोई तकलीफ तो नहीं हुई ? इसी कुशलक्षेम के साथ बात शुरु हुई। मैने भी गंगा प्रयासों से निकले नतीजों के प्रति आशा-निराशा संबंधी प्रश्न उनके समक्ष रख दिया। जवाब देखिए।
– प्रस्तोता )

अगले जन्मों में भी गंगा कार्य की आकांक्षा

इस स्टेज में मेरा जीवन, मेेरे लिए बिल्कुल भी महत्वपूर्ण नहीं है। गंगाजी महत्वपूर्ण हैं। हालांकि विवेकानंद जी कहा था कि जन्म-मरण से मुक्ति मानव का लक्ष्य होना चाहिए, किंतु मैं स्पष्ट हो रहा हूं। मेरा अपना लक्ष्य, मेरी मुक्ति भी नहीं है। मैं तो अगले जन्मों में भी गंगाजी का काम करना चाहूंगा।

किन्हे एक्सपोज करना जरूरी ?

फिलहाल मैं कांग्रेस की वर्तमान सरकारों को एक्सपोज करना चाहता हूं। मैं नहीं कहता हूं कि बाकि सब अच्छी हैं। लेकिन सभी को एक्सपोज करने से एक्सपोजर का महत्व घट जाता है। उतना ही मैं चाहता हूं कि धार्मिक नेताओं को भी एक्सपोज किया जाये।

विश्व हिंदू परिषद ने गंगा जी के लिए क्या किया ?

अब देखिए कि रामदेव जी ने ’गंगा रक्षा मंच’ स्थापित किया। मैने 13 जून, 2008 को अपना अनशन करने की घोषणा की थी। शायद 16 जून को रामदेव जी ने ’गंगा रक्षा मंच’ की पहली बैठक रखी थी। उससे पहले विश्व हिंदू परिषद के सचिव श्री राजेन्द्र पंकज मेरे यहां आये थे। उन्होने कहा था कि अनशन न शुरु करें; 16 की बैठक में शामिल हों। बताया था कि गोविंदाचार्य जी उसका संयोजन करेंगे। मैने ऐसा सोचा था कि किसी को उस बैठक में भेजूंगा। पता चला कि गोविंदाचार्य जी ने संयोजन करने से मना कर दिया। प्रश्न यहां यह है कि उस वक्त विश्व हिंदू परिषद के सचिव गंगा के काम के नाम पर मेरे घर आये; आज वह गंगाजी के लिए क्या कर रहे हैं ?
क्या गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित कराने वालों ने दायित्व निभाया ?

तो यूं तो एक्सपोज तो सभी को, लेकिन जिनकी भूमिका गंगा अथाॅरिटी और गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित कराने में रही, उनका दायित्व अन्य से अधिक है कि नहीं। उन्होने दायित्व नहीं निभाया, तो उन्हे तो एक्सपोज करना ही चाहिए।

हिंदू संस्कृति के नाम की रोटी खाने वालों ने क्या किया ?

तीसरा, कथावाचकों को एक्सपोज करने की जरूरत है। 2006 में एक रामदेव ने एक सभा की थी। उसमें मुरारी बापू भी थे। उन्होने कहा – ’’ मैं तो गंगाजल ही पीता हूं। गंगाजल में सने आटे की रोटी बनाकर खाता हूं।’’ श्री श्री रविशंकर ने भी गंगा संरक्षण को लेकर कुछ कहा। मुझे लगता है कि जो कोई भी हिंदू संस्कृति के नाम से रोटी खाता है, उसने हिंदू संस्कृति के लिए क्या किया ? किसी को उनसे पूछना चाहिए। जाहिर है कि यह स्वामी सानंद नहीं, सरकारों और धर्माचार्यों के साथ हुए कटु अनुभव बोल रहे थे।

( अपने अनुभवों के कारण स्वामी सानंद दुखी दिखे और भीतर ही भीतर क्रोधित भी। सो बातचीत को मैने संवाद का रुख स्वामी जी की जन्मस्थली कांधला, बचपन, स्कूल-काॅलेज और उनके स्वर्गीय बाबा बुधसिंह से मिले संस्कारों की स्मृतिकथा की ओर मोङ दिया। यह स्मृतिकथा आज से पहले कभी मेरी जानकारी में नहीं आई। आपकी जानकारी में भी नहीं आई होगी। संभवतः स्वामी जी ने इससे पूर्व किसी से कही ही न हो। इससे जानना सचमुच बेहद दिलचस्प होगा। – प्रस्तोता)

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